Chapter Chai • Board Revision Guide
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d-एवं f-ब्लॉक के तत्व

Subject: रसायन विज्ञान | Class: Class 12 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 12 रसायन विज्ञान

#### अध्याय: डी- एवं एफ-ब्लॉक के तत्व (The d- and f-Block Elements) - त्वरित संशोधन नोट्स


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परिचय (Introduction)

डी-ब्लॉक के तत्व आवर्त सारणी के वर्ग 3 से 12 तक के तत्व हैं। इनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन (n-1)d कक्षकों में प्रवेश करता है। इन्हें संक्रमण तत्व (Transition Elements) भी कहते हैं।

एफ-ब्लॉक के तत्व (लैंथेनॉइड्स और एक्टिनाइड्स) आवर्त सारणी के निचले भाग में स्थित हैं, जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन (n-2)f कक्षकों में प्रवेश करता है।


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मुख्य अवधारणाएँ एवं सूत्र (Key Concepts and Formulas)

#### 1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (Electronic Configuration)


#### 2. चुम्बकीय गुण (Magnetic Properties)

संक्रमण धातुओं के आयनों का चुम्बकीय आघूर्ण (Magnetic Moment) उनके अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करता है।

μ = sqrt(n(n + 2)) BM (बोर मैग्नेटोन)

(यहाँ n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या)


#### 3. रंगीन आयनों का निर्माण (Formation of Coloured Ions)


#### 4. अंतరआकाश यौगिक (Interstitial Compounds)


#### 5. मिश्रधातु निर्माण (Alloy Formation)


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डी-ब्लॉक की प्रमुख विशेषताएँ (Key Trends of d-Block)


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लैंथेनॉइड और एक्टिनाइड (f-Block Elements)

#### 1. लैंथेनॉइड आकुंचन (Lanthanoid Contraction)


#### 2. ऑक्सीकरण अवस्थाएं


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महत्वपूर्ण यौगिक (Important Compounds)

1. पोटेशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7):

Cr2O7^(2-) + 14H^+ + 6e^- -> 2Cr^(3+) + 7H2O


2. पोटेशियम परमैंगनेट (KMnO4):

