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वन एवं वन्य जीव संसाधन

Subject: सामाजिक विज्ञान | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान - वन और वन्यजीव संसाधन (Quick Revision Notes)

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परिचय (Introduction)

पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवाणुओं और बैक्टीरिया से लेकर बरगद, हाथियों और नीली व्हेल तक करोड़ों जीव-जातियाँ निवास करती हैं। हम इन सभी जीवों के साथ एक जटिल पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं, जिसे जैव विविधता (Biodiversity) कहते हैं।


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1. वन और वन्यजीवों का ह्रास (Decline of Forests and Wildlife)

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2. अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार जातियों का वर्गीकरण

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3. भारत में वन और वन्यजीव संरक्षण (Conservation of Forests and Wildlife in India)

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4. वन और वन्यजीव संसाधनों के प्रकार और वितरण

भारत में वन और बंजर भूमि सरकार के नियंत्रण में हैं, जिन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

1. आरक्षित वन (Reserved Forests): देश के आधे से अधिक वन क्षेत्र इस श्रेणी में आते हैं। इन्हें सबसे मूल्यवान माना जाता है।

2. रक्षित वन (Protected Forests): कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा। इनकी और अधिक बर्बादी से सुरक्षा की जाती है।

3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests): अन्य सभी प्रकार के वन और बंजर भूमि जो सरकार और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं।

(नोट: आरक्षित और रक्षित वनों को 'स्थायी वन क्षेत्र' कहा जाता है, जिनका रखरखाव वनों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए किया जाता है। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक स्थायी वन क्षेत्र है।)


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5. सामुदायिक और नागरिक प्रयास (Community and Conservation)

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याद रखें: पर्यावरण और वन्यजीवों का संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान: वन और वन्यजीवन संसाधन
Overview
भारत में वन और वन्यजीवन जैव विविधता का महत्व भारत में वनस्पतिक और प्राणिजात प्रजातियों के प्रकार सामान्य प्रजातियाँ संकटग्रस्त प्रजातियाँ सुभेद्य प्रजातियाँ दुर्लभ प्रजातियाँ स्थानिक प्रजातियाँ लुप्त प्रजातियाँ वनों और वन्यजीवन के ह्रास के कारण कृषि का विस्तार बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएँ (बाँध आदि) खनन और औद्योगीकरण पशुचारण और जलाऊ लकड़ी की कटाई पर्यावरण प्रदूषण और दावानल (जंगल की आग) भारत में वन और वन्यजीवन का संरक्षण संरक्षण की आवश्यकता भारतीय वन्यजीवन संरक्षण अधिनियम (1972) विभिन्न संरक्षण परियोजनाएँ (बाघ परियोजना आदि) वनों के प्रकार और वितरण आरक्षित वन रक्षित वन अवर्गीकृत वन समुदाय और वन संरक्षण स्थानीय समुदायों की भूमिका सरिस्का बाघ अभयारण्य और राजस्थान के विश्नोई चिपको आंदोलन बीज बचाओ आंदोलन और किसानों का प्रयास संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) कार्यक्रम
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. प्रबंधन और प्रशासन के आधार पर भारत के वनों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत कीजिए और प्रत्येक श्रेणी की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वन वर्गीकरण का परिचय\nभारत में, वन और बंजर भूमि का स्वामित्व और प्रबंधन वन विभाग या अन्य सरकारी विभागों के माध्यम से सरकार द्वारा किया जाता है। सुरक्षा की डिग्री और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर, वनों को तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। ### 1. आरक्षित वन (Reserved Forests) - **परिभाषा:** कुल वन भूमि का आधे से अधिक हिस्सा आरक्षित वनों के रूप में घोषित किया गया है। - **महत्व:** वन और वन्यजीव संसाधनों के संरक्षण के संबंध में आरक्षित वनों को सबसे अधिक मूल्यवान माना जाता है। - **प्रतिबंध:** यहां कड़े नियम और कानून लागू होते हैं। विशेष अनुमति के बिना स्थानीय लोगों को आमतौर पर चरागाह या जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने के लिए वन संसाधनों का उपयोग करने की अनुमति नहीं है। ### 2. संरक्षित वन (Protected Forests) - **परिभाषा:** वन विभाग द्वारा घोषित कुल वन क्षेत्र का लगभग एक तिहाई हिस्सा संरक्षित वन है। - **महत्व:** इस वन भूमि को किसी भी तरह की और अधिक क्षति से बचाया जाता है। - **प्रतिबंध:** स्थानीय समुदायों को छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने और चराई जैसे कुछ अधिकार दिए जाते हैं, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र को स्थाई नुकसान से बचाने के लिए सख्त सरकारी निगरानी के तहत। - **अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests)** - **परिभाषा:** ये सरकार और निजी व्यक्तियों तथा समुदायों दोनों के अन्य वन और बंजर भूमि हैं। - **वितरण:** ये ज्यादातर उत्तर-पूर्वी राज्यों और गुजरात के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। - **महत्व:** ये कुल वनों का एक छोटा प्रतिशत बनाते हैं और आरक्षित व संरक्षित श्रेणियों की तुलना में कम प्रतिबंधों के साथ स्थानीय रूप से प्रबंधित किए जाते हैं।
