मुख्य सूत्र (Key Formulas)
अध्याय: पुष्पीय पादों में लैंगिक जनन (Sexual Reproduction in Flowering Plants)
कक्षा: 12वीं - जीव विज्ञान (MP बोर्ड)
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1. पुष्प की संरचना (Structure of a Flower)
पुष्प आवृतबीजियों (Angiosperms) में लैंगिक जनन का मुख्य अंग है। एक आदर्श पुष्प में चार मुख्य चक्र होते हैं:
- बाह्य दलपुंज (Calyx): कली अवस्था में पुष्प की सुरक्षा करता है।
- दलपुंज (Corolla): परागण के लिए कीटों को आकर्षित करता है।
- पुमंग (Androecium): नर जनन अंग (पुंकेसर)।
- जायांग (Gynoecium): मादा जनन अंग (स्त्रीकेसर/अंडप)।
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2. नर जनन अंग: पुमंग (Androecium & Microsporangium)
- पुंकेसर (Stamen): इसके दो मुख्य भाग होते हैं - परागाशय (Anther) और पुतंतु (Filament)।
- परागाशय की संरचना: सामान्यतः यह द्विपालित (bilobed) होता है, जिसमें चार लघुबीजधानी (Microsporangia) होती हैं।
- लघुबीजधानी की परतें (बाहर से अंदर की ओर):
1. बाह्यत्वचा (Epidermis) - सुरक्षा
2. अंतःस्थिसीय (Endothecium) - स्फुटन में सहायता
3. मध्य परतें (Middle layers) - पोषण (अस्थाई)
4. टैपीटम (Tapetum) - विकासशील परागकणों को पोषण प्रदान करती है। यह बहुकेंद्रकीय (multinucleate) और सघन जीवद्रव्य वाली होती है।
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3. नर युग्मकोद्भिद: परागकण (Male Gametophyte: Pollen Grain)
- स्पोरोपोलेनिन (Sporopollenin): परागकण की बाह्य भित्ति (Exine) स्पोरोपोलेनिन की बनी होती है, जो इसे उच्च ताप, अम्ल और क्षार से सुरक्षित रखती है। यह अत्यधिक प्रतिरोधी कार्बनिक पदार्थ है।
- जनन छिद्र (Germ pore): बाह्य भित्ति पर जहाँ स्पोरोपोलेनिन अनुपस्थित होता है, उसे जनन छिद्र कहते हैं (जहाँ से पराग नलिका निकलती है)।
- अंतःचूल (Intine): यह सेल्युलोज और पेक्टिन की बनी आंतरिक परत है।
- परिपक्व परागकण की कोशिकाएं:
1. कायिक कोशिका (Vegetative Cell): बड़ी होती है, इसमें प्रचुर खाद्य भंडार और अनियमित आकार का केंद्रक होता है।
2. जनन कोशिका (Generative Cell): छोटी होती है और कायिक कोशिका के जीवद्रव्य में तैरती रहती है। यह विभाजित होकर दो नर युग्मक बनाती है।
(नोट: 60% से अधिक आवृतबीजी पादपों में परागकण 2-कोशिकीय अवस्था में झड़ते हैं, शेष में 3-कोशिकीय अवस्था में।)
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4. मादा जनन अंग: जायांग (Gynoecium & Megasporangium)
- स्त्रीकेसर (Pistil/Carpel): इसके तीन भाग हैं - वर्तिकाग्र (Stigma), वर्तिका (Style), और अंडाशय (Ovary)।
- बीजांड (Ovule / Megasporangium): अंडाशय के अंदर बीजांड पाया जाता है, जो बीजांडवृंत (Funicle) द्वारा प्लेसेंटा से जुड़ा होता है।
- बीजांड के मुख्य भाग:
- नाभिका (Hilum): बीजांड और बीजांडवृंत का जुड़ाव बिंदु।
- अध्यावरण (Integuments): बीजांड की सुरक्षात्मक आवरण परतें।
- बीजांडद्वार (Micropyle): वह छोटा छिद्र जहाँ अध्यावरण अनुपस्थित होता है (परागनली यहीं से प्रवेश करती है)।
- निभाग (Chalaza): बीजांड का आधारीय भाग (Micropyle के विपरीत)।
- भ्रूणपोष (Nucellus): बीजांड के भीतर स्थित मृदूतक कोशिकाओं का समूह, जो भोजन संग्रहित करता है।
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5. मादा युग्मकोद्भिद: भ्रूणकोष (Female Gametophyte / Embryo Sac)
- गुरुबीजाणु मातृ कोशिका (Megaspore Mother Cell - MMC) अर्धसूत्री विभाजन द्वारा 4 गुरुबीजाणु बनाती है, जिनमें से 3 नष्ट हो जाते हैं और 1 क्रियाशील (Functional) रहता है।
- क्रियाशील गुरुबीजाणु से 7-कोशकीय और 8-केंद्रकीय भ्रूणकोष का विकास होता है (मोनोस्पोरिक विकास)।
- भ्रूणकोष की संरचना:
- अंड समुच्चय (Egg Apparatus): निभाग छोर पर स्थित होता है, जिसमें 1 अंड कोशिका (Egg cell) और 2 सहायक कोशिकाएं (Synergids) होती हैं। सहायक कोशिकाओं पर तंतुक समुच्चय (Filiform apparatus) होता है जो पराग नलिका का मार्गदर्शन करता है।
- प्रतिमुख कोशिकाएं (Antipodals): निभाग छोर पर स्थित 3 कोशिकाएं।
- केंद्रीय कोशिका (Central Cell): इसमें 2 ध्रुवीय केंद्रक (Polar nuclei) होते हैं, जो मिलकर एक द्वितीयक केंद्रक (2n) बनाते हैं।
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6. परागण (Pollination)
परागकणों का परागाशय से वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण परागण कहलाता है।
- स्व-परागण (Self-Pollination):
1. स्वयुग्मन (Autogamy): एक ही पुष्प के परागकण का उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर पहुँचना (उदा. चिया, कमेंलिना)।
