मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 10 - क्षितिज (गद्य खंड)
पाठ: लखनवी अंदाज़ (यशपाल) - त्वरित रिवीजन नोट्स
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### पाठ परिचय और लेखक
- लेखक: यशपाल
- विधा: व्यंग्य
- मुख्य संदेश: यह पाठ समाज के पतनशील सामंती वर्ग पर एक करारा व्यंग्य है जो वास्तविकता से दूर बनावटी जीवनशैली (नकली संस्कृति) जीने का आदि हो चुका है। बिना किसी विचार, घटना या पात्र के भी कहानी लिखी जा सकती है, इसे लेखक ने 'बिना विचार के कहानी' के रूप में प्रस्तुत किया है।
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### मुख्य बिन्दु और सारांश
1. यात्रा प्रसंग:
- लेखक ने पैसेंजर ट्रेन के डिब्बे में सफर करने का निर्णय किया ताकि अकेले में खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देख सकें और नई कहानी के बारे में सोच सकें।
- लेखक को डिब्बे में खाली समझकर चढ़ने पर एक नवाब साहब (सफेदपोश भद्र व्यक्ति) पालथी मारकर बैठे दिखाई दिए।
2. नवाब साहब की प्रतिक्रिया:
- नवाब साहब के हाव-भाव से ऐसा लगा कि उन्हें लेखक का डिब्बे में आना रास नहीं आया।
- उन्होंने लेखक से बातचीत करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।
3. खीरे का प्रसंग (अहम् घटना):
- नवाब साहब ने बहुत करीने से तौलिए पर दो ताजे चिकने खीरे रखे।
- उन्होंने खीरे को धोया, चाकुओं से उनके सिर काटे, छिले और फाँकों (स्लाइस) को करीने से तौलिए पर सजाया।
- उन पर जीरा-नमक और मिर्च बुरकी। उनकी यह प्रक्रिया देखकर लेखक के मुँह में पानी आ गया।
4. नवाब साहब का झूठा श्लाघा/नवाबी अंदाज़:
- लेखक को उम्मीद थी कि नवाब साहब उन्हें भी खीरा खाने का न्यौता देंगे।
- लेकिन नवाब साहब ने खीरे की एक फाँक उठाई, मुँह के पास ले गए, ससूंघा, स्वाद के आनंद में आँखें मूंद लीं और खिड़की से बाहर फेंक दिया।
- उन्होंने इसी प्रकार सभी फाँकों के साथ किया और अंत में डकार लेकर लेट गए।
5. व्यंग्य का केंद्रीय बिंदु:
- नवाब साहब ने ऐसा अपनी शराफत और रईसी (नवाबी शान) दिखाने के लिए किया ताकि यह साबित हो सके कि वे आम लोगों की तरह खीरा नहीं खा सकते।
- इससे लेखक को समझ आया कि बिना विचार, पात्र और घटना के भी 'इच्छामात्र' से कहानी की पटकथा रची जा सकती है।
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### महत्वपूर्ण शब्दार्थ (Vocabulary)
- सफेदपोश: भद्र या संभ्रांत दिखने वाला व्यक्ति (सज्जन)।
- नफासत: स्वच्छता, सुंदरता या नजाकत।
- नज़ाकत: कोमलता या नफासत।
- तकीया कलाम: बातचीत के दौरान बार-बार इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द।
- रईस: अमीर या धनवान व्यक्ति।
- महताब: चंद्रमा।
- फुर्र: उड़ जाना या गायब हो जाना।
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### परीक्षापयोगी महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Quick Q&A)
- प्रश्न 1: लेखक ने पैसेंजर ट्रेन में यात्रा क्यों की?
- उत्तर: लेखक अकेले में बैठकर नई कहानी के संबंध में सोचने और खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखने के लिए ट्रेन में बैठे थे।
- प्रश्न 2: नवाब साहब ने खीरा खाने की कौन सी नई शैली अपनाई?
