Chapter Chai • Board Revision Guide
HI • CBSE

कृषि

Subject: सामाजिक विज्ञान | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान: भूगोल

#### अध्याय: कृषि - त्वरित पुनरीक्षण नोट्स एवं महत्वपूर्ण सूत्र


---


परिचय एवं महत्व

---


मुख्य कृषि प्रthath (Types of Farming)

1. प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि:


2. गहन जीविका कृषि:


3. वाणिज्यिक कृषि:


---


प्रमुख शस्य प्रारूप (Cropping Seasons in India)

भारत में तीन मुख्य फसल ऋतुएँ हैं:


| ऋतु का नाम | बोने का समय | काटने का समय | मुख्य फसलें |

| :--- | :--- | :--- | :--- |

| रबी | अक्टूबर से दिसंबर (सर्दियों में) | अप्रैल से जून (गर्मियों में) | गेहूँ, जौ, मटर, चना, सरसों |

| खरीफ | मानसून के आगमन पर (जून-जुलाई) | सितंबर से अक्टूबर | धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग, उड़द, कपास, जूट, सोयाबीन |

| जायद | रबी और खरीफ के बीच (ग्रीष्मकालीन) | कुछ महीनों में | तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, खीरा, चारा फसलें |


---


मुख्य फसलें (Major Crops)

#### 1. खाद्य फसलें (Food Crops)


#### 2. अखाद्य फसलें / नकदी फसलें (Non-Food / Cash Crops)


---


कृषि सुधार (Agricultural Reforms)



