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सूरदास के पद

Subject: हिंदी | Class: Class 10 | Syllabus Year:
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
क्षितिज कविता : पद (सूरदास)

#### परिचय

सूरदास जी एक महान भक्त कवि थे, जिन्होंने कृष्ण की भक्ति में कई पद लिखे। उनकी कविताओं में भक्ति और प्रेम की भावना को दर्शाया गया है।


#### कवि की विशेषता

सूरदास जी की कविताओं की विशेषता है:


#### महत्वपूर्ण पद

सूरदास जी के कुछ महत्वपूर्ण पद हैं:


#### भक्ति के संदेश

सूरदास जी की कविताओं में भक्ति के संदेश हैं:


#### सूरदास जी की भाषा शैली

सूरदास जी की भाषा शैली में:


#### निष्कर्ष

सूरदास जी की कविताएं भक्ति और प्रेम की भावना से भरी हुई हैं। उनकी कविताओं में कृष्ण की महानता का वर्णन किया गया है। सूरदास जी की भाषा शैली सरल और स्पष्ट है, जो पाठकों को आकर्षित करती है।

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 सूरदास के पद (कक्षा 10 - क्षितिज)
Overview
कवि परिचय (सूरदास) काल: भक्तिकाल (कृष्णभक्ति शाखा) प्रमुख रस: वात्सल्य एवं श्रृंगार रस के सम्राट प्रमुख ग्रंथ: सूरसागर (भ्रमरगीत से पद उद्धृत) भाषा: ब्रजभाषा पद 1: 'ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी' (भाग्यहीनता पर व्यंग्य) मुख्य भाव: गोपियों द्वारा उद्धव पर तीखा व्यंग्य प्रमुख उदाहरण: जल में रहकर भी सूखा रहने वाला 'कमल का पत्ता' जल में डूबने पर भी जल से अछूती 'तेल की गागर' गोपियों का प्रेम: प्रेम-नदी में पैर न डुबोने की बात गुड़ से चिपटी चींटियों जैसी अनन्य भक्ति पद 2: 'मन की मन ही माँझ रही' (विरह की व्यथा) मुख्य भाव: मन की इच्छाएँ मन में ही रह जाना गोपियों की वेदना: कृष्ण के लौटने की आशा समाप्त होना उद्धव के योग-संदेश से विरह की अग्नि भड़कना शिकायत (उपालंभ): कृष्ण ने 'प्रेम की मर्यादा' (लोक-मर्यादा) तोड़ दी पद 3: 'हमारे हरि हारिल की लकरी' (एकनिष्ठ प्रेम) कृष्ण के प्रति समर्पण: कृष्ण गोपियों के लिए हारिल पक्षी की लकड़ी के समान (दृढ़ सहारा) मन, क्रम और वचन से कृष्ण को हृदय में बसाना योग-संदेश का विरोध: योग-साधना को 'कड़वी ककड़ी' के समान बताना योग को एक 'अपरिचित बीमारी' (व्याधि) कहना योग की उपयोगिता: योग संदेश केवल चंचल मन वाले लोगों के लिए उपयुक्त पद 4: 'हरि हैं राजनीति पढ़ि आए' (राजधर्म का ज्ञान) मुख्य भाव: कृष्ण के कपटपूर्ण व्यवहार पर व्यंग्य गोपियों का तर्क: कृष्ण ने अब राजनीति सीख ली है (अधिक चालाक होना) दूसरों को अनीति से छुड़ाने वाले खुद अनीति कर रहे हैं सच्चा राजधर्म: प्रजा को न सताना प्रजा के सुख-दुख का ध्यान रखना काव्यगत विशेषताएँ (काव्य सौंदर्य) भाषा: मधुर एवं सरस ब्रजभाषा शैली: गेय पद शैली और व्यंग्यात्मकता (भ्रमरगीत परंपरा) प्रधान रस: वियोग श्रृंगार रस अलंकार: अनुप्रास, रूपक, उपमा और दृष्टांत अलंकार