2. सजातपुष्पी परागण (Geitonogamy): एक ही पौधे के एक पुष्प के परागकण का दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर जाना (यह आनुवंशिक रूप से स्व-परागण जैसा है)।
- पर-परागण / सजातीय संकरण (Cross-Pollination / Xenogamy):
- विभिन्न पौधों के फूलों के बीच परागण। इसके लिए बाहरी कारकों की आवश्यकता होती है।
#### परागण के कारक (Agents of Pollination):
1. जैविक कारक (Biotic Agents):
- कीट परागण (Entomophily) - मधुमक्खी, तितली द्वारा।
- पक्षी परागण (Ornithophily) - पक्षियों द्वारा।
- चमगादड़ परागण (Chiropterophily) - चमगादड़ द्वारा।
2. अजैविक कारक (Abiotic Agents):
- वायु परागण (Anemophily) - हवा द्वारा (उदा. घास, मक्का)। हल्के और चिपचिपाहट रहित परागकण।
- जल परागण (Hydrophily) - जल द्वारा (उदा. वैलिसनेरिया, हाइड्रीला, जोस्टेरा)।
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7. निषेचन पूर्व घटनाएँ: पराग-स्त्रीसंकर परस्पर क्रिया (Pollen-Pistil Interaction)
- यह एक गतिशिल प्रक्रम है जिसमें वर्तिकाग्र पर परागकण की पहचान (संगत या असंगत) होती है।
- संगत (Compatible) परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होकर पराग नलिका (Pollen tube) का निर्माण करते हैं जो वर्तिका से होती हुई बीजांडद्वार तक पहुँचती है।
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8. दोहरा निषेचन (Double Fertilization)
यह आवृतबीजी पौधों की एक अद्वितीय विशेषता है। इसकी खोज नवाश्चिन (Navaschin) ने की थी।
इसमें दो मुख्य प्रक्रियाएँ होती हैं:
1. संयुग्मन / सत्य निषेचन (Syngamy / True Fertilization):
- नर युग्मक (n) + अंड कोशिका (n) $\rightarrow$ युग्मज (Zygote - 2n) $\rightarrow$ आगे चलकर भ्रूण (Embryo) बनता है।
2. त्रिक संलयन (Triple Fusion):
- दूसरा नर युग्मक (n) + दो ध्रुवीय केंद्रक / द्वितीयक केंद्रक (2n) $\rightarrow$ प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (Primary Endosperm Nucleus - PEN - 3n) $\rightarrow$ इससे भ्रूणपोष (Endosperm) बनता है जो भ्रूण को पोषण देता है।
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9. निषेचन पश्च घटनाएँ (Post-Fertilization Events)
- युग्मज (Zygote) $\rightarrow$ भ्रूण (Embryo) में विकसित होता है।
- PEN (3n) $\rightarrow$ भ्रूणपोष (Endosperm) में विकसित होता है।
- बीजांड (Ovule) $\rightarrow$ बीज (Seed) में बदल जाता है।
- अंडाशय (Ovary) $\rightarrow$ फल (Fruit) में बदल जाता है।
- अध्यावरण (Integuments) $\rightarrow$ बीज आवरण (Testa & Tegmen) बनाते हैं।
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10. विशेष जनन विधियाँ (Special Modes of Reproduction)
1. असंजनन (Apomixis): बिना निषेचन के बीज बनने की प्रक्रिया (यह लैंगिक जनन का नकल है लेकिन अलैంగिक जनन जैसा फल देता है, उदा. घास, एस्टेरेसी)।
2. संगुणता / बहुभ्रूणता (Polyembryony): एक ही बीजांड या बीज में एक से अधिक भ्रूण का पाया जाना (उदा. नींबू, संतरा, आम)।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 पुष्पीय पादपों में लैंगिक जनन
प्रस्तावना
फूल की संरचना
लैंगिक जनन की मुख्य घटनाएँ
पूर्व-निषेचन: संरचनाएँ और घटनाएँ
नर जननांग (पुमंग)
पुंकेसर की संरचना
परागकोश का विन्यास
परागकोश की सूक्ष्मसंरचना
भित्ति परतें (एपिडर्मिस, एंडोथीसियम, मध्य परतें, टैपीटम)
बीजाणुजन ऊतक
लघुबीजाणुजनन
परागकणों का विकास
परागकण की संरचना (बाह्यचोल, अंतःचोल)
नर युग्मकोद्भिद का विकास
मादा जननांग (जायांग)
स्त्रीकेशर (कार्पेल)
बीजांड (गुरुबीजाणुधानी) की संरचना
बीजांडवृंत, हाइलम, माइक्रोपाइल
भ्रूणकोष (मादा युग्मकोद्भिद)
गुरुबीजाणुजनन
भ्रूणकोष का विकास (मोनोस्पोरिक विकास)
7-कोशकीय और 8-न्यूक्लियस अवस्था
परागण (Pollination)
परागण के प्रकार
स्वपरागण (ऑटोगैमी, गिटेनोगैमी)
परपरागण (जीनोगैमी)
परागण के कारक (एजेंट)
अजैविक कारक (वायु, जल)
जैविक कारक (कीट, पक्षी, चमगादड़)
आउटब्रीडिंग डिवाइसेज़ (बहिःप्रजनन युक्तियाँ)
पराग-स्त्रीकेशर परस्पर क्रिया
निषेचन और पश्च-निषेचन घटनाएँ
दोहरे निषेचन की प्रक्रिया
सिनगैमी (युग्मक संलयन) - युग्मज निर्माण
त्रिसंलयन (Triple Fusion) - प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN)
Syngamy और Triple Fusion का महत्व
पश्च-निषेचन संरचनाएँ और घटनाएँ
भ्रूणपोष (Endosperm) का विकास
भ्रूण (Embryo) का विकास
द्विबीजपत्री भ्रूण
एकबीजपत्री भ्रूण
बीजांड का बीज में परिवर्तन
अंडाशय का फल में परिवर्तन
विशेष जनन प्रणालियाँ
असंगजनन (Apomixis)
बहुभ्रूणता (Polyembryony)
अनिषेकबीजफलन (Parthenocarpy)