---


भू-उपयोग और भारतीय कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 अध्याय: कृषि
Overview
कृषि के प्रकार प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि कर्तन-दहन कृषि (झूम कृषि) श्रम प्रधान गहन जीविका कृषि अधिक जनसंख्या का दबाव रसायनों और सिंचाई का अधिक उपयोग वाणिज्यिक कृषि आधुनिक इनपुट (बीज, उर्वरक) का प्रयोग एक कृषि (रोपण कृषि - चाय, कॉफ़ी) मुख्य फसलें खाद्य फसलें चावल (धान) खरीफ फसल उच्च तापमान और अधिक वर्षा गेहूं रबी फसल शीत ऋतु और मध्यम वर्षा मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी) पोषक तत्व युक्त कम उपजाऊ मिट्टी में भी उत्पादन दालें प्रोटीन के मुख्य स्रोत नाइट्रोजन स्थिरीकरण (मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना) अखाद्य फसलें (व्यापारिक) रबर भूमध्यरेखीय फसल नम और उष्ण जलवायु कपास ब्लैक सॉइल (काली मिट्टी) की आवश्यकता खरीफ फसल जूट (सुनहरा ریشه) बाढ़ के मैदानों की उपजाऊ मिट्टी पश्चिम बंगाल में प्रमुख तकनीकी और संस्थागत सुधार कृषि सुधार जमीदारी प्रथा का उन्मूलन चकबंदी और जोतों की हदबंदी तकनीकी सुधार हरित क्रांति (गेहूं और चावल पर जोर) श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) सरकार की योजनाएं किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) फसल बीमा योजना न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भारतीय कृषि पर वैश्वीकरण का प्रभाव वैश्वीकरण के लाभ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पहुंच आधुनिक तकनीक का आगमन वैश्वीकरण की चुनौतियां विकसित देशों की सब्सिडी से प्रतिस्पर्धा जैव विविधता का नुकसान और भूमि का क्षरण
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. भारत में अपनाई जाने वाली कृषि पद्धतियों के प्रमुख प्रकारों को समझाइए। जीविका निर्वाह कृषि, गहन जीविका निर्वाह कृषि और वाणिज्यिक कृषि का विस्तार से वर्णन कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nभारत में कृषि एक प्राथमिक गतिविधि है और इसकी दो-तिहाई जनसंख्या कृषि कार्यों में संलग्न है। समय के साथ, भौतिक पर्यावरण की विशेषताओं, तकनीकी ज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं के आधार पर खेती के तरीकों में काफी बदलाव आया है। भारत में खेती निर्वाह प्रकार से लेकर वाणिज्यिक प्रकार तक होती है। ### 1. आदिम जीविका निर्वाह कृषि * **विशेषताएं:** इस प्रकार की खेती जमीन के छोटे टुकड़ों पर प्राचीन औजारों जैसे कुदाल, दाव और खुदाई की छड़ें और परिवार/समुदाय के श्रम की मदद से की जाती है। * **निर्भरता:** इस प्रकार की खेती मानसून, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और उगाई जाने वाली फसलों के लिए अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों की उपयुक्तता पर निर्भर करती है। * **कर्तन-दहन (स्लैश और बर्न) कृषि:** इसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में 'झूमिंग' के नाम से भी जाना जाता है। किसान अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज और अन्य खाद्य फसलों के लिए जमीन के एक टुकड़े को साफ करते हैं। जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो किसान खेती के लिए जमीन का एक नया टुकड़ा साफ करते हैं। ### 2. गहन जीविका निर्वाह कृषि * **विशेषताएं:** इस प्रकार की खेती जमीन पर उच्च जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्रों में की जाती है। * **श्रम प्रधान:** यह श्रम-प्रधान खेती है, जहाँ उच्च उत्पादन प्राप्त करने के लिए जैव-रासायनिक इनपुट और सिंचाई की उच्च खुराक का उपयोग किया जाता है। * **जोत का आकार:** हालांकि 'उत्तराधिकार के अधिकार' के कारण पीढ़ियों के बीच भूमि के विभाजन से भूमि की जोत का आकार असहज हो गया है, फिर भी आजीविका का कोई वैकल्पिक स्रोत न होने के कारण किसान सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना जारी रखते हैं। ### 3. वाणिज्यिक कृषि * **विशेषताएं:** इस प्रकार की कृषि की मुख्य विशेषता उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए आधुनिक इनपुट की उच्च खुराक का उपयोग है, जैसे उच्च उपज देने वाली किस्म (HYV) के बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक आदि। * **वाणिज्यिकरण की डिग्री:** कृषि के वाणिज्यिकरण की डिग्री एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होती है। उदाहरण के लिए, हरियाणा और पंजाब में चावल एक वाणिज्यिक फसल है, लेकिन ओडिशा में यह एक निर्वाह फसल है। * **रोपण कृषि (प्लांटेशन):** रोपण कृषि वाणिज्यिक खेती का एक प्रकार है जहाँ एक बड़े क्षेत्र में एक ही फसल उगाई जाती है। रोपण कृषि में कृषि और उद्योग दोनों के लक्षण पाए जाते हैं। असम में चाय और कर्नाटक में कॉफी भारत की महत्वपूर्ण रोपण फसलें हैं।
Q2. भारत में चावल और गेहूं की वृद्धि और उत्पादन के लिए आवश्यक भौगोलिक परिस्थितियों का वर्णन कीजिए, साथ ही उनके प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों का उल्लेख कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत की प्रमुख खाद्य फसलों का परिचय\nकृषि हमारी आबादी के लिए भोजन और उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान करती है। खाद्य फसलों में, चावल और गेहूं भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल क्षेत्रों में उगाई जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण फसलें हैं, जिनके इष्टतम विकास के लिए विशिष्ट जलवायु और मिट्टी की स्थिति की आवश्यकता होती है। ### 1. चावल (धान)\nचावल भारत के अधिकांश लोगों की मुख्य खाद्य फसल है। चीन के बाद हमारा देश दुनिया में चावल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। * **जलवायु परिस्थितियाँ:** चावल एक खरीफ फसल है जिसके लिए उच्च तापमान (25°C से ऊपर) और उच्च आर्द्रता के साथ 100 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। * **सिंचाई की आवश्यकता:** कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसे सिंचाई की सहायता से उगाया जाता है। * **मिट्टी का प्रकार:** यह जलोढ़, चिकनी और दोमट मिट्टी सहित विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उग सकता है, जिसमें चिकनी जलोढ़ मिट्टी सबसे उपर्युक्त और उपजाऊ होती है। * **प्रमुख उत्पादक क्षेत्र:** चावल उत्तर और उत्तर-पूर्वी भारत के मैदानों, तटीय क्षेत्रों और डेल्टा