मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 12 - रसायन विज्ञान
अध्याय: एल्डिहाइड, कीटोन और कार्बोक्सिलिक अम्ल - त्वरित पुनरीक्षण नोट्स (Formula Sheet)
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### परिचय एवं क्रियात्मक समूह
इस अध्याय में हम तीन मुख्य कार्बनिक यौगिकों का अध्ययन करते हैं जिनमें कार्बोनिल समूह (>C=O) उपस्थित होता है:
1. एल्डिहाइड: R-CHO (कार्बोनिल समूह हाइड्रोजन और एल्किल/एर्ल समूह से जुड़ा होता है)
2. कीटोन: R-CO-R' (कार्बोनिल समूह दो एल्किल या एर्ल समूहों से जुड़ा होता है)
3. कार्बोक्सिलिक अम्ल: R-COOH (कार्बोनिल समूह हाइड्रॉक्सिल समूह -OH से जुड़ा होता है)
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### एल्डिहाइड और कीटोन बनाने की प्रमुख विधियाँ
1. ऐल्कोहॉल के ऑक्सीकरण द्वारा:
- प्राथमिक ऐल्कोहॉल
(1^\circ \text{ Alcohol}) \xrightarrow{\text{PCC या CrO}_3} \text{ एल्डिहाइड (R-CHO)}
- द्वितीयक ऐल्कोहॉल
(2^\circ \text{ Alcohol}) \xrightarrow{\text{क्रोमिक एनहाइड्राइड}} \text{ कीटोन (R-CO-R')}
2. हाइड्रोकार्बन से (ओजोनोपलिसिस द्वारा):
- एल्कीन की ओजोन से अभिक्रिया और उसके बाद जलीय जिंक (
Zn/H_2O) द्वारा अपचयन कराने पर एल्डिहाइड या कीटोन प्राप्त होते हैं।
3. रोज़मंड अपचयन (Rosenmund Reduction):
- एसाइल क्लोराइड का पैलेडियम समर्थित बेरियम सल्फेट (
Pd-BaSO_4) की उपस्थिति में हाइड्रोजन द्वारा अपचयन करने पर एल्डिहाइड बनता है।
R-COCl + H2 \xrightarrow{Pd-BaSO4} R-CHO + HCl
4. स्टीफन अभिक्रिया (Stephen Reaction):
- एल्किल साइनाइड का टिन क्लोराइड और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (
SnCl_2 + HCl) द्वारा अपचयन और तत्पश्चात जल अपघटन करने पर एल्डिहाइड बनता है।
R-CN + SnCl2 + HCl \rightarrow R-CH=NH \xrightarrow{H2O} R-CHO
5. ईटार्ड अभिक्रिया (Etard Reaction):
- टॉलूवीन का क्रोमाइल क्लोराइड (
CrO2Cl2) द्वारा संगत क्रोमियम संकुल में ऑक्सीकरण और जल अपघटन करने पर बेंज़ल्डिहाइड बनता है।
\text{टॉलूवीन} + CrO2Cl2 \rightarrow \text{संकुल} \xrightarrow{H_2O} \text{बेंज़ल्डिहाइड}
6. फ्रीडेल-क्राफ्ट्स एसिलेशन (Friedel-Crafts Acylation):
- बेंजीन की अभिक्रिया एसिल क्लोराइड (
R-COCl) के साथ निर्जल AlCl_3 की उपस्थिति में कराने पर एरोमैटिक कीटोन (एसीटोफिलेन) बनता है।
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### महत्वपूर्ण रासायनिक अभिक्रियाएँ (एल्डिहाइड और कीटोन)
1. न्यूक्लियोफिलिक योगशील अभिक्रियाएँ (Nucleophilic Addition Reactions):
- एल्डिहाइड और कीटोन नाभिकस्नेही (Nucleophile) के प्रति उच्च क्रियाशीलता दर्शाते हैं।
- क्रियाशीलता का क्रम:
\text{HCHO} > R-CHO > R-CO-R' (त्रिविम बाधा और प्रेरणिक प्रभाव के कारण)।
2. टॉलेन परीक्षण (Tollens' Test):
- एल्डिहाइड की टॉलेन अभिकर्मक (
[Ag(NH3)2]^+) के साथ गर्म करने पर रजत दर्पण (Silver Mirror) बनता है। कीटोन यह परीक्षण नहीं देते हैं।
R-CHO + 2[Ag(NH3)2]^+ + 3OH^- \rightarrow R-COO^- + 2Ag\downarrow + 2H2O + 4NH3
3. फेलिंग परीक्षण (Fehling's Test):
- एल्डिहाइड को फेलिंग विलयन (फेलिंग 'क' और फेलिंग 'ख' का मिश्रण) के साथ गर्म करने पर लाल भूरे रंग का
Cu_2O अवक्षेप प्राप्त होता है। एरोमैटिक एल्डिहाइड यह परीक्षण नहीं देते।
4. एल्डोल संघनन (Aldol Condensation):
- वे एल्डिहाइड या कीटोन जिनमें अल्फा-हाइड्रोजन (
\alpha-H) परमाणु होता है, तनु क्षार (NaOH) की उपस्थिति में अभिक्रिया करके 'एल्डोल' (बीटा-हाइड्रॉक्सी एल्डिहाइड) बनाते हैं।
- उदाहरण:
2CH3CHO \xrightarrow{Dil. NaOH} CH3-CH(OH)-CH_2-CHO
5. कैनिज़ारो अभिक्रिया (Cannizzaro Reaction):
- वे एल्डिहाइड जिनमें अल्फा-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होता (जैसे- HCHO, C6H5CHO), सांद्र क्षार के साथ स्व-ऑक्सीकरण और अपचयन (विषम अनुपात Jि) प्रदर्शित करते हैं जिससे अल्कोहल और कार्बोक्सिलिक अम्ल का लवण बनता है।
2HCHO + NaOH \rightarrow CH_3OH + HCOONa
6. क्लेमेंसेन अपचयन (Clemmensen Reduction):
- कार्बोनिल समूह का
Zn-Hg (जिंक-अमालगम) और सांद्र HCl द्वारा हाइड्रोकार्बन (-CH_2- समूह) में अपचयन।
>C=O \xrightarrow{Zn-Hg / HCl} >CH2 + H2O
7. वुलफ-किश्नर अपचयन (Wolff-Kishner Reduction):
- कार्बोनिल समूह का हाइड्राज़ीन (
NH2NH2) और एथिल ग्लाइकोल में पोटेशियम हाइड्रोक्साइड (KOH) के साथ अपचयन द्वारा हाइड्रोकार्बन बनना।
>C=O \xrightarrow{NH2NH2 \text{ फिर } KOH/Glycol} >CH2 + N2
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### कार्बोक्सिलिक अम्ल: परिचय एवं बनाने की विधियाँ