- उत्तर: उन्होंने खीरे को काटकर, नमक-मिर्च छिड़ककर केवल सूँघा और खिड़की से बाहर फेंक दिया तथा डकार लेकर संतुष्टि का नाटक किया।
- प्रश्न 3: 'लखनवी अंदाज़' पाठ क्या संदेश देता है?
- उत्तर: यह पाठ हमें यह संदेश देता है कि हमें झूठी शान और दिखावे की जिंदगी से दूर रहना चाहिए तथा यथार्थ (वास्तविकता) को स्वीकार करना चाहिए।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 पाठ: लखनवी अंदाज़ - यशपाल
लेखक परिचय
नाम: यशपाल
जन्म: सन १९०३
विशेषताएँ: क्रांतिकारी धारा के लेखक, यथार्थवादी दृष्टिकोण
प्रमुख रचनाएँ: झूठा सच, अमिता, दिव्या, बारह घंटे
पाठ का परिचय व मूल संवेदना
विधा: व्यंग्य
मुख्य विषय: पतनशील सामंती समाज पर कटाक्ष
संदेश: बिना उद्देश्य और पात्र के किसी नई कहानी का सृजन संभव नहीं
रेलवे स्टेशन की घटना
घटना का स्थल: पैसेंजर ट्रेन का डिब्बा
लेखक की स्थिति: एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने की इच्छा
नवाब साहब का प्रवेश: डिब्बे में पालथी मारकर बैठे नवाब साहब की असुविधाजनक स्थिति
नवाब साहब का हाव-भाव व व्यवहार
उदासीनता: लेखक से बातचीत करने में कोई रुचि नहीं दिखाना
आत्म-सम्मान का दिखावा: खिड़की से बाहर देखना, खीरे की तैयारी करना
नवाब साहब की गतिविधियाँ
खिड़की से बाहर देखकर सिटकनी खोलना
तौलिए पर दोनों खीरों को आराम से रखना
खीरे को धोना, छीलना और काटना
करीने से जीरा-नमक और मिर्च बुरकना
झूठी शान और नवाबी रईसी
खीरा खाने की इच्छा होने पर भी संकोच करना
लेखक को खीरे की फांकों का आमंत्रण देना (नवाब साहब द्वारा)
लेखक का मना करना (आत्म-सम्मान या संकोच के कारण)
खीरे खाने का अनूठा तरीका (नवाबी तरीका)
फांकों को उठाकर मुँह तक ले जाना
स्वाद और खुशबू का आनंद लेना
फांकों को सूंघकर खिड़की से बाहर फेंक देना
लंबी डकार लेना और संतोष प्रकट करना
पाठ का मुख्य व्यंग्य व निष्कर्ष
सामंती वर्ग की खोखली जीवनशैली पर प्रहार
'बिना विचार, घटना और पात्र के कहानी कैसे बन सकती है?' - लेखक का विचार
जीवन की वास्तविकताओं से दूर बनावटी दुनिया का प्रदर्शन
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): लखनऊ के नवाब साहब द्वारा करीने से काटी और मसाले बुरकी हुई खीरे की फांकों को खिड़की से बाहर फेंकने के इस महत्वपूर्ण कृत्य के माध्यम से लेखक यशपाल ने मानव स्वभाव और पाखंड पर एक गहरा सामाजिक-मनोवैज्ञानिक संदेश दिया है। वे खीरे, जिन्हें बड़े जतन से छीला, काटा और नमक-मसाला लगाया गया था, जीवन की वास्तविक प्राथमिकताओं और सुखों के प्रतीक थे। लेकिन उन्हें खाने के बजाय नवाब साहब ने केवल सूंघकर उन्हें बाहर फेंक दिया ताकि वे अपने कृत्रिम कुलीन वर्ग के अहंकार और झूठी प्रतिष्ठा को बचा सकें। यह प्रतीकात्मक कृत्य यह दर्शाता है कि मानव समाज अक्सर दिखावे, झूठे अभिमान और खोखली परंपराओं के जाल में फंसा रहता है, जहां लोग वास्तविक उपयोगिता और सार्थकता की तुलना में दिखावे को अधिक महत्व देते हैं। लेखक इस घटना के माध्यम से उन लोगों और वर्गों की आलोचना करते हैं जो अपना पूरा जीवन महानता का भ्रम बनाए रखने में बिता देते हैं और जीवन के वास्तविक पहलुओं को नजरअंदाज करते हुए पूरी तरह से झूठ और आत्म-वंचना के संसार में जीते हैं।