क्षेत्रों में उगाया जाता है। प्रमुख राज्यों में पश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं। ### 2. गेहूं\nगेहूं भारत में दूसरी सबसे महत्वपूर्ण अनाज की फसल है, जो मुख्य खाद्य फसल के रूप में कार्य करती है, विशेष रूप से देश के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भागों में। * **जलवायु परिस्थितियाँ:** गेहूं एक रबी की फसल है। इसके बढ़ने के मौसम में ठंडी जलवायु और पकने के समय तेज धूप की आवश्यकता होती है। * **तापमान और वर्षा:** बुवाई के समय 10°C से 15°C और पकने के समय 20°C से 25°C तापमान चाहिए। इसे बढ़ने के मौसम में समान रूप से वितरित 50 से 75 सेमी वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। * **मिट्टी का प्रकार:** सिंधु-गंगा के मैदान की अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ दोमट मिट्टी और जलोढ़ मिट्टी गेहूं की खेती के लिए सबसे उपयुक्त होती है। * **प्रमुख उत्पादक क्षेत्र:** भारत में दो मुख्य गेहूं उत्पादक क्षेत्र उत्तर-पश्चिम में गंगा-सतलज के मैदान और दक्कन का काली मिट्टी का क्षेत्र हैं। प्रमुख उत्पादक राज्यों में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार शामिल हैं। ### निष्कर्ष\nचावल और गेहूं दोनों भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। हरित क्रांति के कारण उनके उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है, जिससे भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया है।
Q3. उत्पादकता और किसानों के कल्याण में सुधार के लिए भारतीय सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में शुरू किए गए संस्थागत और तकनीकी सुधारों की चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारतीय कृषि में संस्थागत और तकनीकी सुधार \nकृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है, फिर भी पारंपरिक तरीकों और पुराने भूमि संबंधों के कारण इसे ठहराव का सामना करना पड़ा। इन मुद्दों को हल करने और उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने दशकों से कई संरचनात्मक सुधार शुरू किए हैं। * **संस्थागत सुधार (भूमि सुधार):** * **जमींदारी प्रथा का उन्मूलन:** बिचौलियों को खत्म करने और भूमि का स्वामित्व सीधे वास्तविक किसानों को हस्तांतरित करने के लिए यह कदम उठाया गया, जिससे शोषण कम हुआ। * **जोतों की चकबंदी:** कृषि भूमि का विखंडन एक बड़ी बाधा था। बिखरी हुई जोतों को एकल कॉम्पैक्ट ब्लॉकों में लाने के लिए चकबंदी कानून बनाए गए। * **भूमि जोतों की सीमा (सीलिंग):** कानून पारित किए गए ताकि एक व्यक्ति द्वारा रखे जा सकने वाली भूमि की अधिकतम सीमा तय की जा सके, और अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन किसानों के बीच पुनर्वितरित किया जा सके। * **कृषि ऋण और बीमा:** किसानों को कम ब्याज पर ऋण प्रदान करने के लिए ग्रामीण बैंकों, सहकारी समितियों और बैंकों की स्थापना, साथ ही प्राकृतिक आपदाओं से फसल बीमा प्रदान करने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) जैसी योजनाएँ। * **न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP):** बिचौलियों द्वारा शोषण और भारी मूल्य गिरावट से किसानों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा MSP और खरीद नीतियों की घोषणा। * **तकनीकी सुधार:** * **हरित क्रांति:** 1960 और 1970 के दशक में शुरू की गई, इसने उच्च पैदावार वाली किस्म (HYV) के बीज, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक शामिल किए, जिससे गेहूं और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। * **श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड):** आधुनिक तकनीक और सहकारी नेटवर्क के माध्यम से डेयरी फार्मिंग और दूध उत्पादन में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया। * **आधुनिक सिंचाई सुविधाएँ:** अनिश्चित मानसून बारिश पर निर्भरता कम करने के लिए नलकूपों, नहरों और ड्रिप/स्प్రిinkler सिंचाई प्रणालियों का विस्तार। * **जनसंचार और डिजिटल सहायता:** नियमित मौसम बुलेटिन, रेडियो/टेलीविजन पर कृषि कार्यक्रम, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC), और किसानों को सशक्त बनाने के लिए वास्तविक समय बाजार मूल्य प्रदान करने वाले ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) पोर्टल।
Q4. भारत में रबी और खरीफ फसल सत्रों के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए, अंतर के चार बिंदु और प्रत्येक सत्र में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के उदाहरण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### रबी और खरीफ फसल सत्रों के बीच अंतर \nभारत में तीन प्रमुख फसल सत्र होते हैं: रबी, खरीफ और जायद। रबी और खरीफ दो प्रमुख कृषि सत्र हैं जो देश के कृषि कैलेंडर को तय करते हैं। उनके बीच के अंतर को समझना कृषि नियोजन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। * **बुवाई और कटाई की अवधि:** * **खरीफ सत्र:** फसलें जून-जुलाई में मानसून के आगमन के साथ बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती हैं। * **रबी सत्र:** फसलें अक्टूबर से दिसंबर तक सर्दियों में बोई जाती हैं और अप्रैल से जून तक गर्मियों में काटी जाती हैं। * **जलवायु आवश्यकताएँ:** * **खरीफ सत्र:** इसके लिए गर्म और नम मौसम तथा बढ़ने की अवधि के दौरान प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। * **रबी सत्र:** इसके लिए बीजों के अंकुरण और परिपक्वता के लिए गर्म जलवायु तथा विकास के दौरान ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। * **सिंचाई / पानी का स्रोत:** * **खरीफ सत्र:** पानी की आपूर्ति के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश पर अत्यधिक निर्भर रहता है। * **रबी सत्र:** सर्दियों के पश्चिमी विक्षोभ, वर्षा और नहरों तथा नलकूपों जैसी नियोजित सिंचाई सुविधाओं पर अत्यधिक निर्भर रहता है। * **उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें:** * **खरीफ सत्र:** धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, तुर (अरहर), मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली और सोयाबीन। * **रबी सत्र:** गेहूं, जौ, मटर, चना और सरसों।