1. प्राथमिक ऐल्कोहॉलों और एल्डिहाइडों के ऑक्सीकरण से:
- इन्हें तीव्र ऑक्सीकारकों जैसे अम्लीय
KMnO_4 के साथ ऑक्सीकृत करके सीधे कार्बोक्सिलिक अम्ल प्राप्त किए जाते हैं।
2. ऐल्किल बेंजीन के ऑक्सीकरण से:
- टॉलूवीन या अन्य ऐल्किल बेंजीन को क्षारीय या अम्लीय
KMnO_4 के साथ ऑक्सीकृत करने पर बेंजोइक अम्ल बनता है। (ऐल्किल समूह का आकार कुछ भी हो, पूरा समूह -COOH में बदल जाता है)।
3. ग्रेगनाड अभिकर्मक से:
- ग्रेगनाड अभिकर्मक (
R-MgX) की अभिक्रिया ठोस कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2 या शुष्क बर्फ) के साथ कराने और फिर जल अपघटन करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल बनते हैं।
R-MgX + O=C=O \rightarrow R-COOMgX \xrightarrow{H_3O^+} R-COOH + Mg(OH)X
4. नाइट्राइलों और एमाइड्स के जल-अपघटन से:
R-CN + H2O \xrightarrow{H^+ \text{ या } OH^-} R-CONH2 \xrightarrow{H^+} R-COOH
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### कार्बोक्सिलिक अम्लों के रासायनिक गुण
1. अम्लीय प्रकृति (Acidity):
- कार्बोक्सिलिक अम्ल फिनॉल और ऐल्कोहॉल से अधिक अम्लीय होते हैं क्योंकि इनका कार्बोक्सिलेट आयन (
R-COO^-) अनुनाद (Resonance) द्वारा अधिक स्थायी होता है।
- इलेक्ट्रॉन-प्रसारक समूह (
+I प्रभाव वाले जैसे -CH_3) अम्ल की शक्ति को घटाते हैं।
- इलेक्ट्रॉन-खींचने वाले समूह (
-I प्रभाव वाले जैसे -Cl, -NO_2) अम्ल की शक्ति को बढ़ाते हैं।
2. एस्ट्रीकरण (Esterification):
- कार्बोक्सिलिक अम्ल, सांद्र
H2SO4 की उपस्थिति में ऐल्कोहॉल के साथ अभिक्रिया करके मीठी गंध वाले एस्टर बनाते हैं।
R-COOH + R'-OH \rightleftharpoons R-COOR' + H_2O
3. PCl3, PCl5 या SOCl_2 के साथ अभिक्रिया:
R-COOH + PCl5 \rightarrow R-COCl + POCl3 + HCl
R-COOH + SOCl2 \rightarrow R-COCl + SO2 + HCl (यह विधि एसाइल क्लोराइड बनाने के लिए सबसे उत्तम मानी जाती है क्योंकि सह-उत्पाद गैसें हैं)।
4. अमोनिया के साथ अभिक्रिया:
- एसिटिक अम्ल की अमोनिया से अभिक्रिया कराने पर अमोनियम एसिटेट बनता है, जिसे गर्म करने पर एसिटामाइड बनता है।
CH3COOH + NH3 \rightleftharpoons CH3COONH4 \xrightarrow{\Delta} CH3CONH2 + H_2O
5. डീകारबॉक्सिलीन (Decarboxylation):
- कार्बोक्सिलिक अम्ल के सोडियम लवण को सोडालाइम (
NaOH + CaO का 3:1 मिश्रण) के साथ गर्म करने पर कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासित होती है और ऐल्केन बनता है।
R-COONa + NaOH \xrightarrow{CaO, \Delta} R-H + Na2CO3
6. HNVZ अभिक्रिया (Hell-Volhard-Zelinsky Reaction):
- वे कार्बोक्सिलिक अम्ल जिनमें अल्फा-हाइड्रोजन होता है, लाल फॉस्फोरस (
Red P) की उपस्थिति में हैलोजन (Cl2 या Br2) के साथ अभिक्रिया करके अल्फा-हैलो कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाते हैं।
R-CH2-COOH \xrightarrow{X2 / \text{Red P}} R-CH(X)-COOH + HX
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 एल्डिहाइड, कीटोन और कार्बोक्जिलिक अम्ल
परिचय और संरचना
कार्बोनिल समूह की संरचना
आबंध प्रकृति (द्विआबंध, कार्बन-ऑक्सीजन)
नामकरण (आईयूपीएसी और सामान्य पद्धति)
एल्डिहाइड और कीटोन बनाने की विधियाँ
एल्कोहॉलों का ऑक्सीकरण
एल्कोहॉलों का विहाइड्रोजनीकरण
एल्कीनों का ओजोनीअपघटन
एल्काइनों का जलयोजन
कार्बोक्जिलिक अम्लों से (कैल्शियम लवण का शुष्क आसवन, रोजनमुंड अपचयन)
भौतिक गुण
क्वथनांक
विलेयता
गंध और अवस्था
रासायनिक अभिक्रियाएँ
नाभिकरागी योगशील अभिक्रियाएँ (HCN, NaHSO3, ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक)
अपचयन अभिक्रियाएँ (एल्केन में, एल्कोहॉल में, क्लेमेंसेन, वूल्फ़-किश्नर)
ऑक्सीकरण अभिक्रियाएँ (टोलन परीक्षण, फेलिंग परीक्षण, आयोडोफॉर्म परीक्षण)
अल्फा-हाइड्रोजन से जुड़ी अभिक्रियाएँ (एल्डोल संघनन, कैनिज़ारो अभिक्रिया)
कार्बोक्जिलिक अम्ल
संरचना और नामकरण
बनाने की विधियाँ (प्राथमिक एल्कोहॉल/एल्डिहाइड से, ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक से, नाइट्राइल और एमाइड से)
भौतिक गुण (द्विध्रुवीय प्रकृति, उच्च क्वथनांक, विलेयता)
अम्लीय सामर्थ्य (प्रतिस्थापियों का प्रभाव)
रासायनिक अभिक्रियाएँ (लवण बनना, एस्टरीकरण, PCl5/PCl3/SOCl2 के साथ, decarboxylation)
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### यौगिकों की पहचान
1. **यौगिक A:** दिया गया आणविक सूत्र $C_2H_4O$ है। यह टॉलेन अभिकर्मक और फेलिंग विलयन को अपचयित करता है, जो पुष्टि करता है कि यह एक एल्डिहाइड है। 2 कार्बन परमाणुओं के साथ, यौगिक 'A' **एसिटाल्डिहाइड ($CH_3CHO$)** है।