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. सूरदास के पदों के आधार पर गोपियों के विरह-ताप और उनकी कृष्ण-भक्ति की विशेषताएँ लिखिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): सूरदास के पदों के आधार पर गोपियों के विरह-ताप और कृष्ण-भक्ति की कई प्रमुख विशेषताएँ प्रकट होती हैं। प्रथम, उनकी भक्ति एकनिष्ठ और अनन्य है; वे श्री कृष्ण के अलावा किसी अन्य निर्गुण ईश्वर या योग-साधना को स्वीकार नहीं करतीं। उनका प्रेम चींटियों के गुड़ से चिपकने जैसा गहरा और अभिन्न है। द्वितीय, उनका विरह-ताप अत्यंत तीव्र है। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर वे रात-दिन उनके लौटने की आस में समय बिता रही हैं और उनके बिना पल-पल तड़प रही हैं। तृतीय, गोपियों का प्रेम निश्छल और भावुक है, जहाँ तर्क और शुष्क ज्ञान का कोई स्थान नहीं है। वे उद्धव के योग-संदेश को कड़वी ककड़ी मानकर खारिज कर देती हैं और सिद्ध करती हैं कि सच्ची भक्ति के आगे सारा ज्ञान व्यर्थ है।
Q2. "हरि हैं राजनीति पढ़ि आये" - गोपियों के इस कथन के पीछे क्या व्यंग्य और सच्चाई छिपी है? 3 Marks
उत्तर (Answer): "हरि हैं राजनीति पढ़ि आये" कथन के माध्यम से गोपियों ने श्री कृष्ण पर बहुत बड़ा राजनीतिक कटाक्ष किया है। गोपियों का मानना है कि मथुरा जाने के बाद कृष्ण अब पहले जैसे छल-कपट रहित और सीधे-सादे नहीं रहे, बल्कि वे राजनीतिशास्त्र के निपुण कूटनीतिज्ञ बन गए हैं। राजनीतिज्ञों की तरह वे भी चालबाज़ियाँ करने लगे हैं और वादे करके उन्हें तोड़ रहे हैं। कृष्ण जानते थे कि गोपियाँ उनके विरह में व्याकुल हैं, फिर भी स्वयं न आकर उन्होंने उद्धव को योग-संदेश देकर भेज दिया ताकि गोपियाँ उन्हें भूल जाएँ। गोपियों के अनुसार, कृष्ण का यह व्यवहार एक चतुर राजनीतिज्ञ जैसा है, जो सीधे सामना करने से बचता है और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करता है।
Q3. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के बल पर ज्ञानी उद्धव को कैसे परास्त कर दिया? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): गोपियों का वाक्चातुर्य (बोलने की कला) अत्यंत अद्भुत और प्रभावशाली है। वे अपने तीखे व्यंग्य, निश्छल प्रेम और व्यावहारिक तर्कों के बल पर ज्ञानी और पंडित उद्धव को पूरी तरह निरुत्तर कर देती हैं। उद्धव को अपने ज्ञान और योग-साधना पर बहुत अहंकार था, किंतु गोपियाँ उनके योग-ज्ञान को 'कड़वी ककड़ी' और 'अज्ञात बीमारी' बताकर उसे अस्वीकार कर देती हैं। वे कहती हैं कि योग का संदेश उन लोगों को दो जिनके मन 'चकरी' की तरह चंचल हैं, हमारा मन तो श्री कृष्ण के प्रेम में स्थिर है। गोपियों की प्रेम-भक्ति के समक्ष उद्धव का शुष्क ज्ञान फीका पड़ जाता है। गोपियों के सहज तर्कों और भावुकता के सामने ज्ञान के ज्ञाता उद्धव लज्जित और निरुत्तर होकर चुपचाप खड़े रह जाते हैं।
Q4. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए? वे कृष्ण को राजधर्म की याद क्यों दिलाती हैं? 3 Marks