Q2. भारत में वनों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए अपनाए गए विभिन्न उपायों और रणनीतियों की व्याख्या कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### संरक्षण का परिचय\nपारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने, जैव विविधता को संरक्षित करने और मानव जीवन की उत्तरजीविता सुनिश्चित करने के लिए वनों और वन्यजीवों का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में इन प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए सरकार और समुदायों द्वारा कई कदम उठाए गए हैं। ### सरकारी पहल और कानून - **भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972:** इसे आवासों की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रावधानों के साथ लागू किया गया था। संरक्षित प्रजातियों की एक अखिल भारतीय सूची प्रकाशित की गई थी। इसका मुख्य जोर शिकार पर प्रतिबंध लगाकर, उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा देकर और वन्यजीवों के व्यापार को प्रतिबंधित करके कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों की शेष आबादी की रक्षा करना था। - **राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों की स्थापना:** केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने प्राकृतिक आवासों में वनस्पति और जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण्य और बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित किए हैं। विशिष्ट जानवरों के लिए परियोजनाएं, जैसे प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलिफेंट और एक-सींग वाला गैंडा, सकारात्मक परिणाम दे रही हैं। ### समुदायों और पारंपरिक प्रथाओं की भूमिका - **स्थानीय भागीदारी:** कई क्षेत्रों में, स्थानीय समुदाय आवासों की सुरक्षा के लिए सरकारी अधिकारियों के साथ साझेदारी कर रहे हैं, यह पहचानते हुए कि उनकी अपनी आजीविका इन्हीं संसाधनों पर निर्भर करती है। - **पवित्र उपवन (सेक्रेड ग्रोव्स):** प्रकृति की पूजा एक प्राचीन आदिवासी विश्वास है जिसने प्राचीन वनों को संरक्षित किया है जिन्हें पवित्र उपवन कहा जाता है। वनों के इन टुकड़ों या बड़े वनों के हिस्सों को स्थानीय लोगों द्वारा अछूता छोड़ दिया गया है और उनमें किसी भी तरह का हस्तक्षेप प्रतिबंधित है। - **चिपको आंदोलन:** हिमालय के इस प्रसिद्ध आंदोलन ने कई क्षेत्रों में वनों की कटाई का सफलतापूर्वक विरोध किया और दिखाया कि स्वदेशी प्रजातियों के साथ सामुदायिक वनीकरण सफलतापूर्वक किया जा सकता है।
Q3. भारत में वनस्पति और जीव-जंतुओं के ह्रास के प्रमुख कारणों की चर्चा कीजिए। वनों की कटाई जैव विविधता को कैसे प्रभावित करती है? 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वनस्पति और जीव-जंतुओं के ह्रास का परिचय\nएक समय में, भारत के वन और वन्यजीव समृद्ध और प्रचुर मात्रा में थे। हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में, जंगली जानवरों और पौधों की प्रजातियों का आवास भारी रूप से सिकुड़ रहा है। वनस्पति और जीव-जंतुओं के ह्रास का तात्पर्य किसी क्षेत्र के भीतर पौधों और जानवरों की प्रजातियों की संख्या, विविधता और स्वास्थ्य में कमी से है। इस क्षरण के पारिस्थितिक स्थिरता और मानव जीवन पर खतरनाक परिणाम होते हैं। ### ह्रास के प्रमुख कारण * **कृषि का विस्तार:** भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, 1951 और 1980 के बीच, पूरे भारत में 26,200 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन भूमि को कृषि भूमि में बदल दिया गया था। आदिवासी बेल्ट के महत्वपूर्ण हिस्सों, विशेष रूप से मध्य और उत्तर-पूर्व भारत में, झूम खेती (एक प्रकार की कत और दग्ध कृषि) द्वारा वनों की कटाई या क्षरण किया गया है। * **बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएं:** नदी घाटी परियोजनाओं ने वनों का बड़े पैमाने पर विनाश किया है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश और गुजरात में सरदार सरोवर परियोजना ने हजारों हेक्टेयर वन को जलमग्न कर दिया है। खनन वनों की कटाई में योगदान देने वाला एक अन्य प्रमुख कारक है, जैसे कि पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व को खतरे में डालने वाला डोलोमाइट खनन। * **चराई और जलाऊ लकड़ी का संग्रहण:** वन संसाधनों का ह्रास पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई और ग्रामीण आबादी द्वारा जलाऊ लकड़ी के भारी संग्रह के कारण भी होता है, जो पेड़ों के प्राकृतिक पुनरुत्पादन को रोकता है। * **शिकार और अवैध शिकार:** वाणिज्यिक शिकारियों द्वारा खाल, सींग, दांत, टस्कर और पंखों के लिए शिकार, साथ ही वन्यजीव नमूनों के अवैध व्यापार ने कई प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर धकेल दिया है। * **पर्यावरण कारक:** आवास विनाश, अत्यधिक जनसंख्या, जंगल की आग और प्रदूषण जैव विविधता के नुकसान में योगदान देने वाले निरंतर खतरे हैं। ### जैव विविधता पर वनों की कटाई का प्रभाव\nवनों की कटाई सीधे तौर पर अनगिनत प्रजातियों के जानवरों और पौधों के प्राकृतिक घरों को नष्ट कर देती है। जब वनों को काटा जाता है: * **आवास का नुकसान:** प्रजातियाँ अपने आश्रय, प्रजनन के मैदान और भोजन के स्रोतों को खो देती हैं, जिससे जनसंख्या में तेजी से गिरावट या विलुप्ति होती है। * **पारिस्थितिक व्यवधान:** जीवन के परस्पर निर्भर जाल, जिनमें शिकारी और शिकार, परागणक और पौधे शामिल हैं, टूट जाते हैं। * **मृदा अपरदन और जलवायु परिवर्तन:** पेड़ों के आवरण के बिना, मिट्टी आसानी से बह जाती है, और वाष्पोत्सर्जन और कार्बन अवशोषण में कमी के कारण स्थानीय जलवायु पैटर्न बदल जाते हैं, जिससे शेष जीवों के लिए जीवित रहना और भी कठिन हो जाता है।