उत्तर (Answer): यात्रा की शुरुआत में लखनऊ के नवाब साहब का व्यवहार लेखक के प्रति पूरी तरह से उदासीन और उपेक्षापूर्ण था। जब लेखक ने सेकंड क्लास के डिब्बे में प्रवेश किया, तो नवाब साहब ने लेखक की ओर देखना तक उचित नहीं समझा और न ही उनके अभिवादन का कोई उत्तर दिया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि वे खुद को सामाजिक रूप से श्रेष्ठ मानते थे और एक आम यात्री से उचित दूरी बनाए रखना चाहते थे। वे अपने ही विचारों में डूबे हुए थे और बड़े अक्कड़ स्वभाव से खिड़की से बाहर देख रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता और लेखक ने बिना किसी बाधा के शांत भाव से अपनी सीट पर बैठे रहे, नवाब साहब के दृष्टिकोण में एक सूक्ष्म परिवर्तन आया। शायद यह महसूस करने के बाद कि उनकी चुप्पी और अहंकार का लेखक पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ रहा है, नवाब साहब ने अपनी चुप्पी तोड़ी। उन्होंने अचानक लेखक की तरफ देखा, बड़े अदब से उन्हें ताजे तैयार किए गए खीरों का आनंद लेने का प्रस्ताव दिया और बातचीत शुरू करने की कोशिश की, जिससे उनकी शुरुआती सख्त और ठंडी दूरी कुछ कम हो गई।
उत्तर (Answer): यशपाल द्वारा रचित कहानी 'लखनवी अंदाज' भारत के उस पतनशील और अहंकारी सामंती वर्ग पर एक तीखा व्यंग्य है, जिसने औपनिवेशिक काल में अपनी संपत्ति और राजनीतिक सत्ता तो खो दी थी, लेकिन अपनी झूठी शान, दिखावे और शाही अहंकार को नहीं छोड़ा था। लखनऊ के नवाब के चरित्र के माध्यम से लेखक ने यह दर्शाया है कि यह वर्ग किस प्रकार जमीनी वास्तविकताओं से कोसों दूर था। एक साधारण रेलवे डिब्बे में यात्रा करते हुए भी नवाब साहब आम यात्रियों से बात करने से बचते हैं, लेकिन अपनी झूठी श्रेष्ठता दिखाने के लिए खीरे काटने, मसाले बुरकने और उन्हें बिना खाए सिर्फ सूंघकर फेंकने का लंबा नाटक करते हैं। यह हास्यास्पद कृत्य उस वर्ग के खोखले अहंकार, कृत्रिम जीवनशैली और मानसिक पाखंड का प्रतीक है जो वास्तविक जीवन की सच्चाई का सामना करने से डरता है। यशपाल ने बड़ी खूबी से यह उजागर किया है कि कैसे अनुपयोगी और बेतुकी परंपराएं तब भी जीवित रहती हैं जब उनका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं रह जाता है, जिससे यह पूरा वर्ग समाज में उपहास का पात्र बन जाता है।
उत्तर (Answer): लखनऊ के नवाब साहब के इस अजीबोगरीब और दिखावटी व्यवहार को देखने के बाद लेखक यशपाल के मन में एक नया वैचारिक प्रकाश उत्पन्न हुआ। नवाब साहब ने खीरे खाने की इच्छा न होते हुए भी उन्हें काटा, नमक-मसाला बुरका और केवल सूंघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया और पेट भरने का आभास कर लिया। इस पूरी घटना को देखकर लेखक ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि कोई व्यक्ति बिना किसी वास्तविक घटना या वस्तु के केवल कल्पना और मनोवैज्ञानिक संतुष्टि के सहारे अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकता है, तो एक लेखक भी बिना किसी पारंपरिक कथानक, पात्र या घटना के एक सुंदर कहानी की रचना कर सकता है। इस घटना ने लेखक को आधुनिक हिंदी साहित्य की नई कहानी धारा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्हें यह समझ आ गया कि जीवन की एक छोटी सी, बिना घटना वाली साधारण सी घटना भी एक सशक्त और सार्थक कहानी का आधार बन सकती है, बशर्ते लेखक में गहरी दृष्टि और समझ हो।
