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सत्ता की साझेदारी

Subject: सामाजिक विज्ञान | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
अध्याय: सत्ता की साझेदारी (Power Sharing) - त्वरित पुनरावृत्ति नोट्स (Quick Revision Notes)

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1. सत्ता की साझेदारी का अर्थ (Meaning of Power Sharing)

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2. बेल्जियम और श्रीलंका का उदाहरण (Case Studies: Belgium and Sri Lanka)

#### (क) बेल्जियम का मॉडल (Belgium Model):


#### (ख) श्रीलंका की स्थिति (Sri Lanka):


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3. सत्ता की साझेदारी क्यों जरूरी है? (Why Power Sharing is Desirable?)

सत्ता की साझेदारी के पक्ष में मुख्य रूप से दो तर्क दिए जाते हैं:


1. युक्तिपरक तर्क (Prudential Reason):


2. नैतिक तर्क (Moral Reason):


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4. सत्ता की साझेदारी के रूप (Forms of Power Sharing)

आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी के मुख्य रूप निम्नलिखित हैं:





माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 सत्ता की साझेदारी
Overview
सत्ता की साझेदारी का अर्थ और महत्व परिभाषा: शासन के विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का विभाजन लाभ: सामाजिक संघर्षों में कमी राजनीतिक व्यवस्था का स्थायित्व लोकतंत्र की मूल भावना का आदर बेल्जियम की कहानी (यूरोप) जातीय बनावट: ५९% फ्लेमिश क्षेत्र (डच भाषा) ४०% बोलोनिया क्षेत्र (फ्रेंच भाषा) १% जर्मन भाषी राजधानी ब्रसेल्स: ८०% फ्रेंच और २०% डच समझदारी भरा समाधान (संविधान संशोधन): केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच मंत्रियों की समान संख्या ब्रसेल्स में अलग सरकार (दोनों का समान प्रतिनिधित्व) 'सामुदायिक सरकार' का गठन (तीसरी स्तर की सरकार) श्रीलंका की कहानी (दक्षिण एशिया) जातीय बनावट: ७४% सिंहली भाषी (बौद्ध) १८% तमिल भाषी (श्रीलंकाई और भारतीय तमिल) बहुसंख्यकवाद का परिणाम: १९५६ का कानून: सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित सरकारी नौकरियों और विश्वविद्यालयों में सिंहलियों को प्राथमिकता तमिलों में अलगाव की भावना और गृहयुद्ध की शुरुआत सत्ता की साझेदारी क्यों जरूरी है? युक्तिपरक कारण (प्रूडेंशियल): सामाजिक समूहों के बीच टकराव की आशंका कम करना राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना नैतिक कारण (मोरल): लोकतंत्र की आत्मा है सत्ता में हिस्सेदारी का हकदार हर नागरिक सत्ता की साझेदारी के रूप (प्रकार) क्षैतिज वितरण (Horizontal): शासन के अंग: विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका शक्ति का संतुलन (अंकुश और संतुलन की प्रणाली) ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical): सरकार के विभिन्न स्तर: केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकार (पंचायत/नगरपालिका) विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच: भाषाई और धार्मिक समूहों के बीच (जैसे बेल्जियम की सामुदायिक सरकार) आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र (भारत में कमजोर वर्गों के लिए) राजनीतिक दल और दबाव समूह: गठजोड़ की सरकारें (कोएलिशन) आंदोलनों और हित समूहों द्वारा प्रभाव डालना
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता-साझेदारी के विभिन्न रूपों की व्याख्या कीजिए। प्रत्येक रूप को स्पष्ट करने के लिए उदाहरण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### सत्ता साझेदारी के रूपों का परिचय\nआधुनिक लोकतंत्रों में, सत्ता की साझेदारी ने पारंपरिक राजनीतिक सिद्धांत के विरोध में विभिन्न रूप ले लिया है, जिसके अनुसार सरकार की सारी शक्ति एक ही व्यक्ति या एक ही स्थान पर स्थित समूह में निहित होनी चाहिए। बहुमत के अत्याचार से बचने और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए शक्ति का एक विवेकपूर्ण और लोकतांत्रिक वितरण आवश्यक है। ### सत्ता साझेदारी के प्रमुख रूप * **1. सत्ता का क्षैतिज वितरण:** * सरकार के विभिन्न अंगों, जैसे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता साझा की जाती है। * इसे नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली कहा जाता है क्योंकि प्रत्येक अंग दूसरे पर नियंत्रण रखता है, जिससे विभिन्न संस्थानों के बीच सत्ता का संतुलन सुनिश्चित होता है। * *उदाहरण:* भारत में, संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और यदि न्यायपालिका पाती है कि कोई कानून संविधान का उल्लंघन करता है, तो वह उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। * **2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (संघवाद):** * सत्ता को विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच साझा किया जा सकता है - पूरे देश के लिए एक सामान्य सरकार और प्रांतीय या क्षेत्रीय स्तर पर सरकारें। * *उदाहरण:* भारत में, हमारे पास केंद्र (संघ) सरकार, राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय जैसे पंचायतें और नगरपालिकाएं हैं। * **3. सामाजिक समूहों के बीच सत्ता साझेदारी:** * विभिन्न समुदायों को जगह देने के लिए धार्मिक और भाषाई समूहों जैसे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता साझा की जा सकती है, जो अन्यथा खुद को हाशिए पर महसूस कर सकते हैं। * *उदाहरण:* बेल्जियम में 'सामुदायिक सरकार' जिसे एक भाषा