Q4. विस्तार और प्रशासन के आधार पर वनों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत कीजिए। प्रत्येक श्रेणी को उदाहरण सहित संक्षेप में समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वन वर्गीकरण का परिचय\nभारत में, वन और वन्यजीव संसाधनों का स्वामित्व और प्रबंधन वन विभाग या अन्य सरकारी विभागों के माध्यम से सरकार के पास है। इन विशाल संसाधनों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन और संरक्षण करने के लिए, वनों को उनकी उपयोगिता, सुरक्षा के विस्तार और प्रशासन के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। इन वर्गीकरणों को समझने से देश भर के विभिन्न लकड़ी वाले क्षेत्रों पर लागू कानूनी स्थिति और प्रबंधन प्रोटोकॉल की सराहना करने में मदद मिलती है। ### वनों के प्रकार * **आरक्षित वन (Reserved Forests):** * भारत में कुल वन भूमि का आधे से अधिक हिस्सा आरक्षित वन घोषित किया गया है। * वन और वन्यजीव संसाधनों के संरक्षण के संबंध में इन्हें सबसे मूल्यवान माना जाता है। * यहाँ किसी भी मानवीय गतिविधि, जैसे चराई या वनोपज इकट्ठा करने की अनुमति नहीं है, जब तक कि विशेष रूप से अनुमति न दी जाए। जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आरक्षित वनों का एक बड़ा प्रतिशत है। * **संरक्षित वन (Protected Forests):** * वन विभाग द्वारा घोषित कुल वन क्षेत्र का लगभग एक तिहाई हिस्सा संरक्षित वन है। * इस वन भूमि को किसी भी तरह की और अधिक क्षति से बचाया जाता है। * स्थानीय समुदायों को आम तौर पर मवेशी चराने या गिरी हुई लकड़ी इकट्ठा करने जैसे कुछ अधिकार दिए जाते हैं, लेकिन स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियमों के तहत। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों में उनके अधिकांश वन संरक्षित वनों के अंतर्गत आते हैं। * **अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests):** * ये अन्य वन और बंजर भूमि हैं जो सरकार और निजी व्यक्तियों और समुदायों दोनों के हैं। * ये ज्यादातर उत्तर-पूर्वी राज्यों और गुजरात के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। * ये आरक्षित या संरक्षित श्रेणियों के कड़े प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत नहीं आते हैं, और प्रबंधन के तरीके स्थानीय समुदाय की प्रथाओं के आधार पर काफी भिन्न होते हैं। ### निष्कर्ष\nजबकि आरक्षित और संरक्षित वनों को लकड़ी और अन्य वन उत्पादों के उत्पादन और सुरक्षात्मक कारणों से बनाए गए स्थायी वन संपदा के रूप में भी जाना जाता है, अवर्गीकृत वन एक विकेंद्रीकृत उपयोग पैटर्न का प्रतिनिधित्व करते हैं। उचित वर्गीकरण और इन प्रशासनिक विभाजनों का पालन यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय वन-निवासी समुदायों की जरूरतों को संतुलित करते हुए भारत की समृद्ध जैव विविधता को अनियंत्रित शोषण से बचाया जाए।
Q5. भारत में वनों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए उठाए गए विभिन्न उपायों की व्याख्या कीजिए। वन संरक्षण में समुदायों की भूमिका का वर्णन कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### संरक्षण का परिचय\nसंरक्षण पारिस्थितिक विविधता और हमारे जीवन समर्थन प्रणालियों—जल, वायु और मिट्टी—को सुरक्षित रखता है। 1960 और 1970 के दशक में, संरक्षणवादियों ने एक राष्ट्रीय वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम की मांग की। भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में लागू किया गया, जिसमें आवासों की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रावधान किए गए थे। ### सरकारी उपाय और अधिनियम * **वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972):** इस अधिनियम ने संरक्षित प्रजातियों की एक अखिल भारतीय सूची प्रदान की। इसका मुख्य जोर शिकार पर प्रतिबंध लगाकर, उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा देकर और वन्यजीवों के व्यापार को प्रतिबंधित करके कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों की शेष आबादी की रक्षा करना था। * **प्रोजेक्ट टाइगर:** 1973 में शुरू किया गया, यह दुनिया के सबसे चर्चित वन्यजीव अभियानों में से एक है। बाघ संरक्षण को न केवल एक लुप्तप्राय प्रजाति के बचाव के रूप में देखा जाता है, बल्कि बड़े आकार के बायोटाइप को संरक्षित करने के साधन के रूप में भी देखा जाता है। उत्तराखंड में कॉर्बेट नेशनल पार्क, पश्चिम बंगाल में सुंदरबन नेशनल पार्क और मध्य प्रदेश में बांधवगढ़ नेशनल पार्क कुछ बाघ अभ्यारण्य हैं। * **आरक्षित और संरक्षित वन:** केंद्र और राज्य सरकारों ने वन विभाग के माध्यम से आरक्षित और संरक्षित वन स्थापित किए हैं, जहां शिकार और चराई पर पूरी तरह से प्रतिबंध है या गंभीर रूप से प्रतिबंधित है। ### संरक्षण