मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 12 भौतिकी - चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) - त्वरित पुनरीक्षण नोट्स
1. चुम्बकीय फ्लक्स (Magnetic Flux - $\Phi$)
- परिभाषा: किसी पृष्ठ से गुजरने वाली कुल चुम्बकीय बल रेखाओं की संख्या को चुम्बकीय फ्लक्स कहते हैं।
- सूत्र: $\Phi = B \cdot A = B A \cos\theta$
- जहाँ $B$ = चुम्बकीय क्षेत्र, $A$ = क्षेत्रफल, $theta$ = क्षेत्रफल सदिश और चुम्बकीय क्षेत्र के बीच का कोण।
- मात्रक: वेबर (Weber) या टेसला $\times$ मीटर$^2$ ($\text{T}\cdot\text{m}^2$)
- विमीय सूत्र: $[M^1 L^2 T^{-2} A^{-1}]$
- यह एक अदिश राशि है।
2. फैराडे के विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के नियम (Faraday's Laws of Electromagnetic Induction)
- प्रथम नियम: जब भी किसी बन्द कुंडली सेबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो कुंडली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न होता है। यह तब तक रहता है जब तक फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।
- द्वितीय नियम: प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) का परिमाण चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन की ऋणात्मक दर के बराबर होता है।
- सूत्र: $e = -\frac{d\Phi}{dt}$
- यदि कुंडली में $N$ फेरे हों: $e = -N \frac{d\Phi}{dt}$
3. लेन्ज का नियम (Lenz's Law)
- इस नियम के अनुसार, "प्रेरित विद्युत वाहक बल या प्रेरित धारा की दिशा हमेशा उस कारण (या परिवर्तन) का विरोध करती है जिससे वह स्वयं उत्पन्न होती है।"
- यह नियम ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित है।
- फैराडे के नियम में ऋणात्मक चिह्न (-) लेन्ज के नियम को ही दर्शाता है: $e = -\frac{d\Phi}{dt}$
4. गतिज विद्युत वाहक बल (Motional EMF)
- जब कोई चालक छड़ किसी एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र में गति करती है, तो उसके सिरों पर प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।
- सूत्र: $e = B \cdot l \cdot v$
- जहाँ $B$ = चुम्बकीय क्षेत्र, $l$ = छड़ की लंबाई, $v$ = वेग (यदि $B, l, v$ परस्पर लम्बवत् हों)।
5. स्वप्रेरण (Self-Induction)
- जब किसी कुंडली में प्रवाहित धारा के मान में परिवर्तन होता है, तो उसी कुंडली में चुम्बकीय फ्लक्स परिवर्तन के कारण एक प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। इस घटना को स्वप्रेरण कहते हैं।
- संबध: $\Phi \propto I \implies \Phi = L \cdot I$
- जहाँ $L$ = स्वप्रेरकत्व (Self-Inductance) या स्वप्रेरण गुणांक।
- प्रेरित विद्युत वाहक बल: $e = -L \frac{dI}{dt}$
- मात्रक: हेनरी (Henry या $\text{H}$)
- सपाट परिनालिका का स्वप्रेरकत्व: $L = \frac{\mu_0 N^2 A}{l}$
6. अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction)
- जब पास रखी दो कुंडलों में से प्राथमिक कुंडली की धारा में परिवर्तन किया जाता है, तो द्वितीयक कुंडली सेबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, जिससे द्वितीयक कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।
- संबध: $\Phi2 \propto I1 \implies \Phi2 = M \cdot I1$
- जहाँ $M$ = अन्योन्य प्रेरण गुणांक (Mutual Inductance)।
- प्रेरित विद्युत वाहक बल (द्वितीयक में): $e2 = -M \frac{dI1}{dt}$
- मात्रक: हेनरी (Henry)
7. भँवर धाराएँ (Eddy Currents)
- जब किसी ठोस धातु के टुकड़े को बदलते हुए चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो धातु के पूरे आयतन में पानी के भँवर जैसी प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं, जिन्हें भँवर धाराएँ (या फोको धाराएँ) कहते हैं।
- उपयोग: दग्धीकरण (Induction furnace), चुम्बकीय ब्रेक, विद्युत चुम्बकीय अवमंदन, और स्पीडोमीटर में।
8. प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (AC Generator)
- यह विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत पर कार्य करता है। यह यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।
- उत्पन्न तात्कालिक विद्युत वाहक बल (EMF): $e = e_0 \sin(\omega t)$
- जहाँ अधिकतम (शिखर) मान $e_0 = N B A \omega$
- $\omega$ = कोणीय वेग, $N$ = फेरों की संख्या, $A$ = क्षेत्रफल, $B$ = चुम्बकीय क्षेत्र।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 वैद्युतचुंबकीय प्रेरण
परिचय
मूल परिभाषा
चुंबकीय फ्लक्स की अवधारणा
चुंबकीय फ्लक्स ($\Phi$)
सूत्र ($\Phi = B \cdot A \cos\theta$)
मात्रक (वेबर)
फैराडे के प्रेरण के नियम
प्रथम नियम (प्रेरित विद्युत वाहक बल)
द्वितीय नियम (विद्युत वाहक बल की दर)
गणितीय रूप ($e = - \frac{d\Phi}{dt}$)
लेंज़ का नियम
ऊर्जा संरक्षण का नियम
प्रेरित धारा की दिशा निर्धारित करना
ऋणात्मक चिन्ह का महत्व
गतििक विद्युत वाहक बल (Motional EMF)
चुंबकीय क्षेत्र में गतिशील छड़
सूत्र ($e = Blv$)
भंवर धाराएँ (Eddy Currents)
परिभाषा और उत्पत्ति
हानियाँ
उपयोगी अनुप्रयोग (चुंबकीय ब्रेक, प्रेरण भट्टी)
प्रेरण (Inductance)
स्वप्रेरण (Self-Inductance)
परिभाषा
प्रेरकत्व (L) और सूत्र ($\Phi = LI$)