Q5. स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में शुरू किए गए विभिन्न तकनीकी और संस्थागत सुधारों की विवेचना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में कृषि सुधारों का परिचय\nभारतीय जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में, कम उत्पादकता और स्थिर विकास ने खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे पैदा किए। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए, भारत सरकार ने चरणबद्ध तरीके से व्यापक तकनीकी और संस्थागत सुधारों की शुरुआत की। ### 1. संस्थागत सुधार (Institutional Reforms) * **जमींदारी प्रथा का उन्मूलन:** स्वतंत्रता के तुरंत बाद, बिचौलियों द्वारा वास्तविक किसानों के शोषण को समाप्त करने और भूमि पर उनका अधिकार स्थापित करने के लिए जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के कानून बनाए गए। * **चकबंदी (Land Consolidation):** खेती को अधिक कुशल बनाने और भूमि की सीमाओं के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बिखरे हुए खेतों को एक ही बड़े और आर्थिक रूप से व्यवहार्य टुकड़े में मिलाया गया। * **भूमि सुधार सीमा अधिनियम (Land Ceiling Acts):** किसी व्यक्ति या परिवार द्वारा रखी जा सकने वाली अधिकतम भूमि की सीमा तय करने के लिए कानून पारित किए गए, जिसका उद्देश्य अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन किसानों और हाशिए के वर्गों के बीच पुनर्वित्त करना था। * **वित्तीय और सहकारी सहायता:** किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना (PAIS) के माध्यम से कम ब्याज दर पर संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण सहकारी समितियों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRBs) और वाणिज्यिक बैंकों की स्थापना की गई। * **फसल बीमा:** सूखे, बाढ़, चक्रवात, आग और कीटों के कारण होने वाले नुकसान से किसानों की रक्षा के लिए व्यापक फसल बीमा योजनाओं की शुरुआत की गई। ### 2. तकनीकी सुधार (Technological Reforms) * **हरित क्रांति (1960-1970 का दशक):** उच्च उपज वाली किस्म (HYV) के बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और आधुनिक मशीनों की शुरुआत ने पारंपरिक खेती को बदल दिया, विशेष रूप से उत्तर-पश्चिम राज्यों में गेहूं और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। * **श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड):** सहकारी नेटवर्क और बेहतर पशु प्रजनन के माध्यम से डेयरी विकास और दूध उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। * **आधुनिक कृषि मशीनरी:** शारीरिक श्रम को कम करने और संचालन के समय को बचाने के लिए ट्रैक्टर, थ्रेशर, हार्वेस्टर और पानी के पंप सेटों को बढ़ावा दिया गया। * **कृषि विस्तार और प्रसारण:** किसानों को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए दूरदर्शन पर नियमित मौसम बुलेटिन, कृषि कार्यक्रम और विशेष किसान चैनलों द्वारा मृदा परीक्षण, कीट नियंत्रण और बाजार मूल्यों पर विशेषज्ञ सलाह प्रदान की गई।
Q6. भारत में खरीफ और रबी फसल की ऋतुओं के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। उनकी बुवाई और कटाई की अवधि के साथ-साथ प्रत्येक ऋतु में उगाई जाने वाली कम से कम तीन प्रमुख फसलों के नाम लिखिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत की फसल ऋतुओं का परिचय\nमानसून और जलवायु की स्थानिक तथा कालिक भिन्नताओं के कारण भारत में तीन प्रमुख फसल ऋतुएँ हैं—रबी, खरीफ और जायद। देश में कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में फसल पैटर्न महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ### 1. खरीफ फसल ऋतु (Kharif Cropping Season) * **बुवाई की अवधि:** खरीफ फसलें देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून के आगमन के साथ, आमतौर पर जून और जुलाई के महीनों में बोई जाती हैं। * **कटाई की अवधि:** इन फसलों की कटाई शरद ऋतु में, सामान्यतः सितंबर से अक्टूबर के बीच की जाती है। * **जलवायु आवश्यकताएं:** इन्हें बढ़ने के लिए गर्म मौसम और पर्याप्त मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। * **प्रमुख फसलें:** इस मौसम में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसलों में धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, तुर (अरहर), मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली और सोयाबीन शामिल हैं। धान इस मौसम की सबसे प्रमुख फसल है, विशेषकर पश्चिम बंगाल, तटीय क्षेत्रों और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में। ### 2. रबी फसल ऋतु (Rabi Cropping Season) * **बुवाई की अवधि:** रबी फसलें सर्दियों में अक्टूबर से दिसंबर के बीच बोई जाती हैं, जो लौटते मानसून और सर्दियों की वर्षा का लाभ उठाती हैं। * **कटाई की अवधि:** इन फसलों की कटाई गर्मियों में अप्रैल से जून के बीच की जाती है। * **जलवायु आवश्यकताएं:** इन्हें विकास के समय ठंडी जलवायु और पकने के समय तेज धूप की आवश्यकता होती है। * **प्रमुख फसलें:** महत्वपूर्ण रबी फसलों में गेहूं, जौ, मटर, चना और सरसों शामिल हैं। गेहूं सबसे महत्वपूर्ण रबी फसल है, जो पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे भारत के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भागों में अच्छी तरह से उगती है, जिसे शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) और सिंचाई सुविधाओं से काफी समर्थन मिलता है।
Q7. भारत में अपनाई जाने वाली कृषि पद्धतियों के प्रमुख प्रकारों को उपयुक्त उदाहरणों और विशेषताओं के साथ समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में कृषि पद्धतियों का परिचय\nभारत में कृषि एक प्राचीन आर्थिक गतिविधि है। पिछले कुछ वर्षों में, भौतिक पर्यावरण की विशेषताओं, तकनीकी ज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं के आधार पर खेती के तरीकों में काफी बदलाव आया है। भारत में खेती निर्वाह प्रकार से लेकर वाणिज्यिक प्रकार तक होती है। ### 1. आदिम निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming) * **विशेषताएं:** इस प्रकार की खेती भूमि के छोटे टुकड़ों पर प्राचीन उपकरणों जैसे कुदाल, दाओ और डिगिंग स्टिक्स तथा पारिवारिक या सामुदायिक श्रम की सहायता से की जाती है। * **निर्भरता:** यह मानसूनी वर्षा, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और उगाई जाने वाली फसल के अनुकूल पर्यावरण पर निर्भर करती है। * **कर्तन एवं दहन कृषि (Slash