2. **यौगिक B:** ऑक्सीकरण पर, $CH_3CHO$ 2 कार्बन परमाणुओं के साथ एक कार्बोक्जिलिक एसिड देता है, जो **एसिटिक एसिड ($CH_3COOH$)** है जिसका आणविक सूत्र $C_2H_4O_2$ है।
3. **यौगिक C:** एसिटिक एसिड सांद्र $H_2SO_4$ की उपस्थिति में मेथनॉल ($CH_3OH$) के साथ अभिक्रिया करके एक एस्टर, **मेथिल एसिटेट ($CH_3COOCH_3$)** बनाता है, जिसमें मीठी फलों जैसी गंध होती है।
### रासायनिक समीकरण
1. **A का B में ऑक्सीकरण:**
$$CH_3CHO + [O] \xrightarrow{KMnO_4 \text{ या } K_2Cr_2O_7} CH_3COOH$$
2. **A के लिए टॉलेन परीक्षण:**
$$CH_3CHO + 2[Ag(NH_3)_2]^+ + 3OH^- \rightarrow CH_3COO^- + 2Ag\downarrow + 4NH_3 + 2H_2O$$
3. **एस्टरनीकरण (C का निर्माण):**
$$CH_3COOH + CH_3OH \xrightarrow{conc. H_2SO_4} CH_3COOCH_3 + H_2O$$
### अल्कोहल की तुलना में कार्बोक्जिलिक एसिड की अम्लीय प्रकृति\nकार्बोक्जिलिक एसिड अल्कोहल की तुलना में बहुत अधिक मजबूत एसिड होते हैं क्योंकि:
* **कार्बोक्सिलेट आयन का अनुनाद स्थिरीकरण:** जब एक कार्बोक्जिलिक एसिड एक प्रोटॉन ($H^+$) खो देता है, तो यह एक कार्बोक्सिलेट आयन ($RCOO^-$) बनाता है। यह आयन अनुनाद द्वारा स्थिर होता है, जहाँ ऋणात्मक आवेश दो विद्युत ऋणात्मक ऑक्सीजन परमाणुओं पर विस्थापित होता है।
* **एल्कोक्साइड आयन की अस्थिरता:** अल्कोहल एल्कोक्साइड आयन ($RO^-$) बनाने के लिए एक प्रोटॉन खो देते हैं, जहाँ ऋणात्मक आवेश एक ही ऑक्सीजन परमाणु पर स्थानीयकृत होता है, जिससे यह अस्थिर हो जाता है और प्रोटॉन छोड़ने के लिए कम इच्छुक होता है।
उत्तर (Answer): ### नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि\nएल्डिहाइड और कीटोन में कार्बोनिल समूह ($>C=O$) होता है। कार्बन-ऑक्सीजन द्विबंध ध्रुवीकृत होता है क्योंकि ऑक्सीजन कार्बन की तुलना में अधिक विद्युत ऋणात्मक होती है, जिससे कार्बोनिल कार्बन इलेक्ट्रॉन्सनेही और ऑक्सीजन नाभिकस्नेही बन जाती है।
* **चरण 1:** नाभिकस्नेही ($Nu^-$) ध्रुवीय कार्बोनिल समूह के इलेक्ट्रॉन्सनेही कार्बन परमाणु पर उस तल के लंबवत तल से आक्रमण करता है, जिससे एक चतुष्फलकीय एल्कोक्साइड मध्यवर्ती बनता है।
* **चरण 2:** एल्कोक्साइड मध्यवर्ती अभिक्रिया माध्यम से तेजी से एक प्रोटॉन ($H^+$) प्राप्त करके उदासीन योगात्मक उत्पाद बनाता है, जिसे अक्सर सायनोहाइड्रिन, बाइसल्फाइट योग उत्पाद आदि कहा जाता है।
### प्रतिक्रियाशीलता: एल्डिहाइड बनाम कीटोन\nदो मुख्य कारकों के कारण एल्डिहाइड कीटोन की तुलना में अधिक प्रतिक्रियाशील होते हैं:
* **इलेक्ट्रॉनिक कारक:** कीटोन में कार्बोनिल कार्बन से जुड़े दो एल्काइल समूह होते हैं, जो एक मजबूत इलेक्ट्रॉन-दाता प्रेरणिक प्रभाव ($+I$ प्रभाव) डालते हैं। यह कार्बोनिल कार्बन पर धनात्मक आवेश को कम करता है, जिससे यह आने वाले नाभिकस्नेही के लिए कम आकर्षक हो जाता है। एल्डिहाइड में केवल एक एल्काइल समूह (या फॉर्मेल्डिहाइड में हाइड्रोजन परमाणु) होता है, इसलिए कार्बन पर धनात्मक आवेश अधिक होता है।
* **त्रिमीय (स्टेरिक) कारक:** कीटोन में दो भारी एल्काइल समूह होते हैं जो स्टेरिक बाधा के कारण नाभिकस्नेही के दृष्टिकोण में बाधा डालते हैं। इसके विपरीत, एल्डिहाइड में केवल एक एल्काइल समूह और एक छोटा हाइड्रोजन परमाणु होता है, जो नाभिकस्नेही के लिए आसान पहुंच प्रदान करता है।
### महत्वपूर्ण नामीय अभिक्रियाएँ
1. **एल्डोल संघनन:** कम से कम एक अल्फा-हाइड्रोजन परमाणु वाले एल्डिहाइड और कीटोन तनु क्षार ($NaOH$) की उपस्थिति में $\beta$-हाइड्रॉक्सी एल्डिहाइड (एल्डोल) या $\beta$-हाइड्रॉक्सी कीटोन (केटोल) बनाने के लिए स्व-संघनन अभिक्रिया से गुजरते हैं, जो गर्म करने पर $\alpha,\beta$-असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक देने के लिए पानी खो देते हैं।
2. **कैनिज़ारो अभिक्रिया:** जिन एल्डिहाइडों में $\alpha$-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होता है (जैसे फॉर्मेल्डिहाइड और बेंजलडिहाइड), वे सांद्र क्षार के साथ उपचार करने पर स्व-ऑक्सीकरण और अपचयन (विषम अनुपात) अभिक्रिया से गुजरते हैं। एक अणु अल्कोहल में अपचयित हो जाता है और दूसरा कार्बोक्जिलिक एसिड लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है।
उत्तर (Answer): ### कार्बोक्जिलिक अम्लों की अम्लीय शक्ति\nकार्बोक्जिलिक अम्ल अल्कोहल और फिनोल की तुलना में काफी अधिक अम्लीय होते हैं।
- **कार्बोक्सिलेट आयन का अनुनाद स्थिरीकरण:** जब एक कार्बोक्जिलिक अम्ल एक प्रोटॉन ($H^+$) खो देता है, तो यह कार्बोक्सिलेट आयन ($RCOO^-$) बनाता है। यह कार्बोक्सिलेट आयन अनुनाद द्वारा स्थिर होता है, जहाँ ऋणात्मक आवेश दो विद्युत ऋणात्मक ऑक्सीजन परमाणु पर विस्थापित होता है। इसके विपरीत, अल्कोहल से प्राप्त एल्कोक्साइड आयन में स्थानीयकृत ऋणात्मक आवेश होता है और इसमें अनुनाद स्थिरीकरण का अभाव होता है। फिनोक्साइड आयन में अनुनाद होता है, लेकिन ऋणात्मक आवेश बेंजीन रिंग के कार्बन परमाणुओं पर विस्थापित होता है, जो कार्बोक्सिलेट आयन में दो ऑक्सीजन परमाणुओं पर विस्थापन की तुलना में कम प्रभावी है।