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### दोहरा निषेचन का परिचय\nदोहरा निषेचन (Double Fertilization) सभी आवृतबीजी (फूल वाले) पौधों की एक अद्वितीय और मुख्य विशेषता है। इसकी खोज एस.जी. नवासिन ने लिलियम और फ्रिटिलेरिया में की थी। इस प्रक्रिया में, पराग नली द्वारा भ्रूण कोष में छोड़े गए दो नर युग्मकों में से एक नर युग्मक अंड कोशिका से और दूसरा केंद्रीय कोशिका से संलयन करता है।
### दोहरे निषेचन की क्रिया विधि
- **पराग नली का प्रवेश:** अंडाशय में पहुँचने के बाद, पराग नली आमतौर पर बीजांडद्वार (माइक्रोपाइल) के माध्यम से बीजांड में प्रवेश करती है। प्रवेश करने पर पराग नली का सिरा फट जाता है और भ्रूण कोष के साइटोप्लाज्म में दो नर युग्मक मुक्त हो जाते हैं।
- **स्यंगमी (युग्मक संलयन):** दोनों नर युग्मकों में से एक नर युग्मक अंड कोशिका की ओर बढ़ता है और उसके केंद्रक के साथ संलयित हो जाता है। युग्मकों के इस संलयन को स्यंगमी या वास्तविक निषेचन कहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक द्विगुणित ($2n$) युग्मनज (zygote) का निर्माण होता है। यह युग्मनज आगे चलकर भ्रूण में विकसित होता है।
- **त्रिक संलयन (Triple Fusion):** दूसरा नर युग्मक केंद्रीय कोशिका की ओर बढ़ता है और दो ध्रुवीय केंद्रकों (या द्वितीयक केंद्रक) के साथ संलयन करता है। चूँकि इस संलयन में तीन अगुणित केंद्रक शामिल होते हैं, इसलिए इसे त्रिक संलयन कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप एक त्रिगुणित ($3n$) प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) का निर्माण होता है।
### दोहरे निषेचन का महत्व
- यह सुनिश्चित करता है कि भ्रूणपोष का निर्माण तभी हो जब अंडाणु निषेचित हो चुका हो, जिससे बिना निषेचित बीजांडों में ऊर्जा की बर्बादी रुकती है।
- यह विकासशील भ्रूण को पोषणयुक्त ऊतक (भ्रूणपोष) प्रदान करता है।
### निषेचन पश्च घटनाएं (Post-Fertilization Events)\nदोहरे निषेचन के पश्चात, फूल में कई संरचनात्मक और शारीरिक परिवर्तन होते हैं जिसके परिणामस्वरूप बीज और फल का निर्माण होता है:
- **भ्रूणपोष का विकास:** प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बार-बार विभाजित होकर त्रिगुणित भ्रूणपोष ऊतक बनाता है, जो विकासशील भ्रूण को पोषण देने के लिए खाद्य सामग्री संचित करता है।
- **भ्रूणोद्भव (Embryogenesis):** द्विगुणित युग्मनज कुछ समय के लिए विश्राम अवस्था में रहता है और फिर विभाजित होकर भ्रूण का निर्माण करता है (ग्लोबुलर, हृदय आकार और परिपक्व भ्रूण)।
- **बीज का निर्माण:** बीजांड परिपक्व होकर बीज में बदल जाता है। बीजांड के आवरण (integuments) कठोर होकर बीज आवरण (टेस्टा और टेग्मेन) बनाते हैं।
- **फल का निर्माण:** अंडाशय परिपक्व होकर फल में बदल जाता है और अंडाशय की दीवार फलभित्ति (pericarp) बनाती है। अन्य पुष्प अंग जैसे बाह्यदल, दल और पुंकेसर आमतौर पर सूख कर झड़ जाते हैं।
उत्तर (Answer): ### अंतःप्रजनन अवसाद का परिचय\nअधिकांश पुष्पीय पौधों में उभयलिंगी फूल होते हैं जहां पराग कणों के उसी फूल के वर्तिकाग्र के संपर्क में आने की संभावना होती है। निरंतर स्व-परागण के परिणामस्वरूप अंतःप्रजनन अवसाद होता है, जिससे अगली पीढ़ियों में जीवन शक्ति, उर्वरता और आनुवंशिक विविधता में कमी आती है। इसे रोकने के लिए, पौधों ने कई तंत्र विकसित किए हैं जिन्हें बहिर्प्रजनन युक्तियां कहा जाता है।
### प्रमुख बहिर्प्रजनन युक्तियां
* **1. गैर-समकालिकता (डाइकोगेमी):** कई प्रजातियों में, पराग मुक्ति और वर्तिकाग्र ग्रहणशीलता समकालिक नहीं होती है। स्व-परागण को रोकने के लिए या तो परागकोष वर्तिकाग्र से पहले परिपक्व हो जाते हैं (पुंयुग्मकोद्भिद, जैसे सूरजमुखी) या पराग निकलने से पहले वर्तिकाग्र ग्रहणशील हो जाता है (स्त्रीयुग्मकोद्भिद)।
* **2. परागकोष और वर्तिकाग्र का स्थानिक अलगाव (हर्कोगेमी):** कुछ फूलों में, परागकोषों और वर्तिकाग्र की स्थानिक व्यवस्था ऐसी होती है कि पराग स्वाभाविक रूप से उसी फूल के वर्तिकाग्र के संपर्क में नहीं आ सकता है।
* **3. स्व-असंगता (Self-Incompatibility):** यह एक आनुवंशिक तंत्र है जो एक ही फूल या एक ही पौधे के अन्य फूलों के परागकणों के अंकुरण या पराग नली की वृद्धि को रोकता है, इस प्रकार स्व-परागण के लिए एक प्रमुख आनुवंशिक बाधा के रूप में कार्य करता है।
* **4. एकलिंगी फूलों का उत्पादन:** यदि नर और मादा दोनों फूल एक ही पौधे पर मौजूद हैं (उभयलिंगी, जैसे अरंडी और मक्का), तो यह स्व-युग्मन को रोकता है। dioecious पौधों में (जैसे पपीता), स्व-युग्मन और ग्रीटोनोगमी दोनों पूरी तरह से रुक जाते हैं।