में समुदायों की भूमिका\nभारत में संरक्षण की रणनीतियाँ नई नहीं हैं। भारत में, वन अक्सर स्थानीय समुदायों का घर रहे हैं। समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से इन संसाधनों की रक्षा की है: * **सरिस्का टाइगर रिजर्व:** राजस्थान में, ग्रामीणों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। राजस्थान के अलवर जिले के पाँच गाँवों के निवासियों ने 1,200 हेक्टेयर वन को 'भैरदेव डाकव 'सोंचूरी'' घोषित किया है, जिसमें नियमों और शिकार प्रतिबंधों का उनका अपना सेट है। * **चिपको आंदोलन:** हिमालय में प्रसिद्ध चिपko आंदोलन ने कई क्षेत्रों में वनों की कटाई का सफलतापूर्वक विरोध किया और दिखाया कि स्वदेशी प्रजातियों के साथ सामुदायिक वनीकरण अत्यधिक सफल हो सकता है। * **संयुक्त वन प्रबंधन (JFM):** यह कार्यक्रम degraded वनों के प्रबंधन और पुनर्स्थापना में स्थानीय समुदायों को शामिल करने का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है। ओडिशा ने 1988 में संयुक्त वन प्रबंधन के लिए पहला प्रस्ताव पारित किया था। * **पवित्र उपवन (Sacred Groves):** प्रकृति की पूजा एक पुरानी आदिवासी मान्यता है जो इस आधार पर आधारित है कि प्रकृति की सभी रचनाओं की रक्षा की जानी चाहिए। वनों के ऐसे टुकड़े या बड़े वनों के हिस्से स्थानीय लोगों द्वारा अछूते छोड़े गए हैं और उन्हें पवित्र उपवन कहा जाता है।
Q6. Discuss the role of community participation in forest and wildlife conservation in India. Highlight significant grassroots movements and initiatives taken by local communities. 5 Marks
उत्तर (Answer): ### सामुदायिक भागीदारी का परिचय\nभारत में, वन और वन्यजीव संरक्षण केवल सरकार के नेतृत्व वाला प्रयास नहीं है; ऐतिहासिक और समकालीन प्रमाण दर्शाते हैं कि स्थानीय समुदाय प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में सबसे आगे रहे हैं। पारंपरिक समाजों ने लंबे समय से महसूस किया है कि पारिस्थितिक संरक्षण उनके जीवित रहने के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे अद्वितीय जमीनी स्तर पर संरक्षण पहल हुई हैं। ### प्रमुख जमीनी स्तर के आंदोलन और सामुदायिक पहल 1. **हिमालय में चिपको आंदोलन:** * **अवलोकन:** हिमालय क्षेत्र में शुरू हुए, चिपको आंदोलन ने कई क्षेत्रों में वनों की कटाई का सफलतापूर्वक विरोध किया। * **कार्रवाई:** स्थानीय ग्रामीणों, विशेष रूप से महिलाओं ने, ठेकेदारों को पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। इसने साबित कर दिया कि सामुदायिक कार्रवाई पारिस्थितिक विनाश को सफलतापूर्वक रोक सकती है और वन संसाधनों के स्थायी उपयोग की मांग कर सकती है। 2. **बीज बचाओ आंदोलन और नवदण्या:** * **अवलोकन:** टिहरी और अन्य क्षेत्रों के किसानों और नागरिक समूहों ने सिंथेटिक रसायनों के उपयोग के बिना विविध फसल उत्पादन को लोकप्रिय बनाया। * **कार्रवाई:** 'बीज बचाओ आंदोलन' ने दिखाया कि रासायनिक उर्वरकों के बिना विविध फसल उत्पादन का पर्याप्त स्तर आर्थिक रूप से व्यवहार्य है, जिससे स्वदेशी वनस्पति और मिट्टी के स्वास्थ्य की रक्षा होती है। 3. **संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) कार्यक्रम:** * **अवलोकन:** भारत सरकार द्वारा 1988 में औपचारिक रूप से शुरू किया गया (ओडिशा द्वारा पहला प्रस्ताव पारित करने के साथ), JFM में स्थानीय समुदायों को अपमानित वनों के प्रबंधन और पुनर्स्थापना में शामिल किया जाता है। * **कार्रवाई:** स्थानीय ग्रामीण ऐसी संस्थाएं बनाते हैं जो मुख्य रूप से वन विभाग द्वारा प्रबंधित अपमानित वन भूमि पर सुरक्षा गतिविधियां करती हैं। बदले में, समुदाय गैर-इमारती वन उत्पादों और सफल सुरक्षा पर काटे गए लकड़ी के हिस्से के हकदार होते हैं। 4. **पवित्र उपवन (Sacred Groves) - एक पारंपरिक संरक्षण नैतिकता:** * **अवलोकन:** प्रकृति की पूजा एक प्राचीन आदिवासी विश्वास है जो इस आधार पर है कि प्रकृति की सभी रचनाओं की रक्षा की जानी चाहिए। * **Action:** ऐसे विश्वासों ने प्राचीन रूप में कई कुंवारी वनों को संरक्षित किया है, जिन्हें पवित्र उपवन (या सरना, देवराकाडु, आदि) के रूप में जाना जाता है। कुछ समाज विशिष्ट पेड़ों का सम्मान करते हैं (जैसे मुंडा और संथाल महुआ और कदंब की पूजा करते हैं, और ओडिशा और बिहार के आदिवासी इमली और आम के पेड़ों की पूजा करते हैं)। 5. **बिश्नोई ग्राम समुदाय (राजस्थान):** * **अवलोकन:** राजस्थान में, बिश्नोई समुदाय वन्यजीवों (जैसे काले हिरण) और पेड़ों (जैसे खेजड़ी) की सुरक्षा को एक धार्मिक कर्तव्य मानता है। * **कार्रवाई:** आज भी, वन्यजीव बिना शिकार के डर के उनके गांवों में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, जो मानव बस्तियों और वन्यजीवों के बीच पूर्ण सद्भाव को प्रदर्शित करता है। ### निष्कर्ष\nसामुदायिक भागीदारी राज्य की नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को पाटती है। स्थानीय हितधारकों को शामिल करना स्थायी प्रबंधन सुनिश्चित करता है, पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करता है, और भारत के समृद्ध वन और वन्यजीव संसाधनों के भविष्य को सुरक्षित करता है।