उत्तर (Answer): लखनऊ के नवाब साहब द्वारा खीरे काटने और तैयार करने की प्रक्रिया उनके झूठे और अजीबोगरीब शाही पाखंड का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। सबसे पहले नवाब साहब ने तौलिए से दोनों एजाबी खीरों को बहुत करीने से पोंछा। इसके बाद, अपनी जेब से चाकू निकाला और बड़ी ही नजाकत के साथ खीरों के सिर काटकर उन्हें गोदा और उनका झाग निकाला। इस लंबी और बारीक प्रक्रिया के बाद उन्होंने खीरे के छिलके उतारे और उन्हें बहुत ही करीने से फाकों में काटकर अखबार पर सजा दिया। इसके बाद उन्होंने उन पर जीरा-नवाबी और नमक बुरक दिया, जिसे देखकर उनके मुंह में पानी भी आ गया। लेकिन अपनी नवाबानी शान और अहंकार का प्रदर्शन करते हुए, उन्होंने एक भी फांक को खाया नहीं। इसके विपरीत, वे हर फांक को उठाते, बड़े चाव से उसे सूंघते और खिड़की से बाहर फेंक देते थे। ऐसा करके उन्होंने केवल गंध के माध्यम से ही अपनी तृप्ति का अनुभव किया, जो उनके खोखलेपन और दिखावे की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
उत्तर (Answer): जब लेखक ने सेकंड क्लास के डिब्बे में प्रवेश किया, तो उन्होंने देखा कि लखनऊ के नवाब साहब एक तौलिए पर दो ताजे धुले खीरे रखे आराम से बैठे हैं। शुरुआत में लेखक को उम्मीद थी कि नवाब साहब से कोई साहित्यिक चर्चा होगी या कम से कम औपचारिक बातचीत तो होगी ही। लेकिन नवाब साहब के ठंडे, उदासीन और प्रतिक्रियाहीन हाव-भाव से यह साफ पता चल गया कि वे किसी साधारण यात्री से बात करने या घुलने-मिलने के बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं। इस तरह के असहज करने वाले व्यवहार को देखकर लेखक के मन में यह विचार आया कि शायद नवाब साहब अकेले रहना पसंद करते हैं और एक अजनबी की मौजूदगी से उन्हें असुविधा महसूस हो रही है। लेखक को लगा कि उनके अचानक डिब्बे में आ जाने से नवाब साहब की एकांत में खलल पड़ गई है, जिससे वे नाराज हैं। इसके बाद लेखक ने नवाब साहब की तरफ देखना बंद कर दिया और चुपचाप खिड़की से बाहर देखने लगे तथा समाज के इस पतनशील और अहंकारी वर्ग की विचित्र मानसिकता के बारे में गहराई से सोचने लगे।
उत्तर (Answer): कहाणी 'लखनवी अंदाज' में यशपाल ने पतनशील सामंती वर्ग पर करारा व्यंग्य किया है। लखनऊ के नवाब ने रेलवे स्टेशन पर दो ताज़ा एजाबी खीरे इसलिए खरीदे थे ताकि वे ट्रेन के सामान्य डिब्बे में यात्रा करते हुए भी अपने झूठे नवाबानी शान, अभिमान और कुलीनता को प्रदर्शित कर सकें। सामान्य सेकंड क्लास के डिब्बे में सफर करने के बावजूद वे अपनी श्रेष्ठता और नफीस जीवनशैली को बनाए रखना चाहते थे। खीरे खरीदकर उन्हें करीने से काटना, उन पर नमक-जीरा बुरकना और अंत में उन्हें खाने के बजाय सिर्फ सूंघकर खिड़की से बाहर फेंक देना, नवाब साहब की इसी मानसिकता को दर्शाता है। इसके माध्यम से वे यह जताना चाहते थे कि उनके जैसे रईस लोग वस्तुओं का उपभोग केवल उनकी सुगंध से ही कर लेते हैं। यह कृत्य समाज के उस वर्ग के खोखले दिखावे, पाखंड और रूढ़िवादी संस्कृति को उजागर करता है, जो वास्तविक शक्ति और धन खोने के बाद भी अपनी झूठी शान को छोड़ने को तैयार नहीं था।
उत्तर (Answer): The story is aptly titled 'Lakhnavi Andaaz' (The Lucknowi Style) because it captures the distinct lifestyle, refined manners, artificial etiquette, and aristocratic pretensions traditionally associated with the culture of Lucknow. Lucknow has historically been celebrated for its exquisite 'Tehzeeb' (culture), polite language, and elaborate lifestyle, even among those who had lost their wealth. The central character in the story, the Nawab, embodies this stereotypical Lucknowi mannerism to an extreme degree. From the way he twirls his mustache, meticulously washes and cuts the cucumbers, arranges them on