### निष्कर्ष\nबहिर्प्रजनन युक्तियां यह सुनिश्चित करती हैं कि आनुवंशिक रूप से विविध और मजबूत संतान उत्पन्न हो, जो पर्यावरणीय तनावों और बीमारियों के खिलाफ पौधों की आबादी की विकासात्मक अनुकूलनशीलता को बढ़ाती है।
उत्तर (Answer): ### दोहरे निषेचन का परिचय\nदोहरा निषेचन पुष्पीय पौधों (आवृतबीजी) में होने वाली एक अनूठी और विशिष्ट घटना है। इसकी खोज एस.जी. नवाशिन ने की थी। इसमें भ्रूणकोष के अंदर एक साथ दो अलग-अलग संलयन घटनाएं होती हैं।
### पराग नली का प्रवेश और विसर्जन\nजब एक पराग कण संगत वर्तिकाग्र पर गिरता है, तो यह अंकुरित होकर एक पराग नली बनाता है जो वर्तिका से बढ़ती हुई बीजांड में प्रवेश करती है। पराग नली एक सहाय कोशिका में प्रवेश करती है और अपने साइटोप्लाज्म में दो नर युग्मकों को छोड़ती है।
### संयुग्मन (पहला निषेचन)
* नर युग्मकों में से एक अंड कोशिका की ओर बढ़ता है और उसके केंद्रक के साथ संलयन करता है।
* नर युग्मक और अंड कोशिका के बीच संलयन की इस प्रक्रिया को **संयुग्मन** कहा जाता है।
* इसका परिणाम द्विगुणित युग्मकोद्भिद या युग्मज ($2n$) का निर्माण है।
* युग्मज बाद में भ्रूण में विकसित होता है।
### त्रिसंलयन (दूसरा निषेचन)
* दूसरा नर युग्मक केंद्रीय कोशिका की ओर बढ़ता है और वहां स्थित दो ध्रुवीय केंद्रकों के साथ संलयन करता है।
* चूंकि इस संलयन में तीन अगुणित केंद्रक (एक नर युग्मक और दो ध्रुवीय केंद्रक) शामिल हैं, इसे **त्रिसंलयन** कहा जाता है।
* इसका परिणाम त्रिगुणित ($3n$) प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) का निर्माण है।
* केंद्रीय कोशिका प्राथमिक भ्रूणपोष कोशिका (PEC) बन जाती है और भ्रूणपोष में विकसित होती है, जो विकासशील भ्रूण को पोषण प्रदान करती है।
### उत्पादों का महत्व और भविष्य
* **युग्मज** पौधे के भ्रूण में विकसित होता है।
* **प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN)** पौष्टिक भ्रूणपोष ऊतक में विकसित होता है।
* **बीजांड** बीज में परिपक्व होते हैं, और **अंडाशय** फल में पकता है।
उत्तर (Answer): ### माइक्रोज़ोस्पोरेंजियम की संरचना का परिचय\nआवृतबीजी पौधों में नर जनन अंग पुंकेसर होता है, जिसमें पुतंतु और परागकोष होते हैं। एक सामान्य परागकोष द्विपली होता है। संरचनात्मक रूप से, एक माइक्रोज़ोस्पोरेंजियम गोलाकार होता है और चार भित्ति परतों से घिरा होता है:
* **अधिचर्म (Epidermis):** सबसे बाहरी सुरक्षात्मक परत।
* **अंतःस्थलीय (Endothecium):** परागकोष के स्फुटन में सहायता करती है।
* **मध्य परतें (Middle layers):** 2-3 परतें जो पोषण प्रदान करने के लिए नष्ट हो जाती हैं।
* **टैपीटम (Tapetum):** सबसे आंतरिक पोषक परत जो विकासशील पराग कणों को पोषण देती है।
### लघुबीजाणुजनन (Microsporogenesis) प्रक्रिया\nपरागकोष के विकास के साथ, केंद्रीय बीजाणुजनक ऊतक अर्धसूत्री विभाजन से गुजरकर लघुबीजाणु बनाते हैं। पराग मात्र कोशिका (PMC) से अर्धसूत्री विभाजन द्वारा लघुबीजाणुओं के निर्माण की प्रक्रिया को लघुबीजाणुजनन कहा जाता है। बीजाणुजनक ऊतक की प्रत्येक कोशिका द्विगुणित ($2n$) होती है।
### नर युग्मकोद्भिद का विकास\nलघुबीजाणु बनने पर वे अलग हो जाते हैं और पराग कणों में विकसित होते हैं। लघुबीजाणु का केंद्रक समसूत्री विभाजन से गुजरकर दो असमान कोशिकाएं बनाता है:
* **कायिक कोशिका (Vegetative Cell):** बड़ी, प्रचुर मात्रा में खाद्य भंडार और एक बड़ा केंद्रक।
* **जनन कोशिका (Generative Cell):** छोटी, कायिक कोशिका के साइटोप्लाज्म में तैरती है और परागण से पहले दो नर युग्मकों का निर्माण करती है।\nपराग कण की दो-परत वाली दीवार होती है: बाहरी एक्सिन (स्पोरोपोलेनिन से बनी) और आंतरिक इंटाइन (सेलूलोज़ और पेक्टिन से बनी)।
उत्तर (Answer): ### परागण के प्रकारों का परिचय\nपरागण परागकणों का परागकोश से किसी फूल के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण है। पराग के स्रोत के आधार पर, परागण को मोटे तौर पर स्व-परागण (एक ही पौधे के भीतर स्थानांतरण) और पर-परागण (एक ही प्रजाति के विभिन्न पौधों के बीच स्थानांतरण) में विभाजित किया गया है।
### परागण के प्रकारों की तुलना
* **ऑटोगैमी (एक ही फूल के भीतर स्व-परागण):** एक ही फूल के परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण। इसके लिए पराग मोचन और वर्तिकाग्र ग्राह्यता में समन्वय की आवश्यकता होती है। उदाहरणों में *कोमेलिना*, *ऑक्सालिस* और *वियोला* (जो क्लिस्टोगैमस फूल पैदा करते हैं) शामिल हैं।
* **गिटोनोगैमी:** परागकणों का परागकोश से उसी पौधे के दूसरे फूल के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरण। कार्यात्मक रूप से, यह एक परागण कारक से जुड़ा पर-परागण है, लेकिन आनुवंशिक रूप से यह स्व-परागण के समान है क्योंकि पराग एक ही पौधे से आता है।