### अम्लता पर प्रतिस्थापियों का प्रभाव\nकार्बोक्जिलिक अम्लों की अम्लता कार्बोक्जिलिक कार्बन श्रृंखला या एरोमैटिक रिंग से जुड़े प्रतिस्थापियों की प्रकृति से गहराई से प्रभावित होती है।
- **इलेक्ट्रॉन-आकर्षक समूह (EWG):**
- $-NO_2, -CN, -halogens, -CF_3$ जैसे समूह कार्बोक्जिलिक अम्लों की अम्लता को बढ़ाते हैं।
- **क्रिया-विधि:** EWG एक ऋणात्मक प्रेरणिक ($-I$) प्रभाव और/या अनुनाद ($-R$) प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। वे कार्बोक्सिलेट कार्बन और ऑक्सीजन से इलेक्ट्रॉन घनत्व को दूर खींचते हैं, इस प्रकार ऋणात्मक आवेश को फैलाकर कार्बोक्सिलेट आयन को स्थिर करते हैं।
- **उदाहरण:** क्लोरीन परमाणु के $-I$ प्रभाव के कारण क्लोरोएसिटिक अम्ल ($ClCH_2COOH$, $pK_a = 2.86$) एसिटिक अम्ल ($CH_3COOH$, $pK_a = 4.76$) की तुलना में बहुत अधिक मजबूत होता है।
- **इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (EDG):**
- एल्किल समूह ($-CH_3, -C_2H_5$ आदि) जैसे समूह कार्बोक्जिलिक अम्लों की अम्लता को कम करते हैं।
- **क्रिया-विधि:** EDG एक धनात्मक प्रेरणिक ($+I$) प्रभाव प्रदर्शित करते हैं, जो कार्बोक्सिलेट समूह की ओर इलेक्ट्रॉन घनत्व को धकेलते हैं, जिससे कार्बोक्सिलेट आयन पर ऋणात्मक आवेश बढ़ जाता है, जिससे यह अस्थिर हो जाता है।
- **उदाहरण:** फॉर्मिक अम्ल ($HCOOH$, $pK_a = 3.77$) एसिटिक अम्ल ($CH_3COOH$, $pK_a = 4.76$) से अधिक मजबूत है क्योंकि एसिटिक अम्ल में मिथाइल समूह का $+I$ प्रभाव होता है जो इसकी अम्लता को कम करता है।
उत्तर (Answer): ### चरण-दर-चरण समाधान और पहचान
1. **यौगिक (A) की पहचान:**
- यौगिक (A) का आणविक सूत्र $C_2H_4O$ है। यह एथेनल (एसिटेल्डिहाइड), $CH_3CHO$ से मेल खाता है।
2. **यौगिक (B) की पहचान:**
- यौगिक (A) ($CH_3CHO$) ऑक्सीकरण पर आसानी से $C_2H_4O_2$ सूत्र वाला कार्बोक्जिलिक अम्ल देता है, जो एसिटिक अम्ल (एथेनोइक अम्ल), $CH_3COOH$ है।
3. **यौगिक (C) की पहचान:**
- जब यौगिक (A) ($CH_3CHO$) को तनु NaOH के साथ उपचारित किया जाता है, तो यह एल्डोल संघनन से गुजरता है और 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल (यौगिक C) बनाता है।
- समीकरण:
$$2CH_3CHO \xrightarrow{\text{dil. NaOH}} CH_3-CH(OH)-CH_2-CHO$$
4. **यौगिक (D) की पहचान:**
- यौगिक (C) (3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल) को गर्म करने पर निर्जलीकरण (जल के अणु की हानि) होता है और ब्यूट-2-ईनल (यौगिक D) प्राप्त होता है।
- समीकरण:
$$CH_3-CH(OH)-CH_2-CHO \xrightarrow{\Delta} CH_3-CH=CH-CHO + H_2O$$
### यौगिकों का सारांश:
- **(A):** एथेनल ($CH_3CHO$)
- **(B):** एथेनोइक अम्ल ($CH_3COOH$)
- **(C):** 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल ($CH_3CH(OH)CH_2CHO$)
- **(D):** ब्यूट-2-ईनल ($CH_3CH=CHCHO$)
उत्तर (Answer): ### कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीयता\nकार्बोक्सिलिक अम्ल ऐल्कोहॉल और फीनॉल की तुलना में काफी अधिक अम्लीय होते हैं। इसे समझने के लिए हमें उनके संयुग्मी आधारों (conjugate bases) की स्थिरता को देखना होगा:
- **कार्बोक्सिलेट आयन बनाम एल्कोक्साइड/फीनाक्साइड आयन:** जब एक कार्बोक्सिलिक अम्ल एक प्रोटॉन खो देता है, तो यह कार्बोक्सिलेट आयन ($RCOO^-$) बनाता है। यह आयन अनुनाद-स्थिर (resonance-stabilized) होता है क्योंकि ऋणात्मक आवेश दो विद्युत ऋणात्मक ऑक्सीजन परमाणुओं पर विस्थापित होता है। इसके विपरीत, ऐल्कोहॉल से प्राप्त एल्कोक्साइड आयन ($RO^-$) में स्थानीयृत ऋणात्मक आवेश होता है, जिससे यह कम स्थिर होता है। फीनाक्साइड आयन ($C_6H_5O^-$) अनुनाद प्रदर्शित करते हैं, लेकिन ऋणात्मक आवेश बेंजीन रिंग के कार्बन परमाणुओं पर विस्थापित होता है, जो ऑक्सीजन की तुलना में कम विद्युत ऋणात्मक होते हैं। इसलिए, कार्बोक्सिलेट आयन ऐल्कोक्साइड और फीनाक्साइड दोनों आयनों की तुलना में कहीं अधिक स्थिर होता है, जिससे कार्बोक्सिलिक अम्ल मजबूत अम्ल बनते हैं।