उत्तर (Answer): गोपियों के अनुसार राजा का परम धर्म (राजधर्म) यह होता है कि वह अपनी प्रजा की रक्षा करे, उनके सुख-दुख का ध्यान रखे और प्रजा को किसी भी प्रकार का कष्ट न पहुँचने दे। एक सच्चे राजा का कर्तव्य प्रजा पर अत्याचार करना नहीं, बल्कि उन्हें अन्याय और दुखों से मुक्त कराना होता है। गोपियाँ श्री कृष्ण को राजधर्म की याद इसलिए दिलाती हैं क्योंकि मथुरा जाकर और राजा बनने के बाद कृष्ण अपने वादे से मुकर गए हैं। उन्होंने स्वयं आने के स्थान पर उद्धव के हाथों योग का संदेश भेजकर गोपियों के विरह-ताप को और अधिक बढ़ा दिया है। गोपियाँ मानती हैं कि कृष्ण का यह आचरण प्रजा को सताने जैसा है, जो एक न्यायप्रिय राजा को शोभा नहीं देता।
Q5. 'हारिल की लकड़ी' से गोपियों का क्या तात्पर्य है? वे इसके माध्यम से अपने प्रेम को कैसे व्यक्त करती हैं? 3 Marks
उत्तर (Answer): 'हारिल की लकड़ी' से गोपियों का तात्पर्य अपने एकनिष्ठ, दृढ़ और अनन्य प्रेम से है। हारिल एक ऐसा पक्षी होता है जो अपने पंजों में हमेशा एक लकड़ी दबाए रहता है और किसी भी परिस्थिति में उसे छोड़ता नहीं है। वह लकड़ी ही उसके जीवन का एकमात्र सहारा होती है। गोपियाँ स्वयं की तुलना हारिल पक्षी से और श्री कृष्ण की तुलना उस लकड़ी से करती हैं। वे उद्धव से कहती हैं कि उन्होंने मन, क्रम (कर्म) और वचन से नन्द-नन्दन (श्री कृष्ण) को अपने हृदय में कसकर थाम लिया है। सोते, जागते, सपने में, दिन और रात—उनका मन केवल 'काह्न-काह्न' (कृष्ण-कृष्ण) की रट लगाता रहता है। इस प्रतीक के माध्यम से गोपियों ने दर्शाया है कि कृष्ण ही उनके अस्तित्व का एकमात्र आधार हैं।
Q6. गोपियों ने उद्धव के योग-संदेश की तुलना किन-किन उदाहरणों से की है और क्यों? 3 Marks
उत्तर (Answer): गोपियों ने उद्धव के योग-संदेश की तुलना दो प्रमुख और प्रभावशाली उदाहरणों से की है। पहला, उन्होंने योग के संदेश को 'कड़वी ककड़ी' के समान बताया है। जिस प्रकार कड़वी ककड़ी को मुँह में रखते ही थूकने का मन करता है और वह गले से नीचे नहीं उतरती, उसी प्रकार योग का नीरस संदेश गोपियों के लिए सर्वथा अग्राह्य और स्वादहीन है। दूसरा, उन्होंने योग-साधना की तुलना एक ऐसी 'व्याधि' यानी रोग से की है, जिसके बारे में उन्होंने न कभी पहले सुना था, न देखा था और न ही कभी भोगा था। गोपियों के अनुसार, श्री कृष्ण के सगुण प्रेम रस में डूबे हुए मन के लिए निर्गुण ब्रह्म का योग-संदेश अत्यंत कष्टदायक, व्यर्थ और अरुचिकर है, जिसे स्वीकार करना उनके लिए बिल्कुल असंभव है।
Q7. गोपियों द्वारा उद्धव को 'बड़भागी' कहने में क्या व्यंग्य निहित है? 3 Marks