* **जेनोगैमी (पर-परागण):** एक ही प्रजाति के आनुवंशिक रूप से भिन्न पौधे के परागकोश से वर्तिकाग्र तक परागकणों का स्थानांतरण। यह आनुवंशिक भिन्नता लाता है और संतति में लक्षणों के नए संयोजन पेश करता है।
### आउटब्रीडिंग युक्तियाँ (स्व-परागण को रोकने के तंत्र)\nचूंकि निरंतर स्व-परागण से अंतःप्रजनन अवसाद (inbreeding depression) होता है, इसलिए पुष्पीय पौधों ने स्व-परागण को हतोत्साहित करने के लिए कई युक्तियां विकसित की हैं:
* **असमकालिकता (डाइकोगेमी):** पराग मोचन और वर्तिकाग्र ग्राह्यता समन्वित नहीं होती हैं। या तो परागकोश वर्तिकाग्र से पहले परिपक्व हो जाते हैं (प्रोटैंड्री, जैसे सूरजमुखी) या पराग मोचन से पहले वर्तिकाग्र ग्रहणशील हो जाता है (प्रोटोगिनी, जैसे *ग्लोरियोसा*)।
* **स्थानिक अलगाव (हरकोगेमी):** कुछ फूलों में, परागकोश और वर्तिकाग्र अलग-अलग स्थानों पर रखे जाते हैं, जिससे विशेष एजेंटों के बिना स्व-परागण भौतिक रूप से असंभव हो जाता है।
* **स्व-असंगतता (Self-Incompatibility):** एक आनुवंशिक तंत्र जो उसी फूल या उसी पौधे के अन्य फूलों के स्त्रीकेशर में पराग अंकुरण या पराग नली की वृद्धि को रोकता है। यह सबसे प्रभावी और व्यापक युक्ति है।
* **एकलिंगी फूलों का उत्पादन:** यदि एक ही पौधे पर नर और मादा दोनों फूल मौजूद हैं (उभयलिंगाश्रयी या मोनोएसियस, जैसे अरंडी और मक्का), तो यह ऑटोगैमी को रोकता है लेकिन गिटोनोगैमी को नहीं। यदि नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर हैं (द्विलिंगाश्रयी या डियोएसियस, जैसे पपीता), तो ऑटोगैमी और गिटोनोगैमी दोनों पूरी तरह से रुक जाते हैं।
उत्तर (Answer): ### ऐनाट्रोपस बीजांड का परिचय\nबीजांड (जिसे मेगास्पोरेंजियम भी कहा जाता है) वह संरचना है जो मादा प्रजनन कोशिकाओं को उत्पन्न करती है और उनमें समाहित करती है। आवृतबीजी पौधों में सबसे आम प्रकार का बीजांड ऐनाट्रोपस (प्रतिवर्त) बीजांड होता है, जिसमें विकास के दौरान बीजांड का मुख्य शरीर पूरी तरह से उलट जाता है, जिससे माइक्रोपाइल फ्यूनिकुलस के करीब आ जाता है।
### ऐनाट्रोपस बीजांड की विस्तृत संरचना और भाग
* **फ्यूनिकुलस (वृंत):** यह वह डंठल है जिसके द्वारा बीजांड अंडाशय के प्लेसेंटा से जुड़ा होता है। यह पोषक तत्वों के परिवहन के लिए संरचनात्मक सहायता और संवहन संबंध प्रदान करता है।
* **हिलम (नाभिका):** यह बीजांड और फ्यूनिकुलस के बीच के मिलन बिंदु को दर्शाता है। बीज के अलग होने के बाद, हिलम बीज के आवरण पर एक निशान के रूप में रहता है।
* **राफे (शिविका):** एक ऐनाट्रोपस बीजांड में, फ्यूनिकुलस एक तरफ बीजांड के मुख्य शरीर के साथ संलयित होता है, जिससे राफे नामक एक अनुदैर्ध्य उभार बनता है।
* **अध्यावरण (Integuments):** ये सुरक्षात्मक आवरण हैं जो बीजांडकाय (न्यूसेल्लस) को पूरी तरह से घेरते हैं, सिवाय शीर्ष पर एक छोटे छिद्र के जिसे माइक्रोपाइल (बीजांडद्वार) कहते हैं। आमतौर पर दो अध्यावरण होते हैं: बाहरी अध्यावरण और आंतरिक अध्यावरण।
* **माइक्रोपाइल (बीजांडद्वार):** दूरस्थ छोर पर अध्यावरण द्वारा छोड़ा गया एक सूक्ष्म छिद्र। यह निषेचन के दौरान पराग नली के प्रवेश बिंदु के रूप में कार्य करता है और बीज अंकुरण के दौरान पानी के अवशोषण की अनुमति देता है।
* **निभा (Chalaza):** बीजांड का आधारीय भाग जो माइक्रोपाइलर छोर के विपरीत स्थित होता है। यह उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ न्यूसेल्लस, अध्यावरण और फ्यूनिकुलस मिलते हैं।
* **न्यूसेल्लस (बीजांडकाय):** अध्यावरण के भीतर संलग्न पैरेंकाइमा ऊतक का केंद्रीय द्रव्यमान। यह विकासशील भ्रूणकोष को पोषण प्रदान करता है। कुछ बीजों में, शेष न्यूसेल्लस पेरिस्पर्म के रूप में रहता है (जैसे, काली मिर्च, चुकंदर)।
* **भ्रूणकोष (मादा युग्मकोद्भिद):** न्यूसेल्लस के अंदर स्थित, इसमें आमतौर पर एक 7-कोशिकीय और 8-केंद्रकीय संरचना होती है जिसमें एक अंड उपकरण (एक अंड कोशिका और दो सहाय कोशिकाएं), तीन प्रतिव्यासांत (एंटीपोडल) कोशिकाएं और दो ध्रुवीय केंद्रकों वाली एक केंद्रीय कोशिका शामिल होती है।
### महत्व\nऐनाट्रोपस बीजांड की जटिल लेकिन संगठित संरचना कुशल परागण, मादा युग्मकोद्भिद की सुरक्षा, सफल द्विशेषण और प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रहने में सक्षम एक अच्छी तरह से सुरक्षित बीज में बाद के परिवर्तन को सुनिश्चित करती है।
उत्तर (Answer): ### द्विशेषण का परिचय\nद्विशेषण (Double Fertilization) एक अनूठी और प्रमुख घटना है जो सभी आवृतबीजी (पुष्पीय) पौधों में होती है। इसकी खोज 1898 में एस.जी. नवाशिन ने *लिलियम* और *फ्रिटिलेरिया* में की थी। इस प्रक्रिया में, पराग नली द्वारा भ्रूणकोष में छोड़े गए दो नर युग्मकों में से एक, अंड कोशिका से और दूसरा, केंद्रीय कोशिका से संलयन करता है।