समुदाय से संबंधित लोगों द्वारा चुना जाता है, और अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए भारत की आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की प्रणाली। * **4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के माध्यम से सत्ता साझेदारी:** * राजनीतिक प्रतिस्पर्धा यह सुनिश्चित करती है कि सत्ता एक हाथ में न रहे। जब दो या दो से अधिक दल मिलकर गठबंधन सरकार बनाते हैं, तो सत्ता साझा की जाती है। * हित समूह, दबाव समूह और सामाजिक आंदोलन भी सरकारी फैसलों को प्रभावित करते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता साझा करते हैं। * *उदाहरण:* भारत में विभिन्न राज्यों में और केंद्र में बनाई गई गठबंधन सरकारें जब किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है। ### निष्कर्ष\nनिष्कर्षतः, सत्ता साझेदारी के ये विभिन्न रूप लोकतांत्रिक शासन के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करते हैं। विभिन्न स्तरों, संस्थानों और सामाजिक संस्थाओं में अधिकार का प्रसार करके, सत्ता साझेदारी लोकतंत्र के मूल मूल्यों को बनाए रखती है और दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देती है।
Q2. बेल्जियम और श्रीलंका में सत्ता-साझेदारी व्यवस्थाओं की तुलना कीजिए। क्षेत्रीय और सांस्कृतिक अंतरों को समायोजित करने के लिए बेल्जियम द्वारा उठाए गए प्रमुख संवैधानिक उपायों पर प्रकाश डालिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### तुलनात्मक सत्ता साझेदारी का परिचय\nसत्ता साझेदारी वह तंत्र है जिसके द्वारा स्थिरता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न समूहों, समुदायों या सरकार के अंगों के बीच राजनीतिक शक्ति का वितरण किया जाता है। बेल्जियम और श्रीलंका की तुलना यह दर्शाती है कि लोकतंत्र सामाजिक विविधता को कैसे संभालते हैं, इसके दो बिल्कुल अलग रास्ते और परिणाम क्या हो सकते हैं। ### बेल्जियम में सत्ता साझेदारी: विविधता का समायोजन\nबेल्जियम ने नवीन संवैधानिक डिजाइनों के माध्यम से अपनी जटिल भाषाई और क्षेत्रीय संरचना को सफलतापूर्वक प्रबंधित किया: * **केंद्रीय सरकार में समान प्रतिनिधित्व:** बेल्जियम के संविधान में यह निर्धारित किया गया कि केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच बोलने वाले मंत्रियों की संख्या समान होगी। कोई भी एक समुदाय अकेले फैसले नहीं ले सकता। * **शक्तियों का हस्तांतरण:** केंद्र सरकार की कई शक्तियां दो क्षेत्रों (फ्लेमिश और वालून) की राज्य सरकारों को सौंप दी गईं, जिससे ये सरकारें केंद्रीय सत्ता के अधीन नहीं रहीं। * **ब्रसेल्स के लिए अलग सरकार:** ब्रसेल्स की अपनी एक अलग सरकार थी जिसमें दोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व था, जिसने इस अनूठी स्थिति को हल किया कि देश में बहुमत (डच) राजधानी में अल्पसंख्यक था। * **सामुदायिक सरकार:** एक तीसरे प्रकार की सरकार, जिसे 'सामुदायिक सरकार' कहा जाता है, को एक भाषा समुदाय - डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी - से संबंधित लोगों द्वारा चुना जाता है, चाहे वे कहीं भी रहें। इस सरकार के पास सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा से संबंधित मुद्दों पर शक्ति होती है। ### श्रीलंका में सत्ता साझेदारी: बहुसंख्यकवादी प्रभुत्व\nबेल्जियम के बिल्कुल विपरीत, श्रीलंका ने बहुसंख्यकवादी मार्ग अपनाया: * **सिंहल सर्वोच्चता:** 1948 में स्वतंत्रता के बाद, बहुसंख्यक सिंहल समुदाय ने अपनी संख्या के बल पर सरकार पर हावी होने की कोशिश की, और 1956 के सिंहल ओनली एक्ट जैसे भेदभावपूर्ण कानून बनाए। * **क्षेत्रीय स्वायत्तता से इनकार:** तमिल बहुल क्षेत्रों को वास्तविक स्वायत्तता से वंचित कर दिया गया, और अल्पसंख्यकों की शिकायतों को लगातार नजरअंदाज किया गया। * **संघर्ष का परिणाम:** सत्ता साझेदारी से इस इनकार के परिणामस्वरूप एक गहरी जड़ें जमा चुका गृह युद्ध, सामाजिक अशांति और जीवन व संपत्ति का भारी नुकसान हुआ। ### निष्कर्ष\nजबकि बेल्जियम के सत्ता-साझेदारी के मॉडल ने जातीय मतभेदों को समायोजित करके राष्ट्रीय एकता, आपसी सम्मान और शांति को बढ़ावा दिया, वहीं श्रीलंका के बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण ने कड़वे जातीय संघर्ष को जन्म दिया। इस प्रकार, सत्ता साझेदारी न केवल नैतिक रूप से वांछनीय है बल्कि राष्ट्र की अखंडता को बनाए रखने के लिए व्यावहारिक रूप से आवश्यक भी है।
Q3. 1948 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद श्रीलंका सरकार द्वारा सिंहल सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए अपनाए गए बहुसंख्यकवादी उपायों की व्याख्या कीजिए। इन उपायों से श्रीलंकाई तमिलों में अलगाव की भावना कैसे पैदा हुई? 5 Marks