### प्रतिस्थापियों का अम्ल शक्ति पर प्रभाव\nकार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्ल शक्ति एल्किल या एरील समूह से जुड़े प्रतिस्थापियों की प्रकृति से गहराई से प्रभावित होती है:
- **इलेक्ट्रॉन-आकर्षक समूह (EWG):** $-NO_2$, $-CN$, $-X$ (हैलाइड) आदि जैसे समूह $-I$ (प्रेरक) और/या $-M$ (मेसोमेरिक) प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। वे कार्बोक्सिल समूह से इलेक्ट्रॉन घनत्व को खींचते हैं, ऋणात्मक आवेश को फैलाते हैं और कार्बोक्सिलेट आयन को स्थिर करते हैं। इससे अम्ल शक्ति बढ़ती है ($pK_a$ कम होता है)। उदाहरण के लिए, तीन क्लोरीन परमाणुओं के मजबूत $-I$ प्रभाव के कारण ट्राइक्लोरोएसेटिक एसिड, एसिटिक एसिड की तुलना में बहुत मजबूत होता है।
- **इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (EDG):** एल्किल समूह ($-CH_3$, $-C_2H_5$), $-OH$, $-OCH_3$ आदि जैसे समूह $+I$ और/या $+R$ प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। वे कार्बोनिल कार्बन की ओर इलेक्ट्रॉन छोड़ते हैं, कार्बोक्सिलेट आयन पर ऋणात्मक आवेश को तीव्र करते हैं और इसे अस्थिर करते हैं। इससे अम्ल शक्ति घटती है ($pK_a$ बढ़ता है)। उदाहरण के लिए, एसिटिक एसिड, प्रोपियोनिक एसिड की तुलना में एक मजबूत अम्ल है क्योंकि एसिटिक एसिड में मिथाइल समूह का $+I$ प्रभाव प्रोपियोनिक एसिड में एथिल समूह की तुलना में कम होता है।
### बेंजोइक एसिड में स्थिति का प्रभाव\nप्रतिस्थापित बेंजोइक एसिड में, प्रतिस्थापी प्रभाव उनकी स्थिति (ऑर्थो, मेटा, पैरा) पर दृढ़ता से निर्भर करते हैं:
- **ऑर्थो प्रभाव:** इस बात की परवाह किए बिना कि ऑर्थो प्रतिस्थापी इलेक्ट्रॉन-दाता है या इलेक्ट्रॉन-आकर्षक, ऑर्थो-प्रतिस्थापित बेंजोइक एसिड अनुनाद और स्थिरीकरण कारकों की त्रिविम बाधा के कारण स्वयं बेंजोइक एसिड की तुलना में लगभग हमेशा मजबूत अम्ल होते हैं।
उत्तर (Answer): दुर्बल मोनोकार्बोक्सिलिक अम्ल ($HA$) की हाइड्रोजन आयन सांद्रता, प्रतिशत वियोजन और pH ज्ञात करने के लिए, हम वियोजन संतुलन का उपयोग करते हैं:
$$HA_{(aq)} \rightleftharpoons H^+_{(aq)} + A^-_{(aq)}$$
**दिया गया डेटा:**
- अम्ल की सांद्रता ($C$) = $0.05\text{ M}$
- वियोजन स्थिरांक ($K_a$) = $1.8 \times 10^{-5}$
**चरण 1: हाइड्रोजन आयन सांद्रता ($[H^+]$) की गणना करें**\nएक दुर्बल अम्ल के लिए वियोजन की मात्रा ($\alpha$) इस प्रकार दी जाती है:
$$\alpha = \sqrt{\frac{K_a}{C}}$$
\nदिए गए मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
$$\alpha = \sqrt{\frac{1.8 \times 10^{-5}}{0.05}} = \sqrt{3.6 \times 10^{-4}} = 0.019$$
\nचूँकि $\alpha < 0.05$ है, हमारा सन्निकटन मान्य है।\nहाइड्रोजन आयन सांद्रता $[H^+]$ इस प्रकार परिकलित की जाती है:
$$[H^+] = C \times \alpha = 0.05 \times 0.019 = 9.5 \times 10^{-4}\text{ M}$$
**चरण 2: प्रतिशत वियोजन की गणना करें**
$$\text{प्रतिशत वियोजन} = \alpha \times 100$$
$$\text{प्रतिशत वियोजन} = 0.019 \times 100 = 1.9\%$$
**चरण 3: pH की गणना करें**
$$\text{pH} = -\log[H^+]$$
$$\text{pH} = -\log(9.5 \times 10^{-4})$$
$$\text{pH} = -(\log(9.5) + \log(10^{-4}))$$
$$\text{pH} = -(\log(9.5) - 4) = 4 - \log(9.5)$$\nचूँकि $\log(9.5) \approx 0.9777$ है:
$$\text{pH} = 4 - 0.9777 = 3.0223$$
**अंतिम उत्तर:**
- हाइड्रोजन आयन सांद्रता $[H^+] = 9.5 \times 10^{-4}\text{ M}$
- प्रतिशत वियोजन = $1.9\%$
- pH = $3.02$
उत्तर (Answer): ### न्यूक्लियोफिलिक योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि\nएल्डिहाइड और कीटोन में कार्बोनिल समूह ($>C=O$) होता है जहाँ ऑक्सीजन की उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण कार्बन-ऑक्सीजन द्विबंध ध्रुवीकृत होता है। कार्बोनिल कार्बन इलेक्ट्रोफिलिक (इलेक्ट्रॉन-न्यून) होता है और ऑक्सीजन न्यूक्लियोफिलिक (इलेक्ट्रॉन-समृद्ध) होती है।
- **चरण 1 (न्यूक्लियोफाइल का आक्रमण):** एक न्यूक्लियोफाइल ($Nu^-$) कार्बोनिल समूह के तल के लंबवत दिशा से इलेक्ट्रोफिलिक कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करता है, जिससे एक चतुष्फलकीय एल्काक्साइड मध्यवर्ती ($>C(O^-)(Nu)$) बनता है।
- **चरण 2 (प्रोटॉनीकरण):** एल्काक्साइड मध्यवर्ती तेजी से प्रतिक्रिया माध्यम से एक प्रोटॉन ($H^+$) ग्रहण करके तटस्थ योगात्मक उत्पाद बनाता है, जिसे सायनोहाइड्रिन, बाइसल्फाइट योगात्मक यौगिक आदि कहा जाता है।
### एल्डिहाइड बनाम कीटोन की अभिक्रियाशीलता\nदो मुख्य कारकों के कारण न्यूक्लियोफिलिक योग के प्रति एल्डिहाइड सामान्यतः कीटोन की तुलना में अधिक प्रतिक्रियाशील होते हैं:
- **इलेक्ट्रॉनिक कारक:** एल्डिहाइड में एक एल्किल समूह और एक हाइड्रोजन परमाणु होता है, जबकि कीटोन में दो एल्किल समूह होते हैं। एल्किल समूहों का इलेक्ट्रॉन-दाता प्रेरक प्रभाव ($+I$ प्रभाव) होता है, जो कार्बोनिल कार्बन पर धनात्मक आवेश को कम करता है, जिससे यह न्यूक्लियोफिलिक आक्रमण के प्रति कम संवेदनशील हो जाता है। चूँकि एल्डिहाइड में केवल ऐसा एक समूह होता है, इसलिए उनका कार्बोनिल कार्बन अधिक इलेक्ट्रोफिलिक होता है।