### चरण-दर-चरण प्रक्रिया
* **पराग नली का प्रवेश:** जब परागकण वर्तिकाग्र पर गिरता है, तो यह अंकुरित होकर पराग नली बनाता है। पराग नली आमतौर पर बीजांडद्वार (माइक्रोपाइल) के माध्यम से बीजांड में प्रवेश करती है और भ्रूणकोष के साइटोप्लाज्म में दो नर युग्मकों को छोड़ती है।
* **स्यूंगेमी (प्रथम निषेचन):** नर युग्मकों में से एक अंड कोशिका की ओर बढ़ता है और उसके केंद्रक के साथ संलयन करता है। युग्मकों के इस संलयन को स्यूंगेमी कहा जाता है। इसके परिणामस्वरूप एक द्विगुणित ($2n$) युग्मज बनता है, जो बाद में भ्रूण में विकसित होता है।
* **त्रिसंलयन (द्वितीय निषेचन):** दूसरा नर युग्मक केंद्रीय कोशिका की ओर बढ़ता है, जिसमें पहले से ही दो ध्रुवीय केंद्रक होते हैं। यह इन दोनों ध्रुवीय केंद्रकों के साथ संलयन करके त्रिगुणित ($3n$) प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) बनाता है। चूंकि इस संलयन में तीन अगुणित केंद्रक शामिल हैं, इसे त्रिसंलयन कहा जाता है।
* **द्विशेषण की पूर्णता:** चूंकि स्यूंगेमी और त्रिसंलयन दोनों एक ही भ्रूणकोष के भीतर होते हैं, इसलिए इस संपूर्ण प्रक्रिया को द्विशेषण कहा जाता है। प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक वाली केंद्रीय कोशिका प्राथमिक भ्रूणपोष कोशिका (PEC) बन जाती है और भ्रूणपोष में विकसित होती है।
### द्विशेषण का महत्व
* **भ्रूणपोष का निर्माण:** त्रिसंलयन के परिणामस्वरूप भ्रूणपोष का निर्माण होता है, जो बीज अंकुरण और प्रारंभिक पौधे की वृद्धि के दौरान विकासशील भ्रूण को आवश्यक पोषण प्रदान करता है।
* **विकासवादी लाभ:** यह सुनिश्चित करता है कि पौधे अंड कोशिका के सफल निषेचन से पहले पोषक ऊतक (भ्रूणपोष) बनाने पर ऊर्जा खर्च न करें, जिससे चयापचय संसाधनों की बचत होती है।
* **बीज व्यवहार्यता:** द्विशेषण के संयुक्त उत्पाद एक व्यवहार्य बीज के निर्माण की ओर ले जाते हैं, जो प्रजातियों की निरंतरता और विविध पारिस्थितिक तंत्रों में सफल फैलाव तंत्र को सुनिश्चित करते हैं।
उत्तर (Answer): ### दिया गया डेटा:
* कायिक (पत्ती) कोशिकाओं की द्विगुणित गुणसूत्र संख्या ($2n$) = $24$
* इसलिए, अगुणित संख्या ($n$) = $\frac{24}{2} = 12$
### प्रत्येक कोशिका प्रकार के लिए चरण-दर-चरण गणना:
**(a) परागकण:**
* **तर्क:** परागकण लघुबीजाणु मात्र कोशिकाओं के अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बनता है और नर युग्मकोद्भिद का प्रतिनिधित्व करता है, जो कि अगुणित ($n$) होता है।
* **गणना:** गुणसूत्रों की संख्या = $n = 12$|
**(b) प्रतिव्यासांत (एंटीपोडल) कोशिका:**
* **तर्क:** प्रतिव्यासांत कोशिकाएं कार्यात्मक गुरुबीजाणु के समसूत्री विभाजनों द्वारा बनने वाले मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूण कोष) की कोशिकाएं होती हैं, जिससे वे अगुणित ($n$) होती हैं।
* **गणना:** गुणसूत्रों की संख्या = $n = 12$|
**(c) भ्रूणपोष कोशिका:**
* **तर्र्क:** आवृतबीजियों में, भ्रूणपोष तीन अगुणित केंद्रकों (एक नर युग्मक + दो ध्रुवीय केंद्रक) को शामिल करने वाले त्रिक संलयन के परिणामस्वरूप बनता है, जिससे यह त्रिगुणित ($3n$) होता है।
* **गणना:** गुणसूत्रों की संख्या = $3 \times n = 3 \times 12 = 36$|
**(d) युग्मज:**
* **तर्क:** युग्मज एक नर युग्मक ($n$) और एक अंडे की कोशिका ($n$) के संलयन से बनता है, जो द्विगुणित अवस्था ($2n$) को पुनर्स्थापित करता है।
* **गणना:** गुणसूत्रों की संख्या = $2n = 24$|
**(e) अध्यावरण (इंटेगुमेंट) कोशिका:**
* **तर्क:** अध्यावरण बीजांड की दीवार से संबंधित है जो पौधे का एक कायिक (बीजाणुोद्भिद) हिस्सा है, इस प्रकार यह द्विगुणित ($2n$) रहता है।
* **गणना:** गुणसूत्रों की संख्या = $2n = 24$|
उत्तर (Answer): ### भ्रूणजनन का परिचय\nभ्रूणजनन बीजांड के भ्रूण कोष के भीतर युग्मज (निषेचित अंडे) से एक परिपक्व भ्रूण के विकास की प्रक्रिया है। द्विबीजपत्री पौधों में, भ्रूण के विकास का तरीका एक विशिष्ट पैटर्न का पालन करता है जिसे क्रूसिफ़र या ओनाग्राड प्रकार कहा जाता है। कुछ मात्रा में भ्रूणपोष बनने तक युग्मज थोड़े समय के लिए प्रसुप्त (dormant) रहता है।
### द्विबीजपत्री भ्रूण विकास के चरण
* **युग्मज का ध्रुवीय विभाजन:** युग्मज एक असममित अनुप्रस्थ विभाजन से गुजरता है जिससे दो असमान कोशिकाएं बनती हैं: माइक्रोपाइल सिरे की ओर एक बड़ी आधारी कोशिका और निभागीय (चैलाजल) सिरे की ओर एक छोटी शीर्षांत कोशिका (अग्र कोशिका)।