उत्तर (Answer): ### श्रीलंका में बहुसंख्यकवाद का परिचय 1948 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, श्रीलंका की लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ने सिंहल समुदाय के प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए बहुसंख्यकवादी उपायों की एक श्रृंखला अपनाई। इन नीतियों ने अल्पसंख्यक तमिल आबादी के अधिकारों और प्रतिनिधित्व को बुरी तरह कमजोर कर दिया, जिससे लंबे समय तक चलने वाला जातीय संघर्ष शुरू हुआ। ### अपनाए गए प्रमुख बहुसंख्यकवादी उपाय * **1956 का अधिनियम (सिंहल मात्र अधिनियम):** 1956 में तमिल की पूरी तरह से उपेक्षा करते हुए सिंहल को एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने के लिए एक अधिनियम पारित किया गया। इससे तमिल भाषी नागरिक आधिकारिक संचार और प्रशासन में तुरंत हाशिए पर चले गए। * **प्राथमिकता वाली नीतियां:** सरकार ने ऐसी प्राथमिकता वाली नीतियों का पालन किया जो विश्वविद्यालय के पदों और सरकारी नौकरियों के लिए सिंहल आवेदकों का पक्ष लेती थीं। इससे तमिल युवाओं के लिए गंभीर आर्थिक और शैक्षिक असुविधाएं पैदा हुईं। * **बौद्ध धर्म के लिए राजकीय संरक्षण:** एक नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा करेगा और उसे बढ़ावा देगा, जिससे हिंदू धर्म, इस्लाम और ईसाई धर्म का पालन करने वाले अल्पसंख्यक समुदाय अलग-थलग महसूस करने लगे। ### परिणाम और श्रीलंकाई तमिलों का अलगाव * **विश्वास की कमी:** सरकार के इन सभी उपायों ने, जो एक के बाद एक आए, श्रीलंकाई तमिलों में अलगाव की भावना को क्रमिक रूप से बढ़ाया। * **द्वितीय श्रेणी के नागरिक होने की धारणा:** उन्हें लगा कि बौद्ध सिंहल नेताओं के नेतृत्व में किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल को उनकी भाषा, संस्कृति और राजनीतिक अधिकारों की कोई परवाह नहीं है। * **उग्रवाद का उदय:** परिणामस्वरूप, समय के साथ सिंहल और तमिल समुदायों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए। तमिलों ने तमिल भाषा को मान्यता देने, क्षेत्रीय स्वायत्तता और शिक्षा एवं नौकरियों में अवसर की समानता के लिए राजनीतिक दल बनाए और संघर्ष शुरू किए। * **गृह युद्ध:** हालांकि, तमिलों की बहुसंख्या वाले प्रांतों के लिए अधिक स्वायत्तता की उनकी मांग को बार-बार ठुकरा दिया गया। 1980 के दशक तक उत्तरी और पूर्वी श्रीलंका में एक स्वतंत्र तमिल ईलम (राज्य) की मांग करने वाले कई राजनीतिक संगठन बन गए। इस अविश्वास और संघर्ष ने जल्द ही एक व्यापक गृह युद्ध का रूप ले लिया, जिससे देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन को भारी झटका लगा। ### निष्कर्ष\nनिष्कर्षतः, एक समुदाय के प्रभुत्व को दूसरे समुदाय पर सुनिश्चित करने के लिए श्रीलंका सरकार द्वारा अपनाए गए बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण ने देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को नष्ट कर दिया, जिससे यह सिद्ध होता है कि एक विविध समाज में शांति और एकता के लिए सत्ता की साझेदारी आवश्यक है।
Q4. बेल्जियम और श्रीलंका ने सत्ता की साझेदारी और सांस्कृतिक विविधता की समस्या का सामना किस प्रकार किया, इसकी तुलना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): बेल्जियम और श्रीलंका दोनों ही लोकतंत्र हैं जो गंभीर जातीय और सांस्कृतिक विविधताओं का सामना कर रहे हैं, फिर भी सत्ता की साझेदारी और सांस्कृतिक विविधता के संबंध में उनके दृष्टिकोण और राजनीतिक परिणाम मौलिक रूप से भिन्न रहे हैं। ### 1. बेल्जियम का मामला - **विविधता का समायोजन:** बेल्जियम ने क्षेत्रीय अंतरों और सांस्कृतिक विविधताओं के अस्तित्व को पहचाना। 1970 और 1993 के बीच, बेल्जियम के नेताओं ने एक ही देश के भीतर सभी को एक साथ रहने योग्य बनाने के लिए अपने संविधान में चार बार संशोधन किया। - **बेल्जियम मॉडल के प्रमुख तत्व:** - केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों का समान प्रतिनिधित्व। - केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ दोनों क्षेत्रों की राज्य सरकारों को सौंपना। - दोनों भाषाई समूहों के लिए समान प्रतिनिधित्व के साथ ब्रुसेल्स के लिए अलग सरकार। - एक भाषा समुदाय के लोगों द्वारा चुने गए 'सामुदायिक सरकार' की शुरुआत। - **परिणाम:** इस अभिनव मॉडल ने दोनों समुदायों के बीच नागरिक संघर्ष से बचने और देश के संभावित भाषाई विभाजन को रोकने में मदद की, जिससे राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित हुई। ### 2. श्रीलंका का मामला - **बहुसंख्यकवाद:** श्रीलंका 1948 में एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरा, और लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार ने सिंहल वर्चस्व स्थापित करने के लिए बहुसंख्यकवादी उपायों की एक श्रृंखला अपनाई। - **श्रीलंकाई नीतियों के प्रमुख तत्व:** - तमिल की उपेक्षा करते हुए सिंहल को एकमात्र राजभाषा के रूप में मान्यता देने के लिए 1956 में एक अधिनियम पारित किया गया। - विश्वविद्यालय के पदों और सरकारी नौकरियों के लिए सिंहल आवेदकों को प्राथमिकता देने वाली नीतियां अपनाई गईं। - एक नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा और पोषण करेगा। - **परिणाम:** इन सरकारी उपायों ने श्रीलंकाई तमिलों को अलग-थलग कर दिया, जिससे अविश्वास, व्यापक विरोध, उग्रवादी समूहों का गठन और अंततः एक विनाशकारी गृह युद्ध हुआ जिससे भारी जान-माल का नुकसान हुआ। ### निष्कर्ष\nजबकि बेल्जियम के समायोजन मॉडल ने शांति, एकता और सहयोग को बढ़ावा दिया, श्रीलंका के बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण ने लंबे समय तक चलने वाले जातीय संघर्ष और राष्ट्रीय विघटन को जन्म दिया।