and Burn):** इसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में 'झूमिंग' भी कहा जाता है, जहाँ किसान अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज और अन्य खाद्य फसलें उगाने हेतु भूमि के एक टुकड़े को साफ करते हैं। जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो किसान उस भूमि को छोड़कर दूसरी नई भूमि पर खेती करने लगते हैं। ### 2. गहन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistence Farming) * **विशेषताएं:** यह खेती उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ भूमि पर जनसंख्या का दबाव बहुत अधिक होता है। * **श्रम और इनपुट:** यह श्रम-प्रधान कृषि है, जहाँ उच्च उत्पादन प्राप्त करने के लिए जैव-रासायनिक उर्वरकों और सिंचाई के साधनों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। * **जोतों का आकार:** उत्तराधिकार के नियम के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी भूमि का विभाजन होता गया है, जिससे जोतों का आकार छोटा और अलाभकारी हो गया है, फिर भी किसान सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ### 3. वाणिज्यिक कृषि (Commercial Farming) * **विशेषताएं:** इस प्रकार की कृषि की मुख्य विशेषता उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए आधुनिक इनपुट जैसे उच्च उपज देने वाली किस्म (HYV) के बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक आदि का भारी मात्रा में उपयोग है। * **रोपण कृषि (Plantation Agriculture):** यह वाणिज्यिक खेती का एक प्रकार है जिसमें एक ही फसल को बहुत बड़े क्षेत्र में उगाया जाता है। रोपण कृषि उद्योग और कृषि के बीच का एक अंतरापृष्ठ है। इसके उदाहरण असम में चाय और कर्नाटक में कॉफी हैं, जिनके लिए भारी पूंजी और प्रवासी श्रमिकों की आवश्यकता होती है।
Q8. उत्पादकता और किसानों के कल्याण में सुधार के लिए स्वतंत्रता के बाद भारतीय सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में शुरू किए गए व्यापक तकनीकी और संस्थागत सुधारों की चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में कृषि सुधारों का परिचय\nकृषि भारत की आधी से अधिक आबादी की आजीविका का निर्वाह करती है। हालाँकि, स्वतंत्रता से पहले और शुरुआती वर्षों के दौरान भी, भारतीय कृषि मानसून पर निर्भरता, सिंचाई की कमी और शोषक भू-स्वामित्व प्रणालियों के कारण ठहराव का सामना कर रही थी। इन मुद्दों को हल करने और कृषि विकास को बढ़ावा देने के लिए, भारत सरकार ने चरणों में विभिन्न संस्थागत और तकनीकी सुधार पेश किए। ### 1. संस्थागत सुधार * **जमींदारी व्यवस्था का उन्मूलन:** स्वतंत्रता के तुरंत बाद, भूमि सुधारों को प्राथमिकता दी गई। वास्तविक काश्तकारों के शोषण को समाप्त करने और उन्हें भूमि के स्वामित्व अधिकार ("जोतने वाले को भूमि") देने के लिए जमींदारी व्यवस्था और बिचौलियों को समाप्त करने के लिए कानून बनाए गए। * **चकबंदी:** कृषि कार्यों के लिए उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए बिखरी हुई भूमि के समेकन (चकबंदी) के लिए कानून पेश किए गए। * **भूमि जोतों की सीमा (सीलिंग):** सरकार ने एक व्यक्ति या परिवार के स्वामित्व वाली भूमि की अधिकतम मात्रा पर सीमा तय की। अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन किसानों और सीमांत काश्तकारों के बीच वितरित किया गया। * **सहकारी खेती और ग्रामीण बैंकिंग:** सस्ते ऋण प्रदान करने के लिए सहकारी समितियों को बढ़ावा देना, और कम ब्याज दरों पर किसानों को संस्थागत ऋण प्रदान करने के लिए ग्रामीण बैंकों, सहकारी बैंकों और नाबार्ड की स्थापना। * **किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा:** किसानों को आसान वित्तीय सहायता और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए KCC और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना (PAIS) जैसी योजनाएं शुरू की गईं। * **न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP):** सरकार बिचौलियों द्वारा शोषण और बाजार में मूल्य उतार-चढ़ाव से किसानों की रक्षा के लिए विभिन्न फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, खरीद मूल्य और लाभकारी मूल्य घोषित करती है। ### 2. तकनीकी सुधार * **हरित क्रांति:** 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के दशक की शुरुआत में शुरू की गई, इसने गेहूं और चावल के उच्च उपज देने वाले किस्म (HYV) के बीजों, रासायनिक उर्वरकों और उन्नत सिंचाई तकनीकों को शामिल करके भारतीय कृषि में एक आदर्श बदलाव को चिह्नित किया। * **श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड):** देश भर में डेयरी फार्मिंग, दूध उत्पादन और सहकारी विपणन प्रणालियों में सुधार पर ध्यान केंद्रित किया गया। * **कृषि का यंत्रीकरण:** पारंपरिक लकड़ी के हलों और बैलों के बजाय ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर और इलेक्ट्रिक/डीजल पंप-सेट जैसी आधुनिक कृषि मशीनरी के उपयोग को प्रोत्साहित करना। * **आधुनिक सिंचाई बुनियादी ढांचा:** बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं, बांधों, नहरों का निर्माण और अनिश्चित मानसून की बारिश पर निर्भरता को कम करने के लिए ड्रिप और फव्वारा सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देना। * **कृषि प्रसारण और सूचना प्रौद्योगिकी:** किसानों को फसल रोगों, मौसम पूर्वानुमान और बाजार की कीमतों के संबंध में वास्तविक समय की सलाह प्रदान करने के लिए विशेष मौसम बुलेटिन, दूरदर्शन पर कृषि कार्यक्रम (जैसे कृषि दर्शन), और समर्पित किसान चैनल।
