कक्षा 11वीं हिंदी (आरोह भाग-1)
पाठ: मिया नसीरुद्दीन (लेखिका: कृष्णा सोबती) - त्वरित पुनरावृत्ति नोट्स (Quick Revision Notes)
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### परिचय एवं पाठ का सार
- लेखिका: कृष्णा सोबती
- विधा: संस्मरण / शब्द-चित्र (यह 'हम हशमंत' नामक संग्रह से लिया गया है।)
- मुख्य पात्र: मिया नसीरुद्दीन (56 किस्म की रोटियां बनाने के लिए प्रसिद्ध मसीहा-नॉनबाई)।
- उद्देश्य: इस पाठ में मिया नसीरुद्दीन के व्यक्तित्व, उनके मज़ाकिया अंदाज, उनके खानदानी पेशे के प्रति लगाव और उनके जीवन के अनुभवों का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है।
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### मुख्य बिंदु एवं कथा-सार
1. जामामास्र्द के गढ़ैया मोहल्ला:
- लेखिका एक दिन मटिया महल के अंदर के गढ़ैया मोहल्ले की तरफ निकलीं।
- वहाँ अंधेरी और किचकिच भरी सड़कों पर एक मद्धम आवाज सुनी, जो आटे को सानने की आवाज थी।
2. खानदानी नानबाई की दुकान:
- लेखिका ने जब छानबीन की तो पता चला कि वह मिया नसीरुद्दीन की 'खानदानी नानबाई' की दुकान है।
- मिया नसीरुद्दीन चारपाई पर बैठे बीड़ी पी रहे थे। उनके चेहरे पर उम्र का अनुभव, आंखों में चुस्ती और माथे पर कारीगरी के तेवर थे।
3. अखबारनवीस (पत्रकार) से नाराजगी:
- जब लेखिका ने उनसे बातचीत शुरू की और सवाल पूछने चाहे, तो मिया साहब ने अखबार पढ़ने वालों और अखबार छापने वालों को आड़े हाथों लिया।
- उनके अनुसार, "अखबार बनाना और पढ़ना दोनों निकम्मे लोगों का काम है।"
4. खानदानी हुनर (कला):
- मिया नसीरुद्दीन अपने खानदानी पेशे पर बहुत गर्व करते थे।
- उन्होंने बताया कि उन्होंने यह इल्म (कला) अपने वालिद (पिता) मिया बरकत शाही नानबाई से सीखा था। उनके दादा का नाम मिया कलन नानबाई था।
- उन्होंने गर्व से बताया कि हमारे बुजुर्गों ने बादशाह के सामने एक ऐसा पकवान बनाया था, जो न आग से पकता और न पानी से बनता। (यह उनके खानदानी हुनर का अतिशयोक्तिपूर्ण बड़प्पन था)।
5. बादशाह का जिक्र:
- जब लेखिका ने उस बादशाह का नाम पूछना चाहा जिसके यहाँ उनके बुजुर्ग काम करते थे, तो मिया नसीरुद्दीन झेंप गए और गोलमोल जवाब देने लगे।
- वे बादशाह का नाम नहीं बता सके क्योंकि वे सिर्फ अपनी शान बघार रहे थे। उन्होंने कहा कि "बादशाह के नाम से क्या करना है, क्या आप सुल्तानी रोटियां खरीदना चाहती हैं?"
6. शागिर्द (शर्मिंदगी और सीखने की प्रक्रिया):
- मिया नसीरुद्दीन अपनी दुकान पर काम करने वाले कारीगर (शागिर्द) को मजदूरी देते थे - दो रुपए रोज और सूत का कपड़ा।
- जब लेखिका ने उनके कारीगरों के बारे में पूछा, तो उन्होंने टालमटोल किया।
7. पाठ का अंत:
- अंत में मिया नसीरुद्दीन ने अपने कारीगर बब्थन मिया को भट्टी सुलगने का आदेश दिया।
- लेखिका ने मिया से उनके काम के बारे में अंतिम सवाल किया और विदा ली।
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### महत्वपूर्ण शब्दार्थ (Key Vocabulary)
- नानबाई: तरह-तरह की रोटियां पकाने और बेचने वाला कारीगर।
- मसीहा-नॉनबाई: नानबाइयों के मसीहा (महान नानबाई)।
- इल्म: ज्ञान या कला।
- वालिद: पिता।
- शागिर्द: शिष्य या सीखने वाला (कारीगर)।
- अखबारनवीस: पत्रकार या अखबार छापने/पढ़ने वाला।
- गढ़ैया: दिल्ली का एक मोहल्ला।
- निगाहे-मशूकाना: प्यार भरी या तिरछी नजरें।
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### परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर बिंदु
- प्रश्न: मिया नसीरुद्दीन को 'नानबाइयों का मसीहा' क्यों कहा गया है?
- उत्तर: क्योंकि वे मटिया महल के गढ़ैया मोहल्ले के मिया नसीरुद्दीन अपनी छप्पन किस्म की र रोटियाँ बनाने की कला के लिए पूरे इलाके में मशहूर थे। वे इस पेशे को खानदानी हुनर मानते थे और इसके उस्ताद थे।
- प्रश्न: लेखिका ने मिया नसीरुद्दीन के पास जाने का कारण क्या बताया?
- उत्तर: लेखिका पत्रकारिता के सिलसिले में मटिया महल की तरफ गई थीं और एक मद्धम आवाज सुनकर जिज्ञासावश उनकी दुकान पर पहुँच गईं।
- प्रश्न: मिया नसीरुद्दीन के चेहरे के हाव-भाव कैसे थे?
- उत्तर: उनके चेहरे पर उम्र का अनुभव, आंखों में एक खास किस्म की तेजस्विता और माथे पर कारीगर के हुनर का गर्व साफ झलकता था।
उत्तर (Answer): उनका लहजा बेहद आत्मविश्वासी, रोबीला और अधिकारपूर्ण रहता है, जो उनके बड़प्पन को दर्शाता है।
उत्तर (Answer): उनका मानना था कि तालीम बड़ी चीज़ है, हुनर मेहनत और उस्ताद से तालीम लेने से आता है, सिर्फ खानदान से नहीं।