अध्याय: लघु व्यवसाय एवं उद्यम (Small Business and Enterprises)
त्वरित पुनरीक्षण नोट्स (Quick Revision Notes)
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1. लघु व्यवसाय का परिचय (Introduction to Small Business)
भारत जैसे विकासशील देश में जहाँ श्रम प्रचुर मात्रा में है और पूँजी सीमित है, लघु व्यवसाय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। ये कम पूँजी, स्थानीय संसाधनों और न्यूनतम तकनीक से संचालित होते हैं।
- विशेषताएँ:
- स्वामित्व: आमतौर पर एकल स्वामित्व (Sole Proprietorship) या साझेदारी (Partnership) के रूप में होते हैं।
- प्रबंध: प्रबंध का नियंत्रण सीधे मालिक के हाथ में होता है (प्रत्यक्ष नियंत्रण)।
- श्रम प्रधान: इनमें मशीनों की तुलना में श्रम का उपयोग अधिक होता है।
- क्षेत्र: इनका कार्यक्षेत्र आमतौर पर स्थानीय (Local) होता है।
- संसाधन: स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हैं।
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2. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 (MSMED Act, 2006)
भारत सरकार ने उद्यमों के वर्गीकरण के लिए निवेश (Investment) और टर्नओवर (Turnover) के आधार पर नई परिभाषा निर्धारित की है:
- सूक्ष्म उद्यम (Micro Enterprise):
- निवेश: 1 करोड़ रुपए से अधिक नहीं।
- वार्षिक टर्नओवर: 5 करोड़ रुपए से अधिक नहीं।
- लघु उद्यम (Small Enterprise):
- निवेश: 10 करोड़ रुपए से अधिक नहीं।
- वार्षिक टर्नओवर: 50 करोड़ रुपए से अधिक नहीं।
- मध्यम उद्यम (Medium Enterprise):
- निवेश: 50 करोड़ रुपए से अधिक नहीं।
- वार्षिक टर्नओवर: 250 करोड़ रुपए से अधिक नहीं।
(नोट: यह वर्गीकरण विनिर्माण (Manufacturing) और सेवा (Service) दोनों प्रकार के उद्यमों पर लागू होता है।)
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3. ग्रामीण क्षेत्रों में लघु उद्योगों का महत्व (Role of Small Business in Rural India)
- रोजगार सृजन: कृषि पर निर्भरता कम करके ग्रामीण युवाओं को रोजगार प्रदान करना।
- आय का समान वितरण: धन का संकेंद्रण कुछ हाथों में होने से रोकता है।
- कला और संस्कृति का संरक्षण: पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को बढ़ावा देना।
- प्रवास रोकना: ग्रामीण लोगों का शहरों की ओर पलायन रोकना।
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4. लघु उद्योगों की समस्याएँ (Problems of Small Scale Industries - SSIs)
लघु व्यवसायों को अपने दैनिक संचालन में निम्नलिखित प्रमुख कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है:
1. वित्त की कमी (Shortage of Finance): बैंकों से आसानी से ऋण न मिलना और साहूकारों पर निर्भरता।
2. कच्चे माल की समस्या (Procurement of Raw Materials): गुणवत्तापूर्ण कच्चे माल की अनुपलब्धता और अधिक मूल्य।
3. विपणन की समस्या (Marketing Problems): बड़े उद्योगों से प्रतिस्पर्धा न कर पाना और विज्ञापन का अभाव।
4. अप्रचलित तकनीक (Outdated Technology): आधुनिक मशीनों और तकनीकी ज्ञान की कमी।
5. कुशल श्रमिकों की कमी (Lack of Skilled Labour): कम वेतन के कारण कुशल कर्मचारी नहीं टिकते।
6. बीमारी या रुग्णता (Sickness): कुप्रबंधन और वित्तीय संकट के कारण इकाइयों का बंद होना।
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5. सरकारी सहायता एवं प्रोत्साहन (Government Assistance and Measures)
सरकार द्वारा लघु उद्योगों के विकास के लिए उठाए गए कदम:
- संस्थागत सहायता (Institutional Support):
- NABARD (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक): ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को वित्तीय सहायता।
- District Industries Centres (DICs - जिला उद्योग केंद्र): एक ही छत के नीचे सभी सुविधाएँ और मार्गदर्शन प्रदान करना।
- NSIC (राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम): मशीनों को किराए पर (Hire-Purchase) देना और विपणन में मदद करना।
- SIDBI (भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक): लघु उद्यमों के वित्तपोषण के लिए शीर्ष बैंक।
- वित्तीय प्रोत्साहन (Financial Incentives): कम ब्याज दर पर ऋण, करों में छूट (Tax Concessions)।
- तकनीकी सहायता: अनुसंधान और विकास (R&D) में मदद।
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6. बौद्धिक संपदा अधिकार एवं पेटेंट (Intellectual Property Rights & Patents)
- बौद्धिक संपदा (Intellectual Property): मानव मस्तिष्क के नवाचार, आविष्कार और कलात्मक कृतियों पर कानूनी अधिकार।
- पेटेंट (Patent): किसी नए आविष्कार के लिए सरकार द्वारा दिया जाने वाला एकाधिकार (Exclusive Right), जिसके तहत कोई अन्य व्यक्ति उस आविष्कार का उपयोग बिना अनुमति के नहीं कर सकता।