Q9. भारत में खरीफ और रबी फसल ऋतुओं के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। इन मौसमों में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलों के नाम उनकी भौगोलिक आवश्यकताओं के साथ लिखिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में फसल ऋतुओं का परिचय\nभारत में तीन अलग-अलग फसल ऋतुएँ हैं—रबी, खरीफ और जायद। ये ऋतुएँ मुख्य रूप से देश के विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु परिस्थितियों, तापमान और वर्षा के पैटर्न की उपलब्धता से निर्धारित होती हैं। भारत के कृषि परिदृश्य को समझने के लिए इन ऋतुओं को समझना महत्वपूर्ण है। ### 1. रबी फसल ऋतु * **बुवाई की अवधि:** रबी की फसलें सर्दियों में अक्टूबर से दिसंबर के बीच बोई जाती हैं। * **कटाई की अवधि:** इनकी कटाई गर्मियों में अप्रैल से जून के बीच की जाती है। * **प्रमुख फसलें:** महत्वपूर्ण रबी फसलों में गेहूं, जौ, मटर, चना और सरसों शामिल हैं। * **भौगोलिक आवश्यकताएं (गेहूं पर विशेष ध्यान):** * **तापमान:** पकने के समय ठंडे बढ़ने के मौसम और तेज धूप की आवश्यकता होती है। * **वर्षा:** बढ़ते मौसम में समान रूप से वितरित 50 से 75 सेमी वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। जहाँ वर्षा अपर्याप्त होती है वहाँ सिंचाई महत्वपूर्ण है। * **प्रमुख उत्पादक राज्य:** पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश। ### 2. खरीफ फसल ऋतु * **बुवाई की अवधि:** खरीफ की फसलें देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून के आगमन के साथ उगाई जाती हैं। * **कटाई की अवधि:** इनकी कटाई सितंबर-अक्टूबर में की जाती है। * **प्रमुख फसलें:** इस मौसम में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसलें धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, तुर (अरहर), मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली और सोयाबीन हैं। * **भौगोलिक आवश्यकताएं (चावल पर विशेष ध्यान):** * **तापमान:** उच्च तापमान (25°C से ऊपर)। * **वर्षा:** 100 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा के साथ उच्च आर्द्रता। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में इसे सिंचाई की सहायता से उगाया जाता है। * **प्रमुख उत्पादक राज्य:** असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा के तटीय क्षेत्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल और महाराष्ट्र, विशेष रूप से कोंकण तट के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और बिहार। ### अंतर का सारांश * जहाँ रबी की फसलें काफी हद तक सर्दियों के पश्चिमी विक्षोभ और सिंचाई पर निर्भर करती हैं, वहीं खरीफ की फसलें दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं। रबी की फसलें ठंड पसंद करती हैं, जबकि खरीफ की फसलें गर्म और नम परिस्थितियों में पनपती हैं।
Q10. भारत में अपनाई जाने वाली कृषि पद्धतियों के प्रमुख प्रकारों की व्याख्या कीजिए, जिसमें आदिम निर्वाह कृषि, गहन निर्वाह कृषि और वाणिज्यिक कृषि का विशेष संदर्भ हो। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भारत में कृषि पद्धतियों का परिचय\nकृषि भारत में एक बहुत पुरानी आर्थिक गतिविधि है। पिछले कुछ वर्षों में, भौतिक पर्यावरण की विशेषताओं, तकनीकी ज्ञान और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं के आधार पर खेती के तरीकों में काफी बदलाव आया है। भारत में खेती निर्वाह प्रकार से लेकर वाणिज्यिक प्रकार तक की होती है। भारत में अपनाई जाने वाली कृषि पद्धतियों के प्रमुख प्रकारों की चर्चा नीचे अलग-अलग शीर्षकों के अंतर्गत की गई है। ### 1. आदिम निर्वाह कृषि * **खेती की प्रकृति:** इस प्रकार की खेती भूमि के छोटे टुकड़ों पर कुदाल, दाओ और खुदाई की छड़ जैसे आदिम औजारों तथा पारिवारिक या सामुदायिक श्रम की सहायता से की जाती है। * **निर्भरता:** यह प्रकार की खेती मानसून, मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और उगाई जाने वाली फसल के लिए पर्यावरणीय उपयुक्तता पर निर्भर करती है। * **कर्तन एवं दहन कृषि:** इसे 'कर्तन एवं दहन' (Slash and Burn) कृषि भी कहा जाता है। किसान भूमि के एक टुकड़े को साफ करते हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए अनाज तथा अन्य खाद्य फसलें पैदा करते हैं। जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो किसान खेती के लिए एक नए टुकड़े को साफ करने के लिए स्थानांतरित हो जाते हैं। * **स्थानीय नाम:** इस प्रकार की स्थानांतरित खेती को देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में *झूमिंग*, मध्य प्रदेश में *बिवार* या *दहिया*, आंध्र प्रदेश में *पोडु* या *पेंडा*, आदि। ### 2. गहन निर्वाह कृषि * **खेती की प्रकृति:** इस प्रकार की खेती भूमि पर उच्च जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्रों में की जाती है। * **श्रम प्रधानता:** यह श्रम-प्रधान खेती है, जहाँ उच्च उत्पादन प्राप्त करने के लिए बायोकेमिकल इनपुट और सिंचाई की उच्च खुराक का उपयोग किया जाता है। * **जमीन के जोत का आकार:** हालांकि 'उत्तराधिकार के अधिकार' के कारण क्रमिक पीढ़ियों के बीच भूमि का विभाजन हुआ है जिससे भूमि के जोत का आकार असहज हो गया है, फिर भी वैकल्पिक आजीविका के साधन के अभाव में किसान सीमित भूमि से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना जारी रखते हैं। इस प्रकार, कृषि भूमि पर भारी दबाव रहता है। ### 3. वाणिज्यिक कृषि * **खेती की प्रकृति:** इस प्रकार की खेती की मुख्य विशेषता उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए आधुनिक इनपुट की उच्च खुराक का उपयोग है, जैसे कि उच्च उपज देने वाली किस्म (HYV) के बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और खरपतवारनाशक। * **वाणिज्यिकरण की डिग्री:** कृषि के वाणिज्यिकरण की डिग्री एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न होती है। उदाहरण के लिए, हरियाणा और पंजाब में चावल एक वाणिज्यिक फसल है, लेकिन ओडिशा में यह एक निर्वाह फसल है। * **रोपण कृषि:** रोपण वाणिज्यिक कृषि का एक प्रकार है जहाँ एक बड़े क्षेत्र पर एकल फसल उगाई जाती है। रोपण में कृषि और उद्योग का अंतरापृष्ठ होता है। रोपण में पूंजी-गहन निवेश के बड़े क्षेत्र शामिल होते हैं, जिसमें प्रवासी श्रम का उपयोग किया जाता है। भारत में, चाय, कॉफी, रबर, गन्ना, केला आदि महत्वपूर्ण रोपण फसलें हैं। असम और उत्तर बंगाल में चाय, और कर्नाटक में कॉफी इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