a piece of newspaper, sprinkles spices with delicate precision, to the theatrical manner in which he smells and discards them—every single action reflects a compulsive need to maintain an outward appearance of supreme grace and aristocracy, regardless of practicality or logic. The title ironically highlights how this famous 'Andaaz' or style has deteriorated into hollow showmanship, snobbery, and self-deception in modern times. Thus, the title encapsulates the entire thematic essence of the story, serving as a critique of feudal vanity masquerading as sophistication.
उत्तर (Answer): Throughout the journey, the Nawab of Lucknow maintains an air of supreme indifference and detachment, deliberately keeping his eyes closed and avoiding direct eye contact with the author to project his aristocratic superiority. However, beneath this external facade of royal nonchalance, he is acutely conscious of the author's presence and observant gaze. When the author refuses his offer of cucumber slices, the Nawab experiences a subtle blow to his ego. He feels compelled to complete his self-inflicted ritual of preparing the cucumbers to prove a point, yet he knows he is being closely watched by a critical observer. As he meticulously smells each slice and throws it out of the window, his internal psychological state is a mixture of intense self-consciousness, stubborn pride, and a desperate desire to maintain his dignity. He avoids looking directly at the author, fearing that his pretentious act might be seen through and mocked. This psychological tension creates a fascinating dynamic in the compartment, illustrating how human beings often go to great lengths to preserve their image in front of strangers, driven purely by false vanity and social conditioning.
उत्तर (Answer): At the conclusion of the story, as the author observes the Nawab reclining with closed eyes in deep satisfaction after throwing away the cucumber slices, a sudden realization dawns upon him. He reflects on the entire train journey and the peculiar behavior of the Nawab. The author wonders that if a person can invent a elaborate ritual of preparing and eating food purely for psychological satisfaction and ego gratification without actually consuming a single bite, then surely a literary writer can conceive a story or narrative without relying on a traditional plot, characters, or heavy events. He concludes that just as the aroma and the visual appeal of the cucumber created a mental experience of eating for the Nawab, similarly, human observations, trivial daily encounters, and fleeting thoughts can serve as sufficient catalysts to generate a compelling story or creative thought process. This philosophical reflection serves as a meta-narrative comment by Yashpal on the craft of writing, suggesting that fiction does not always require grand plots; sometimes, profound truths can be extracted from the most ordinary, mundane situations of everyday life.