MnO4^- + 8H^+ + 5e^- -> Mn^(2+) + 4H2O

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 डी-एवं एफ-ब्लॉक के तत्व
Overview
परिचय एवं स्थिति आवर्त सारणी में स्थान (वर्ग 3 से 12) सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $(n-1)d^{1-10}ns^{1-2}$ संक्रमण तत्वों की परिभाषा संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक) के सामान्य गुण परमाणु एवं आयनिक आकार आवर्त में कमी वर्ग में वृद्धि आयनन एन्थैल्पी क्रमिक वृद्धि ऑक्सीकरण अवस्थाएँ परिवर्तनशील संयोजकता अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाएँ धात्विक गुण एवं गलनांक उच्च तन्यता और कठोरता रंगीन आयन बनाना $d-d$ संक्रमण चुंबकीय गुण अनुचुंबकत्व प्रतिचुंबकत्व चुंबकीय आघूर्ण की गणना ($\mu = \sqrt{n(n+2)}$) उत्प्रेरकीय गुण रिक्त $d$-कक्षक की उपस्थिति अंतराकाशी यौगिक निर्माण मिश्रधातु निर्माण महत्वपूर्ण यौगिक पोटेशियम डाइक्रोमेट ($K2Cr2O_7$) बनाने की विधि रासायनिक गुण एवं ऑक्सीकारक प्रकृति संरचना पोटेशियम परमैंगनेट ($KMnO_4$) बनाने की विधि रासायनिक गुण एवं उपयोग संरचना आंतरिक संक्रमण तत्व (f-ब्लॉक) परिचय एवं सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $(n-2)f^{1-14}(n-1)d^{0-1}ns^2$ लैंथेनाइड (4f-श्रेणी) श्रेणी (Ce से Lu) लैंथेनाइड आकुंचन (Contraction) और उसके प्रभाव ऑक्सीकरण अवस्थाएँ (+3 मुख्य) ऐक्टिनाइड (5f-श्रेणी) श्रेणी (Th से Lr) रेडियोएक्टिव प्रकृति परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ लैंथेनाइड्स से तुलना
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक तत्वों) की सामान्य विशेषताओं को निम्नलिखित गुणों के संदर्भ में समझाइए: (i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (ii) धात्विक लक्षण, (iii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, और (iv) रंगीन आयनों का निर्माण। प्रत्येक गुण के लिए उपयुक्त कारणों के साथ अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): संक्रमण तत्व, जिन्हें d-ब्लॉक तत्वों के रूप में भी जाना जाता है, आवर्त सारणी के मध्य भाग में s-ब्लॉक और p-ब्लॉक तत्वों के बीच स्थित होते हैं। उनके अद्वितीय गुण d-ऑर्बिटलों के क्रमिक भरने का परिणाम हैं। उनकी विशेषताओं का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है: ### (i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास - संक्रमण तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $(n-1)d^{1-10}ns^{1-2}$ होता है। - इन तत्वों में अंतिम इलेक्ट्रॉन उपंतिम $(n-1)d$ ऊर्जा स्तर में प्रवेश करता है। - आधे भरे हुए और पूरी तरह से भरे हुए d-उपकोशों के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण आउफबाऊ नियम के अपवाद पाए जाते हैं (जैसे, क्रोमियम $3d^54s^1$ और कॉपर $3d^{10}4s^1$)। ### (ii) धात्विक लक्षण - लगभग सभी संक्रमण तत्व विशिष्ट धात्विक गुण प्रदर्शित करते हैं जैसे उच्च तन्यता, आघातवर्धनीयता, उच्च तापीय और विद्युत चालकता, और धात्विक चमक। - ये गुण उनके बाहरी कोशों में बड़ी संख्या में संयोजकता इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति और मजबूत अंतर-परमाणु धात्विक बंधन के कारण होते हैं। - धात्विक बंधन में $(n-1)d$ और $ns$ दोनों इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी के कारण s-ब्लॉक धातुओं की तुलना में इनके गलनांक और क्वथनांक तथा परमाणुकरण की एन्थैल्पी बहुत अधिक होती है। ### (iii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ - संक्रमण धातुएँ परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करती हैं क्योंकि $(n-1)d$ और $ns$ ऑर्बिटलों के बीच ऊर्जा का अंतर बहुत कम होता है। - परिणामस्वरूप, सबसे बाहरी $s$-ऑर्बिटलों और उपंतिम $d$-ऑर्बिटलों दोनों के इलेक्ट्रॉन रासायनिक बंधन में भाग ले सकते हैं। - वे $ns$ इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था और $ns$ तथा $(n-1)d$ इलेक्ट्रॉनों के योग के बराबर अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं (जैसे, मैंगनीज +2 से +7 तक की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दर्शाता है)। ### (iv) रंगीन आयनों का निर्माण - अधिकांश संक्रमण धातु आयन और उनके यौगिक ठोस और जलीय दोनों अवस्थाओं में रंगीन होते हैं। - यह रंग अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉनों और $d-d$ इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों की उपस्थिति के कारण होता है। - जब दृश्य प्रकाश किसी संक्रमण धातु आयन पर पड़ता है, तो d-इलेक्ट्रॉन प्रकाश की विशिष्ट आवृत्तियों को अवशोषित करते हैं और कम ऊर्जा वाले d-ऑर्बिटलों से उच्च ऊर्जा वाले d-ऑर्बिटलों में पदोन्नत हो जाते हैं (जिसे $d-d$ संक्रमण कहा जाता है)। शेष प्रेषित या परावर्तित प्रकाश यौगिक को विशिष्ट पूरक रंग प्रदान करता है।