- **त्रिविम (स्टेरिक) कारक:** कीटोन में कार्बोनिल कार्बन से जुड़े दो बड़े एल्किल समूह होते हैं, जो आने वाले न्यूक्लियोफाइल में त्रिविम बाधा उत्पन्न करते हैं। एल्डिहाइड में केवल एक एल्किल समूह और एक छोटा हाइड्रोजन परमाणु होता है, जिसके परिणामस्वरूप कम त्रिविम बाधा और आसान न्यूक्लियोफिलिक आक्रमण होता है।
### विभेदकारी परीक्षण
- **1. टॉलेन परीक्षण:** जब किसी एल्डिहाइड को टॉलेन अभिकर्मक (अमोनियामयी सिल्वर नाइट्रेट विलयन) के साथ गर्म किया जाता है, तो elemental silver के बनने के कारण परखनली की आंतरिक दीवारों पर एक चमकदार सिल्वर मिरर उत्पन्न होता है। कीटोन टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित नहीं करते हैं।
- **2. फेलिंग परीक्षण:** जब किसी एल्डिहाइड को फेलिंग विलयन (फेलिंग ए और फेलिंग बी का मिश्रण) के साथ गर्म किया जाता है, तो क्यूप्रस ऑक्साइड ($Cu_2O$) का लाल-भूरा अवक्षेप बनता है। कीटोन सामान्यतः इस परीक्षण का उत्तर नहीं देते हैं।
उत्तर (Answer): ### कार्बोक्सिलिक अम्लों की अम्लीय प्रकृति\nकार्बोक्सिलिक अम्ल जल में वियोजित होकर कार्बोक्सिलेट आयन और हाइड्रोनियम आयन देते हैं।
### ऐल्कोहॉल और फिनॉल के साथ तुलना
* **कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाम ऐल्कोहॉल:** ऐल्कोहॉल में ऋणावेश एकल ऑक्सीजन परमाणु पर स्थानीयकृत होता है, जबकि कार्बोक्सिलेट आयन में ऋणावेश अनुनाद द्वारा दो ऑक्सीजन परमाणुओं पर विस्थापित (delocalized) रहता है। अनुनाद स्थिरीकरण के कारण कार्बोक्सिलिक अम्ल ऐल्कोहॉल से अधिक प्रबल अम्ल होते हैं।
* **कार्बोक्सिलिक अम्ल बनाम फिनॉल:** फिनॉक्साइड आयन भी अनुनाद द्वारा स्थिरीकृत होते हैं, लेकिन ऋणावेश बेंजीन रिंग के कार्बन परमाणुओं पर वितरित होता है जो ऑक्सीजन से कम विद्युत ऋणात्मक होते हैं। कार्बोक्सिलेट आयन में ऋणावेश उच्च विद्युत ऋणात्मकता वाले दो ऑक्सीजन परमाणुओं पर वितरित होता है। अतः कार्बोक्सिलिक अम्ल फिनॉल से भी प्रबल होते हैं।
### प्रतिस्थापियों का अम्लता पर प्रभाव
* **इलेक्ट्रॉन-आकर्षक समूह (EWGs):** जैसे $-NO_2$, हैलोजन आदि, -I या -R प्रभाव द्वारा ऋण आवेश को फैलाकर कार्बोक्सिलेट आयन को स्थायी बनाते हैं, जिससे **अम्लता बढ़ती है**।
* **इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (EDGs):** जैसे ऐल्किल समूह (+I प्रभाव), ऋण आवेश को तीव्र करते हैं, जिससे आयन अस्थिर होता है और **अम्लता घटती है**।
उत्तर (Answer): ### यौगिकों की पहचान
* **यौगिक (A):** आण्विक सूत्र $C_2H_4O$ एसिटैल्डिहाइड ($CH_3CHO$) है। यह टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है क्योंकि यह एक ऐल्डिहाइड है, और $CH_3-CO-$ समूह होने के कारण आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है।
* **यौगिक (B):** आण्विक सूत्र $C_2H_4O_2$ एसिटिक अम्ल ($CH_3COOH$) है। यह एक कार्बोक्सिलिक अम्ल है जो नीले लिटमस को लाल करता है।
* **यौगिक (C):** एस्टर इथाइल एसीटेट ($CH_3COOC_2H_5$) है जो मीठी गंध देता है।
### रासायनिक समीकरण
**1. टॉलेन अभिकर्मक के साथ (A) की अभिक्रिया:**
$$CH_3CHO + 2[Ag(NH_3)_2]^+ + 3OH^- \rightarrow CH_3COO^- + 2Ag\downarrow + 4NH_3 + 2H_2O$$
**2. (A) के लिए आयोडोफॉर्म परीक्षण:**
$$CH_3CHO + 3I_2 + 4NaOH \rightarrow CHI_3\downarrow (पीला) + HCOONa + 3NaI + 3H_2O$$
**3. एस्टरीकरण अभिक्रिया द्वारा (C) का निर्माण:**
$$CH_3COOH + C_2H_5OH \xrightarrow[सांद्र H_2SO_4]{\Delta} CH_3COOC_2H_5 + H_2O$$
उत्तर (Answer): ### नाभिकस्नेही योगात्मक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि\nऐल्डिहाइड और कीटोन में कार्बोनिल समूह ($>C=O$) होता है जहाँ कार्बन की तुलना में ऑक्सीजन की उच्च विद्युत् ऋणात्मकता के कारण कार्बन-ऑक्सीजन द्विबंध ध्रुवीकृत होता है। कार्बन परमाणु पर आंशिक धन आवेश होता है जिससे यह एक इलेक्ट्रॉनीय केंद्र बन जाता है, जबकि ऑक्सीजन पर आंशिक ऋण आवेश होता है।
* **चरण 1: नाभिकस्नेही का आक्रमण:** एक नाभिकस्नेही ($Nu^-$) कार्बोनिल कार्बन के समतल के लंबवत दिशा से कार्बोनिल समूह के इलेक्ट्रॉनीय कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है। यह आक्रमण त्रिकोणीय समतलीय कार्बन को चतुष्फलकीय मध्यवर्ती में परिवर्तित कर देता है, जहाँ ऑक्सीजन पर ऋण आयन आ जाता है।
* **चरण 2: प्रोटॉनीकरण:** एल्कोक्साइड मध्यवर्ती अभिक्रिया माध्यम ($H^+$) से एक प्रोटॉन् प्राप्त करता है और योजक उत्पाद बनाता है।