Q5. विश्लेषण कीजिए कि बेल्जियम और श्रीलंका ने जातीय विविधता और सत्ता की साझेदारी की समस्या से कैसे निपटा। उनके परिणाम एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न थे? 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nबेल्जियम और श्रीलंका दोनों ही ऐसे लोकतंत्र हैं जो गहन जातीय विविधता का सामना कर रहे हैं, फिर भी सत्ता की साझेदारी के संबंध में उनके मार्ग और परिणाम विपरीत कहानियाँ बयां करते हैं। बेल्जियम ने जहाँ आपसी तालमेल के जरिए अपनी भाषाई विविधता को सफलतापूर्वक प्रबंधित किया, वहीं श्रीलंका बहुसंख्यकवादी नीतियों के कारण गृहयुद्ध की आग में झुलस गया। ### 1. बेल्जियम की जातीय बनावट * **जनसांख्यिकी:** बेल्जियम यूरोप का एक छोटा सा देश है। इसकी कुल आबादी का 59% हिस्सा फ्लेमिश क्षेत्र में रहता है और डच बोलता है; 40% वालूनिया क्षेत्र में रहता है और फ्रेंच बोलता है; और शेष 1% जर्मन बोलता है। * **राजधानी की विरोधाभासी स्थिति:** राजधानी शहर ब्रुसेल्स में, 80% आबादी फ्रेंच बोलती है जबकि केवल 20% डच भाषी है। फ्रेंच भाषी अल्पसंख्यक अपेक्षाकृत अमीर और शक्तिशाली थे, जिससे डच भाषी बहुसंख्यकों में नाराजगी पैदा हुई जिन्हें आर्थिक विकास का लाभ बाद में मिला। ### 2. बेल्जियम का समायोजन मॉडल * **संविधान संशोधन:** 1970 और 1993 के बीच, बेल्जियम के नेताओं ने एक ही देश के भीतर सभी को साथ रहने में सक्षम बनाने के लिए अपने संविधान में चार बार संशोधन किया। * **मुख्य तत्व:** * केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों का समान प्रतिनिधित्व। * केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ दोनों क्षेत्रों की राज्य सरकारों को सौंपना। * ब्रुसेल्स में एक अलग सरकार जहाँ दोनों समुदायों का समान प्रतिनिधित्व हो। * 'सामुदायिक सरकार' नामक तीसरे प्रकार की सरकार का गठन, जिसे एक भाषा समुदाय के लोगों द्वारा चुना जाता है। * **परिणाम:** इस जटिल मॉडल ने गृह कलह को रोका और राष्ट्रीय एकता और शांति बनाए रखने में मदद की। ### 3. श्रीलंका की जातीय बनावट * **जनसांख्यिकी:** श्रीलंका विविध आबादी वाला एक द्वीपीय देश है। प्रमुख सामाजिक समूह सिंहली-भाषी (74%) और तमिल-भाषी (18%) हैं। तमिलों में, श्रीलंकाई तमिल (13%) और भारतीय तमिल (5%) शामिल हैं। * **बहुसंख्यकवाद:** 1948 में स्वतंत्रता के बाद, सिंहली समुदाय ने सरकार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया। 1956 में एक अधिनियम पारित किया गया जिसमें सिंहली को तमिल की उपेक्षा करते हुए एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई। ### 4. श्रीलंका का बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण और परिणाम * **भेदभाव:** सरकारी नीतियों ने विश्वविद्यालय के पदों और सरकारी नौकरियों के लिए सिंहली आवेदकों का पक्ष लिया। एक नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा और पोषण करेगा। * **अलगाव की भावना:** एक के बाद एक उठाए गए इन सभी सरकारी कदमों से श्रीलंकाई तमिलों में खुद को उपेक्षित महसूस किया। उन्हें लगा कि बौद्ध सिंहली नेताओं के नेतृत्व में किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल को उनकी भाषा और संस्कृति की कोई परवाह नहीं है। * **परिणाम:** समय के साथ सिंहली और तमिल समुदायों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए, जिससे उग्रवादी समूहों का गठन हुआ, एक स्वतंत्र तमिल ईलम की मांग उठी, और अंततः एक क्रूर गृहयुद्ध छिड़ गया जिसके कारण भारी जान-माल का नुकसान हुआ। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, बेल्जियम के सत्ता साझेदारी के मॉडल ने शांति और सद्भाव सुनिश्चित किया, जबकि श्रीलंका के बहुसंख्यकवाद के कारण गंभीर जातीय संघर्ष हुआ, जिससे यह साबित होता है कि लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए सत्ता की साझेदारी आवश्यक है।
Q6. आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूपों की उपयुक्त उदाहरणों सहित तुलना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nआधुनिक लोकतंत्रों में, किसी राष्ट्र के संविधान, राजनीतिक ढांचा और सामाजिक विविधता के आधार पर सत्ता की साझेदारी के कई रूप हो सकते हैं। लंबे समय तक यह माना जाता था कि सरकार की सारी शक्ति एक ही व्यक्ति या स्थान पर केंद्रित होनी चाहिए, लेकिन लोकतंत्र के उदय ने इस धारणा को बदल दिया है। आज, सत्ता को विभिन्न अंगों, स्तरों और समूहों के बीच साझा किया जाता है। ### 1. सत्ता का क्षैतिज वितरण (सरकार के विभिन्न अंगों के बीच सत्ता की साझेदारी) * **परिभाषा:** सरकार के विभिन्न अंगों, जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता साझा की जाती है। * **नियंत्रण और संतुलन:** इसे अक्सर नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था कहा जाता है क्योंकि यद्यपि विभिन्न अंग अलग-अलग शक्तियों का प्रयोग करते हैं, वे एक-दूसरे पर नजर रखते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी एक अंग के पास असीमित शक्ति न हो। * **उदाहरण:** भारत में, संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है। यदि संसद कोई असंवैधानिक कानून पारित करती है, तो न्यायपालिका के पास उसे रद्द करने की शक्ति है। ### 2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सत्ता की साझेदारी) * **परिभाषा:** सत्ता को सरकार के विभिन्न स्तरों- पूरे देश के लिए एक सामान्य सरकार और प्रातीय या क्षेत्रीय स्तर की सरकारों के बीच साझा किया जा सकता है। * **संघीय विभाजन:** इस व्यवस्था को आमतौर पर संघवाद कहा जाता है। संविधान स्पष्ट रूप से सरकार के प्रत्येक स्तर की शक्तियों को निर्धारित करता है। * **उदाहरण:** भारत में, हमारे पास राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार, क्षेत्रीय स्तर पर राज्य सरकारें और जमीनी स्तर पर स्थानीय सरकारें (पंचायतें और नगर पालिकाएं) हैं। ### 3. विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी * **परिभाषा:** सत्ता विभिन्न सामाजिक समूहों, जैसे धार्मिक और भाषाई समूहों के बीच भी साझा की जा सकती है। * **अल्पसंख्यकों की सुरक्षा:** इस व्यवस्था का उपयोग विभिन्न सामाजिक समूहों को सरकार और प्रशासन में जगह