Q2. लैंथेनाइड क्या हैं? 'लैंथेनाइड संकुचन' के कारणों और परिणामों की विस्तार से विवेचना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### लैंथेनाइड्स का परिचय \nलैंथेनाइड्स आंतरिक संक्रमण तत्वों की एक श्रृंखला हैं जिसमें लैंथेनम (La, परमाणु क्रमांक 57) के बाद के 14 तत्व शामिल हैं, जो सीरियम (Ce, परमाणु क्रमांक 58) से ल्यूटेटियम (Lu, परमाणु क्रमांक 71) तक हैं। इन तत्वों में $4f$ परमाणु कक्षकों का क्रमिक भराव शामिल होता है। ऐतिहासिक रूप से इन्हें दुर्लभ-पृथ्वी तत्वों के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि एक समय ऐसा माना जाता था कि इनके ऑक्साइड दुर्लभ हैं। ### लैंथेनाइड संकुचन के कारण \nजैसे-जैसे हम लैंथेनाइड श्रृंखला में बाएं से दाएं आगे बढ़ते हैं, परमाणु क्रमांक एक बार में एक इकाई बढ़ता है, जिसका अर्थ है कि नाभिक में एक प्रोटॉन जोड़ा जाता है और $4f$ उपकोश में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ा जाता है। * **अपूर्ण परिरक्षण:** $4f$ कक्षकों का स्थानिक आकार बहुत फैला हुआ और जटिल होता है, जिसके परिणामस्वरूप बाहरी $6s$ संयोजकता इलेक्ट्रॉनों पर $4f$ इलेक्ट्रॉनों द्वारा नाभिकीय आवेश का बहुत कम परिरक्षण प्रभाव पड़ता है। * **प्रभावी नाभिकीय आवेश:** जैसे-जैसे परमाणु क्रमांक के साथ नाभिकीय आवेश उत्तरोत्तर बढ़ता है, आंतरिक $4f$ इलेक्ट्रॉन बाहरी इलेक्ट्रॉनों को नाभिक के बढ़ते आकर्षक खिंचाव से प्रभावी ढंग से बचाने में विफल होते हैं। परिणामस्वरूप, सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभावी नाभिकीय आवेश लगातार बढ़ता जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन क्लाउड नाभिक के करीब खिंच जाता है और परमाणु तथा आयनिक त्रिज्या में क्रमिक कमी आती है। इस निरंतर सिकुड़न को **लैंथेनाइड संकुचन** कहा जाता है। ### लैंथेनाइड संकुचन के परिणाम \nलैंथेनाइड संकुचन के गहरे रासायनिक और भौतिक परिणाम होते हैं: * **लैंथेनाइड्स के बाद के तत्वों की परमाणु त्रिज्या में समानता:** लैंथेनाइड संकुचन के कारण, दूसरी और तीसरी पंक्ति के संक्रमण श्रृंखला तत्वों (जैसे, Zr और Hf, Nb और Ta) की परमाणु और आयनिक त्रिज्या उल्लेखनीय रूप से समान हो जाती है। उदाहरण के लिए, जिरकोनियम की त्रिज्या $160 \text{ pm}$ है जबकि हाफनियम की $159 \text{ pm}$ है। * **अलग करने में कठिनाई:** लैंथेनाइड्स के परमाणु आकारों और रासायनिक गुणों में नगण्य भिन्नता के कारण, प्राकृतिक रूप से होने वाले मिश्रणों से उनके शुद्ध रूप में एक-दूसरे से अलग करना बेहद कठिन हो जाता है। * **क्षारकीय सामर्थ्य पर प्रभाव:** लैंथेनाइड संकुचन के कारण, लैंथेनाइड आयनों ($Ln^{3+}$) की आयनिक त्रिज्या $\text{La}^{3+}$ से $\text{Lu}^{3+}$ तक उत्तरोत्तर कम हो जाती है। फजान के नियमों के अनुसार, धनायन के आकार में कमी इसके सहसंयोजक लक्षण को बढ़ाती है और क्षारकीय सामर्थ्य को कम करती है। इसलिए, लैंथेनाइड हाइड्रॉक्साइड्स की क्षारकीय सामर्थ्य $\text{La(OH)}_3$ से $\text{Lu(OH)}_3$ तक घट जाती है।
Q3. $\text{Mn}^{2+}$ आयन का 'स्पिन-ओनली' (केवल चक्रण) चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए (Mn का परमाणु क्रमांक = 25)। सभी मध्यवर्ती चरणों और प्रयुक्त सूत्र को दर्शाइए। 4 Marks
उत्तर (Answer): $\text{Mn}^{2+}$ आयन के 'स्पिन-ओनली' चुंबकीय आघूर्ण की गणना करने के लिए, हम निम्नलिखित चरण-दर-चरण गणना करते हैं: **चरण 1: उदासीन मैंगनीज (Mn) का परमाणु क्रमांक और इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।** * मैंगनीज का परमाणु क्रमांक ($Z$) = 25 * $\text{Mn}$ का मूल अवस्था इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $[\text{Ar}] 3d^5 4s^2$ **चरण 2: $\text{Mn}^{2+}$ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निर्धारित कीजिए।** * जब मैंगनीज $\text{Mn}^{2+}$ बनाने के लिए दो इलेक्ट्रॉन खोता है, तो इलेक्ट्रॉन सबसे पहले सबसे बाहरी $4s$ कक्षक से हटाए जाते हैं। * $\text{Mn}^{2+}$ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $[\text{Ar}] 3d^5 4s^0$ या केवल $3d^5$। **चरण 3: अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) गिनिए।** * $3d^5$ विन्यास में, अधिकतम बहुलता के हुंड के नियम के अनुसार, सभी पाँच d-कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन होता है। * अतः, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = 5। **चरण 4: 'स्पिन-ओनली' चुंबकीय आघूर्ण ($\mu$) का सूत्र लिखिए।** * सूत्र निम्नलिखित है: $$\mu = \sqrt{n(n+2)} \text{ BM}$$ जहाँ $n$ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है और $\text{BM}$ बोर मैग्नेटॉन को दर्शाता है। **चरण 5: सूत्र में $n$ का मान रखिए और गणना कीजिए।** * $n = 5$ रखिए: $$\mu = \sqrt{5(5+2)}$$ $$\mu = \sqrt{5(7)}$$ $$\mu = \sqrt{35}$$ $$\mu \approx 5.92 \text{ BM}$$ **उत्तर:** $\text{Mn}^{2+}$ आयन का स्पिन-ओनली चुंबकीय आघूर्ण $5.92 \text{ BM}$ (बोर मैग्नेटॉन) है।
Q4. संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक तत्वों) की सामान्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए, विशेष रूप से निम्नलिखित गुणों के संदर्भ में: (i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (ii) धात्विक लक्षण और गलनांक, (iii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, और (iv) रंगीन आयनों का निर्माण। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### d-ब्लॉक तत्वों के सामान्य गुण \nd-ब्लॉक तत्व आवर्त सारणी के मध्य भाग में, s-ब्लॉक और p-ब्लॉक तत्वों के बीच स्थित होते हैं। इन्हें आमतौर पर संक्रमण तत्व कहा जाता है क्योंकि इनके गुण अत्यधिक प्रतिक्रियाशील s-ब्लॉक धातुओं और कम प्रतिक्रियाशील p-ब्लॉक अधातुओं/उपधातुओं के बीच संक्रमण करते हैं। निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ हैं: * **(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:** संक्रमण तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $(n-1)d^{1-10}ns^{1-2}$ होता है। इलेक्ट्रॉन $(n-1)d$ कक्षकों में भरे जाते हैं, जो सबसे बाहरी $ns$ कक्षक के आंतरिक होते हैं। आधे भरे और पूरी तरह से भरे हुए d-उपकोशों के स्थायित्व के कारण आउफबाऊ नियम के अपवाद होते हैं (जैसे, क्रोमियम $3d^54s^1$ और तांबा $3d^{10}4s^1$)। * **(ii) धात्विक लक्षण और गलनांक:** सभी संक्रमण तत्व वास्तविक धातुएँ हैं। वे $ns$ और $(n-1)d$ दोनों इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी के कारण मजबूत धात्विक बंधन प्रदर्शित करते हैं। इस व्यापक धात्विक बंधन के कारण, वे कठोर, चमकीले, उच्च घनत्व वाले और उच्च गलनांक तथा क्वथनांक वाले होते हैं। धात्विक बंधन की ताकत आम तौर पर युग्मित d-इलेक्ट्रॉनों की संख्या के साथ बढ़ती है, और प्रत्येक श्रृंखला के मध्य के पास अधिकतम तक पहुँच जाती है। * **(iii) ऑक्सीकरण अवस्थाएँ:** संक्रमण तत्व परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। यह $(n-1)d$ और $ns$ कक्षकों के बीच छोटे ऊर्जा अंतर का परिणाम है, जो दोनों ऊर्जा स्तरों के इलेक्ट्रॉनों को बंधन निर्माण में भाग लेने की अनुमति देता है। न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था संयोजक $s$-इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है, और अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था $s$ और अयुग्मित $d$ इलेक्ट्रॉनों के योग से मेल खाती है। * **(iv) रंगीन आयनों का निर्माण:** अधिकांश संक्रमण धातु आयन ठोस अवस्था में या जलीय घोल में रंगीन होते हैं। इसका श्रेय इलेक्ट्रॉनों के $d-d$ संक्रमण को दिया जाता है। जब संक्रमण धातु आयन पर श्वेत प्रकाश पड़ता है, तो इलेक्ट्रॉन दृश्य क्षेत्र से प्रकाश की एक विशिष्ट आवृत्ति को अवशोषित करते हैं और कम ऊर्जा वाले d-कक्षकों से उच्च ऊर्जा वाले d-कक्षकों ($\Delta E$) में प्रमोट हो जाते हैं। देखे गए प्रेषित या पूरक रंग गैर-अवशोषित आवृत्तियों से मेल खाते हैं।
Q5. लैंथेनाइड संकुचन क्या है? लैंथेनाइड संकुचन के कारणों और एक्टिनाइड्स तथा लैंथेनाइडोत्तर तत्वों के रसायन विज्ञान पर इसके प्रमुख रासायनिक परिणामों की विस्तार से चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### लैंथेनाइड संकुचन का परिचय\nजैसे-जैसे हम लैंथेनाइड श्रेणी के साथ आगे बढ़ते हैं (लैंथेनम, La, परमाणु क्रमांक 57 से लुटेटियम, Lu, परमाणु क्रमांक 71 तक), परमाणु और आयनिक त्रिज्या ($M^{3+}$ आयनों) में एक स्थिर और क्रमिक कमी आती है। आकार में इस नियमित कमी को **लैंथेनाइड संकुचन** के रूप में जाना जाता है। ### 1. लैंथेनाइड संकुचन के कारण * **आंतरिक ऑर्बिटल्स में इलेक्ट्रॉनों का जुड़ना:** जैसे-जैसे हम लैंथेनाइड श्रृंखला में एक तत्व से दूसरे तत्व की ओर बढ़ते हैं, नाभिकीय आवेश एक बार में एक इकाई बढ़ता है, और आने वाला इलेक्ट्रॉन पूर्व-प्रतिअंतिम $(n-2)f$ ऑर्बिटल में जोड़ा जाता है। * **4f इलेक्ट्रॉनों का दुर्बल आवरण प्रभाव (Shielding Effect):** 4f ऑर्बिटल्स का आकार बहुत फैला हुआ और जटिल होता है, जिसके परिणामस्वरूप सबसे बाहरी संयोजकता इलेक्ट्रॉनों (6s इलेक्ट्रॉनों) पर इन 4f इलेक्ट्रॉनों द्वारा नाभिकीय आवेश का आवरण या परिरक्षण प्रभाव बहुत कम होता है। * **शुद्ध परिणाम:** बढ़ते नाभिकीय आवेश और 4f इलेक्ट्रॉनों द्वारा दुर्बल आवरण के कारण, बाहरी इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभावी नाभिकीय आवेश पूरी अवधि में लगातार बढ़ता जाता है। परिणामस्वरूप, इलेक्ट्रॉन बादल नाभिक के करीब खींचे जाते हैं, जिससे परमाणु और आयनिक त्रिज्या में क्रमिक कमी आती है। ### 2. लैंथेनाइड संकुचन के प्रमुख रासायनिक परिणाम\nलैंथेनाइड संकुचन का आवर्त सारणी के रसायन विज्ञान पर गहरा प्रभाव पड़ता है, विशेष रूप से लैंथेनाइडोत्तर तत्वों और एक्टिनाइड्स पर: * **समान समूह के तत्वों के आकार में समानता (उदा. जिरकोनियम और हाफ्नियम):** लैंथेनाइड संकुचन के कारण, दूसरी पंक्ति के संक्रमण तत्वों (जैसे Zr, $160 \text{ pm}$) की परमाणु और आयनिक त्रिज्या उसी समूह के तीसरी पंक्ति के संक्रमण तत्वों (जैसे Hf, $159 \text{ pm}$) के लगभग समान होती है। परमाणु त्रिज्या में इस घनिष्ठ समानता के कारण जिरकोनियम और हाफ्नियम जैसे तत्वों को अलग करना बेहद मुश्किल हो जाता है और उनके रासायनिक गुण लगभग समान हो जाते हैं। * **हाइड्रॉक्साइड्स की क्षारीय शक्ति में भिन्नता:** जैसे-जैसे लैंथेनाइड श्रृंखला में $La^{3+}$ से $Lu^{3+}$ तक आयनिक त्रिज्या घटती है, फैजान के नियमों के अनुसार $\text{M-OH}$ बंध का सहसंयोजक चरित्र बढ़ता है। परिणामस्वरूप, हाइड्रॉक्साइड्स की क्षारीय शक्ति कम हो जाती है। इस प्रकार, $\text{La(OH)}_3$ सबसे अधिक क्षारीय है, जबकि $\text{Lu(OH)}_3$ सबसे कम क्षारीय है। * **घनत्व और यांत्रिक गुणों पर प्रभाव:** परमाणु द्रव्यमान में वृद्धि के साथ परमाणु आयतन में स्थिर कमी के कारण, श्रृंखला की शुरुआत से अंत तक लैंथेनाइड्स का घनत्व काफी बढ़ जाता है। * **एक्टिनाइड्स पर प्रभाव:** लैंथेनाइड्स के समान, एक्टिनाइड्स भी 5f इलेक्ट्रॉनों के दुर्बल आवरण के कारण 'एक्टिनाइड संकुचन' प्रदर्शित करते हैं, जो उनके आयनिक त्रिज्या और समन्वय रसायन विज्ञान को इसी तरह से प्रभावित करता है।