उत्तर (Answer): गोपियों द्वारा उद्धव को 'बड़भागी' कहने में अत्यंत तीव्र व्यंग्य छिपा हुआ है। देखने में तो यह प्रशंसा प्रतीत होती है, परंतु वास्तव में गोपियाँ उद्धव पर कटाक्ष कर रही हैं कि वे अत्यंत दुर्भाग्यशाली हैं। उद्धव श्री कृष्ण के अत्यंत निकट रहते हुए भी उनके प्रेम-पाश से पूरी तरह अछूते और अनासक्त हैं। गोपियाँ उनकी तुलना कमल के उस पत्ते से करती हैं जो जल में रहकर भी गीला नहीं होता, और तेल से भरी उस गागर से करती हैं जिस पर जल की एक बूँद भी नहीं ठहरती। गोपियों के अनुसार, जो व्यक्ति प्रेम के रस और आनंद की अनुभूति से वंचित है, उससे बढ़कर अभागा कोई नहीं हो सकता। अतः 'बड़भागी' शब्द के आवरण में गोपियाँ वास्तव में उद्धव के हृदयहीन, नीरस और दुर्भाग्यपूर्ण जीवन का उपहास उड़ा रही हैं।
Q8. सूरदास के 'भ्रमरगीत' में 'भ्रमर' (भंवरे) का क्या प्रतीकात्मक महत्व है? 3 Marks
उत्तर (Answer): सूरदास के 'भ्रमरगीत' में 'भ्रमर' (भंवरे) का अत्यधिक प्रतीकात्मक और साहित्यिक महत्व है। जब उद्धव गोपियों को योग का नीरस संदेश देने आते हैं, उसी समय वहाँ एक काला भंवरा उड़ता हुआ आ जाता है। गोपियाँ उस भंवरे को माध्यम बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से उद्धव और श्री कृष्ण पर अपने ताने, व्यंग्य और उलाहने बरसाती हैं। भारतीय संस्कृति में अतिथि को सीधे-सीधे कटु शब्द कहना अनुचित माना जाता है, इसलिए गोपियों ने भंवरे के बहाने अपने मन के गुबार और विरह की पीड़ा को खुलकर व्यक्त किया। प्रतीकात्मक रूप से, काला और चंचल भंवरा उद्धव तथा श्री कृष्ण दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। जिस प्रकार भंवरा एक फूल पर नहीं टिकता और रस लेकर दूसरे फूल पर चला जाता है, उसी प्रकार श्री कृष्ण भी गोपियों को छोड़कर मथुरा चले गए। इस प्रकार भ्रमर व्यंग्य, अनन्य भक्ति और विरह-वेदना को प्रकट करने का एक सशक्त काव्य प्रतीक है।
Q9. गोपियों ने उद्धव के योग संदेश को 'करुई ककड़ी' के समान क्यों बताया है? उनके तर्क की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): तीसरे पद में गोपियों ने उद्धव द्वारा दिए गए योग के उपदेश की तुलना 'करुई ककड़ी' (कड़वी ककड़ी) से की है। जिस प्रकार कड़वी ककड़ी को मुँह में रखते ही उसका स्वाद इतना अरुचिकर और ख़राब लगता है कि मनुष्य उसे तुरंत थूक देता है और निगल नहीं पाता, उसी प्रकार गोपियों को उद्धव का योग संदेश अत्यंत नीरस, अनपेक्षित और कष्टदायक लगता है। गोपियों के लिए श्री कृष्ण का सगुण प्रेम और भक्ति अमृत के समान मधुर है, जबकि उद्धव का ज्ञान और निर्गुण योग संदेश कड़वा और त्याज्य प्रतीत होता है। गोपियाँ मानती हैं कि योग का संदेश उनके मन के अनुकूल नहीं है। वे इसे एक ऐसा मानसिक रोग मानती हैं जिसे उन्होंने न कभी देखा, न सुना और न ही भोगा है। इसलिए वे उद्धव से कहती हैं कि वे इस योग रूपी कड़वी ककड़ी को उन लोगों को सौंप दें जिनका मन चंचल और अस्थिर है।