Q11. भारतीय कृषि, अपनी अपार संभावनाओं और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में योगदान के बावजूद, समकालीन काल में कई बहुआयामी चुनौतियों का सामना करती है। सबसे पहले, भारतीय कृषि मानसून पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे यह सूखे और बाढ़ के प्रति संवेदनशील हो जाती है; कई हिस्सों में अपर्याप्त सिंचाई सुविधाएं इस जोखिम को और बढ़ा देती हैं। दूसरा, उत्तराधिकार के अधिकार के कारण, पीढ़ी-दर-पीढ़ी भूमि जोतों का लगातार उपविभाजन और विखंडन होता रहा है, जिससे यंत्रीकरण और व्यावसायिक खेती के लिए परिचालन भूमि जोत अलाभकारी हो गई है। तीसरा, किसानों को अक्सर अपर्याप्त भंडारण और विपणन सुविधाओं से जूझना पड़ता है, जिससे कटाई के तुरंत बाद बिचौलियों को कम कीमतों पर अपनी उपज की संकटपूर्ण बिक्री करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। चौथा, छोटे और सीमांत किसानों को पूंजी और ऋण की भारी कमी का सामना करना पड़ता है, जो उच्च ब्याज दरों के कारण स्थानीय साहूकारों के साथ ऋण के जाल में फंस जाते हैं। पांचवां, उचित मिट्टी परीक्षण के बिना रासायनिक उर्वरकों और कीटनाشकों के अंधाधुंध उपयोग से भूमि का क्षरण, घटती मिट्टी की उर्वरता और भूजल स्तर की कमी हुई है, जो दीर्घकालिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है। 3 Marks
उत्तर (Answer): Indian agriculture, despite its immense potential and contribution to the national economy, faces numerous multi-faceted challenges in the contemporary period. First, Indian agriculture is heavily dependent on the monsoons, making it vulnerable to droughts and floods; inadequate irrigation facilities in many parts exacerbate this risk. Second, due to the right of inheritance, landholdings have been continuously subdivided and fragmented from generation to generation, making operational land holdings uneconomical for mechanization and commercial farming. Third, farmers often struggle with inadequate storage and marketing facilities, forcing distress sales of their produce at lower prices immediately after harvest to middlemen. Fourth, small and marginal farmers face acute shortage of capital and credit, often falling into debt traps with local moneylenders due to high interest rates. Fifth, indiscriminate use of chemical fertilizers and pesticides without proper soil testing has led to land degradation, declining soil fertility, and depletion of groundwater tables, posing serious threats to long-term sustainability.
Q12. रोपण कृषि वाणिज्यिक खेती का एक रूप है जहां पूंजी-गहन इनपुट और प्रवासी या स्थानीय श्रम का उपयोग करके एक बड़े क्षेत्र में एक ही फसल उगाई जाती है। इस प्रकार की खेती में कृषि और उद्योग का एक इंटरफेस होता है, क्योंकि उपज मुख्य रूप से खेत में ही या आसपास के कारखानों में संसाधित की जाती है। रोपण कृषि की विशिष्ट विशेषताओं में शामिल हैं: 1) बड़े पैमाने पर खेती: उद्यम को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए भूमि के विशाल विस्तार की आवश्यकता होती है। 2) पूंजी-गहन: मशीनरी, उर्वरकों, प्रसंस्करण इकाइयों और परिवहन में उच्च निवेश किया जाता है। 3) एकल फसल विशेषज्ञता (मोनोकल्चर): पूरे खेत में केवल एक प्रकार की फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। 4) प्रबंधकीय और परिवहन नेटवर्क: इसके लिए बाजारों और प्रसंस्करण केंद्रों से बागान को जोड़ने वाले परिवहन और संचार के एक अच्छी तरह से विकसित नेटवर्क की आवश्यकता होती है। भारत में उगाई जाने वाली दो प्रमुख रोपण फसलें चाय (असम और उत्तरी बंगाल की पहाड़ियों में बड़े पैमाने पर खेती) और कॉफी (मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में उगाई जाती हैं) हैं। रबर, केला और गन्ना भी रोपण फसलों के उदाहरण हैं। 3 Marks
उत्तर (Answer): Plantation agriculture is a form of commercial farming where a single crop is grown on a large area using capital-intensive inputs and migrant or local labor. This type of farming has an interface of agriculture and industry, as the produce is primarily processed on the farm itself or in nearby factories. Distinct features of plantation agriculture include: 1) Large-scale farming: It requires vast tracts of land to make the enterprise economically viable. 2) Capital intensive: High investments are made in machinery, fertilizers, processing units, and transport. 3) Single crop specialization (Monoculture): Only one type of crop is cultivated extensively over the entire farm. 4) Managerial and transport network: It requires a well-developed network of transport and communication connecting the plantation to markets and processing centers. Two major plantation crops grown in India are tea (cultivated extensively in Assam and Northern Bengal hills) and coffee (primarily grown in Karnataka, Kerala, and Tamil Nadu). Rubber, banana, and sugarcane are also examples of plantation crops.
Q13. गेहूं भारत में दूसरी सबसे महत्वपूर्ण अनाज फसल है, जो मुख्य खाद्य फसल के रूप में कार्य करती है, विशेष रूप से देश के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भागों में। भौगोलिक रूप से, गेहूं एक रबी फसल है जिसे पकने के समय एक ठंडे बढ़ते मौसम और तेज धूप की आवश्यकता होती है। सफल अंकुरण और शुरुआती विकास के लिए, इसे मध्यम तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि कटाई के दौरान, उचित अनाज परिपक्वता के लिए तेज धूप आवश्यक है। नमी के संबंध में, गेहूं को बढ़ते मौसम में समान रूप से वितरित 50 सेमी और 75 सेमी के बीच वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। शुरुआती चरणों में बहुत अधिक वर्षा या जलभराव फसल को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए जहां वर्षा कम होती है, वहां सिंचाई महत्वपूर्ण है। देश में दो प्रमुख गेहूं उगाने वाले क्षेत्र उत्तर-पश्चिम में गंगा-सतलज के मैदान और दक्कन का काली मिट्टी का क्षेत्र हैं। भारत में प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं, जो केंद्रीय खाद्य पूल में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। 3 Marks