देने के लिए किया जाता है जो अन्यथा सरकार से खुद को अलग-थलग महसूस कर सकते हैं। * **उदाहरण:** बेल्जियम में 'सामुदायिक सरकार' इसका एक अच्छा उदाहरण है जहाँ एक ही भाषा समुदाय - डच, फ्रेंच और जर्मन - के लोग इस सरकार का चुनाव करते हैं। ### 4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच सत्ता की साझेदारी * **परिभाषा:** लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक खंडों का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा के अधीन होनी चाहिए। * **गठबंधन सरकारें:** जब किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है, तो दो या दो से अधिक दल सरकार बनाने के लिए गठबंधन करते हैं। * **उदाहरण:** भारत में गठबंधन सरकारें और हड़तालों या आंदोलनों के माध्यम से सरकारी नीतियों को प्रभावित करने वाले हित समूह। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी विभिन्न रूप लेती है, जो समावेशिता, सत्तावाद पर नियंत्रण और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करती है।
Q7. लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी क्यों वांछित है? इसके दो मुख्य कारण लिखिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nसत्ता की साझेदारी सरकार के विभिन्न अंगों, स्तरों या सामाजिक समूहों के बीच शक्ति का वितरण है। एक आधुनिक लोकतंत्र में, राजनीतिक व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए सत्ता की साझेदारी को आवश्यक और वांछित माना जाता है। मुख्य रूप से दो प्रकार के कारण हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि सत्ता की साझेदारी क्यों आवश्यक है: ### 1. युक्तिपरक (प्रूडेंशियल) कारण (व्यावहारिक और आर्थिक लाभ) * **संघर्षों में कमी:** युक्तिपरक कारण लाभ और हानि के विवेकपूर्ण हिसाब-किताब पर आधारित होते हैं। सत्ता की चश्मे से देखने पर, यह विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच हिंसक संघर्ष की संभावना को कम करने में मदद करती है। चूंकि सामाजिक संघर्ष अक्सर राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा की ओर ले जाते हैं, इसलिए राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सत्ता की साझेदारी एक अच्छा तरीका है। * **राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करना:** अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा को थोपना अल्पकालिक रूप से आकर्षक विकल्प लग सकता है, लेकिन लंबे समय में यह देश की एकता को कमजोर करता है। बहुसंख्यक की तानाशाही केवल अल्पसंख्यकों के लिए दमनकारी नहीं होती, बल्कि यह बहुसंख्यक के लिए भी सर्वनाश का कारण बन सकती है। * **व्यावहारिक उपयोगिता:** युक्तिपरक दृष्टिकोण से, सत्ता की साझेदारी ऐसे परिणाम देती है जो व्यावहारिक रूप से लाभकारी होते हैं और एक ही राष्ट्र-राज्य के भीतर रहने वाले विभिन्न समुदायों के बीच घर्षण को कम करते हैं। ### 2. नैतिक कारण (लोकतांत्रिक सिद्धांत) * **लोकतंत्र की सच्ची आत्मा:** नैतिक कारण लोकतांत्रिक शासन की प्रकृति पर जोर देते हैं। एक लोकतांत्रिक सरकार वह होती है जहाँ नागरिक अपनी भागीदारी के माध्यम से शासन व्यवस्था में हिस्सेदार बनते हैं। * **वैध सरकार:** एक वैध सरकार वह है जिसमें नागरिकों को भागीदारी के माध्यम से निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। इसलिए, एक लोकतांत्रिक सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ता की साझेदारी के माध्यम से नागरिकों को शामिल करे ताकि वे अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें और प्रतिनिधित्व महसूस कर सकें। * **सत्ता का विकेंद्रीकरण:** प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि जिस तरह से उस पर शासन किया जा रहा है, उसमें उससे परामर्श किया जाए। एक नैतिक रूप से सुदृढ़ समाज विविधता का सम्मान करता है और विभिन्न समूहों को संस्थागत तंत्र के माध्यम से समायोजित करता है। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, जहाँ युक्तिपरक कारण इस बात पर जोर देते हैं कि सत्ता की साझेदारी संघर्षों से बचकर बेहतर परिणाम लाती है, वहीं नैतिक कारण सत्ता की साझेदारी के कृत्य को अपने आप में मूल्यवान बताते हैं।
Q8. आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी के विभिन्न रूप क्या हैं? प्रत्येक रूप को उपयुक्त उदाहरणों के साथ समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nसमकालीन लोकतंत्रों में, सत्ता की साझेदारी की व्यवस्थाओं ने विभिन्न रूप ले लिए हैं। पहले, यह माना जाता था कि सरकार की सारी शक्ति एक ही व्यक्ति या एक ही स्थान पर स्थित व्यक्तियों के समूह में निहित होनी चाहिए। हालाँकि, लोकतांत्रिक आदर्शों के उद्भव के साथ, अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने और सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने के लिए सत्ता की साझेदारी बहुआयामी हो गई है। ### 1. सत्ता का क्षैतिज वितरण - **परिभाषा:** सरकार के विभिन्न अंगों, जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता साझा की जाती है। - **नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली:** इस प्रणाली में, किसी भी अंग के पास असीमित शक्ति नहीं होती है। प्रत्येक अंग दूसरों की जाँच करता है, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न संस्थानों के बीच शक्ति का संतुलन बनता है। - **उदाहरण:** भारत में, संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है। यदि न्यायपालिका को लगता है कि संसद द्वारा पारित कोई कानून संविधान का