* **निलंबक (Suspensor) का निर्माण:** बड़ी आधारी कोशिका बार-बार अनुप्रस्थ रूप से विभाजित होकर एक तंतु जैसी संरचना बनाती है जिसे निलंबक कहते हैं। निलंबक विकासशील भ्रूण को इष्टतम पोषण के लिए भ्रूणपोष के अंदर गहराई तक धकेलने में मदद करता है। निलंबक की सबसे ऊपरी कोशिका फूलकर हॉस्टोरियम के रूप में कार्य करती है, जबकि निलंबक की सबसे निचली कोशिका, जिसे हाइपोफाइसिस कहा जाता है, मूलांकुर और मूल गोप को जन्म देती है।
* **गोलाकार चरण:** छोटी शीर्षांत कोशिका बहुकोशिकीय, गोलाकार भ्रूण बनाने के लिए क्रमिक समसूत्री विभाजनों (लंबवत और अनुप्रस्थ विभाजनों) से गुजरती है। इस बिंदु पर, ऊतक विभेदन अभी तक नहीं हुआ होता है।
* **हृदय के आकार का चरण:** गोलाकार भ्रूण के दो पार्श्व क्षेत्रों में तेजी से विभाजन होने से दो बीजपत्रों का निर्माण होता है। इससे भ्रूण को एक स्पष्ट हृदय के आकार की उपस्थिति मिलती है। बीजपत्रों के जुड़ाव से ऊपर का क्षेत्र प्रांकुरचोली (एपिकोटिल) और नीचे का क्षेत्र अधोबीजपत्री (हाइपोटिल) कहलाता है।
* **परिपक्व द्विबीजपत्री भ्रूण:** निरंतर वृद्धि और प्रकटन के परिणामस्वरूप एक वक्र, पूरी तरह से परिपक्व द्विबीजपत्री भ्रूण बनता है जिसमें एक भ्रूण अक्ष, दो बीजपत्र, प्रांकुर (प्ररोह सिरा), और मूलांकुर (मूल गोप से ढका हुआ जड़ का सिरा) होता है।
उत्तर (Answer): ### दोहरा निषेचन का परिचय\nदोहरा निषेचन सभी आवृतबीजी (पुष्पीय) पौधों में होने वाली एक अनूठी और विशिष्ट घटना है। इसकी खोज एस.जी. नवासचिन ने *लिलियम* और *फ्रिटिलारिया* में की थी। इस प्रक्रिया में, पराग नली द्वारा भ्रूण कोष में छोड़े गए दो नर युग्मकों में से एक अंडे की कोशिका के साथ और दूसरा द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक के साथ संलयन करता है।
### चरण-दर-चरण प्रक्रिया
* **पराग नली का प्रवेश:** परागकण के सुसंगत वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद, यह अंकुरित होकर पराग नली बनाता है। पराग नली बीजांडद्वार (माइक्रोपाइल) से होते हुए बीजांड में प्रवेश करती है और किसी एक सहायक कोशिका (सिनर्जिड) में दो नर युग्मक मुक्त करती है।
* **स्यंगैमी (प्रथम निषेचन):** नर युग्मकों में से एक अंडे की कोशिका की ओर बढ़ता है और उसके केंद्रक के साथ संलयन करता है। इस प्रक्रिया को स्यंगैमी या वास्तविक निषेचन कहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक द्विगुणित ($2n$) युग्मज बनता है, जो आगे चलकर भ्रूण में विकसित होता है।
* **त्रिक संलयन (द्वितीय निषेचन):** दूसरा नर युग्मक केंद्रीय कोशिका की ओर बढ़ता है और वहाँ स्थित दो ध्रुवीय केंद्रकों (या द्वितीयक केंद्रक) के साथ संलयन करता है। चूंकि इसमें तीन अगुणित केंद्रकों का संलयन शामिल है, इसे त्रिक संलयन कहा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप एक त्रिगुणित ($3n$) प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) बनता है।
### दोहरे निषेचन का महत्व
* **भ्रूणपोष का निर्माण:** त्रिक संलयन से प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक बनता है, जो आगे चलकर भ्रूणपोष (endosperm) में विकसित होता है। भ्रूणपोष बीज अंकुरण के दौरान विकासशील भ्रूण को आवश्यक पोषक ऊतक प्रदान करता है।
* **द्विगुणित अवस्था की पुनर्स्थापना:** स्यंगैमी जीवन चक्र में द्विगुणित अवस्था ($2n$) को बहाल करती है, जिससे एक व्यवहार्य युग्मज के निर्माण के माध्यम से पीढ़ियों में आनुवंशिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
* **व्यर्थ संसाधन आवंटन की रोकथाम:** पौधों के संसाधन निषेचित न होने वाले बीजांडों पर बर्बाद नहीं होते हैं, क्योंकि भ्रूणपोष का विकास आमतौर पर सफल निषेचन होने के बाद ही शुरू होता है।
* **विकास संबंधी लाभ:** यह सुनिश्चित करता है कि पोषक ऊतक तभी बने जब एक सफल भ्रूण का निर्माण हो चुका हो, जिससे आवृतबीजी पौधों में प्रजनन दक्षता अत्यधिक उच्च हो जाती है।
उत्तर (Answer): असंगजनन (apomixis) पुष्पीय पादपों में प्रजनन का एक विशिष्ट तरीका है जहाँ निषेचन या लैंगिक संलयन के बिना बीजों का उत्पादन किया जाता है। यह अलैंगिक प्रजनन का एक रूप है जो लैंगिक प्रजनन की नकल करता है। असंगजनन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: एगामोस्पर्मी (जहाँ भ्रूण अर्धसूत्री विभाजन और निषेचन के बिना बनते हैं) और वानस्पतिक प्रवर्धन। एगामोस्पर्मी अपस्थानिक भ्रूणता (adventitious embryony) के माध्यम से हो सकती है, जहाँ भ्रूणकोष के आसपास की द्विगुणित कोशिकाएं भ्रूण में विकसित हो जाती हैं, या डिप्लोस्पोरी/अपोस्पोरी के माध्यम से, जहाँ गुरुबीजाणु मातृ कोशिका या कोई अन्य कोशिका सीधे एक अगुणित भ्रूणकोष में विकसित हो जाती है। असंगजनन का कृषि और बागवानी में अत्यधिक महत्व है। यदि संकर बीजों को असंगजनित बना दिया जाए, तो किसानों को हर साल संकर बीज खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि संतानों में संकर लक्षण अलग नहीं होते हैं। असंगजनित संकर बीजों की खेती से किसानों के लिए भारी लागत बचती है और बिना किसी ओज (vigor) के नुकसान के साल-दर-साल लगातार उच्च उपज सुनिश्चित होती है।