उत्तर (Answer): नवाब साहब द्वारा खीरे की कटी हुई फांकों को केवल सूंघकर और उनकी महक का आनंद लेकर एक-एक करके खिड़की से बाहर फेंक देना कहानी का मुख्य मोड़ है और यह खोखले दिखावे का एक गहरा प्रतीक है। इतनी मेहनत से खीरे धोने, छीलने, काटने और मसालों से सजाने के बाद स्वाभाविक रूप से यही उम्मीद की जाती थी कि वे उन्हें खाएंगे। लेकिन इसके विपरीत, उन्होंने प्रत्येक टुकड़े को बाहर हवा में फेंक दिया और रुमाल से हाथ पोंछे जैसे उन्होंने कोई महान काम किया हो। यह अजीब हरकत पतनशील सामंती मानसिकता की दिवालियापन का प्रतीक है, जहां वास्तविक पदार्थ और उपयोगिता के बजाय बाहरी दिखावा, अहंकार और बनावटी तौर-तरीके अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। नवाब साहब अपनी झूठी शान को बनाए रखना चाहते थे और यह दिखाना चाहते थे कि वे इतने महान हैं कि साधारण खीरा नहीं खा सकते, फिर भी उनकी लालसा ने उन्हें इसे तैयार करने पर मजबूर किया। भोजन को इस प्रकार बर्बाद करके, वे एक ऐसे सामाजिक वर्ग के पाखंड को उजागर करते हैं जो पूरी तरह से भ्रम और कृत्रिम परंपराओं पर जीवित रहता है।
उत्तर (Answer): नवाब साहब द्वारा लेखक को बहुत करीने से तैयार किए गए खीरे की फांकें पेश करने का क्षण कहानी में बहुत महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक महत्व रखता है। शुरुआत में नवाब साहब ने लेखक के प्रति पूरी तरह से उदासीनता और नाराजगी दिखाई थी, जिससे एक वर्गीय दूरी बनी हुई थी। लेकिन खीरों को तैयार करने के बाद, शायद अकेले खाने में संकोच महसूस करते हुए या अपनी दरियादली और तहजीब का प्रदर्शन करने के लिए, नवाब साहब ने बड़े शालीनता से लेखक को खीरे का आनंद लेने के लिए आमंत्रित किया और पूछा, 'जनाब, शौक फरमाइशिए।' लेखक, जिन्होंने पहले नवाब साहब के रूखे रवैये से अपमानित महसूस किया था, ने विनम्रतापूर्वक उस प्रस्ताव को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि 'शुक्रिया, मेरा दिल नहीं चाहता, आप ही शौक फरमाएं।' लेखक का यह इनकार उनके आत्मसम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक था, क्योंकि वे किसी ऐसे अजनबी से अचानक मिले प्रस्ताव को स्वीकार करके अपनी गरिमा से समझौता नहीं करना चाहते थे जिन्होंने थोड़ी देर पहले उन्हें नजरअंदाज किया था। यह बातचीत सामाजिक दूरियों और व्यक्तिगत अहंकार को दर्शाती है।
उत्तर (Answer): कहानी 'लखवी अंदाज' में लेखक यशपाल ने पतनशील सामंती वर्ग के पाखंड, दंभ और झूठी प्रतिष्ठा पर बहुत ही तीखा व्यंग्य किया है। लखनऊ के नवाब ऐतिहासिक रूप से अपनी नजाकत, तहजीब और विलासितापूर्ण जीवनशैली के लिए जाने जाते थे, लेकिन समय बदलने के साथ उनकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक स्थिति कमजोर हो चुकी थी। इसके बावजूद, उनका मानसिक अहंकार और अपनी रईसी का दिखावा करने की आदत वैसी ही बनी