Q10. उद्धव के अनासक्त व्यवहार को दर्शाने के लिए गोपियों द्वारा दिए गए दो दृष्टांतों—कमल का पत्ता और तेल की गागर—की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): गोपियाँ उद्धव के निष्काम, अनभिज्ञ और प्रेमहीन स्वभाव को स्पष्ट करने के लिए प्रथम पद में दो सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। पहला उदाहरण 'पात पूरीन' (कमल के पत्ते) का है; जिस प्रकार कमल का पत्ता सदैव जल के भीतर ही रहता है, परंतु जल का एक भी प्रभाव या धब्बा उस पर नहीं ठहरता और वह सूखा ही रहता है। दूसरा उदाहरण 'तेल की गागर' का है; यदि तेल से भरी हुई गागर को पानी में डुबोया जाए, तो उस पर जल की एक भी बूंद नहीं टिकती। इन दोनों दृष्टांतों के माध्यम से गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करती हैं कि वे प्रेम के सागर श्री कृष्ण के अत्यंत निकट रहने के बावजूद उनके प्रेम-रूपी जल से पूरी तरह अछूते और अप्रभावित रहे हैं। उनके हृदय में कृष्ण के प्रति अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ, जो उनकी भावनाहीनता को दर्शाता है।
Q11. चौथे पद में गोपियाँ श्री कृष्ण के राजनीति सीख लेने पर क्या व्यंग्य करती हैं? 3 Marks
उत्तर (Answer): सूरदास के चौथे पद में गोपियाँ श्री कृष्ण पर राजनीति सीख लेने का तीखा व्यंग्य करती हैं। वे कहती हैं कि श्री कृष्ण तो बचपन से ही बहुत चतुर और बुद्धिमान थे, परंतु अब मथुरा जाकर उन्होंने राजनीति शास्त्र पढ़ लिया है, जिससे उनकी बुद्धि और अधिक सूक्ष्म एवं कूटनीतिक हो गई है। उनकी इसी बढ़ी हुई बुद्धि का ही परिणाम है कि वे गोपियों की विरह-व्यथा को समझने के बजाय उनके लिए उद्धव के हाथों योग का नीरस संदेश भिजवा रहे हैं। गोपियों का मानना है कि राजा बनकर कृष्ण राजनीति की चालें चलने लगे हैं और छल-कपट का सहारा ले रहे हैं। पहले के समय में सज्जन लोग दूसरों की भलाई के लिए दौड़ते फिरते थे, परंतु अब कृष्ण स्वयं दूसरों को अनीति से छुड़ाने के बजाय गोपियों पर ही अनीति कर रहे हैं। इस प्रकार गोपियाँ कृष्ण की राजनीति और कूटनीति पर करारा कटाक्ष करती हैं।
Q12. उद्धव द्वारा लाया गया योग का संदेश गोपियों की विरह-अग्नि में 'आहुति' के समान कैसे सिद्ध हुआ? 3 Marks
उत्तर (Answer): श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद गोपियाँ उनके विरह की अग्नि में निरंतर जल रही थीं। वे इस उम्मीद में अपने दिन बिता रही थीं कि कृष्ण जल्द ही वापस लौटेंगे और उनका विरह समाप्त हो जाएगा। वे केवल कृष्ण के आने की प्रतीक्षा में अपनी विरह-व्यथा को सह रही थीं। परंतु जब उद्धव कृष्ण का प्रेम-संदेश लाने के बजाय उनके पास निर्गुण ब्रह्म और योग का शुष्क संदेश लेकर पहुँचे, तो गोपियों की बची-खुची आस भी टूट गई। योग के संदेश ने उनके हृदय की तड़प को कम करने के बजाय और अधिक बढ़ा दिया। जिस प्रकार यज्ञ की अग्नि में घी डालने से उसकी लपटें और अधिक भड़क उठती हैं, ठीक उसी प्रकार उद्धव के योग-उपदेश ने गोपियों के मन में उठ रही विरह की ज्वाला को शांत करने के स्थान पर उसे कई गुना अधिक तीव्र कर दिया। इसीलिए योग संदेश को विरह रूपी अग्नि में आहुति माना गया है।
Q13. गोपियों के अनुसार राजा का सच्चा 'राजधर्म' क्या होना चाहिए? श्री कृष्ण का वर्तमान व्यवहार इसका उल्लंघन कैसे करता है? 3 Marks