### ऐल्डिहाइड और कीटोन की क्रियाशीलता की तुलना\nदो मुख्य कारकों के कारण ऐल्डिहाइड सामान्यतः कीटोन की तुलना में अधिक क्रियाशील होते हैं:
* **इलेक्ट्रॉनीय कारक (प्रेरणिक प्रभाव):** कीटोन में कार्बोनिल कार्बन से दो ऐल्किल समूह जुड़े होते हैं, जबकि ऐल्डिहाइड में केवल एक ऐल्किल समूह (या फॉर्मेल्डिहाइड में हाइड्रोजन) होता है। ऐल्किल समूह इलेक्ट्रॉनदाता (+I प्रभाव) होते हैं जो कार्बोनिल कार्बन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं, जिससे इसका धन आवेश कम हो जाता है।
* **त्रिविम कारक (स्टेरिक प्रभाव):** कीटोन में दो बड़े ऐल्किल समूह होते हैं जो आने वाले नाभिकस्नेही के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत, ऐल्डिहाइड में कम बाधा होती है।
उत्तर (Answer): आवश्यक बेंजोइक अम्ल के द्रव्यमान की गणना करने के लिए, हम मोलरता के सूत्र का उपयोग करते हैं:
$$\text{मोलरता } (M) = \frac{\text{विलेय के मोल}}{\text{लीटर में विलयन का आयतन}}$$
\nचरण 1: बेंजोइक अम्ल ($C_7H_6O_2$) के मोलर द्रव्यमान की गणना करें।\nपरमाणु द्रव्यमान: $C = 12 \text{ g/mol}$, $H = 1 \text{ g/mol}$, $O = 16 \text{ g/mol}$
$$\text{मोलर द्रव्यमान} = (7 \times 12) + (6 \times 1) + (2 \times 16)$$
$$\text{मोलर द्रव्यमान} = 84 + 6 + 32 = 122 \text{ g/mol}$$
\nचरण 2: आवश्यक मोलों की संख्या ज्ञात करें।\nदी गई मोलरता $M = 0.15 \text{ mol/L}$\nदिया गया आयतन $V = 500 \text{ mL} = \frac{500}{1000} \text{ L} = 0.5 \text{ L}$
$$\text{मोल} = \text{मोलरता} \times \text{आयतन (लीटर में)}$$
$$\text{मोल} = 0.15 \text{ mol/L} \times 0.5 \text{ L} = 0.075 \text{ मोल}$$
\nचरण 3: बेंजोइक अम्ल के आवश्यक द्रव्यमान की गणना करें।
$$\text{द्रव्यमान} = \text{मोल} \times \text{मोलर द्रव्यमान}$$
$$\text{द्रव्यमान} = 0.075 \text{ mol} \times 122 \text{ g/mol} = 9.15 \text{ ग्राम}$$
\nअतः, आवश्यक बेंजोइक अम्ल का द्रव्यमान 9.15 ग्राम है।
\nरासायनिक उद्योगों में बेंजोइक अम्ल की भूमिका:\nबेंजोइक अम्ल का व्यापक रूप से एक महत्वपूर्ण रासायनिक मध्यवर्ती और परिरक्षक के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके व्युत्पन्न, जैसे सोडियम बेंजोएट, कवक और बैक्टीरिया के विकास को रोकने के लिए अम्लीय खाद्य पदार्थों, पेय पदार्थों और मसालों में खाद्य परिरक्षकों के रूप में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाते हैं। औद्योगिक रूप से, इसका उपयोग फिनॉल, बेंजोयल क्लोराइड, प्लास्टिसाइज़र, और विभिन्न इत्रों, रंजकों और कीट repellents के निर्माण में किया जाता है।
उत्तर (Answer): यौगिकों (A) और (B) की पहचान करने के लिए, आइए दिए गए संकेतों का चरण-दर-चरण विश्लेषण करें:
1. यौगिक (A) का आण्विक सूत्र $C_2H_4O$ है, जो एल्डिहाइड या कीटोन से मेल खाता है। चूँकि यह धनात्मक टॉलेंस परीक्षण देता है, इसलिए यह एक एल्डिहाइड होना चाहिए।
2. यौगिक (A) कैनिजारो अभिक्रिया से गुजरता है। जो यौगिक कैनिजारो अभिक्रिया से गुजरते हैं, उनमें कोई अल्फा-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होना चाहिए। इसलिए, फॉर्मल्डिहाइड ($HCHO$) एक ऐसा एल्डिहाइड है जिसमें अल्फा-हाइड्रोजन नहीं होता है और यह टॉलेंस परीक्षण तथा कैनिजारो अभिक्रिया दोनों देता है (ध्यान दें: फॉर्मल्डिहाइड का सही सूत्र $CH_2O$ है, जबकि $C_2H_4O$ एसीटल्डिहाइड का सूत्र है, परंतु कैनिजारो और टॉलेंस के गुण फॉर्मल्डिहाइड से मेल खाते हैं)। अतः यौगिक (A) फॉर्मल्डिहाइड है और यौगिक (B) मेथनॉल है।
\nयौगिकों की पहचान:\nयौगिक (A) = फॉर्मल्डिहाइड ($HCHO$)\nयौगिक (B) = मेथनॉल ($CH_3OH$)
\nरासायनिक समीकरण:
1. उत्प्रेरकीय हाइड्रोजननीकरण (अपचयन):
$HCHO + H_2 \xrightarrow{Ni/Pt} CH_3OH$
2. कैनिजारो अभिक्रिया:
$2HCHO + conc. NaOH \rightarrow CH_3OH + HCOONa$
3. टॉलेंस परीक्षण:
$HCHO + 2[Ag(NH_3)_2]^+ + 3OH^- \rightarrow HCOO^- + 2Ag \downarrow + 2H_2O + 4NH_3$
उत्तर (Answer): एल्डोल संघनन उन एल्डिहाइड और कीटोनों द्वारा दी जाने वाली एक विशिष्ट अभिक्रिया है जिनमें कम से कम एक अल्फा-हाइड्रोजन परमाणु होता है। जब ऐसे यौगिक, उदाहरण के लिए एसीटल्डिहाइड ($CH_3CHO$), को एक तनु क्षार (जैसे तनु $NaOH$) के साथ उपचारित किया जाता है, तो यह स्व-संघनन से गुजरकर एक $\beta$-हाइड्रॉक्सीएल्डिहाइड बनाता है, जिसे सामान्यतः एल्डोल कहा जाता है। 'एल्डोल' शब्द उत्पाद में मौजूद क्रियात्मक समूहों: एल्डिहाइड ('ald') और अल्कोहल ('ol') के संयोजन से लिया गया है।
\nरासायनिक समीकरण:
$2CH_3CHO \xrightarrow{dilute NaOH} CH_3-CH(OH)-CH_2-CHO$ (3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल)
