#### अध्याय: रोजगार - वृद्धि, अनौपचारिकीकरण एवं अन्य मुद्दे
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1. श्रमिक (Worker):
वे सभी व्यक्ति जो आर्थिक गतिविधियों में लगे हुए हैं और देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान करते हैं, श्रमिक कहलाते हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो काम की तलाश में हैं या काम करने के लिए उपलब्ध हैं (बेरोजगार)।
2. श्रम बल (Labour Force):
15 से 59 वर्ष की आयु के वे सभी व्यक्ति जो या तो काम कर रहे हैं (employed) या काम करने के इच्छुक और तलाश में हैं (unemployed)।
3. कार्य बल (Workforce):
वास्तव में जो लोग किसी न किसी आर्थिक गतिविधि में लगे हुए हैं, उन्हें कार्य बल कहते हैं। इसमें बेरोजगार लोग शामिल नहीं होते।
4. बेरोजगारी दर (Unemployment Rate):
श्रम बल का वह प्रतिशत जो काम की तलाश में है लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा है।
5. श्रमिक-जनसंख्या अनुपात (Worker-Population Ratio - WPR):
यह देश की कुल जनसंख्या और उसके कार्य बल के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसका उपयोग देश में रोजगार के स्तर का आकलन करने के लिए किया जाता है।
WPR = (कुल कार्य बल / कुल जनसंख्या) × 100
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1. स्व-रोज़गार (Self-employed):
वे श्रमिक जो अपनी खुद की आजीविका या व्यवसाय चलाते हैं और अपने संसाधनों का उपयोग करते हैं (जैसे- दुकानदार, किसान)। भारत में यह रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है।
2. नियमित वेतनभोगी कर्मचारी (Regular Salaried Employees):
वे श्रमिक जिन्हें किसी नियोक्ता (Employer) द्वारा नियुक्त किया जाता है और नियमित रूप से वेतन या मजदूरी मिलती है (जैसे- सरकारी कर्मचारी, कंपनियों के पक्के कर्मचारी)। इन्हें सामाजिक सुरक्षा लाभ (जैसे- पेंशन, भविष्य निधि) मिलते हैं।
3. आकस्मिक श्रमिक (Casual Wage Labourers):
वे श्रमिक जिन्हें दैनिक आधार पर काम मिलता है और उनकी मजदूरी अनिश्चित होती है (जैसे- दिहाड़ी मजदूर, निर्माण कार्य में लगे मजदूर)। इन्हें कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलता।
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इसमें वे सभी सार्वजनिक प्रतिष्ठान और निजी प्रतिष्ठान आते हैं जहाँ 10 या उससे अधिक श्रमिक काम करते हैं। इन्हें 'संगठित क्षेत्र' भी कहते हैं। यहाँ श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा और श्रम कानूनों का संरक्षण मिलता है।
इसमें वे सभी उद्यम शामिल हैं जो 10 से कम श्रमिकों को रोजगार देते हैं। यहाँ कोई श्रम कानून लागू नहीं होता और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा (चिकित्सा अवकाश, पेंशन आदि) मिलती है।
जब कुल कार्य बल में से औपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों का अनुपात कम होने लगता है और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों का अनुपात बढ़ने लगता है, तो इसे रोजगार का अनौपचारिकीकरण कहा जाता है।
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1. प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment):
जब किसी काम में जितने लोगों की आवश्यकता होती है, उससे अधिक लोग लगे होते हैं। यदि उनमें से कुछ लोगों को हटा भी दिया जाए, तो कुल उत्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता। (विशेषकर कृषि क्षेत्र में)।
2. मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment):
जब वर्ष के कुछ विशेष महीनों में (जैसे कृषि कटाई या बुवाई के बाद) लोगों को काम नहीं मिलता है।
3. औद्योगिक बेरोजगारी (Industrial Unemployment):
जब शहरी क्षेत्रों या उद्योगों में काम करने के इच्छुक लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिलता।
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1. मनरेगा (MGNREGA - महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम): ग्रामीण क्षेत्रों में हर परिवार को वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी।
2. कौशल विकास योजना (Skill Development Programmes)।
3. प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP)।