उत्तर (Answer): सूरदास के पद के अनुसार, गोपियों का मानना है कि एक राजा का सच्चा 'राजधर्म' अपनी प्रजा की रक्षा करना, उनके दुखों को दूर करना, उन्हें न्याय दिलाना और किसी भी स्थिति में अपनी प्रजा को सताना नहीं होता है। एक लोककल्याणकारी राजा सदैव प्रजा के सुख और भलाई का ध्यान रखता है। परंतु, गोपियों के अनुसार श्री कृष्ण राजा बनने के पश्चात अपने इस राजधर्म का सही ढंग से पालन नहीं कर रहे हैं। मथुरा जाने के बाद उन्होंने गोपियों को स्वयं दर्शन देने का वादा किया था, किंतु वे स्वयं न आकर उद्धव के हाथों योग का नीरस संदेश भेज देते हैं। गोपियाँ जो उनके विरह की अग्नि में जल रही थीं, उन्हें योग संदेश भेजकर कृष्ण और अधिक कष्ट पहुँचा रहे हैं। इस प्रकार, अपनी ही प्रजा को दुख देकर और उनके विश्वास को तोड़कर श्री कृष्ण राजधर्म के सिद्धांतों का उल्लंघन कर रहे हैं।
Q14. गोपियों ने श्री कृष्ण की तुलना 'हारिल की लकड़ी' से क्यों की है? इस उपमा का क्या महत्व है, स्पष्ट कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): सूरदास के 'पद' में गोपियों ने श्री कृष्ण की तुलना 'हारिल पक्षी की लकड़ी' से अपनी अनन्य और दृढ़ भक्ति को प्रकट करने के लिए की है। हारिल एक ऐसा पक्षी होता है जो अपने पंजों में सदैव एक लकड़ी दबाए रहता है और उसे किसी भी अवस्था में—चाहे वह उड़ रहा हो, बैठा हो या सो रहा हो—नहीं छोड़ता। ठीक उसी प्रकार, गोपियों ने भी अपने मन, क्रम और वचन से श्री कृष्ण रूपी लकड़ी को अपने हृदय में दृढ़तापूर्वक पकड़ रखा है। वे सोते, जागते, सपने में और दिन-रात केवल 'कान्हा-कान्हा' का ही जाप करती रहती हैं। इस उपमा के माध्यम से गोपियाँ उद्धव को यह समझाना चाहती हैं कि उनका प्रेम क्षणिक नहीं बल्कि अत्यंत गहरा और अविचल है। वे किसी भी स्थिति में श्री कृष्ण के प्रेम को त्याग नहीं सकतीं, इसलिए उद्धव का योग संदेश उनके लिए व्यर्थ है।
Q15. सूरदास के पहले पद में गोपियों ने उद्धव को 'बड़भागी' क्यों कहा है? इस कथन के पीछे छिपा व्यंग्य क्या है? 3 Marks
उत्तर (Answer): सूरदास द्वारा रचित 'पद' में गोपियाँ उद्धव को व्यंग्यात्मक रूप से 'बड़भागी' (अर्थात अत्यंत भाग्यशाली) कहती हैं। हालाँकि, इस प्रशंसा के पीछे एक गहरा कटाक्ष छिपा हुआ है। गोपियों का वास्तविक तात्पर्य यह है कि उद्धव वास्तव में अत्यंत अभागी और दुर्भाग्यशाली हैं। वे प्रेम के साक्षात अवतार श्री कृष्ण के निकट रहकर भी उनके प्रेम के धागे से पूरी तरह अछूते रहे हैं। उनके मन में कभी कृष्ण के प्रति अनुराग या प्रेम उत्पन्न नहीं हुआ। जिस प्रकार कमल का पत्ता जल के भीतर रहकर भी जल से अछूता रहता है और तेल लगी गागर को जल में डुबोने पर उस पर पानी की एक भी बूंद नहीं ठहरती, ठीक उसी प्रकार उद्धव भी कृष्ण के सानिध्य में रहकर भी उनके प्रेम-रस से वंचित रहे हैं। अतः गोपियाँ उन्हें भाग्यशाली कहकर वास्तव में उनकी प्रेमहीनता और संवेदनहीनता पर करारा व्यंग्य करती हैं।