परिनालिका का स्वप्रेरण
अन्योन्य प्रेरण (Mutual Inductance)
परिभाषा
गुणांक (M)
दो लंबी समअक्षीय परिनालिकाएँ
प्रत्यावर्ती धारा जनित्र (AC Generator)
सिद्धांत (विद्युतचुंबकीय प्रेरण)
मुख्य भाग
कार्यप्रणाली
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### भाग (a): स्व-प्रेरण तथा लंबी परिनालिका के स्व-प्रेरकत्व का व्यंजक
#### स्व-प्रेरण की परिभाषा:\nस्व-प्रेरण वह विद्युत-चुंबकीय घटना है जिसमें किसी कुंडली में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा के मान में परिवर्तन करने पर, स्वयं उसी कुंडली से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है। इस फ्लक्स परिवर्तन के कारण उसी कुंडली में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है, जो धारा के वृद्धि या क्षय का विरोध करता है।
#### लंबी परिनालिका के स्व-प्रेरकत्व का व्यंजक:\nमाना कि $L$ लंबाई, $A$ समान अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल तथा $N$ कुल फेरों वाली एक लंबी वायु-क्रोड परिनालिका है।
\nप्रति इकाई लंबाई में फेरों की संख्या होगी:
$$n = \frac{N}{L}$$
\nजब परिनालिका में $I$ धारा प्रवाहित की जाती है, तो इसके अंदर अक्ष के अनुदिश एकसमान चुंबकीय क्षेत्र $B$ उत्पन्न होता है:
$$B = \mu_0 n I = \frac{\mu_0 N I}{L}$$
\nपरिनालिका के प्रत्येक फेरे से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स $\phi_B$ होगा:
$$\phi_B = B \cdot A = \left(\frac{\mu_0 N I}{L}\right) A$$
\nअतः परिनालिका के सभी $N$ फेरों से बद्ध कुल चुंबकीय फ्लक्स ($\Phi_{\text{total}}$) होगा:
$$\Phi_{\text{total}} = N \cdot \phi_B = N \cdot \left(\frac{\mu_0 N I A}{L}\right) = \frac{\mu_0 N^2 A I}{L}$$
\nस्व-प्रेरकत्व ($L_s$) की परिभाषा से:
$$\Phi_{\text{total}} = L_s \cdot I$$
\nदोनों समीकरणों की तुलना करने पर:
$$L_s \cdot I = \frac{\mu_0 N^2 A I}{L}$$
$$L_s = \frac{\mu_0 N^2 A}{L}$$
\nयदि परिनालिका $\mu_r$ आपेक्षिक पारगम्यता वाले किसी चुंबकीय पदार्थ के क्रोड पर लपेटी गई हो, तो स्व-प्रेरकत्व का सूत्र होगा:
$$L_s = \frac{\mu_0 \mu_r N^2 A}{L}$$
#### स्व-प्रेरकत्व को प्रभावित करने वाले कारक:
1. **फेरों की संख्या ($N$):** स्व-प्रेरकत्व फेरों की संख्या के वर्ग के समानुपाती होता है ($L_s \propto N^2$)।
2. **अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल ($A$):** स्व-प्रेरकत्व परिनालिका के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के समानुपाती होता है ($L_s \propto A$)।
3. **परिनालिका की लंबाई ($L$):** स्व-प्रेरकत्व परिनालिका की लंबाई के व्युत्क्रमानुपाती होता है ($L_s \propto \frac{1}{L}$)।
4. **क्रोड पदार्थ की पारगम्यता ($\mu_r$):** उच्च आपेक्षिक पारगम्यता वाले पदार्थ (जैसे नर्म लोहा) के क्रोड का उपयोग करने पर स्व-प्रेरकत्व का मान अत्यधिक बढ़ जाता है।
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### भाग (b): आंकिक प्रश्न का हल
**दिए गए मान:**
* फेरों की संख्या, $N = 200$
* प्रारंभिक चुंबकीय फ्लक्स, $\phi_1 = 8 \times 10^{-4} \text{ Wb}$
* अंतिम चुंबकीय फ्लक्स, $\phi_2 = 2 \times 10^{-4} \text{ Wb}$
* समय अंतराल, $\Delta t = 0.02 \text{ s}$
**सूत्र:**\nफैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियमानुसार, प्रेरित विद्युत वाहक बल $e$ का परिमाण निम्नलिखित होता है:
$$e = N \left| \frac{\Delta \phi}{\Delta t} \right| = N \left| \frac{\phi_2 - \phi_1}{\Delta t} \right|$$
**गणना:**
$$\Delta \phi = \phi_2 - \phi_1 = (2 \times 10^{-4}) - (8 \times 10^{-4}) = -6 \times 10^{-4} \text{ Wb}$$
$$\left| \Delta \phi \right| = 6 \times 10^{-4} \text{ Wb}$$
\nसूत्र में मान रखने पर:
$$e = 200 \times \frac{6 \times 10^{-4}}{0.02}$$
$$e = 200 \times \frac{6 \times 10^{-4}}{2 \times 10^{-2}}$$
$$e = 200 \times (3 \times 10^{-2})$$
$$e = 6 \text{ V}$$
**उत्तर:**\nकुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) का परिमाण **$6 \text{ V}$** है।
उत्तर (Answer): ### **भाग (a): आंकिक प्रश्न का हल**
#### **दिये गए मान:**
- वर्गाकार कुंडली की भुजा, $a = 10\text{ cm} = 0.1\text{ m}$
- अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल, $A = a^2 = (0.1)^2 = 0.01\text{ m}^2 = 10^{-2}\text{ m}^2$
- फेरों की संख्या, $N = 500$
- प्रारंभिक चुंबकीय क्षेत्र, $B_1 = 0.4\text{ T}$
- अंतिम चुंबकीय क्षेत्र, $B_2 = 0.1\text{ T}$
- समय अंतराल, $\Delta t = 0.2\text{ s}$
- कुंडली का प्रतिरोध, $R = 5\ \Omega$
- क्षेत्र एवं तल के अभिलंब के मध्य कोण, $\theta = 0^\circ$ (क्योंकि कुंडली का तल क्षेत्र के लंबवत है)
---
#### **चरण 1: प्रारंभिक एवं अंतिम चुंबकीय फ्लक्स ($\Phi_1$ तथा $\Phi_2$)**\nकुल चुंबकीय फ्लक्स का सूत्र:
$$
\Phi = N B A \cos\theta
$$
- **प्रारंभिक फ्लक्स ($\Phi_1$):**
$$
\Phi_1 = N B_1 A \cos(0^\circ) = 500 \times 0.4 \times 0.01 \times 1 = 2.0\text{ Wb}
$$
- **अंतिम फ्लक्स ($\Phi_2$):**
$$
\Phi_2 = N B_2 A \cos(0^\circ) = 500 \times 0.1 \times 0.01 \times 1 = 0.5\text{ Wb}