Q7. भारत में वनस्पति और जीव-जंतुओं के ह्रास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का विश्लेषण कीजिए। इस पर्यावरणीय क्षरण में मानवीय गतिविधि ने किस प्रकार योगदान दिया है? 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वनस्पति और जीव-जंतुओं के ह्रास का परिचय\nभारत अपनी विशाल जैव विविधता के मामले में दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है। हालांकि, यह अपार जैव विविधता गंभीर खतरे में है। वनस्पति और जीव-जंतुओं का ह्रास कोई हालिया घटना नहीं है; विभिन्न मानवीय और प्राकृतिक कारकों के कारण पिछले कुछ दशकों में इसमें काफी तेजी आई है। ### ह्रास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारक 1. **कृषि का विस्तार:** * स्वतंत्रता के बाद, कृषि का विस्तार वनों की कटाई के प्रमुख चालकों में से एक रहा है। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, 1951 और 1980 के बीच, पूरे भारत में 26,200 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया था। * विशेष रूप से पूर्वोत्तर और मध्य भारत में आदिवासी बेल्ट के पर्याप्त हिस्सों को स्थानांतरित कृषि (झूम), जो कि स्लैश-एंड-बर्न कृषि का एक प्रकार है, द्वारा वनों से काट दिया गया या अपमानित कर दिया गया है। 2. **बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएं:** * नदी घाटी परियोजनाओं का वनों पर भारी प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिए, नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर परियोजना ने हजारों हेक्टेयर वनों को जलमग्न कर दिया है। * वनों की कटाई के पीछे खनन एक अन्य प्रमुख कारक है। पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व डोलोमाइट खनन से गंभीर रूप से खतरे में है। खनन ने कई प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को बाधित किया है और भारतीय हाथी सहित कई जानवरों के प्रवास मार्गों को अवरुद्ध कर दिया है। 3. **चारागाह और ईंधन की लकड़ी का संग्रहण:** * बड़े पैमाने पर मवेशियों को चराने और जलाऊ लकड़ी के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने वन पारिस्थितिकी तंत्र पर अत्यधिक दबाव डाला है। प्राकृतिक पुनर्जनन की अनुमति देने के बजाय, अत्यधिक जैविक हस्तक्षेप पौधों को नुकसान पहुँचाता है और मिट्टी की गुणवत्ता को खराब करता है। 4. **शिकार और अवैध शिकार:** * जानवरों की खाल, टस्क, सींग, हड्डियों और जीवित पालतू जानवरों के व्यावसायिक व्यापार के लिए शिकार और अवैध शिकार ने कई प्रजातियों को विलुप्त होने के कगार पर धकेल दिया है। अनियंत्रित मानवीय लालच और अवैध वन्यजीव तस्करी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। 5. **पर्यावरण प्रदूषण और दावानल (जंगल की आग):** * वायु प्रदूषण, जल संदूषण और लगातार जंगल की आग, जो अक्सर मानवीय लापरवाही से शुरू होती है, आवासों के विशाल क्षेत्रों को नष्ट कर देती है, जिससे लाखों सूक्ष्मजीव, कीड़े, पक्षी और जानवर मारे जाते हैं। ### सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम\nअसमान पहुंच, वन संसाधनों की अनुचित खपत और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पर्यावरण के लाभों को साझा करने से उन गरीबों पर भारी प्रभाव पड़ा है जो सीधे वनों पर निर्भर हैं। जनसंख्या वृद्धि ने भूमि और संसाधनों की मांग को और बढ़ा दिया है, जिससे पारिस्थितिक संकट बढ़ गया है। ### निष्कर्ष\nवनस्पति और जीव-जंतुओं का तेजी से क्षरण पारिस्थितिक सुरक्षा को कमजोर करता है। हमारे शेष वन संसाधनों की रक्षा के लिए कड़े कानून प्रवर्तन, स्थायी विकास प्रथाओं और सक्रिय सामुदायिक भागीदारी की आवश्यकता है।
Q8. भारत में वनों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए उठाए गए विभिन्न उपायों और सामुदायिक पहलों की चर्चा कीजिए। पर्यावरण की रक्षा में स्थानीय समुदायों की भूमिका पर प्रकाश डालिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में वनों और वन्यजीवों का संरक्षण और सामुदायिक पहल \nसंरक्षण पारिस्थितिक विविधता और हमारे जीवन समर्थन प्रणालियों—पानी, हवा और मिट्टी—को सुरक्षित रखता है। वनस्पति और जीवों के तेजी से ह्रास के जवाब में, भारत सरकार और स्थानीय समुदायों ने वन और वन्यजीव संसाधनों की रक्षा के लिए विभिन्न उपायों और पहलों को शुरू किया है। * **सरकारी कानून और नीतियां:** * भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 में लागू किया गया था, जिसमें आवासों की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रावधान किए गए थे। संरक्षित प्रजातियों की एक अखिल भारतीय सूची प्रकाशित की गई थी। इस कार्यक्रम का मुख्य जोर शिकार पर प्रतिबंध लगाकर, उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा देकर और वन्यजीवों के व्यापार को प्रतिबंधित करके कुछ संकटग्रस्त प्रजातियों की शेष आबादी की रक्षा करना था। * केंद्र और राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य स्थापित किए। गंभीर रूप से खतरे में पड़े विशिष्ट जानवरों की रक्षा के लिए प्रोजेक्ट टाइगर (1973) जैसी परियोजनाएं शुरू की गईं। * **समुदाय और स्थानीय लोगों की भूमिका:** * भारत में, वन कुछ पारंपरिक समुदायों का घर हैं। कुछ क्षेत्रों में, स्थानीय समुदाय अपने आवासों की रक्षा के लिए सरकारी अधिकारियों के साथ संघर्ष कर रहे हैं, यह पहचानते हुए कि इससे ही उनकी अपनी दीर्घकालिक आजीविका सुरक्षित होगी। * **सरिस्का टाइगर रिजर्व:** राजस्थान में, ग्रामीणों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। कई क्षेत्रों में, ग्रामीण खुद आवासों की रक्षा कर रहे हैं और