उत्तर (Answer): पराग-स्त्रीकेशर परस्पर क्रिया एक गतिशील प्रक्रिया है जिसमें पराग की पहचान और उसके बाद पराग को बढ़ावा देना या रोकना शामिल है। यह कोई एकल घटना नहीं है बल्कि लगातार होने वाली घटनाओं की एक श्रृंखला है जो वर्तिकाग्र पर पराग के जमाव से शुरू होती है और बीजांड में पराग नलिका के प्रवेश तक पहुँचती है। स्त्रीकेशर में पराग को पहचानने की क्षमता होती है, कि क्या वह सही प्रकार का (संगत) है या गलत प्रकार का (असंगत)। यदि यह संगत है, तो स्त्रीकेशर पराग को स्वीकार करता है और परागकण के बाद की घटनाओं को बढ़ावा देता है जो निषेचन की ओर ले जाती हैं। परागकण किसी एक जनन छिद्र के माध्यम से पराग नलिका उत्पन्न करने के लिए वर्तिकाग्र पर अंकुरित होता है। परागकण की सामग्रियां पराग नलिका में चली जाती हैं। पराग नलिका वर्तिका और वर्तिकाग्र के ऊतकों से होते हुए अंडाशय तक पहुँचती है। अधिकांश आवृतबीजियों में, यह माइक्रोपाइल के माध्यम से बीजांड में प्रवेश करती है और फिर तंतुमय उपकरण (filiform apparatus) के माध्यम से एक सहायक कोशिका में प्रवेश करती है, जिससे संलयन और त्रिसंलयन के लिए नर युग्मकों को मुक्त किया जाता है।
उत्तर (Answer): n व्यवहार्य बीज उत्पन्न करने के लिए, हमें n कार्यात्मक गुरुबीजाणुओं और n नर युग्मकोद्भिदों की आवश्यकता होती है।
\nचरण 1: मादा पक्ष (गुरुबीजाणुजनन) के लिए आवश्यक अर्धसूत्री विभाजनों की गणना करें।
- गुरुबीजाणुजनन में, 1 गुरुबीजाणु मातृ कोशिका (MMC) 4 गुरुबीजाणु उत्पन्न करने के लिए अर्धसूत्री विभाजन से गुजरती है, जिनमें से केवल 1 कार्यात्मक गुरुबीजाणु 1 भ्रूणकोष बनाता है।
- इसलिए, n कार्यात्मक गुरुबीजाणु (और इस प्रकार n बीज) उत्पन्न करने के लिए, n अर्धसूत्री विभाजनों की आवश्यकता होती है।
- 200 बीजों के लिए, मादा अर्धसूत्री विभाजन = 200।
\nचरण 2: नर पक्ष (लघुबीजाणुजनन) के लिए आवश्यक अर्धसूत्री विभाजनों की गणना करें।
- लघुबीजाणुजनन में, 1 लघुबीजाणु मातृ कोशिका (PMC) 4 लघुबीजाणु (परागकण) बनाने के लिए अर्धसूत्री विभाजन से गुजरती है।
- इसलिए, 1 अर्धसूत्री विभाजन 4 परागकण उत्पन्न करता है।
- n परागकण उत्पन्न करने के लिए, n / 4 अर्धसूत्री विभाजनों की आवश्यकता होती है।
- 200 परागकणों के लिए, नर अर्धसूत्री विभाजन = 200 / 4 = 50।
\nचरण 3: कुल न्यूनतम अर्धसूत्री विभाजनों की गणना करें।
- कुल विभाजन = मादा विभाजन + नर विभाजन
- कुल विभाजन = 200 + 50 = 250 विभाजन।
उत्तर (Answer): द्विषेचन (double fertilization) सभी आवृतबीजियों या पुष्पीय पादपों में पाई जाने वाली एक अनूठी और परिभाषित करने वाली विशेषता घटना है। इसमें भ्रूणकोष के भीतर होने वाले दो प्रकार के संलयन शामिल हैं: संलयन (syngamy) और त्रिसंलयन (triple fusion)। संलयन के परिणामस्वरूप एक द्विगुणित युग्मज का निर्माण होता है, जो बाद में भ्रूण में विकसित होता है, जिससे पुनर्संयोजन के माध्यम से प्रजातियों की निरंतरता और आनुवंशिक भिन्नता का सृजन सुनिश्चित होता है। त्रिसंलयन में दूसरे नर युग्मकाणु का द्विगुणित द्वितीयक केंद्रक के साथ संलयन शामिल है, जिसके परिणामस्वरूप एक त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केंद्रक (PEN) का निर्माण होता है। PEN पोषण संबंधी ऊतक के रूप में विकसित होता है जिसे भ्रूणपोष कहा जाता है, जो बीज अंकुरण के दौरान विकासशील भ्रूण को आवश्यक पोषण प्रदान करता है। इस प्रकार, द्विषेचन यह सुनिश्चित करता है कि पोषण संबंधी ऊतक तभी बनता है जब अंडे का निषेचन हो चुका हो, जिससे ऊर्जा की बर्बादी से बचा जा सके, जो आवृतबीजियों के लिए एक प्रमुख विकासात्मक लाभ है।
उत्तर (Answer): दिया गया डेटा:
- द्विगुणित गुणसूत्र संख्या (2n) = 24
\nचरण 1: अगुणित संख्या (n) ज्ञात कीजिए।
- n = 24 / 2 = 12
\nचरण 2: परागकण में गुणसूत्रों का निर्धारण करें।
- परागकण एक नर युग्मकोद्भिद है और अगुणित (n) होता है।
- परागकण में गुणसूत्रों की संख्या = 12।
\nचरण 3: सहायक कोशिका में गुणसूत्रों का निर्धारण करें।
- सहायक कोशिका मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) की एक कोशिका है और अगुणित (n) होती है।
- सहायक कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या = 12।
\nचरण 4: भ्रूणपोष में गुणसूत्रों का निर्धारण करें।
- आवृतबीजियों में, भ्रूणपोष त्रिगुणित (3n) होता है जो त्रिसंलयन द्वारा बनता है।
- भ्रूणपोष में गुणसूत्रों की संख्या = 3n = 3 * 12 = 36।