Q6. जलीय विलयन में परमाणु क्रमांक 25 वाले द्विसंयोजक धातु आयन के 'स्पिन-ओनली' चुंबकीय आघूर्ण की गणना कीजिए। साथ ही, समझाइए कि संक्रमण धातु के यौगिक सामान्यतः रंगीन क्यों होते हैं। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भाग 1: 'स्पिन-ओनली' चुंबकीय आघूर्ण की गणना 1. **तत्व और परमाणु क्रमांक की पहचान:** - दिया गया परमाणु क्रमांक ($Z$) = 25। - परमाणु क्रमांक 25 वाला तत्व मैंगनीज (Mn) है। 2. **उदासीन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन निर्धारित करना:** - मैंगनीज ($Mn$) = $[Ar] 3d^5 4s^2$ 3. **द्विसंयोजक आयन ($M^{2+}$) का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन निर्धारित करना:** - जब मैंगनीज दो इलेक्ट्रॉन खो देता है (4s ऑर्बिटल से), तो यह $Mn^{2+}$ आयन बनाता है। - $Mn^{2+}$ का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन = $[Ar] 3d^5 4s^0$ 4. **अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) गिनना:** - $3d^5$ विन्यास में, अधिकतम बहुलता के हुंड के नियम के अनुसार, सभी 5 इलेक्ट्रॉन पाँच संभ्रंश (degenerate) d-ऑर्बिटल्स में अयुग्मित रहते हैं। - अतः, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = 5 है। 5. **'स्पिन-ओनली' चुंबकीय आघूर्ण सूत्र का उपयोग करना:** $$\mu = \sqrt{n(n+2)} \text{ BM}$$ सूत्र में $n = 5$ रखें: $$\mu = \sqrt{5(5+2)}$$ $$\mu = \sqrt{5 \times 7}$$ $$\mu = \sqrt{35} \text{ BM}$$ $$\mu \approx 5.92 \text{ BM}$$ - इस प्रकार, $Mn^{2+}$ आयन का 'स्पिन-ओनली' चुंबकीय आघूर्ण $5.92 \text{ BM}$ है। --- ### भाग 2: संक्रमण धातु यौगिकों का रंग\nअधिकांश संक्रमण धातु यौगिक और आयन ठोस अवस्था और जलीय विलयन दोनों में रंगीन होते हैं। * **रंग की उत्पत्ति:** संक्रमण धातु आयनों का रंग **d-d इलेक्ट्रॉन संक्रमण** के कारण होता है। * **क्रियाविधि:** 1. एक पृथक्कृत संक्रमण धातु आयन में, सभी पाँच d-ऑर्बिटल संभ्रंश होते हैं (समान ऊर्जा वाले)। हालाँकि, जब लिगैंड समन्वय संकुल बनाने के लिए धातु आयन के पास आते हैं, तो लिगैंड्स द्वारा बनाया गया विद्युत क्षेत्र d-ऑर्बिटल्स की संभ्रंशता को समाप्त कर देता है, जिससे वे विभिन्न ऊर्जाओं के दो सेटों ($t_{2g}$ और $e_g$ सेट) में विभाजित हो जाते हैं। 2. इस घटना को क्रिस्टल फील्ड विपाटन (crystal field splitting) के रूप में जाना जाता है। 3. इन विभाजित d-ऑर्बिटल्स के बीच का ऊर्जा अंतराल ($\Delta_o$) विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम के दृश्य क्षेत्र में विकिरण की तरंग दैर्ध्य से मेल खाता है। 4. जब दृश्य प्रकाश संकुल पर पड़ता है, तो निचले ऊर्जा d-ऑर्बिटल से एक इलेक्ट्रॉन प्रकाश की एक विशिष्ट आवृत्ति को अवशोषित करता है और उच्च ऊर्जा d-ऑर्बिटल में उत्तेजित हो जाता है (d-d संक्रमण)। 5. प्रेषित या परावर्तित प्रकाश में इस विशिष्ट अवशोषित तरंग दैर्ध्य की कमी होती है और इसलिए यह रंगीन दिखाई देता है (अवशोषित प्रकाश का पूरक रंग)। उदाहरण के लिए, जलयोजित कॉपर(II) आयन ($[Cu(H_2O)_6]^{2+}$) लाल-नारंगी प्रकाश को अवशोषित करते हैं और नीले रंग के दिखाई देते हैं।
Q7. संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक तत्वों) की सामान्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए, विशेष रूप से उनकी परिवर्तित ऑक्सीकरण अवस्थाओं, चुंबकीय गुणों और उत्प्रेरक गुणों के संदर्भ में। इन गुणों के पीछे के कारणों को विस्तार से समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### संक्रमण तत्वों का परिचय\nसंक्रमण तत्व वे तत्व हैं जिनकी मूल अवस्था में या किसी भी ऑक्सीकरण अवस्था में d-ऑर्बिटल अपूर्ण रूप से भरे होते हैं। ये आवर्त सारणी के मध्य में s-ब्लॉक और p-ब्लॉक तत्वों के बीच, समूह 3 से 12 तक स्थित होते हैं। ये तत्व आबंधन में ns ऑर्बिटल्स के साथ-साथ (n-1)d ऑर्बिटल्स की भागीदारी के कारण अद्वितीय भौतिक और रासायनिक विशेषताएं प्रदर्शित करते हैं। ### 1. परिवर्तित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ\nसंक्रमण तत्वों का सबसे उल्लेखनीय गुण उनके यौगिकों में कई या परिवर्तित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करने की क्षमता है। * **परिवर्तित ऑक्सीकरण अवस्थाओं का कारण:** यह गुण इसलिए उत्पन्न होता है क्योंकि सबसे बाहरी ns ऑर्बिटल्स और आंतरिक (n-1)d ऑर्बिटल्स के बीच ऊर्जा अंतर बहुत कम होता है। परिणामस्वरूप, ns और (n-1)d दोनों ऑर्बिटल्स के इलेक्ट्रॉन आबंधन में भाग ले सकते हैं। * **न्यूनतम और अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाएँ:** संक्रमण धातुओं द्वारा दिखाई जाने वाली न्यूनतम ऑक्सीकरण अवस्था सामान्यतः ns ऑर्बिटल में इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है, जबकि अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था ns और (n-1)d इलेक्ट्रॉनों के योग के बराबर होती है। उदाहरण के लिए, मैंगनीज +2 से +7 तक की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करता है। * **स्थायित्व कारक:** फ्लोरीन और ऑक्सीजन अत्यधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व होने के कारण संक्रमण धातुओं की उच्चतम ऑक्सीकरण अवस्थाओं को स्थिर करते हैं (उदा. $OsO_4$ और $VF_5$)। ### 2. चुंबकीय गुण\nअधिकांश संक्रमण धातु आयन और उनके यौगिक अनुचुंबकीय (paramagnetic) होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे चुंबकीय क्षेत्र द्वारा आकर्षित होते हैं। * **चुंबकत्व की उत्पत्ति:** अनुचुंबकत्व (n-1)d ऑर्बिटल्स में अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति के कारण उत्पन्न होता है। प्रत्येक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन में कक्षीय चुंबकीय आघूर्ण और चक्रण चुंबकीय आघूर्ण होता है। * **चुंबकीय आघूर्ण की गणना:** चुंबकीय आघूर्ण ($\mu$) की गणना 'स्पिन-ओनली' सूत्र का उपयोग करके की जा सकती है: $$\mu = \sqrt{n(n+2)} \text{ BM (बोर मैग्नेटन)}$$ जहाँ $n$ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या है। जैसे-जैसे अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती है, चुंबकीय आघूर्ण बढ़ता जाता है। सभी युग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले पदार्थ प्रतिचुंबकीय होते हैं और चुंबकीय क्षेत्र द्वारा प्रतिकर्षित होते हैं। ### 3. उत्प्रेरक गुण\nसंक्रमण धातुएँ और उनके यौगिक औद्योगिक और प्रयोगशाला दोनों रासायनिक प्रक्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। * **उत्प्रेरक सक्रियता का कारण:** 1. **परिवर्तित ऑक्सीकरण अवस्थाएँ:** वे आसानी से अपनी ऑक्सीकरण अवस्थाओं को बदल सकते हैं और अस्थिर मध्यवर्ती यौगिक बना सकते हैं, जो कम सक्रियण ऊर्जा के साथ एक वैकल्पिक प्रतिक्रिया पथ प्रदान करते हैं। 2. **बड़ा पृष्ठीय क्षेत्रफल:** बारीक पिसी हुई संक्रमण धातुएँ अभिकारक अणुओं के अधिशोषित होने के लिए एक बड़ा पृष्ठीय क्षेत्रफल प्रदान करती हैं, जिससे उत्प्रेरक की सतह पर अभिकारकों की सांद्रता बढ़ जाती है और प्रतिक्रियाओं को बढ़ावा मिलता है। 3. **रिक्त ऑर्बिटल्स:** उनमें रिक्त d-ऑर्बिटल होते हैं जो अभिकारक अणुओं से आसानी से इलेक्ट्रॉन युग्म स्वीकार कर सकते हैं।
Q8. आंतरिक संक्रमण तत्व क्या हैं? उनके सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, लैंथेनाइड संकुचन की परिघटना तथा इसके प्रमुख परिणामों की चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### आंतरिक संक्रमण तत्वों का परिचय\nआंतरिक संक्रमण वे तत्व हैं जिनमें अंतिम इलेक्ट्रॉन $(n-2)f$ कक्षकों में प्रवेश करता है। इन्हें f-ब्लॉक तत्वों के रूप में भी जाना जाता है और आवर्त सारणी के निचले भाग में दो श्रेणियों में रखा गया है: लैंथेनाइड्स (4f-श्रेणी) और एक्टिनाइड्स (5f-श्रेणी)। ### 1. सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास - f-ब्लॉक तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $(n-2)f^{1-14} (n-1)d^{0-1} ns^2$ होता है। - लैंथेनाइड्स (4f-श्रेणी) के लिए: $[Xe] 4f^{1-14} 5d^{0-1} 6s^2$। - एक्टिनाइड्स (5f-श्रेणी) के लिए: $[Rn] 5f^{1-14} 6d^{0-1} 7s^2$। - चूकि f-कक्षक परमाणु के बहुत अंदर स्थित होते हैं, इसलिए उनमें जोड़े गए इलेक्ट्रॉन कमजोर परिरक्षण प्रदान करते हैं। ### 2. लैंथेनाइड संकुचन - जैसे-जैसे हम लैंथेनाइड श्रेणी में आगे बढ़ते हैं (La से Lu तक), परमाणु और आयनिक त्रिज्या में लगातार कमी आती है। - आकार में इस नियमित कमी को **लैंथेनाइड संकुचन** कहा जाता है। - **कारण:** यह एक $4f$ इलेक्ट्रॉन द्वारा दूसरे $4f$ इलेक्ट्रॉन के imperfect (अपूर्ण) परिरक्षण के कारण होता है। जैसे-जैसे प्रत्येक चरण में नाभिकीय आवेश एक इकाई बढ़ता है, सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन बादल नाभिक के करीब खिंच जाते हैं। ### 3. लैंथेनाइड संकुचन के परिणाम - **गुणों में समानता:** त्रिज्या में बहुत कम परिवर्तन के कारण, दूसरी और तीसरी संक्रमण श्रेणियों के तत्वों (जैसे Zr और Hf, Nb और Ta) के रासायनिक गुण अत्यधिक समान होते हैं, जिससे उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है। - **घनत्व में वृद्धि:** परमाणु आकार में निरंतर कमी और परमाणु द्रव्यमान में वृद्धि के कारण श्रेणी में घनत्व लगातार बढ़ता जाता है। - **क्षारीयता में अंतर:** $\text{La}^{3+}$ से $\text{Lu}^{3+}$ तक आयनिक आकार में कमी के कारण, $\text{M-OH}$ बंध का सहसंयोजक चरित्र बढ़ जाता है, जिससे उनके हाइड्रॉक्साइड्स की क्षारीय शक्ति कम हो जाती है।
Q9. परमाणु क्रमांक 27 वाले संक्रमण धातु के $M^{2+}$ आयन के 'स्पिन-ओनली' (केवल चक्रण) चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए। संक्रमण धातु आयनों में चुम्बकीय गुणों की उत्पत्ति को भी समझाइए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### चरण 1: उदासीन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए\nसंक्रमण धातु का परमाणु क्रमांक $Z = 27$ है। यह कोबाल्ट (Co) से संबंधित है।\nकोबाल्ट ($Z = 27$) का मूल अवस्था इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है: $[Ar] 3d^7 4s^2$ ### चरण 2: $M^{2+}$ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ज्ञात कीजिए\nजब धातु $M^{2+}$ आयन बनाने के लिए दो इलेक्ट्रॉन त्यागती है, तो इलेक्ट्रॉन सबसे पहले सबसे बाहरी $4s$ कक्षक से निकलते हैं: $[Ar] 3d^7 4s^0$ या संक्षेप में $[Ar] 3d^7$ ### चरण 3: अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) निर्धारित कीजिए $3d^7$ विन्यास में, अधिकतम बहुलकता के हुंड के नियम के अनुसार, पाँच $3d$ कक्षकों में 7 इलेक्ट्रॉनों का वितरण इस प्रकार है: - तीन कक्षकों में युग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं (प्रत्येक में 2 इलेक्ट्रॉन)। - दो कक्षकों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं (प्रत्येक में 1 इलेक्ट्रॉन)।\nअतः, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = 3। ### चरण 4: स्पिन-ओनली चुम्बकीय आघूर्ण सूत्र का प्रयोग कीजिए\nस्पिन-ओनली चुम्बकीय आघूर्ण ($\mu$) की गणना का सूत्र है: $$\mu = \sqrt{n(n + 2)} \text{ BM}$$ (बोर मैग्नेटन) \nसूत्र में $n = 3$ रखिए: $$\mu = \sqrt{3(3 + 2)}$$ $$\mu = \sqrt{3 \times 5}$$ $$\mu = \sqrt{15}$$ $$\mu \approx 3.87 \text{ BM}$$ ### चुम्बकीय गुणों की उत्पत्ति\nसंक्रमण धातु आयनों का चुम्बकीय आघूर्ण दो स्रोतों से उत्पन्न होता है: 1. **चक्रण योगदान:** इलेक्ट्रॉनों का अपने अक्ष पर घूमना। 2. **कक्षीय योगदान:** नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की गति।\nअधिकांश प्रथम-पंक्ति के संक्रमण धातु आयनों में, आसपास के लिगैंड्स के विद्युत क्षेत्र के साथ अन्योन्यक्रिया के कारण कक्षीय योगदान प्रभावी रूप से समाप्त हो जाता है, यही कारण है कि 'स्पिन-ओनली' सूत्र का व्यापक और सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता है।