स्पष्ट रूप से सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करते हैं जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाता है। * **पवित्र उपवन (Sacred Groves):** * प्रकृति की पूजा एक पुरानी आदिवासी मान्यता है जो इस आधार पर है कि प्रकृति की प्रत्येक रचना की रक्षा की जानी चाहिए। ऐसी मान्यताओं ने कई प्राचीन वनों को 'पवित्र उपवन' (या देवी-देवताओं के वनों) के रूप में संरक्षित रखा है। वन के इन पैच या बड़े वनों के हिस्सों को स्थानीय लोगों द्वारा अछूता छोड़ दिया गया है और उनके साथ किसी भी तरह का हस्तक्षेप प्रतिबंधित है। * **चिपको आंदोलन:** * हिमालय में प्रसिद्ध चिपko आंदोलन ने कई क्षेत्रों में वनों की कटाई का सफलतापूर्वक विरोध किया और दिखाया कि स्वदेशी प्रजातियों के साथ सामुदायिक वनीकरण सफलतापूर्वक किया जा सकता है। * **संयुक्त वन प्रबंधन (JFM):** * संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम निम्नीकृत वनों के प्रबंधन और पुनर्स्थापना में स्थानीय समुदायों को शामिल करने का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है। 1988 में ओडिशा में शुरू किया गया, JFM स्थानीय (ग्राम) संस्थानों के गठन पर निर्भर करता है जो मुख्य रूप से वन विभाग द्वारा प्रबंधित निम्नीकृत वन भूमि पर सुरक्षा गतिविधियाँ चलाते हैं। बदले में, इन समुदायों के सदस्य गैर-इमारती वन उत्पादों जैसे मध्यवर्ती लाभ और 'सफल सुरक्षा' द्वारा काटी गई लकड़ी के हिस्से के हकदार हैं। \nनिष्कर्ष रूप में, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बिना प्रभावी संरक्षण प्राप्त नहीं किया जा सकता है जो अपनी दैनिक आजीविका के लिए इन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं।
Q9. भारत में वनस्पति और जीवों के ह्रास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन कीजिए। मानवीय गतिविधियाँ वन और वन्यजीव संसाधनों को कैसे प्रभावित करती हैं? 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में वनस्पति और जीवों के ह्रास के प्रमुख कारक \nभारत अपनी विशाल जैविक विविधता के मामले में दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है। हालाँकि, यह अपार जैव विविधता गंभीर खतरे में है। कई मानवीय और प्राकृतिक कारकों ने हमारी वनस्पति और जीवों के तेजी से ह्रास में योगदान दिया है। नीचे प्रमुख कारकों की विस्तृत चर्चा दी गई है: * **कृषि का विस्तार:** * स्वतंत्रता के बाद, कृषि का विस्तार वन ह्रास के प्रमुख चालकों में से एक रहा है। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, 1951 और 1980 के बीच पूरे भारत में 26,200 वर्ग किलोमीटर से अधिक वन भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया था। विशेष रूप से मध्य और उत्तर-पूर्वी भारत में आदिवासी क्षेत्रों के पर्याप्त हिस्सों को झूम खेती (काटने और जलाने की कृषि) के लिए वनों से मुक्त या निम्नीकृत किया गया है। * **बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएँ:** * नदी घाटी परियोजनाओं का वनों पर भारी प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर परियोजना के लिए वनों की कटाई से हजारों हेक्टेयर वन जलमग्न हो गए हैं। खनन वनों की कटाई के लिए जिम्मेदार एक अन्य प्रमुख कारक है। पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व डोलोमाइट खनन से गंभीर रूप से खतरे में है। खनन वन्यजीवों को विस्थापित करता है और उनके प्रवास मार्गों को अवरुद्ध करता है। * **चराई और ईंधन की लकड़ी का संग्रहण:** * हालाँकि अलग-अलग विचार हैं, लेकिन मवेशियों की चराई और ईंधन की लकड़ी का संग्रहण अक्सर पर्यावरणीय क्षरण का एक महत्वपूर्ण कारण बताया जाता है। घरेलू मवेशियों द्वारा अत्यधिक चराई और जलाऊ लकड़ी के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई के कारण वन आवरण में कमी से जंगली जानवरों के आवास खराब होते हैं और पौधों की प्रजातियाँ नष्ट हो जाती हैं। * **शिकार और अवैध शिकार (Poaching):** * खाल, दांत, सींग, हड्डियों और दांतों के लिए अवैध शिकार और अवैध व्यापार ने कई जातियों को विलुप्ति के कगार पर धकेल दिया है। वन्यजीव उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांगों को पूरा करने के लिए वाणिज्यिक शिकार बाघों, गैंडों, तेंदुओं और हाथियों जैसे जानवरों के लिए एक गंभीर खतरा है। * **पर्यावरण प्रदूषण और वनाग्नि (जंगल की आग):** * वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग से पौधे और जानवर दोनों प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, नियमित वनाग्नि, जो अक्सर मानवीय लापरवाही या झूम कृषि प्रथाओं के कारण होती है, मूल्यवान वनों के विशाल क्षेत्रों को नष्ट कर देती है, जिससे अनगिनत युवा पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव मारे जाते हैं। \nसंक्षेप में, आवास विनाश, शिकार, अति-दोहन, पर्यावरण प्रदूषण और जनसंख्या वृद्धि संयुक्त रूप से भारत की समृद्ध प्राकृतिक संपदा में भारी गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं।