उल्लंघन करता है, तो वह उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है। ### 2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (संघीय विभाजन) - **परिभाषा:** सत्ता को विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच साझा किया जा सकता है—पूरे देश के लिए एक सामान्य सरकार और प्रांतीय या क्षेत्रीय स्तर पर सरकारें। - **संघीय सरकार:** ऐसी सरकार में शासन के स्तर शामिल होते हैं जहाँ अधिकार उच्च स्तर से निचले स्तर की ओर प्रवाहित होते हैं। - **उदाहरण:** भारत में, हमारे पास राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार, क्षेत्रीय स्तर पर राज्य सरकारें और जमीनी स्तर पर स्थानीय सरकारें (पंचायतें और नगरपालिकाएं) हैं। ### 3. सामाजिक समूहों के बीच सत्ता की साझेदारी - **परिभाषा:** धार्मिक और भाषाई समूहों जैसे विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच भी सत्ता साझा की जा सकती है। - **अल्पसंख्यकों की सुरक्षा:** इस व्यवस्था का उपयोग अल्पसंख्यक समुदायों को सत्ता में उचित हिस्सा देने, उनके अलगाव को रोकने और उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करने के लिए किया जाता है। - **उदाहरण:** बेल्जियम में 'सामुदायिक सरकार' एक भाषा समुदाय के लोगों द्वारा चुनी जाती है। इसी तरह, भारत में, विधानसभाओं और संसद में 'आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों' की प्रणाली कमजोर वर्गों और जनजातियों के लिए सामाजिक विविधता प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। ### 4. राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच सत्ता की साझेदारी - **परिभाषा:** सत्ता की साझेदारी विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा और गठबंधन का रूप भी लेती है। - **गठबंधन सरकारें:** जब किसी एक दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो दो या दो से अधिक दल सत्ता साझा करने के लिए गठबंधन सरकार बनाते हैं। - **दबाव समूह:** हित समूह, व्यवसायी, उद्योगपति, किसान और श्रमिक संघ भी सरकारी समितियों के माध्यम से या निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को प्रभावित करके सत्ता साझा करते हैं। - **उदाहरण:** भारत में विभिन्न समय पर गठबंधन सरकारें, और कृषि कानूनों पर किसान संघों द्वारा डाला गया प्रभाव। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, आधुनिक लोकतंत्र यह सुनिश्चित करने के लिए सत्ता साझा करने के कई स्तरों—क्षैतिज, ऊर्ध्वाधर, सामाजिक और राजनीतिक—पर अत्यधिक निर्भर करते हैं कि शासन समावेशी हो, अधिनायकवाद के खिलाफ जांच बनाए रखी जाए और लोकतंत्र जीवंत तथा स्थिर बना रहे।
Q9. बेल्जियम और श्रीलंका में सत्ता की साझेदारी की व्यवस्था की तुलना कीजिए। दोनों देशों ने जातीय विविधता से निपटने के तरीकों में मुख्य अंतरों को उजागर कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nबेल्जियम और श्रीलंका दो ऐसे लोकतांत्रिक देश हैं जिन्हें तीव्र जातीय विविधता और सत्ता की साझेदारी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालाँकि, जातीय संघर्षों को हल करने के लिए उनके राजनीतिक दृष्टिकोण और संवैधानिक रास्ते काफी अलग थे, जिसके कारण राष्ट्रीय एकता और शांति में विपरीत परिणाम आए। ### बेल्जियम की जातीय बनावट - **जटिल जनसांख्यिकी:** बेल्जियम एक छोटा सा यूरोपीय देश है जिसकी जातीय बनावट जटिल है। - **क्षेत्रीय भाषाई विभाजन:** लगभग 59 प्रतिशत आबादी फ्लेमिश क्षेत्र में रहती है और डच बोलती है। अन्य 40 प्रतिशत वालोनिया क्षेत्र में रहती है और फ्रेंच बोलती है। शेष 1 प्रतिशत जर्मन बोलते हैं। - **राजधानी का अंतर:** राजधानी शहर ब्रुसेल्स में 80 प्रतिशत लोग फ्रेंच बोलते हैं जबकि 20 प्रतिशत डच भाषी हैं। ### बेल्जियम का सत्ता की साझेदारी का मॉडल - **संवैधानिक संशोधन:** 1970 और 1993 के बीच, बेल्जियम के संविधान में चार बार संशोधन किया गया ताकि सभी लोग एक ही देश के भीतर एक साथ रह सकें। - **समान मंत्री:** केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान थी। - **सामुदायिक सरकार:** सामुदायिक सरकार नामक एक तीसरे प्रकार की सरकार की शुरुआत की गई, जिसे एक भाषा समुदाय—डच, फ्रेंच और जर्मन—के लोगों द्वारा चुना गया, चाहे वे कहीं भी रहते हों। इस सरकार के पास सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा से संबंधित मुद्दों पर शक्ति थी। - **परिणाम:** इस अभिनव मॉडल ने सफलतापूर्वक गृहयुद्ध को रोका और समुदायों के बीच आपसी विश्वास को बनाए रखा। ### श्रीलंका की जातीय बनावट - **सिंहली बहुमत:** श्रीलंका लगभग दो करोड़ की आबादी वाला एक द्वीपीय राष्ट्र है। प्रमुख सामाजिक समूह सिंहली भाषी (74 प्रतिशत) है। - **तमिल अल्पसंख्यक:** तमिल 18 प्रतिशत हैं, जो श्रीलंकाई तमिलों (13 प्रतिशत) और भारतीय तमिलों (5 प्रतिशत) में विभाजित हैं। - **धार्मिक विभाजन:** अधिकांश सिंहली भाषी लोग बौद्ध हैं, जबकि अधिकांश तमिल हिंदू या मुस्लिम हैं। ईसाई लगभग 7 प्रतिशत हैं। - **श्रीलंका का बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण** - **बहुसंख्यकवाद:** श्रीलंका 1948 में एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरा। लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों ने सिंहली सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए बहुसंख्यकवादी उपायों की एक श्रृंखला अपनाई। - **भेदभावपूर्ण कानून:** 1956 में, तमिल की उपेक्षा करते हुए सिंहली को एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता देने वाला एक अधिनियम पारित किया गया। सिंहली आवेदकों के लिए विश्वविद्यालय के पदों और सरकारी नौकरियों के लिए प्राथमिकता वाली नीतियों का पक्ष लिया गया। - **परिणाम:** इस अलगाव ने श्रीलंकाई तमिलों के बीच कड़वी नाराजगी पैदा की, जिससे उग्रवादी समूहों का गठन हुआ, एक स्वतंत्र तमिल ईलम की मांग उठी और अंततः दशकों तक चलने वाला एक विनाशकारी गृहयुद्ध हुआ। ### निष्कर्ष\nजबकि बेल्जियम ने एक जटिल सत्ता-साझाकरण व्यवस्था के माध्यम से क्षेत्रीय और भाषाई विविधता को पहचानने और उसका सम्मान करने का समावेशी रास्ता चुना, वहीं श्रीलंका ने बहुसंख्यकवादी नीतियों का पालन किया जिससे अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन हुआ, और इसके परिणामस्वरूप अंततः संघर्ष और सद्भाव में अंतर स्पष्ट हुआ।