Q10. संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक तत्वों) की सामान्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए, विशेष रूप से उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, परमाणु और आयनिक त्रिज्या, तथा परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाओं के संदर्भ में। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### संक्रमण तत्वों का परिचय\nसंक्रमण वे तत्व हैं जिनमें उनकी मूल अवस्था या किसी भी ऑक्सीकरण अवस्था में d-कक्षक अपूर्ण रूप से भरे होते हैं। ये आवर्त सारणी के मध्य भाग में s-ब्लॉक और p-ब्लॉक तत्वों के बीच, समूह 3 से समूह 12 तक स्थित होते हैं। ### 1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास - d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य बाह्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $(n-1)d^{1-10}ns^{1-2}$ होता है। - आवर्त में आगे बढ़ने पर आंतरिक d-कक्षक क्रमिक रूप से भरते जाते हैं। - अर्ध-पूर्ण ($d^5$) और पूर्ण-पूर्ण ($d^{10}$) विन्यासों के अतिरिक्त स्थायित्व के कारण कुछ अपवाद भी होते हैं (जैसे क्रोमियम और कॉपर)। ### 2. परमाणु और आयनिक त्रिज्या - संक्रमण श्रेणी में परमाणु क्रमांक बढ़ने के साथ परमाणु त्रिज्या घटती है, किंतु श्रेणी के मध्य के बाद यह कमी बहुत कम हो जाती है। - ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जोड़े गए d-इलेक्ट्रॉनों का परिरक्षण प्रभाव (shielding effect) बढ़े हुए नाभिकीय आवेश को संतुलित कर देता है। - समूह में ऊपर से नीचे आने पर पहली से दूसरी संक्रमण श्रेणी तक त्रिज्या बढ़ती है, परंतु लैंथेनाइड संकुचन के कारण तीसरी श्रेणी की त्रिज्या दूसरी श्रेणी के लगभग समान होती है। ### 3. परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ - संक्रमण धातुएँ $(n-1)d$ इलेक्ट्रॉनों और $ns$ इलेक्ट्रॉनों दोनों के बंधन में भाग लेने के कारण विभिन्न प्रकार की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करती हैं, क्योंकि इन कक्षकों के बीच ऊर्जा का अंतर बहुत कम होता है। - 3d श्रेणी में मैंगनीज अधिकतम +7 ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करता है। - निचली ऑक्सीकरण अवस्थाएँ आमतौर पर तब देखी जाती हैं जब वे ऐसे लिगैंड्स के साथ संकुल बनाते हैं जो $\pi$-इलेक्ट्रॉनों को स्वीकार कर सकते हैं। ### निष्कर्ष\nये अनूठी विशेषताएँ रिक्त d-कक्षकों की उपलब्धता के कारण उत्पन्न होती हैं, जो संक्रमण धातुओं को उत्प्रेरण, मिश्र धातु निर्माण और उपसहसंयोजन रसायन विज्ञान में अत्यधिक उपयोगी बनाती हैं।
Q11. जलीय विलयन में एक द्विसंयोजक धातु आयन का चक्रण-मात्र (spin-only) चुंबकीय आघूर्ण ज्ञात कीजिए जिसका परमाणु क्रमांक 25 है। 3 Marks
उत्तर (Answer): चरण 1: तत्व और उसके इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन की पहचान करें।\nपरमाणु क्रमांक 25 वाला तत्व मैंगनीज (Mn) है।\nमैंगनीज का जमीनी अवस्था का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन $[Ar] 3d^5 4s^2$ है। \nचरण 2: द्विसंयोजक धातु आयन ($Mn^{2+}$) का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन निर्धारित करें।\nजब मैंगनीज दो इलेक्ट्रॉन खो देता है ($4s$ कक्षक से), तो $Mn^{2+}$ का इलेक्ट्रॉनिक कॉन्फ़िगरेशन हो जाता है: $[Ar] 3d^5$ \nचरण 3: अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) की गणना करें। $3d^5$ विन्यास में, हुंड के नियम के अनुसार, सभी पाँच $d$ कक्षकों में एक-एक इलेक्ट्रॉन होता है।\nइसलिए, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या, $n = 5$ है। \nचरण 4: चक्रण-मात्र चुंबकीय आघूर्ण के सूत्र का उपयोग करें।\nचक्रण-मात्र चुंबकीय आघूर्ण ($\mu$) का सूत्र है: $\mu = \sqrt{n(n + 2)}$ BM (बोर मैग्नेटन) \nचरण 5: सूत्र में $n$ का मान रखें। $\mu = \sqrt{5(5 + 2)}$ $\mu = \sqrt{5 \times 7}$ $\mu = \sqrt{35}$ $\mu \approx 5.92$ BM \nअंतिम उत्तर: $Mn^{2+}$ आयन का चक्रण-मात्र चुंबकीय आघूर्ण $5.92$ BM है।
Q12. स्पष्ट कीजिए कि संक्रमण धातुएँ और उनके यौगिक अपनी उत्प्रेरकीय गुणों के लिए क्यों जाने जाते हैं। कम से कम दो कारण दीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): संक्रमण धातुएँ और उनके यौगिक विभिन्न औद्योगिक और प्रयोगशाला प्रक्रियाओं में उत्प्रेरक के रूप में व्यापक रूप से उपयोग किए جاتے हैं। उनकी उत्प्रेरकीय दक्षता मुख्य रूप से दो प्रमुख कारकों के कारण होती है। सबसे पहले, संक्रमण धातुएँ बंधन में $ns$ इलेक्ट्रॉनों के साथ-साथ $(n-1)d$ इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी के कारण परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करती हैं। इस वजह से, वे आसानी से इलेक्ट्रॉनों को स्वीकार और त्याग सकती हैं, जिससे अभिकारकों के साथ अस्थाई मध्यवर्ती यौगिक बनते हैं और कम सक्रियण ऊर्जा के साथ एक वैकल्पिक प्रतिक्रिया पथ मिलता है। दूसरे, संक्रमण धातुओं की सतह पर खाली संयोजकता के साथ एक बड़ा सतह क्षेत्र प्रदान करने की प्रवृत्ति होती है। जब अभिकारक के अणु संक्रमण धातु उत्प्रेरक की सतह के संपर्क में आते हैं, तो वे सतह पर adsorbed हो जाते हैं। यह सोखना सक्रिय स्थलों पर अभिकारकों की सांद्रता को बढ़ाता है और अभिकारक अणुओं के भीतर के बंधनों को कमज़ोर करता है, जिससे तेजी से बंधन टूटना और उत्पादों का निर्माण आसान होता है। उदाहरणों में हैबर प्रक्रिया में आयरन, संपर्क प्रक्रिया में वैनेडियम पेंटाऑक्साइड और हाइड्रोजनीकरण प्रतिक्रियाओं में बारीक विभाजित निकल का उपयोग शामिल है, जो स्पष्ट रूप से उनकी उल्लेखनीय उत्प्रेरकीय उपयोगिता को प्रदर्शित करते हैं।