$$
---
#### **चरण 2: प्रेरित विद्युत वाहक बल ($e$)**\nफैराडे के नियमानुसार:
$$
e = -\frac{\Delta \Phi}{\Delta t} = -\frac{\Phi_2 - \Phi_1}{\Delta t}
$$
$$
e = -\frac{0.5 - 2.0}{0.2} = -\frac{-1.5}{0.2} = 7.5\text{ V}
$$
$$
\text{प्रेरित emf का परिमाण, } |e| = 7.5\text{ V}
$$
---
#### **चरण 3: प्रेरित धारा ($I$)**\nओम के नियम से:
$$
I = \frac{|e|}{R} = \frac{7.5}{5} = 1.5\text{ A}
$$
---
#### **चरण 4: प्रवाहित कुल आवेश ($q$)**
$$
q = I \times \Delta t = 1.5 \times 0.2 = 0.3\text{ C}
$$
*(अथवा, $q = \frac{|\Delta \Phi|}{R} = \frac{1.5}{5} = 0.3\text{ C}$)*
---
### **भाग (b): चुंबकीय फ्लक्स परिवर्तित करने की विधियाँ**
1. **चुंबकीय क्षेत्र ($B$) के परिमाण को बदलकर:** परिपथ से होकर गुजरने वाले चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता को बढ़ाकर या घटाकर।
2. **कुंडली के अभिविन्यास (कोण $\theta$) को बदलकर:** एक समान चुंबकीय क्षेत्र में कुंडली को घुमाकर उसके क्षेत्रफल सदिश और चुंबकीय क्षेत्र के बीच का कोण बदलकर।
उत्तर (Answer): ### **अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction)**\nजब किसी एक कुंडली (प्राथमिक कुंडली) में प्रवाहित धारा के मान में परिवर्तन किया जाता है, तो उसके पास रखी दूसरी कुंडली (द्वितीयक कुंडली) में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है। इस घटना को **अन्योन्य प्रेरण** कहते हैं।
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### **दो समअक्षीय परिनालिकाओं के अन्योन्य प्रेरकत्व का व्यंजक**
\nमान लीजिए कि दो लंबी समअक्षीय परिनालिकाएँ $S_1$ तथा $S_2$ हैं, जिनकी लंबाई $L$ तथा अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल $A$ समान है।
- माना आंतरिक परिनालिका $S_1$ में कुल फेरों की संख्या = $N_1$
- माना बाह्य परिनालिका $S_2$ में कुल फेरों की संख्या = $N_2$
- $S_1$ में प्रति एकांक लंबाई फेरों की संख्या: $n_1 = \frac{N_1}{L}$
- $S_2$ में प्रति एकांक लंबाई फेरों की संख्या: $n_2 = \frac{N_2}{L}$
#### **चरण 1: $S_1$ में धारा के कारण चुंबकीय क्षेत्र**\nजब परिनालिका $S_1$ में धारा $I_1$ प्रवाहित की जाती है, तो इसके अंदर अक्ष के अनुदिश एकसमान चुंबकीय क्षेत्र $B_1$ उत्पन्न होता है:
$$
B_1 = \mu_0 n_1 I_1 = \mu_0 \left(\frac{N_1}{L}\right) I_1
$$
#### **चरण 2: $S_2$ के एक फेरे से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स**\nचूँकि परिनालिका $S_2$, $S_1$ के साथ समअक्षीय है, अतः क्षेत्र $B_1$ के कारण $S_2$ के प्रत्येक फेरे से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स:
$$
\Phi_2 = B_1 A = \left(\frac{\mu_0 N_1 I_1}{L}\right) A
$$
#### **चरण 3: परिनालिका $S_2$ से संबद्ध कुल चुंबकीय फ्लक्स**
$N_2$ फेरों वाली परिनालिका $S_2$ से संबद्ध कुल फ्लक्स:
$$
N_2 \Phi_2 = N_2 \left[ \frac{\mu_0 N_1 I_1 A}{L} \right] = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A}{L} I_1
$$
#### **चरण 4: अन्योन्य प्रेरकत्व ($M$) की गणना**\nअन्योन्य प्रेरकत्व की परिभाषा से:
$$
N_2 \Phi_2 = M_{21} I_1
$$\nदोनों समीकरणों की तुलना करने पर:
$$
M_{21} I_1 = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A}{L} I_1
$$
$$
M = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A}{L}
$$\nप्रति एकांक लंबाई फेरों की संख्या ($n_1$ तथा $n_2$) के पदों में:
$$
M = \mu_0 n_1 n_2 A L
$$
---
### **अन्योन्य प्रेरकत्व को प्रभावित करने वाले कारक**
1. **फेरों की संख्या ($N_1, N_2$):** $M \propto N_1 N_2$ (फेरों की संख्या बढ़ाने पर अन्योन्य प्रेरकत्व बढ़ता है)।
2. **अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल ($A$):** $M \propto A$ (क्षेत्रफल अधिक होने पर प्रेरकत्व अधिक होता है)।
3. **करोड की पारगम्यता (Permeability, $\mu_r$):** यदि नरम लोहे की क्रोड प्रयुक्त की जाए तो $M = \frac{\mu_0 \mu_r N_1 N_2 A}{L}$ (प्रेरकत्व $\mu_r$ गुना बढ़ जाता है)।
4. **कुंडलियों का आपेक्षिक अभिविन्यास व दूरी:** जब कुंडलियाँ एक-दूसरे पर लपेटी जाती हैं तो अन्योन्य प्रेरकत्व अधिकतम होता है।
उत्तर (Answer): ### **वैद्युतचुंबकीय प्रेरण के फैराडे के नियम**
1. **प्रथम नियम:** जब भी किसी बंद परिपथ से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो परिपथ में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है। यह प्रेरित emf तब तक बना रहता है जब तक कि चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।
2. **द्वितीय नियम:** किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण, परिपथ से संबद्ध चुंबकीय फ्लक्स के परिवर्तन की समय-दर के सीधे समानुपाती होता है।
$$
e \propto \frac{d\Phi_B}{dt} \implies e = -k \frac{d\Phi_B}{dt}
$$\nSI मात्रक में, $k = 1$, अतः:
$$
e = -\frac{d\Phi_B}{dt}
$$
(ऋणात्मक चिन्ह लेंज के नियमानुसार प्रेरित emf की दिशा को दर्शाता है)।
---