Q10. अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा वर्गीकृत पौधों और पशु जातियों की विभिन्न श्रेणियों को समझाइए। प्रत्येक के लिए उपयुक्त उदाहरण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### IUCN द्वारा पौधों और पशु जातियों का वर्गीकरण \nअंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने पौधों और पशुओं की जातियों को उनके संरक्षण की स्थिति को समझने के लिए कई श्रेणियों में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण सरकारों और संगठनों को संरक्षण प्रयासों को प्राथमिकता देने में मदद करता है। नीचे मुख्य श्रेणियां, उनकी परिभाषाएं और उदाहरण दिए गए हैं: * **सामान्य जातियां (Normal Species):** * **परिभाषा:** ये वे जातियां हैं जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है, जैसे मवेशी (cattle), साल, चीड़ (pine) और कृंतक (rodents)। * **विशेषताएं:** इनकी संख्या आम तौर पर स्थिर होती है और विलुप्त होने का कोई तात्कालिक खतरा नहीं होता है। * **संकटग्रस्त जातियां (Endangered Species):** * **परिभाषा:** ये वे जातियां हैं जिनके विलुप्त होने का खतरा है। यदि नकारात्मक कारक काम करना जारी रखते हैं तो ऐसी जातियों का जीवित रहना कठिन है। * **उदाहरण:** काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, भारतीय गैंडा, शेर की पूंछ वाला मकाक, और संगाई (मणिपुर का हिरण)। * **सुभेद्य जातियां (Vulnerable Species):** * **परिभाषा:** ये वे जातियां हैं जिनकी आबादी ऐसे स्तर तक गिर गई है कि यदि नकारात्मक कारक काम करते रहे, तो निकट भविष्य में उनके संकटग्रस्त श्रेणी में जाने की संभावना है। * **उदाहरण:** नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन आदि। * **दुर्लभ जातियां (Rare Species):** * **परिभाषा:** छोटी आबादी वाली जातियां संकटग्रस्त या सुभेद्य श्रेणी में जा सकती हैं यदि उन्हें प्रभावित करने वाले नकारात्मक कारक सक्रिय रहते हैं। * **उदाहरण:** हिमालयी भूरा भालू, जंगली एशियाई भैंसा, रेगिस्तानी लोमड़ी और हॉर्नबिल। * **स्थानिक जातियां (Endemic Species):** * **परिभाषा:** ये वे जातियां हैं जो आमतौर पर प्राकृतिक या भौगोलिक बाधाओं से अलग विशेष क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं। * **उदाहरण:** अंडमान टील, निकोबार पि कबूतर, अंडमान जंगली सूअर, अरुणाचल प्रदेश में मिथुन। * **लुप्त जातियां (Extinct Species):** * **परिभाषा:** ये वे जातियां हैं जो ज्ञात या संभावित क्षेत्रों की खोज के बाद भी नहीं पाई जाती हैं। कोई जाति किसी स्थानीय क्षेत्र, क्षेत्र, देश, महाद्वीप या पूरी पृथ्वी से लुप्त हो सकती है। * **उदाहरण:** एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख। \nनिष्कर्ष रूप में, जैव विविधता की रक्षा के लिए लक्षित संरक्षण रणनीतियों को लागू करने और वनस्पतियों तथा जीवों के अपूरणीय नुकसान को रोकने के लिए इन श्रेणियों को समझना महत्वपूर्ण है।
Q11. वर्णन कीजिए कि भारत में समुदायों ने वनों और वन्यजीवों के संरक्षण में किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 3 Marks
उत्तर (Answer): भारत में वन और वन्यजीव संरक्षण कोई नए अभ्यास नहीं हैं; पारंपरिक समुदायों ने सदियों से इन संसाधनों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई क्षेत्रों में, स्थानीय समुदाय सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर इन आवासों के संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे हैं, यह पहचानते हुए कि उनका अपना दीर्घकालिक अस्तित्व इस पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, सरिस्का टाइगर रिजर्व (राजस्थान) में, ग्रामीणों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का हवाला देते हुए खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। राजस्थान के अलवर जिले के पांच गांवों के निवासियों ने 1,200 हेक्टेयर वन को 'भैरव देव डाकव 'सोंचुरी'' के रूप में घोषित किया है, जिसमें उन्होंने अपने खुद के नियम और कानून बनाए हैं जो शिकार की अनुमति नहीं देते हैं और किसी भी बाहरी अतिक्रमण से वन्यजीवों की रक्षा करते हैं। हिमालय में प्रसिद्ध चिपको आंदोलन ने कई क्षेत्रों में वनों की कटाई का सफलतापूर्वक विरोध किया और दिखाया कि स्वदेशी प्रजातियों के साथ सामुदायिक वनीकरण सफलतापूर्वक किया जा सकता है। प्रसिद्ध पवित्र उपवन (प्रकृति पूजा परंपराएं) जहां वनों या आदि वनों के बड़े हिस्सों को छुआ नहीं गया और स्थानीय समाजों द्वारा संरक्षित किया गया, स्वदेशी संरक्षण विधियों को प्रदर्शित करते हैं। इसके अलावा, संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) कार्यक्रम स्थानीय समुदायों को क्षरित वनों के प्रबंधन और पुनर्स्थापना में शामिल करने का एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां समुदायों को मध्यवर्ती उपज के रूप में गैर-इमारती वन उत्पादों जैसे लाभ और सफल सुरक्षा द्वारा काटे गए लकड़ी में हिस्सा मिलता है।