\nअभिक्रिया क्रियाविधि के चरण:\nचरण 1: इनॉलेट आयन का निर्माण\nतनु क्षार हाइड्रॉक्साइड आयन ($OH^-$) प्रदान करता है, जो एसीटल्डिहाइड अणु से एक अम्लीय अल्फा-हाइड्रोजन परमाणु को निष्कासित करता है, जिससे एक अनुनाद-स्थिर इनॉलेट आयन बनता है।\nसमीकरण: $CH_3CHO + OH^- \rightleftharpoons [CH_2^-–CHO] + H_2O$
\nचरण 2: नाभिकस्नेही योग\nनाभिकस्नेही इनॉलेट आयन नाभिकस्नेही योग चरण में एसीटल्डिहाइड के दूसरे अनअभिकृत अणु के कार्बोनिल कार्बन पर आक्रमण करता है, जिससे एक एल्कोक्साइड मध्यवर्ती आयन बनता है।\nसमीकरण: $CH_3CHO + CH_2^–CHO \rightarrow CH_3-CH(O^-)-CH_2-CHO$
\nचरण 3: प्रोटोनीकरण\nएल्कोक्साइड मध्यवर्ती अंतिम उत्पाद, 3-हाइड्रॉक्सीब्यूटेनल (एल्डोल) बनाने के लिए पानी से एक प्रोटॉन निष्कासित करता है, जिससे हाइड्रॉक्साइड आयन उत्प्रेरक पुनर्जीवित हो जाता है।\nसमीकरण: $CH_3-CH(O^-)-CH_2-CHO + H_2O \rightarrow CH_3-CH(OH)-CH_2-CHO + OH^-$\nगर्म करने पर, यह एल्डोल आसानी से एक पानी का अणु खोकर एक $\alpha,\beta$-असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक (क्रोटोनल्डिहाइड) बनाता है।
उत्तर (Answer): यहाँ मांगे गए परिवर्तनों के लिए चरण-दर-चरण रासायनिक समीकरण और स्पष्टीकरण दिए गए हैं।
1. एसीटोफीनोन से 2-फेनिलब्यूटेन-2-ऑल का परिवर्तन:\nएसीटोफीनोन ($C_6H_5COCH_3$) को एथिल ग्रिगनार्ड अभिकर्मक, विशेष रूप से एथिलमैग्नीशियम ब्रोमाइड ($CH_3CH_2MgBr$), के साथ उपचारित किया जाता है, जिसके बाद अम्लीय जलअपघटन किया जाता है। ग्रिगनार्ड अभिकर्मक कार्बोनिल समूह पर योग करके एक योग संकुल बनाता है, जिसके जलअपघटन पर तृतीयक अल्कोहल, 2-फेनिलब्यूटेन-2-ऑल प्राप्त होता है।\nअभिक्रिया के चरण:\nचरण 1: $C_6H_5COCH_3 + CH_3CH_2MgBr \rightarrow [C_6H_5C(CH_3)(OMgBr)(CH_2CH_3)]$ (योग संकुल)\nचरण 2: $[C_6H_5C(CH_3)(OMgBr)(CH_2CH_3)] + H_2O \xrightarrow{H^+} C_6H_5C(OH)(CH_3)(CH_2CH_3) + Mg(OH)Br$\nअ अंतिम उत्पाद 2-फेनिलब्यूटेन-2-ऑल है।
2. बेंजोइक अम्ल से बेंजल्डिहाइड का परिवर्तन:\nबेंजोइक अम्ल ($C_6H_5COOH$) को पहले थिओनिल क्लोराइड ($SOCl_2$) या फास्फोरस पेंटाक्लोराइड ($PCl_5$) की क्रिया द्वारा बेंजोयल क्लोराइड ($C_6H_5COCl$) में परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद, बेंजोयल क्लोराइड का बेरियम सल्फेट पर समर्थित पैलेडियम ($Pd/BaSO_4$) की उपस्थिति में हाइड्रोजन गैस का उपयोग करके उत्प्रेरकीय हाइड्रोजननीकरण किया जाता है, जिसे रोजनमंड अपचयन कहा जाता है। यह अभिक्रिया अम्ल क्लोराइड समूह को अल्कोहल में आगे अपचयन किए बिना चुनिंदा रूप से एल्डिहाइड समूह में अपचयित करती है, जिससे सफलतापूर्वक बेंजल्डिहाइड प्राप्त होता है।\nअभिक्रिया के चरण:\nचरण 1: $C_6H_5COOH + SOCl_2 \rightarrow C_6H_5COCl + SO_2 + HCl$\nचरण 2: $C_6H_5COCl + H_2 \xrightarrow{Pd/BaSO_4} C_6H_5CHO + HCl$\nअंतिम उत्पाद बेंजल्डिहाइड है।
उत्तर (Answer): एल्डिहाइड सामान्यतः दो प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक और त्रिविम (steric) कारकों के कारण नाभिकस्नेही योग अभिक्रियाओं के प्रति कीटोन की तुलना में अधिक क्रियाशील होते हैं। पहला, इलेक्ट्रॉनिक कारक: एल्डिहाइड के कार्बोनिल कार्बन से एक एल्किल समूह जुड़ा होता है, जबकि कीटोन में दो एल्किल समूह जुड़े होते हैं। प्रेरक प्रभाव (+I प्रभाव) और अतिसंयुग्मन के कारण एल्किल समूह इलेक्ट्रॉन-दाता समूह होते हैं। परिणामस्वरुप, वे कार्बोनिल कार्बन की ओर इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं, जिससे कार्बोनिल कार्बन परमाणु पर धनावेश कम हो जाता है। चूंकि कीटोन में ऐसे दो इलेक्ट्रॉन-प्रदाता समूह होते हैं, इसलिए कीटोन में कार्बोनिल कार्बन पर धनावेश एल्डिहाइड की तुलना में अधिक सीमा तक कम हो जाता है, जिससे कीटोन में कार्बोनिल कार्बन का इलेक्ट्रोफिलिक गुण कमजोर हो जाता है और एल्डिहाइड में मजबूत रहता है। दूसरा, त्रिविम कारक: एल्डिहाइड के कार्बोनिल कार्बन से एक भारी एल्किल समूह और एक छोटा हाइड्रोजन परमाणु जुड़ा होता है, जबकि कीटोन में दो भारी एल्किल समूह जुड़े होते हैं। कीटोन में दो भारी एल्किल समूहों की उपस्थिति आने वाले नाभिकस्नेही के लिए एल्डिहाइड की तुलना में अधिक त्रिविम बाधा (steric hindrance) उत्पन्न करती है, जिसमें केवल एक एल्किल समूह होता है। कीटोन में यह त्रिविम भीड़भाड़ कार्बोनिल कार्बन पर नाभिकस्नेही के आक्रमण में काफी बाधा डालती है, जिससे अभिक्रिया की दर धीमी हो जाती है। इस प्रकार, इलेक्ट्रॉनिक और त्रिविम दोनों कारक मिलकर एल्डिहाइड को नाभिकस्नेही योग अभिक्रियाओं के प्रति कीटोनों की तुलना में अधिक क्रियाशील बनाते हैं।