Q13. संक्रमण तत्व बड़ी संख्या में उपसहसंयोजक यौगिक क्यों बनाते हैं? योगदान देने वाले कारकों की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): संक्रमण तत्वों में विभिन्न अणुओं और आयनों, जिन्हें लिगैंड कहा जाता है, के साथ उपसहसंयोजक कॉम्प्लेक्स (या उपसहसंयोजक यौगिक) बनाने की एक उल्लेखनीय प्रवृत्ति होती है। इस क्षमता का श्रेय संक्रमण धातु परमाणुओं और आयनों द्वारा रखे गए कई अनूठे इलेक्ट्रॉनिक और संरचनात्मक लक्षणों को दिया जाता है: 1. **छोटा आयनिक आकार और उच्च परमाणु आवेश:** संक्रमण धातु आयनों में आम तौर पर उच्च परमाणु आवेश के साथ अपेक्षाकृत छोटे आयनिक आकार होते हैं। यह उच्च आवेश-से-आकार का अनुपात उनकी ध्रुवीकरण शक्ति को बढ़ाता है, जिससे वे लिगैंड से इलेक्ट्रॉन जोड़े को प्रभावी ढंग से आकर्षित करने में सक्षम होते हैं। 2. **रिक्त d-कक्षकों की उपलब्धता:** संक्रमण धातु आयनों के अपने संयोजकता कोष में उपयुक्त ऊर्जा के रिक्त $d$-कक्षक होते हैं। उपसहसंयोजक सहसंयोजक बंध निर्माण के दौरान लुईस आधारों (लिगैंड्स) द्वारा दान किए गए इलेक्ट्रॉन युग्मों को स्वीकार करने के लिए ये रिक्त कक्षक आसानी से उपलब्ध होते हैं। 3. **परिवर्तनशील ऑक्सीकरण अवस्थाएं:** संक्रमण तत्वों की कई ऑक्सीकरण अवस्थाओं को प्रदर्शित करने की क्षमता उन्हें विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक विशेषताओं वाले लिगैंड्स के साथ कॉम्प्लेक्स बनाने में सक्षम बनाती है, जो विभिन्न त्रिविम रासायनिक व्यवस्थाओं और उपसहसंयोजन संख्याओं को स्थिर करती है। \nइन कारकों के माध्यम से, संक्रमण धातुएं $NH_3$, $H_2O$, $CN^-$, और हैलाइड आयनों जैसे लिगैंड्स के साथ मजबूती से बंध बनाती हैं ताकि $[Fe(CN)_6]^{3-}$, $[Cu(NH_3)_4]^{2+}$, आदि जैसे स्थिर उपसहसंयोजक यौगिक उत्पन्न हो सकें।
Q14. $n = 3$ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले संक्रमण धातु आयन के केवल-चक्रण चुम्बकीय आघूर्ण की गणना कीजिए। 2 Marks
उत्तर (Answer): $n = 3$ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले संक्रमण धातु आयन के केवल-चक्रण चुम्बकीय आघूर्ण की गणना करने के लिए, हम केवल-चक्रण सूत्र का उपयोग करते हैं। 1. **दिया गया डेटा:** अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = 3 2. **सूत्र:** केवल-चक्रण चुम्बकीय आघूर्ण ($\mu$) इस प्रकार दिया जाता है: $$\mu = \sqrt{n(n + 2)} \text{ BM (बोर मैग्नेटन)}$$ 3. **गणना:** सूत्र में $n = 3$ का मान रखें: $$\mu = \sqrt{3(3 + 2)}$$ $$\mu = \sqrt{3 \times 5}$$ $$\mu = \sqrt{15} \text{ BM}$$ अब, 15 का वर्गमूल निकालें: $$\sqrt{15} \approx 3.87 \text{ BM}$$ \nअतः, 3 अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों वाले संक्रमण धातु आयन का केवल-चक्रण चुम्बकीय आघूर्ण $3.87 \text{ BM}$ है।
Q15. लैंथेनाइड संकुचन क्या है? इसके प्रमुख कारणों और परिणामों की चर्चा कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): लैंथेनाइड संकुचन को परमाणु संख्या में वृद्धि के साथ लैंथेनाइड तत्वों (La से Lu तक) की परमाणु और आयनिक त्रिज्या में निरंतर और क्रमिक कमी के रूप में परिभाषित किया जाता है। जैसे-जैसे हम लैंथेनाइड श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं, प्रत्येक चरण में परमाणु आवेश एक इकाई बढ़ जाता है, और साथ ही उपंतिम पूर्व $4f$ उपकोश में एक इलेक्ट्रॉन जोड़ा जाता है। **लैंथेनाइड संकुचन के कारण:**\nलैंथेनाइड संकुचन का प्राथमिक कारण $4f$ इलेक्ट्रॉनों का खराब परिरक्षण प्रभाव (poor shielding effect) है। जैसे-जैसे परमाणु संख्या बढ़ती है, परमाणु आवेश बढ़ता है, जो इलेक्ट्रॉन बादल को नाभिक के करीब खींचता है। $f$-कक्षकों के विसरित और जटिल आकार के कारण, वे बढ़ते परमाणु आवेश से बाहरी $6s$ इलेक्ट्रॉनों की बहुत कम स्क्रीनिंग या परिरक्षण प्रदान करते हैं। परिणामस्वरूप, बाहरी इलेक्ट्रॉनों द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रभावी परमाणु आवेश लगातार बढ़ता जाता है, जिसके परिणामस्वरूप परमाणु और आयनिक आकारों में संकुचन होता है। **लैंथेनाइड संकुचन के परिणाम:** 1. **पोस्ट-लैंथेनाइड्स की परमाणु त्रिज्या में समानता:** लैंथेनाइड संकुचन के कारण, दूसरी और तीसरी संक्रमण श्रृंखला के तत्वों (जैसे Zr और Hf, Nb और Ta) की परमाणु त्रिज्या एक-दूसरे के बहुत करीब होती है। इससे उनका रासायनिक पृथक्करण बेहद मुश्किल हो जाता है। 2. **हाइड्रॉक्साइड्स की क्षारीय शक्ति:** चूंकि आयनिक त्रिज्या La से Lu तक घटती है, फैजान के नियम के अनुसार $M-OH$ बंधों का सहसंयोजक चरित्र बढ़ता है। परिणामस्वरूप, लैंथेनाइड हाइड्रॉक्साइड्स की क्षारीय शक्ति $La(OH)_3$ से $Lu(OH)_3$ तक कम हो जाती है। 3. **घनत्व:** परमाणु द्रव्यमान में वृद्धि के साथ परमाणु आयतन में लगातार कमी से लैंथेनाइड तत्वों के घनत्व में नियमित वृद्धि होती है।