### **लेंज का नियम**
**कथन:** किसी परिपथ में प्रेरित धारा की दिशा सदैव इस प्रकार होती है कि वह उस कारण (या चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन) का विरोध करती है जिसके कारण वह स्वयं उत्पन्न हुई है।
$$
e = -\frac{d\Phi_B}{dt}
$$
---
### **लेंज का नियम तथा ऊर्जा संरक्षण का नियम**\nलेंज का नियम **ऊर्जा संरक्षण के नियम** का एक सीधा परिणाम है। इसे निम्नलिखित बिंदुओं द्वारा समझा जा सकता है:
1. **यांत्रिक कार्य का विद्युत ऊर्जा में रूपांतरण:**
- जब किसी छड़ चुंबक के उत्तरी ध्रुव ($N$-ध्रुव) को एक बंद कुंडली की ओर लाया जाता है, तो कुंडली में प्रेरित धारा इस प्रकार प्रवाहित होती है कि कुंडली का सामने वाला तल भी उत्तरी ध्रुव की भांति व्यवहार करने लगता है।
- समान ध्रुव एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं। अतः, यह प्रतिकर्षण बल चुंबक की गति का विरोध करता है।
- इस प्रतिकर्षण बल के विरुद्ध चुंबक को कुंडली के समीप लाने के लिए बाह्य यांत्रिक कार्य करना पड़ता है।
- चुंबकीय प्रतिकर्षण के विरुद्ध किया गया यही यांत्रिक कार्य विद्युत ऊर्जा (प्रेरित धारा) और अंततः ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होता है।
2. **यदि लेंज का नियम असत्य होता:**
- मान लीजिए कि प्रेरित धारा दक्षिणी ध्रुव ($S$-ध्रुव) उत्पन्न करती। तब चुंबक स्वयं ही कुंडली की ओर आकर्षित होता और बिना किसी बाह्य कार्य के त्वरित गति करता।
- इससे बिना कोई कार्य किए निरंतर विद्युत ऊर्जा प्राप्त होती, जो कि **ऊर्जा संरक्षण के नियम** का स्पष्ट उल्लंघन होता।
\nअतः, लेंज का नियम पूर्णतः ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के अनुकूल है।
उत्तर (Answer): ### विद्युत चुंबकीय प्रेरण एवं लेंज का नियम
#### **1. फैराडे के विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियम**
- **प्रथम नियम:** जब भी किसी बंद विद्युत परिपथ से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स के मान में परिवर्तन होता है, तो उस परिपथ में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है। यह प्रेरित emf केवल तब तक बना रहता है जब तक कि फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।
- **द्वितीय नियम:** किसी परिपथ में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण, परिपथ से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन की समय दर के समानुपाती होता है।
$$\varepsilon \propto \frac{d\Phi_B}{dt} \implies \varepsilon = -\frac{d\Phi_B}{dt}$$
*(यहाँ ऋणात्मक चिन्ह लेंज के नियम के अनुसार प्रेरित emf की दिशा प्रदर्शित करता है।)*
---
#### **2. लेंज का नियम**\nलेंज के नियम के अनुसार, विद्युत चुंबकीय प्रेरण की प्रत्येक स्थिति में प्रेरित धारा (या प्रेरित emf) की दिशा सदैव इस प्रकार होती है कि वह उस कारण का विरोध करती है जिससे वह स्वयं उत्पन्न हुई है।
$$\varepsilon = -N \frac{d\Phi_B}{dt}$$
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#### **3. लेंज का नियम और ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत**\nलेंज का नियम **ऊर्जा संरक्षण नियम** का ही एक सीधा और स्वाभाविक परिणाम है।
##### **उदाहरण: छड़ चुंबक और बंद कुंडली का प्रयोग**
1. **चुंबक के उत्तरी ध्रुव (N-Pole) को पास लाना:**
- जब किसी छड़ चुंबक के उत्तरी ध्रुव को बंद कुंडली के पास लाया जाता है, तो कुंडली से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स का मान बढ़ता है।
- लेंज के नियमानुसार, कुंडली में प्रेरित धारा वामावर्त (Anticlockwise) दिशा में प्रवाहित होती है, जिससे चुंबक के सामने वाला तल उत्तरी ध्रुव (N-Pole) बन जाता है।
- समान ध्रुवों में प्रतिकर्षण होता है। अतः यह प्रेरित उत्तरी ध्रुव चुंबक की गति का विरोध करता है।
2. **यांत्रिक कार्य का विद्युत ऊर्जा में परिवर्तन:**
- चुंबक को कुंडली की ओर गतिमान बनाए रखने के लिए इस प्रतिकर्षण बल के विरुद्ध बाह्य स्रोत द्वारा यांत्रिक कार्य (Mechanical Work) करना पड़ता है।
- यही किया गया यांत्रिक कार्य ही परिपथ में विद्युत ऊर्जा (तथा अंततः जूल ऊष्मा) के रूप में रूपांतरित हो जाता है।
3. **चुंबक के उत्तरी ध्रुव को दूर ले जाना:**
- इसके विपरीत, जब उत्तरी ध्रुव को दूर ले जाया जाता है, तो फ्लक्स घटता है।
- प्रेरित धारा दक्षिणावर्त (Clockwise) प्रवाहित होकर दक्षिणी ध्रुव (S-Pole) बनाती है, जो चुंबक को आकर्षित करके उसे दूर जाने से रोकती है।
- यहाँ भी आकर्षण बल के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है।
##### **यदि लेंज का नियम सत्य न होता तो क्या होता?**
- यदि प्रेरित धारा गति का विरोध न करके सहायता करती (अर्थात N ध्रुव पास आने पर S ध्रुव बनता),
- तो चुंबक बिना किसी बाह्य बल के स्वतः ही त्वरित गति से कुंडली की ओर खिंचता चला जाता। बिना कोई कार्य किए लगातार विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती रहती, जो कि असंभव है तथा ऊर्जा संरक्षण के प्रथम नियम का उल्लंघन करती।
##### **निष्कर्ष:**\nअतः लेंज का नियम पूरी तरह से ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुकूल है। चुंबकीय प्रतिरोध के विरुद्ध किया गया यांत्रिक कार्य ही विद्युत और तापीय ऊर्जा में बदलता है।
उत्तर (Answer): ### चरणबद्ध हल:
#### **दिए गए मान:**
- लंबी भुजा की लंबाई, $l = 8\text{ cm} = 0.08\text{ m}$
- छोटी भुजा की लंबाई, $b = 2\text{ cm} = 0.02\text{ m}$
- चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता, $B = 0.3\text{ T}$
- लूप का वेग, $v = 1\text{ cm/s} = 0.01\text{ m/s}$
---
#### **स्थिति (a): वेग लूप की लंबी भुजा ($l = 0.08\text{ m}$) के लंबवत है**
1. **प्रेरित विद्युत वाहक बल ($\varepsilon$) की गणना:**
जब लूप अपनी लंबी भुजा के लंबवत बाहर की ओर गति करता है, तो लंबी भुजा चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती है।
$$\varepsilon = B \cdot l \cdot v$$
$$\varepsilon = 0.3\text{ T} \times 0.08\text{ m} \times 0.01\text{ m/s}$$
$$\varepsilon = 2.4 \times 10^{-4}\text{ V} = 0.24\text{ mV}$$
2. **समय की अवधि ($t_1$) की गणना:**
चुंबकीय क्षेत्र से पूरी तरह बाहर निकलने के लिए लूप को छोटी भुजा के बराबर दूरी ($b = 0.02\text{ m}$) तय करनी होगी।
$$t_1 = \frac{\text{दूरी}}{\text{वेग}} = \frac{b}{v}$$
$$t_1 = \frac{0.02\text{ m}}{0.01\text{ m/s}} = 2\text{ सेकंड}$$
---
#### **स्थिति (b): वेग लूप की छोटी भुजा ($b = 0.02\text{ m}$) के लंबवत है**
1. **प्रेरित विद्युत वाहक बल ($\varepsilon$) की गणना:**
जब लूप अपनी छोटी भुजा के लंबवत गति करता है, तो छोटी भुजा चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं को काटती है।
$$\varepsilon = B \cdot b \cdot v$$
$$\varepsilon = 0.3\text{ T} \times 0.02\text{ m} \times 0.01\text{ m/s}$$
$$\varepsilon = 0.6 \times 10^{-4}\text{ V} = 0.06\text{ mV}$$
2. **समय की अवधि ($t_2$) की गणना:**
चुंबकीय क्षेत्र से पूरी तरह बाहर निकलने के लिए लूप को लंबी भुजा के बराबर दूरी ($l = 0.08\text{ m}$) तय करनी होगी।
$$t_2 = \frac{\text{दूरी}}{\text{वेग}} = \frac{l}{v}$$
$$t_2 = \frac{0.08\text{ m}}{0.01\text{ m/s}} = 8\text{ सेकंड}$$
---
#### **अंतिम उत्तर:**
- **(a)** प्रेरित EMF = **$2.4 \times 10^{-4}\text{ V}$** (या $0.24\text{ mV}$), जो **$2\text{ सेकंड}$** तक रहता है।
- **(b)** प्रेरित EMF = **$0.6 \times 10^{-4}\text{ V}$** (या $0.06\text{ mV}$), जो **$8\text{ सेकंड}$** तक रहता है।
उत्तर (Answer): ### दो लंबी समाक्षीय परिनालिकाओं का अन्योन्य प्रेरकत्व
#### **1. प्रस्तावना तथा परिभाषा**\nअन्योन्य प्रेरकत्व (Mutual Inductance) दो कुंडलियों का वह गुण है जिसके कारण जब एक कुंडली में प्रवाहित धारा के मान में परिवर्तन किया जाता है, तो पास स्थित दूसरी कुंडली से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है और उसमें एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है।
\nमाना समान लंबाई $L$ की दो लंबी समाक्षीय परिनालिकाएं $S_1$ तथा $S_2$ हैं।
- $S_1$ तथा $S_2$ में कुल फेरों की संख्या क्रमशः $N_1$ तथा $N_2$ है।
- एकांक लंबाई में फेरों की संख्या क्रमशः $n_1 = \frac{N_1}{L}$ तथा $n_2 = \frac{N_2}{L}$ है।
- आंतरिक परिनालिका $S_1$ के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल $A$ है।
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#### **2. गणितीय व्युत्पत्ति**\nमाना आंतरिक परिनालिका $S_1$ में धारा $I_1$ प्रवाहित होती है।
1. **$S_1$ के अंदर उत्पन्न चुंबकीय क्षेत्र:**
$$B_1 = \mu_0 n_1 I_1 = \mu_0 \left(\frac{N_1}{L}\right) I_1$$
2. **बाहरी परिनालिका $S_2$ के प्रत्येक फेरे से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स:**
$$\Phi_2 = B_1 A = \mu_0 \left(\frac{N_1}{L}\right) I_1 A$$
3. **$S_2$ के सभी $N_2$ फेरों से बद्ध कुल चुंबकीय फ्लक्स:**
$$N_2 \Phi_2 = N_2 \left[ \mu_0 \left(\frac{N_1}{L}\right) I_1 A \right] = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A}{L} I_1$$
4. **अन्योन्य प्रेरकत्व ($M_{21}$) का सूत्र:**
अन्योन्य प्रेरकत्व की परिभाषा से, $N_2 \Phi_2 = M_{21} I_1$
$$M_{21} = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A}{L} = \mu_0 n_1 n_2 A L$$
\nइसी प्रकार, यदि $S_2$ में $I_2$ धारा प्रवाहित की जाए, तो $M_{12} = M_{21} = M$ प्राप्त होता है।
\nअतः दो लंबी समाक्षीय परिनालिकाओं का अन्योन्य प्रेरकत्व:
$$M = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A}{L} = \mu_0 n_1 n_2 A L$$
\nयदि परिनालिका के अंदर $\mu_r$ आपेक्षिक पारगम्यता वाला क्रोड (Core) रखा हो, तब:
$$M = \frac{\mu_0 \mu_r N_1 N_2 A}{L}$$
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#### **3. अन्योन्य प्रेरकत्व को प्रभावित करने वाले कारक**
- **फेरों की संख्या ($N_1, N_2$):** अन्योन्य प्रेरकत्व दोनों कुंडलियों के फेरों की संख्या के गुणनफल के समानुपाती होता है ($M \propto N_1 N_2$)।
- **अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल ($A$):** क्षेत्रफल अधिक होने पर फ्लक्स बद्धता बढ़ती है, जिससे $M$ का मान बढ़ता है।
- **क्रोड के पदार्थ की पारगम्यता ($\mu_r$):** नर्म लोहे (Soft Iron) की छड़ रखने पर आपेक्षिक पारगम्यता बढ़ जाती है, जिससे $M$ का मान काफी बढ़ जाता है।