हुई थी। कहानी के नवाब साहब इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण हैं जो खीरे खाने जैसी साधारण सी बात को भी अपनी शान के खिलाफ मानते हैं। वे खीरे को काटते हैं, उस पर मसाला बुरकते हैं, उसे सूंघते हैं और फिर एक-एक करके खिड़की से बाहर फेंक देते हैं। ऐसा करके वे यह दिखाना चाहते हैं कि वे इतने ऊंचे खानदान से हैं कि वे सामान्य व्यक्ति की तरह खीरा नहीं खा सकते। यशपाल इस व्यंग्य के माध्यम से यह दर्शाते हैं कि कैसे सामंती व्यवस्था के अवशेष ढो रहे लोग व्यावहारिक सच्चाई से दूर होकर खोखले दिखावे और झूठी शान में अपनी जिंदगी बिताते हैं।
उत्तर (Answer): जब लेखक ट्रेन के दूसरे दर्जे के डिब्बे में दाखिल हुआ, तो उसे उम्मीद थी कि डिब्बा लगभग खाली होगा ताकि वह आराम से बैठकर कुछ लिख-पढ़ सके। लेकिन उसने पाया कि खिड़की के सामने वाली बर्थ पर लखनऊ के एक नवाब साहब बड़े आराम से पालथी मारकर बैठे हैं। नवाब साहब की शारीरिक बनावट में क्षीण होती हुई नवाबी और रईसी का अहसास साफ झलक रहा था। उनकी मूंछें ताव दी हुई थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब सा संकोच भाव था। जैसे ही लेखक ने डिब्बे में प्रवेश किया, नवाब साहब की आँखों में अवांछित अतिथि को देखने जैसा भाव आया, जिससे साफ पता चला कि वे एकांत में रहना पसंद कर रहे थे और किसी का आना उन्हें पसंद नहीं आया। उनकी मुद्रा से ऐसा लग रहा था कि वे अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति बहुत अधिक सचेत थे, भले ही आज उनकी परिस्थितियां बदल चुकी थीं। शुरुआत में नवाब साहब ने लेखक की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया और उनकी आँखों में दखलंदाजी से होने वाली झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी।
उत्तर (Answer): लखनऊ के नवाब ने स्टेशन के विक्रेता से अपनी प्यास बुझाने और शायद लेखक के सामने झूठी रईसियत और शान दिखाने के लिए दो ताजे और कोमल खीरे खरीदे थे। शाही वंश से संबंध रखने के बावजूद, नवाब साहब साधारण तीसरी श्रेणी के डिब्बे में यात्रा कर रहे थे, जो उनके शाही दिखावे के विपरीत था। खीरों को तैयार करने के लिए, नवाब साहब ने सबसे पहले अपने पास मौजूद छोटे लोटे के पानी से उन्हें सावधानीपूर्वक धोया और तौलिए से पोंछा। इसके बाद, अत्यंत सावधानी के साथ, उन्होंने अपनी जेब वाले चाकू से दोनों खीरों के ऊपरी सिरों को काटा और कड़वापन निकालने के लिए कटे हुए हिस्से को मला। खीरे का छिलका छीलने के बाद, उन्होंने कटे हुए टुकड़ों को अपने घुटनों पर फैले हुए अखबार के टुकड़े पर बड़े करीने से सजाया। इसके अलावा, उन्होंने खीरे की फांकों पर बहुत करीने से जीरा पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और नमक छिड़का, जिससे उसकी महक और स्वाद बढ़ गया। यह पूरी प्रक्रिया उनके रईसों जैसे नजाकत और फुर्सतभरे अंदाज को दर्शाती थी।