उत्तर (Answer): Wheat is the second most important cereal crop in India, serving as the main food crop, particularly in the north and north-western parts of the country. Geographically, wheat is a rabi crop that requires a cool growing season and bright sunshine at the time of ripening. For successful germination and early growth, it requires moderate temperatures, whereas during harvest, bright sunshine is essential for proper grain maturation. Regarding moisture, wheat requires an annual rainfall between 50 cm and 75 cm, evenly distributed over the growing season. Too much rainfall or waterlogging during early stages can damage the crop, hence irrigation is crucial where rainfall is deficient. The two major wheat-growing zones in the country are the Ganga-Satluj plains in the northwest and the black soil region of the Deccan. Major wheat-producing states in India include Punjab, Haryana, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Bihar, and parts of Rajasthan, which contribute significantly to the central food pool.
Q14. 1960 और 1970 के दशक में, भारत सरकार ने उत्पादकता में सुधार और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यापक कृषि सुधार पेश किए। संस्थागत सुधारों में सामूहिकीकरण, जोतों का चकबंदी, सहयोग और जमींदारी प्रथा का उन्मूलन शामिल था। स्वतंत्रता के बाद प्राथमिक कदम के रूप में 'भूमि सुधार' पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित किया गया था। इसके अलावा, सरकार ने सूखा, बाढ़, चक्रवात, आग और बीमारी के खिलाफ फसल बीमा शुरू किया, और किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना (PAIS) के माध्यम से कम ब्याज दरों पर ग्रामीण बैंक, सहकारी समितियां और कृषि ऋण सुविधाएं स्थापित कीं। रेडियो और टेलीविजन पर किसानों के लिए विशेष मौसम बुलेटिन और कृषि कार्यक्रम शुरू किए गए। फसल की किस्मों और दूध के उत्पादन में भारी सुधार करने के लिए तकनीकी सुधार, जिन्हें आमतौर पर हरित क्रांति (पैकेज तकनीक के उपयोग पर आधारित) और श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड) के रूप में जाना जाता है, पेश किए गए थे। उच्च उपज देने वाली किस्म (HYV) के बीजों, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और ट्रैक्टरों और हार्वेस्टर जैसी आधुनिक मशीनरी के उपयोग ने देश के कई क्षेत्रों में पारंपरिक खेती को एक आधुनिक, व्यावसायिक उद्यम में बदल दिया। 3 Marks
उत्तर (Answer): In the 1960s and 1970s, the Indian government introduced comprehensive agricultural reforms to improve productivity and ensure food security. Institutional reforms included the collectivization, consolidation of holdings, cooperation, and abolition of the zamindari system. The focus was heavily placed on 'Land Reform' as the primary step after independence. Furthermore, the government introduced crop insurance against drought, flood, cyclone, fire, and disease, and established Grameen banks, cooperative societies, and agricultural loan facilities at lower interest rates through Kisan Credit Card (KCC) and Personal Accident Insurance Scheme (PAIS). Special weather bulletins and agricultural programmes for farmers were introduced on radio and television. Technological reforms, commonly known as the Green Revolution (based on the use of package technology) and the White Revolution (Operation Flood), were introduced to drastically improve crop varieties and milk production. The use of high-yielding variety (HYV) seeds, chemical fertilizers, pesticides, and modern machinery like tractors and harvesters transformed traditional farming into a modernized, commercial enterprise across many regions of the country.
Q15. चावल भारत के अधिकांश लोगों की सबसे महत्वपूर्ण मुख्य खाद्य फसल है, और इसकी सफल खेती के लिए विशिष्ट और अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। भौगोलिक रूप से, चावल एक खरीफ फसल है जिसे अपने पूरे बढ़ते मौसम में अच्छी तरह से पनपने के लिए उच्च तापमान, विशेष रूप से 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, इसके लिए उच्च आर्द्रता की आवश्यकता होती है, जो इसकी वानस्पतिक वृद्धि का समर्थन करती है। वर्षा एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है; चावल को 100 सेमी से ऊपर प्रचुर मात्रा में वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। उन क्षेत्रों में जहां वर्षा कम या कम होती है, नहरों और ट्यूबवेलों जैसी विश्वसनीय सिंचाई सुविधाओं के व्यापक उपयोग के माध्यम से सफल खेती संभव बनाई जाती है। मिट्टी की आवश्यकताओं के संबंध में, नदी के मैदानों और डेल्टा क्षेत्रों में पाई जाने वाली जलोढ़ मिट्टी को चावल की खेती के लिए सबसे उपर्युक्त और आदर्श माना जाता है, हालांकि यह चिकनी मिट्टी में भी अच्छी तरह से उग सकती है जो लंबी अवधि तक नमी बनाए रखती है। भारत में प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों में पश्चिम बंगाल, पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु शामिल हैं, जहां ये आदर्श भौगोलिक परिस्थितियां प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं या कृत्रिम रूप से पूरक हैं। 3 Marks
उत्तर (Answer): Rice is the most important staple food crop of a majority of the people in India, and its successful cultivation requires specific and favorable geographical conditions. Geographically, rice is a kharif crop that requires high temperature, specifically above 25 degrees Celsius, to thrive well throughout its growing season. Additionally, it requires high humidity, which supports its vegetative growth. Rainfall is another critical factor; rice needs abundant annual rainfall of above 100 cm. In regions where rainfall is lower or deficient, successful cultivation is made possible through the extensive use of reliable irrigation facilities like canals and tube wells. Regarding soil requirements, alluvial soil found in river plains and deltaic regions is considered the most fertile and ideal for rice cultivation, though it can also grow well in clayey soils that retain moisture for a longer duration. Major rice-producing states in India include West Bengal, Punjab, Andhra Pradesh, and Tamil Nadu, where these ideal geographical conditions are naturally available or artificially supplemented.