- **परिनालिका की लंबाई ($L$):** कुल फेरों की संख्या नियत रहने पर लंबाई बढ़ाने पर $M$ का मान घटता है।
- **कुंडलियों की सापेक्ष स्थिति तथा दूरी:** कुंडलियों को पास-पास तथा समाक्षीय रखने पर अन्योन्य प्रेरकत्व अधिकतम होता है।
उत्तर (Answer): ### दिए गए मान:
* फेरों की संख्या ($N$) = $200$
* कुंडली का क्षेत्रफल ($A$) = $0.05\text{ m}^2$
* प्रतिरोध ($R$) = $5\ \Omega$
* घूर्णन चाल ($n$) = $600\text{ rpm} = \frac{600}{60}\text{ rps} = 10\text{ चक्कर/सेकंड}$
* चुंबकीय क्षेत्र ($B$) = $0.4\text{ T}$
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### चरणबद्ध हल:
#### 1. कोणीय वेग ($\omega$)
$$\omega = 2 \pi n = 2 \times \pi \times 10 = 20\pi\text{ rad/s} \approx 62.83\text{ rad/s}$$
#### 2. अधिकतम चुंबकीय फ्लक्स ($\Phi_{\text{max}}$)\nअधिकतम फ्लक्स तब होता है जब कुंडली का तल चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत हो ($\theta = 0^\circ$):
$$\Phi_{\text{max}} = B \times A = 0.4 \times 0.05 = 0.02\text{ Wb}$$
#### 3. शिखर प्रेरित विद्युत वाहक बल ($e_0$)\nप्रत्यावर्ती धारा जनित्र के सिद्धांत के अनुसार, प्रेरित emf $e = e_0 \sin(\omega t)$ होता है, जहाँ:
$$e_0 = N B A \omega$$
$$e_0 = 200 \times 0.4 \times 0.05 \times (20\pi)$$
$$e_0 = 200 \times 0.02 \times 20\pi = 80\pi\text{ V}$$
$$e_0 \approx 80 \times 3.1416 = 251.33\text{ V}$$
#### 4. अधिकतम प्रेरित धारा ($I_0$)
$$I_0 = \frac{e_0}{R} = \frac{80\pi}{5} = 16\pi\text{ A} \approx 50.27\text{ A}$$
#### 5. औसत शक्ति व्यय ($P_{\text{avg}}$)\nप्रत्यावर्ती emf के लिए वर्ग-माध्य-मूल मान $e_{\text{rms}} = \frac{e_0}{\sqrt{2}}$ होता है।
$$P_{\text{avg}} = \frac{e_{\text{rms}}^2}{R} = \frac{(e_0 / \sqrt{2})^2}{R} = \frac{e_0^2}{2R}$$
$$P_{\text{avg}} = \frac{(80\pi)^2}{2 \times 5} = \frac{6400 \pi^2}{10} = 640 \pi^2\text{ W}$$
$\pi^2 \approx 9.8696$ रखने पर:
$$P_{\text{avg}} = 640 \times 9.8696 = 6316.54\text{ W} \approx 6.32\text{ kW}$$
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### अंतिम उत्तर:
1. **कोणीय वेग:** $20\pi\text{ rad/s} \approx 62.83\text{ rad/s}$
2. **अधिकतम फ्लक्स:** $0.02\text{ Wb}$
3. **शिखर प्रेरित emf:** $80\pi\text{ V} \approx 251.33\text{ V}$
4. **अधिकतम प्रेरित धारा:** $16\pi\text{ A} \approx 50.27\text{ A}$
5. **औसत शक्ति व्यय:** $640\pi^2\text{ W} \approx 6.32\text{ kW}$
उत्तर (Answer): ### अन्योन्य प्रेरण (Mutual Induction)
\nअन्योन्य प्रेरण वह घटना है जिसमें एक कुंडली (प्राथमिक कुंडली) में प्रवाहित धारा में परिवर्तन के कारण पास रखी दूसरी कुंडली (द्वितीयक कुंडली) में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है।
### अन्योन्य प्रेरकत्व गुणांक ($M$)
* यदि प्राथमिक कुंडली में $I_1$ धारा प्रवाहित हो रही है तथा $N_2$ फेरों वाली द्वितीयक कुंडली के प्रत्येक फेरे से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स $\Phi_2$ है, तो कुल फ्लक्स संबद्धता $I_1$ के समानुपाती होती है:
$$N_2 \Phi_2 \propto I_1 \implies N_2 \Phi_2 = M I_1$$
यहाँ $M$ **अन्योन्य प्रेरकत्व गुणांक** (या अन्योन्य प्रेरकत्व) कहलाता है।
* **परिभाषा:** प्राथमिक कुंडली में इकाई धारा प्रवाहित करने पर द्वितीयक कुंडली से बद्ध कुल चुंबकीय फ्लक्स ही अन्योन्य प्रेरकत्व कहलाता है।
* **द्वितीय परिभाषा:** फैराडे के नियमानुसार, द्वितीयक कुंडली में प्रेरित emf:
$$\mathcal{E}_2 = -M \frac{dI_1}{dt}$$
अतः अन्योन्य प्रेरकत्व का परिमाण उस प्रेरित emf के बराबर होता है जो प्राथमिक कुंडली में धारा परिवर्तन की दर $1\text{ A/s}$ होने पर द्वितीयक में उत्पन्न होता है।
* **S.I. मात्रक:** हेनरी (Henry या H) अथवा $\text{V}\cdot\text{s}/\text{A}$ अथवा $\text{Wb}/\text{A}$।
* **विमीय सूत्र:** $[M^1 L^2 T^{-2} A^{-2}]$।
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### दो समाक्षीय परिनालिकाओं के अन्योन्य प्रेरकत्व का व्यंजक
\nमाना लंबाई $l$ की दो लंबी समाक्षीय परिनालिकाएँ $S_1$ तथा $S_2$ हैं।
* आंतरिक परिनालिका $S_1$: त्रिज्या $r_1$, कुल फेरे $N_1$, प्रति इकाई लंबाई फेरे $n_1 = N_1 / l$।
* बाह्य परिनालिका $S_2$: त्रिज्या $r_2$, कुल फेरे $N_2$, प्रति इकाई लंबाई फेरे $n_2 = N_2 / l$।
\nमाना बाहरी परिनालिका $S_2$ में धारा $I_2$ प्रवाहित होती है:
1. परिनालिका $S_2$ के अंदर चुंबकीय क्षेत्र:
$$B_2 = \mu_0 n_2 I_2 = \mu_0 \left(\frac{N_2}{l}\right) I_2$$
2. आंतरिक परिनालिका $S_1$ के एक फेरे (क्षेत्रफल $A_1 = \pi r_1^2$) से संबद्ध फ्लक्स:
$$\Phi_1 = B_2 A_1 = \left(\mu_0 \frac{N_2}{l} I_2\right) (\pi r_1^2)$$
3. परिनालिका $S_1$ के सभी $N_1$ फेरों से संबद्ध कुल फ्लक्स:
$$N_1 \Phi_1 = N_1 \left( \mu_0 \frac{N_2}{l} I_2 \pi r_1^2 \right) = \frac{\mu_0 N_1 N_2 \pi r_1^2}{l} I_2$$
4. अन्योन्य प्रेरकत्व की परिभाषा $N_1 \Phi_1 = M_{12} I_2$ से:
$$M_{12} = \frac{\mu_0 N_1 N_2 \pi r_1^2}{l}$$
5. पारस्परिक सिद्धांत द्वारा $M_{12} = M_{21} = M$, अतः:
$$M = \frac{\mu_0 N_1 N_2 A_1}{l} = \mu_0 n_1 n_2 A_1 l$$
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### अन्योन्य प्रेरकत्व को प्रभावित करने वाले कारक
1. **फेरों की संख्या:** $M$ दोनों कुंडलियों के फेरों की संख्या के गुणनफल के समानुपाती होता है ($M \propto N_1 N_2$)।
2. **कुंडलियों के बीच की दूरी एवं अभिविन्यास:** यदि कुंडलियाँ एक-दूसरे के निकट तथा समाक्षीय हैं तो $M$ का मान अधिकतम होता है; दूरी बढ़ाने पर $M$ घटता है।
उत्तर (Answer): ### विद्युत चुंबकीय प्रेरण के फैराडे के नियम
* **प्रथम नियम:** जब भी किसी बंद परिपथ से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो परिपथ में एक प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है, जिसका अस्तित्व तब तक रहता है जब तक फ्लक्स में परिवर्तन होता रहता है।
* **द्वितीय नियम:** किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण, परिपथ से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन की समय-दर के सीधे समानुपाती होता है।
$$\mathcal{E} = -\frac{d\Phi_B}{dt}$$
*(ऋणात्मक चिह्न लेंज़ के नियमानुसार दिशा को व्यक्त करता है)*
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### सीधे चालक में प्रेरित गतिक विद्युत वाहक बल का व्यंजक
\nमाना $l$ लंबाई की एक सीधी चालक छड़ $PQ$ एकसमान चुंबकीय क्षेत्र $B$ (जो तल के लंबवत अंदर की ओर है) में $v$ नियत वेग से गति कर रही है।
* मान लीजिए आयताकार परिपथ $PQRS$ का तल में विस्तार है, जहाँ भुजा $PQ$ खिसकने के लिए स्वतंत्र है।
* समय $t$ पर चालक की स्थिति $RS = x$ है।
* लूप द्वारा घेरे गए क्षेत्रफल $A = l x$ से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स निम्न है:
$$\Phi_B = B A = B l x$$
\nफैराडे के नियम के अनुसार, प्रेरित विद्युत वाहक बल $\mathcal{E}$ है:
$$\mathcal{E} = -\frac{d\Phi_B}{dt} = -\frac{d}{dt}(B l x)$$
\nचुंबकीय क्षेत्र $B$ तथा लंबाई $l$ नियत हैं:
$$\mathcal{E} = -B l \frac{dx}{dt}$$
\nचूँकि वेग $v = -\frac{dx}{dt}$ (समय के साथ $x$ घट रहा है):
$$\mathcal{E} = B l v$$
\nगतिमान चालक के सिरों पर इस प्रेरित विद्युत वाहक बल को **गतिक विद्युत वाहक बल** कहते हैं।
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### घूर्णन करती हुई धातु की छड़ में प्रेरित emf का व्यंजक
\nमाना $l$ लंबाई की एक धातु की छड़ अपने एक सिरे के परितः $\omega$ नियत कोणीय वेग से एकसमान चुंबकीय क्षेत्र $B$ के लंबवत तल में घूर्णन कर रही है।
1. घूर्णन केंद्र से $r$ दूरी पर छड़ के एक छोटे अल्पांश $dr$ पर विचार करते हैं।
2. इस अल्पांश का रेखीय वेग $v = r \omega$ होगा।
3. इस सूक्ष्म अल्पांश $dr$ में प्रेरित गतिक emf निम्न होगा:
$$d\mathcal{E} = B v dr = B (r \omega) dr$$
4. पूरी छड़ ($r = 0$ से $r = l$) के सिरों के मध्य कुल प्रेरित विद्युत वाहक बल समाकलन द्वारा प्राप्त होता है:
$$\mathcal{E} = \int_{0}^{l} d\mathcal{E} = \int_{0}^{l} B \omega r dr$$
$$\mathcal{E} = B \omega \left[ \frac{r^2}{2} \right]_{0}^{l}$$
$$\mathcal{E} = \frac{1}{2} B \omega l^2$$
\nअतः घूर्णन करती हुई छड़ के सिरों के मध्य प्रेरित विद्युत वाहक बल **$\mathcal{E} = \frac{1}{2} B \omega l^2$** है।
उत्तर (Answer): ### चरणबद्ध हल:
**1. दिया गया डेटा:**
- धातु की छड़ की लंबाई, $l = 1.0\text{ m}$
- घूर्णन की आवृत्ति, $f = 50\text{ चक्कर/सेकंड} = 50\text{ Hz}$
- चुंबकीय क्षेत्र का मान, $B = 0.2\text{ T}$
**2. सूत्र:**\nजब $l$ लंबाई की कोई चालक छड़ घूर्णन तल के लंबवत एकसमान चुंबकीय क्षेत्र $B$ में $\omega$ कोणीय चाल से घूमती है, तो उसके सिरों के मध्य प्रेरित emf ($e$) होता है:
$$e = \frac{1}{2} B \omega l^2$$
\nचुँकि कोणीय आवृत्ति $\omega = 2 \pi f$, अतः सूत्र को इस प्रकार लिखा जा सकता है:
$$e = \frac{1}{2} B (2 \pi f) l^2 = B \pi f l^2$$
**3. गणना:**\nदिए गए मानों को सूत्र में रखने पर:
$$e = 0.2 \times \pi \times 50 \times (1.0)^2$$
$$e = (0.2 \times 50) \times \pi \times 1$$
$$e = 10 \pi\text{ V}$$
$\pi \approx 3.1416$ रखने पर:
$$e = 10 \times 3.1416 = 31.42\text{ V}$$
**उत्तर:**\nछड़ के दोनों सिरों के मध्य उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल **$31.42\text{ V}$** (या $10\pi\text{ V}$) है।
उत्तर (Answer): ### स्वप्रेरण (Self-Induction):\nजब किसी कुंडली में प्रवाहित विद्युत धारा के मान में परिवर्तन होता है, तो उसी कुंडली से बद्ध चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होने के कारण स्वयं उसी कुंडली में एक विरोधी प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) उत्पन्न हो जाता है। इस घटना को स्वप्रेरण कहते हैं।
### स्वप्रेरकत्व गुणांक ($L$):\nकुंडली से बद्ध कुल चुंबकीय फ्लक्स ($\Phi$) उसमें प्रवाहित धारा ($I$) के समानुपाती होता है:
$$\Phi \propto I \implies \Phi = L I$$\nजहाँ $L$ एक नियतांक है जिसे स्वप्रेरकत्व गुणांक कहते हैं।\nसूत्र $e = -L \frac{dI}{dt}$ के अनुसार, स्वप्रेरकत्व गुणांक ($L$) का परिमाण उस प्रेरित विद्युत वाहक बल के बराबर होता है जो परिपथ में धारा परिवर्तन की दर $1\text{ A/s}$ होने पर उत्पन्न होता है।