Q12. भारत में वनस्पति और जीव-जंतुओं के ह्रास के कारणों को स्पष्ट कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): भारत में वनस्पति और जीव-जंतुओं का ह्रास एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता है जो कई मानवीय और प्राकृतिक कारकों के कारण हो रहा है। औपनिवेशिक काल से ही रेलवे के विस्तार, कृषि, व्यावसायिक और वैज्ञानिक वानिकी तथा खनन गतिविधियों ने वन आवरण को काफी हद तक कम कर दिया है। बड़े पैमाने पर कृषि का विस्तार वनों की कटाई के प्रमुख कारणों में से एक है, क्योंकि बढ़ती आबादी की खाद्य और आर्थिक मांगों को पूरा करने के लिए वनों के विशाल क्षेत्रों को साफ किया जाता है। इसके अलावा, नदी घाटी परियोजनाओं (बांधों) जैसी विकास परियोजनाओं ने हजारों हेक्टेयर वनों को जलमग्न कर दिया है, जिससे वन्यजीवों का विस्थापन हुआ है और उनके प्राकृतिक आवास खंड-खंड हो गए हैं। खनन गतिविधियों, विशेष रूप से चूना पत्थर, लौह अयस्क और कोयले जैसे खनिजों के लिए, ने वन पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से नष्ट कर दिया है और आसपास के जल स्रोतों को प्रदूषित किया है। स्थानीय समुदायों द्वारा चराई और ईधन की लकड़ी का संग्रह, जो अक्सर वनों की वहन क्षमता से अधिक होता है, ने भी आवास के क्षरण में योगदान दिया है। पशुओं की खाल, सींग, दांत और हड्डियों के अवैध व्यापार के लिए अवैध शिकार और वन्यजीव संरक्षण कानूनों के कड़े प्रवर्तन की कमी ने कई प्रजातियों को विलुप्त होने की कगार पर धकेल दिया है। इसके अतिरिक्त, पर्यावरण प्रदूषण, वनों की आग और आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रवेश ने भारत की समृद्ध जैव विविधता की सुभेदारियों को और बढ़ा दिया है, जिससे तत्काल संरक्षण के उपाय अनिवार्य हो गए हैं।
Q13. भारत में वन्यजीवों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न उपाय क्या हैं? 3 Marks
उत्तर (Answer): भारत सरकार ने देश भर में वन्यजीवों की रक्षा और संरक्षण के लिए कई सक्रिय कदम उठाए हैं और मजबूत उपाय लागू किए हैं। 1. भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम: आवासों की रक्षा के लिए विभिन्न प्रावधानों के साथ 1972 में अधिनियमित किया गया। संरक्षित प्रजातियों की एक अखिल भारतीय सूची प्रकाशित की गई थी, और जोर शिकार पर प्रतिबंध लगाकर, उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा देकर, और वन्यजीवों में व्यापार को प्रतिबंधित करके कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों की शेष आबादी की रक्षा करने पर था। 2. राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों की स्थापना: केंद्र और राज्य सरकारों ने जंगली जानवरों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक आवास प्रदान करने के लिए पूरे भारत में कई राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य और बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित किए हैं। 3. लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए विशेष परियोजनाएं: लुप्तप्राय और करिश्माई प्रजातियों के लिए विशिष्ट संरक्षण परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जिनमें सबसे उल्लेखनीय 1973 में शुरू की गई 'प्रोजेक्ट टाइगर' के साथ-साथ एक सींग वाले गैंडे, कश्मीरी बारहसिंगा (हंगुल), तीन प्रकार के मगरमच्छ और एशियाई शेर के लिए परियोजनाएं शामिल हैं, जिन्होंने अपनी आबादी को पुनर्जीवित करने में सकारात्मक परिणाम दिए हैं।
Q14. चिपको आंदोलन और उसके महत्व पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): चिपको आंदोलन 1970 के दशक के दौरान हिमालय में हुआ एक प्रसिद्ध अहिंसक आंदोलन था। इसकी शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले में हुई थी जब ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं ने व्यावसायिक ठेकेदारों द्वारा पेड़ों को काटे जाने से रोकने के लिए उन्हें गले लगा लिया था। इस आंदोलन का नेतृत्व सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट जैसे पर्यावरणविदों और स्थानीय नेताओं ने किया था। इसका मुख्य उद्देश्य वनों को व्यावसायिक शोषण से बचाना और वन संसाधनों पर स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को संरक्षित करना था। यह आंदोलन अत्यधिक लोकप्रिय हुआ और इसने साबित कर दिया कि स्थानीय समुदायों ने शक्तिशाली निहित स्वार्थों के खिलाफ अपने पर्यावरण की सफलतापूर्वक रक्षा की है। चिपको आंदोलन का महत्व इस बात में है कि इसने लोगों को पेड़ों के पारिस्थितिक मूल्य के प्रति जागरूक किया और भारत में समुदाय-आधारित वन संरक्षण नीतियों के निर्माण को बढ़ावा दिया, जिसमें पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया गया।
Q15. मानव गतिविधियों ने भारत में वन्यजीवों को कैसे प्रभावित किया है? चर्चा कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): मानव गतिविधियों ने भारत में वन्यजीवों को गहराई से प्रभावित किया है, जिससे कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। मानव बस्तियों के विस्तार, औद्योगिकीकरण और बुनियादी ढाचे के विकास ने प्राकृतिक आवासों को नष्ट कर दिया है, जो वन्यजीवों के पतन का प्राथमिक कारण है। खाल, सींग, दांतों और हड्डियों के शिकार, अवैध शिकार और अवैध व्यापार ने बाघों, हाथियों और गैंडों जैसे राजसी जानवरों की आबादी को तबाह कर दिया है। इसके अलावा, पर्यावरण प्रदूषण, आक्रामक प्रजातियों का परिचय, और मानव लापरवाही के परिणामस्वरूप लगने वाली जंगल की आग ने पारिस्थितिक तंत्र को इस हद तक बदल दिया है कि पहचानना मुश्किल हो गया है। सड़कों, रेलवे और नहरों के कारण आवास का विखंडन पशु आबादी को विभाजित करता है, आनुवंशिक विविधता को कम करता है और उन्हें इनब्रीडिंग डिप्रेशन और अचानक बीमारी के प्रकोप के प्रति संवेदनशील बनाता है। परिणामस्वरूप, चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख, पहाड़ी बटेर और वन उल्लू जैसी प्रजातियां या तो विलुप्त हो गई हैं या गंभीर रूप से लुप्तप्राय हो गई हैं, जो भारत की शेष जैव विविधता की रक्षा के लिए मजबूत संरक्षण रणनीतियों की तत्काल आवश्यकता को उजागर करती हैं।