Q10. लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी क्यों वांछित है? इसके कारण समझाइए और विवेकपूर्ण तथा नैतिक दोनों कारण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### परिचय\nसत्ता की साझेदारी सरकार के विभिन्न अंगों, स्तरों या सामाजिक समूहों के बीच सत्ता का वितरण है। एक आधुनिक लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी को आवश्यक माना जाता है और इसे दो प्रमुख कारणों से उचित ठहराया जाता है: विवेकपूर्ण कारण और नैतिक कारण। ### सत्ता की साझेदारी के विवेकपूर्ण कारण\nविवेकपूर्ण कारण सावधानी, लाभ और हानि की गणना तथा व्यावहारिक परिणामों पर आधारित होते हैं। - **संघर्ष में कमी:** सत्ता की साझेदारी विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष की संभावना को कम करने में मदद करती है। चूंकि सामाजिक संघर्ष अक्सर हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनता है, इसलिए राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सत्ता की साझेदारी एक अच्छा तरीका है। - **राजनीतिक स्थिरता:** अल्पसंख्यक समूहों पर बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा थोपना अल्पकालिक लग सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह राष्ट्र की एकता को कमजोर करता है। बहुसंख्यक की तानाशाही केवल अल्पसंख्यक के लिए दमनकारी नहीं है, बल्कि यह अक्सर बहुसंख्यक के लिए भी बर्बादी लाती है। - **विविधता का समायोजन:** विवेकपूर्ण तर्क इस बात पर जोर देते हैं कि सत्ता की साझेदारी विविध हितों को समायोजित करके, सामाजिक विखंडन को रोककर और सुचारू शासन सुनिश्चित करके बेहतर परिणाम देती है। ### सत्ता की साझेदारी के नैतिक कारण\nनैतिक कारण लोकतंत्र की प्रकृति और लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर देते हैं। - **लोकतंत्र की आत्मा:** सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र की वास्तविक आत्मा है। एक लोकतांत्रिक शासन में उन लोगों के साथ सत्ता साझा करना शामिल है जो इसके प्रयोग से प्रभावित होते हैं और जिन्हें इसके प्रभावों के साथ जीना पड़ता है। - **परामर्श का अधिकार:** लोगों को इस बात पर परामर्श दिए जाने का अधिकार है कि उन पर शासन कैसे किया जाए। एक वैध सरकार वह है जहाँ नागरिक भागीदारी के माध्यम से व्यवस्था में हिस्सेदारी हासिल करते हैं। - **सत्ता का विकेंद्रीकरण:** नैतिक तर्क यह तय करते हैं कि सच्चा लोकतंत्र तभी मौजूद होता है जब विकेंद्रीकृत संस्थानों और सहभागी तंत्रों के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को आवाज दी जाती है। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, जबकि विवेकपूर्ण कारण इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि सत्ता की साझेदारी मूल्यवान है क्योंकि यह संघर्षों को कम करके बेहतर और स्थिर राजनीतिक परिणाम लाने में मदद करती है, वहीं नैतिक कारण इस बात पर जोर देते हैं कि सत्ता की साझेदारी स्वाभाविक रूप से मूल्यवान है क्योंकि यह नागरिक भागीदारी और समानता के मुख्य लोकतांत्रिक सिद्धांत को बनाए रखती है।
Q11. बेल्जियम और श्रीलंका के सत्ता की साझेदारी के अनुभवों से हमें क्या सबक मिलते हैं? 3 Marks
उत्तर (Answer): बेल्जियम और श्रीलंका के सत्ता की साझेदारी के अनुभवों की तुलना दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए महत्वपूर्ण सबक देती है। बेल्जियम यह दर्शाता है कि देश की एकता केवल विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों की भावनाओं और हितों का सम्मान करके ही संभव है। इस तरह की अनुभूति के परिणामस्वरूप सत्ता साझा करने के लिए परस्पर स्वीकार्य व्यवस्थाएं बनीं, जिन्होंने देश की अखंडता को सफलतापूर्वक संरक्षित किया और नागरिक अशांति को रोका। दूसरी ओर, श्रीलंका का अनुभव यह दर्शाता है कि यदि कोई बहुसंख्यक समुदाय दूसरों पर अपना वर्चस्व थोपने की कोशिश करता है और सत्ता साझा करने से इनकार करता है, तो यह देश की एकता और संप्रभुता को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है, जिससे हिंसक जातीय संघर्ष, आर्थिक व्यवधान और लंबे समय तक गृहयुद्ध हो सकता है। इसलिए, सत्ता की साझेदारी केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं है, बल्कि बहु-जातीय समाजों में शांति, लोकतंत्र, आपसी सम्मान और राष्ट्रीय एकता बनाए रखती है।
Q12. बेल्जयमी नेताओं ने संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से अपनी जातीय समस्या का सफलतापूर्वक समाधान कैसे किया? 3 Marks