**SI मात्रक:** स्वप्रेरकत्व का SI मात्रक **हेनरी ($\text{H}$)** होता है।
### लंबी वायु-क्रोड परिनालिका के स्वप्रेरकत्व को प्रभावित करने वाले कारक ($L = \frac{\mu_0 N^2 A}{l}$):
1. **फेरों की संख्या ($N$):** स्वप्रेरकत्व फेरों की संख्या के वर्ग के समानुपाती होता है ($L \propto N^2$)।
2. **अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल ($A$):** स्वप्रेरकत्व परिनालिका के अनुप्रस्थ क्षेत्रफल के समानुपाती होता है ($L \propto A$)।
3. **क्रोड के पदार्थ की पारगम्यता ($\mu_r$):** परिनालिका के अंदर नरम लोहे जैसी उच्च आपेक्षिक पारगम्यता की क्रोड रखने पर स्वप्रेरकत्व का मान बहुत अधिक बढ़ जाता है ($L = \frac{\mu_0 \mu_r N^2 A}{l}$)।
उत्तर (Answer): ### चरणबद्ध हल:
**1. दिया गया डेटा:**
- स्वप्रेरकत्व, $L = 2.0\text{ H}$
- प्रारंभिक धारा, $I_1 = 10\text{ A}$
- अंतिम धारा, $I_2 = 0\text{ A}$
- समय अंतराल, $\Delta t = 0.02\text{ s}$
**(i) औसत स्वप्रेरित emf ($e$) की गणना:**\nधारा में परिवर्तन, $\Delta I = I_2 - I_1 = 0 - 10 = -10\text{ A}$
\nधारा परिवर्तन की दर, $\frac{\Delta I}{\Delta t} = \frac{-10\text{ A}}{0.02\text{ s}} = -500\text{ A/s}$
\nस्वप्रेरित emf के सूत्र से:
$$e = -L \frac{\Delta I}{\Delta t}$$
$$e = -(2.0) \times (-500\text{ A/s}) = 1000\text{ V}$$
**(ii) प्रारंभिक संचित चुंबकीय स्थितिज ऊर्जा ($U$) की गणना:**\nधारा $I_1$ पर प्रेरक में संचित ऊर्जा का सूत्र:
$$U = \frac{1}{2} L I_1^2$$
$$U = \frac{1}{2} \times 2.0 \times (10)^2$$
$$U = 1.0 \times 100 = 100\text{ J}$$
**अंतिम उत्तर:**
(i) औसत स्वप्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) = **$1000\text{ V}$** (या $1\text{ kV}$)।
(ii) प्रारंभ में संचित चुंबकीय ऊर्जा = **$100\text{ J}$**।
उत्तर (Answer): ### भंवर धाराएँ (Eddy Currents):\nजब किसी ठोस धातु के टुकड़े को परिवर्तित चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है अथवा किसी चुंबकीय क्षेत्र में गति कराया जाता है, तो उस धातु के संपूर्ण आयतन में चक्रदार (लूप के रूप में) प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये धाराएँ जल में उत्पन्न भंवरों के समान चक्करदार होती हैं, इसीलिए इन्हें भंवर धाराएँ कहा जाता है।
### व्यावहारिक अनुप्रयोग:
1. **प्रेरण भट्टी (Induction Furnace):** उच्च आवृत्ति के परिवर्तित चुंबकीय क्षेत्र द्वारा धातु में प्रबल भंवर धाराएँ उत्पन्न की जाती हैं। इससे अत्यधिक जूल ऊष्मा ($I^2Rt$) उत्पन्न होती है, जिसका उपयोग धातुओं तथा मिश्रधातुओं को पिघलाने में किया जाता है।
2. **विद्युत ट्रेनों में चुंबकीय ब्रेक:** पहियों या पटरियों के पास लगे विद्युत चुंबकों को चालू करने पर प्रबल चुंबकीय क्षेत्र बनता है। पहियों में प्रेरित भंवर धाराएँ उनकी गति का तीव्र विरोध करती हैं, जिससे ट्रेन बिना किसी घर्षण या घिसावट के सुरक्षित रुक जाती है।
### भंवर धाराओं को कम करने की विधियाँ:
1. **पटलित क्रोड (Laminated Core) का उपयोग:** ट्रांसफार्मर के क्रोड को एक ठोस टुकड़े के रूप में न बनाकर, वार्निश से पृथक्कृत पतली-पतली लोहे की पट्टियों को जोड़कर पटलित बनाया जाता है। यह पृथक्करण धारा के मार्ग में उच्च प्रतिरोध उत्पन्न कर भंवर धाराओं को क्षीण कर देता है।
2. **धातु की प्लेटों में खांचे काटना:** धातु की पट्टियों या प्लेटों में खांचे (slots) काट देने से भंवर धाराओं के बड़े लूप छोटे-छोटे लूपों में टूट जाते हैं, जिससे ऊर्जा का ह्रास बहुत कम हो जाता है।
उत्तर (Answer): ### चरणबद्ध हल:
**1. दिया गया डेटा:**
- वर्गाकार कुंडली की भुजा, $a = 10\text{ cm} = 0.1\text{ m}$
- कुंडली का क्षेत्रफल, $A = a^2 = (0.1\text{ m})^2 = 0.01\text{ m}^2$
- फेरों की संख्या, $N = 500$
- चुंबकीय क्षेत्र का मान, $B = 0.4\text{ T}$
- समय अंतराल, $\Delta t = 0.1\text{ s}$
- प्रारंभिक कोण, $\theta_1 = 0^\circ$
- अंतिम कोण, $\theta_2 = 180^\circ$
**2. प्रारंभिक एवं अंतिम चुंबकीय फ्लक्स:**
- 1 फेरे से बद्ध प्रारंभिक फ्लक्स:
$$\Phi_1 = B A \cos(0^\circ) = 0.4 \times 0.01 \times 1 = 0.004\text{ Wb}$$
- 1 फेरे से बद्ध अंतिम फ्लक्स:
$$\Phi_2 = B A \cos(180^\circ) = 0.4 \times 0.01 \times (-1) = -0.004\text{ Wb}$$
**3. फ्लक्स परिवर्तन की गणना:**
- 1 फेरे में फ्लक्स परिवर्तन, $\Delta \Phi = \Phi_2 - \Phi_1 = -0.004 - 0.004 = -0.008\text{ Wb}$
- $N$ फेरों के लिए कुल फ्लक्स परिवर्तन:
$$\Delta \Phi_{\text{कुल}} = N \Delta \Phi = 500 \times (-0.008\text{ Wb}) = -4.0\text{ Wb}$$
**4. प्रेरित emf की गणना:**\nफैराडे के नियम के अनुसार:
$$e = -\frac{\Delta \Phi_{\text{कुल}}}{\Delta t}$$
$$e = -\frac{-4.0\text{ Wb}}{0.1\text{ s}} = 40\text{ V}$$
**उत्तर:**\nकुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल (emf) का परिमाण **$40\text{ V}$** है।