उत्तर (Answer): बेल्जयमी नेताओं ने क्षेत्रीय अंतरों और सांस्कृतिक विविधताओं के अस्तित्व को पहचाना और एक अभिनव व्यवस्था तैयार करने के लिए 1970 से 1993 के बीच अपने संविधान में चार बार संशोधन किया। पहला, संविधान में यह निर्धारित किया गया कि केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान होगी, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि कोई भी एक समुदाय अकेले निर्णय नहीं ले सकता। दूसरा, केंद्र सरकार की कई शक्तियाँ दोनों क्षेत्रों की राज्य सरकारों को दी गईं, जिससे राज्य सरकारें केंद्र सरकार के अधीन नहीं रहीं। तीसरा, ब्रुसेल्स में एक अलग सरकार थी जिसमें दोनों समुदायों को समान प्रतिनिधित्व मिला। चौथा, केंद्र और राज्य सरकार के अलावा, 'सामुदायिक सरकार' नामक एक तीसरी प्रकार की सरकार है जो एक भाषा समुदाय-डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी-से संबंधित लोगों द्वारा चुनी जाती है, चाहे वे कहीं भी रहें। इस सरकार के पास सांस्कृतिक, शैक्षिक और भाषा से संबंधित मुद्दों पर शक्ति है, जिसने सफलतापूर्वक गृहयुद्ध को रोका और देश को एकजुट रखा।
Q13. सत्ता की साझेदारी के विवेकपूर्ण और नैतिक कारण क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए। 3 Marks
उत्तर (Answer): सत्ता की साझेदारी का बचाव अक्सर दो तरह के कारणों से किया जाता है: विवेकपूर्ण और नैतिक। विवेकपूर्ण कारण इस बात पर जोर देते हैं कि सामाजिक समूहों के बीच संघर्ष की संभावना को कम करके सत्ता की साझेदारी बेहतर परिणाम लाएगी। चूंकि सामाजिक संघर्ष अक्सर हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का कारण बनता है, इसलिए राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सत्ता की साझेदारी एक अच्छा तरीका है। उदाहरण के लिए, एक संतुलित संविधान के माध्यम से बेल्जियम में विभिन्न भाषाई और क्षेत्रीय समूहों को समायोजित करने से संभावित जातीय हिंसा और राष्ट्रीय विघटन को रोका जा सका। दूसरी ओर, नैतिक कारण लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप पर जोर देते हैं। सत्ता की साझेदारी मूल्यवान है क्योंकि यह लोकतंत्र की सच्ची भावना है। एक लोकतांत्रिक शासन में उन लोगों के साथ सत्ता साझा करना शामिल है जो इसके प्रयोग से प्रभावित होते हैं, और जिन्हें इसके प्रभावों के साथ जीना पड़ता है। लोगों को इस बात पर परामर्श दिए जाने का अधिकार है कि उन पर कैसे शासन किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, विधानसभाओं में आरक्षित सीटों के माध्यम से हाशिए के समुदायों को प्रतिनिधित्व देना नैतिक रूप से सुदृढ़ और समावेशी सहभागी लोकतंत्र सुनिश्चित करता है।
Q14. आधुनिक लोकतंत्रों में सत्ता की साझेदारी के चार मुख्य रूपों की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): आधुनिक लोकतंत्रों में, सत्ता की साझेदारी की व्यवस्था कई रूप ले सकती है। पहला रूप सत्ता का क्षैतिज वितरण है, जहाँ सरकार के विभिन्न अंगों जैसे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता साझा की जाती है। यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी अंग असीमित शक्ति का उपयोग न कर सके, जिससे नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली स्थापित होती है। दूसरा रूप सत्ता का संघीय विभाजन है, जहाँ सत्ता को विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच साझा किया जाता है, जैसे पूरे देश के लिए एक सामान्य सरकार और प्रातीय या क्षेत्रीय स्तरों पर सरकारें। तीसरे रूप में विभिन्न सामाजिक समूहों, जैसे भाषाई और धार्मिक समूहों के बीच सत्ता साझा करना शामिल है, जिसका उदाहरण बेल्जियम में सामुदायिक सरकार या भारत में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र हैं। चौथा रूप राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और आंदोलनों के बीच सत्ता की साझेदारी है, जो गठबंधन, प्रतिस्पर्धा और सक्रिय सार्वजनिक भागीदारी के माध्यम से सत्ता में बैठे लोगों को नियंत्रित या प्रभावित करते हैं।
Q15. 1948 में स्वतंत्रता के बाद श्रीलंकाई सरकार द्वारा अपनाए गए प्रमुख बहुसंख्यकवादी उपायों का वर्णन कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): 1948 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, सिंहली समुदाय के नेताओं ने अपने बहुमत के बल पर सरकार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया। परिणाम स्वरूप, लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार ने सिंहली सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए कई बहुसंख्यकवादी उपाय अपनाए। 1956 में, एक अधिनियम पारित किया गया जिसके तहत सिंहली को एकमात्र आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई, और इस प्रकार तमिल की पूरी तरह से उपेक्षा की गई। सरकार ने ऐसी पक्षपातपूर्ण नीतियां अपनाईं जिन्होंने विश्वविद्यालय के पदों और सरकारी नौकरियों के लिए सिंहली आवेदकों को प्राथमिकता दी। एक नए संविधान में यह प्रावधान किया गया कि राज्य बौद्ध धर्म की रक्षा और पोषण करेगा। सरकार के इन सभी उपायों ने, एक के बाद एक आने के कारण, श्रीलंकाई तमिलों के बीच अलगाव की भावना को धीरे-धीरे बढ़ा दिया। उन्हें महसूस हुआ कि बौद्ध सिंहली नेताओं के नेतृत्व में कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल उनकी भाषा और संस्कृति के प्रति संवेदनशील नहीं है। उन्हें लगा कि संविधान और सरकारी नीतियों ने उन्हें समान राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर दिया है, नौकरियों और अन्य अवसरों को प्राप्त करने में उनके साथ भेदभाव किया है, और उनके हितों की उपेक्षा की गई है। परिणामस्वरूप, सिंहली और तमिल समुदायों के बीच संबंध समय के साथ तनावपूर्ण हो गए और अंततः एक व्यापक गृहयुद्ध में बदल गए।