कक्षा 11 जीव विज्ञान: जैविक वर्गीकरण (Biological Classification) - त्वरित संशोधन नोट्स
इस अध्याय में हम जीवों के वैज्ञानिक वर्गीकरण और उनके प्रमुख लक्षणों का अध्ययन करते हैं। यहाँ इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण बिंदु दिए गए हैं।
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1. जैविक वर्गीकरण का इतिहास (History of Biological Classification)
- Aristotle (अरस्तू): इन्होंने सबसे पहले जीवों का morphological characters (अकारिकी लक्षणों) के आधार पर वर्गीकरण किया।
- पौधे (Plants): पेड़, झाड़ियाँ और शाक (Trees, shrubs, and herbs)।
- जंतु (Animals): लाल रक्त वाले (RBC present) और बिना लाल रक्त वाले (RBC absent)।
- Two Kingdom Classification (द्वijagat वर्गीकरण):
- इसे कैरोलस लिनियस (Carolus Linnaeus) ने दिया था।
- इसमें दो जगत थे: प्लैंटी (Plantae) और एैंमेलिया (Animalia)।
- सीमा (Limitation): यह प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक, एककोशिकीय और बहुकोशिकीय, तथा प्रकाशसंश्लेषी (शैवाल) और अप्रेकाशसंश्लेषी (कवक) में भेद नहीं कर पाया।
- Five Kingdom Classification (पंचजगत वर्गीकरण):
- इसे आर.एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker - 1969) ने प्रतिपादित किया।
- वर्गीकरण के मुख्य आधार: कोशिका संरचना (Cell structure), थैलस संगठन (Thallus organization), पोषण की विधि (Mode of nutrition), प्रजनन (Reproduction) और जातिकीय संबंध (Phylogenetic relationships)।
- पाँच जगत हैं: मोनेरा (Monera), प्रोटिस्टा (Protista), फंजाई (Fungi), प्लांटी (Plantae), और एैंमेलिया (Animalia)।
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2. पंचजगत वर्गीकरण का विस्तृत विवरण (Detailed Five Kingdoms)
#### क. जगत मोनेरा (Kingdom Monera)
- सभी प्रोकैरियोट्स (Prokaryotes) इस जगत में आते हैं (मुख्य उदाहरण: जीवाणु/Bacteria)।
- आकृति के आधार पर जीवाणु के प्रकार:
1. कोक्कस (Coccus): गोलाकार (Spherical)
2. बेसिलस (Bacillus): छड़नुमा (Rod-shaped)
3. स्पाइरिलम (Spirillum): सर्पिलाकार (Spiral)
4. विब्रियो (Vibrio): अल्पविराम आकार (Comma-shaped)
- प्रमुख समूह:
- आर्किबैक्टीरिया (Archaebacteria): अत्यधिक कठोर आवासों में जीवित रहते हैं (जैसे- लवणरागी/Halophiles, गर्म झरने वाले/Thermoacidophiles, और मिथेनोजेन/Methanogens)। इनकी कोशिका भित्ति की संरचना भिन्न होती है जो इन्हें चरम परिस्थिति में जीवित रखती है।
- यूबैक्टीरिया (Eubacteria): इन्हें 'सत्य जीवाणु' कहते हैं। इनमें कठोर कोशिका भित्ति और कशाभिका (flagellum) होती है।
- साइनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria): इन्हें नील-हरित शैवाल (Blue-green algae) भी कहते हैं। इनमें क्लोरोफिल-ए होता है। कुछ विशेष कोशिकाएँ हैटरोसिस्ट (Heterocyst) नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) का कार्य करती हैं (उदाहरण: Nostoc, Anabaena)।
- माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma): इनमें कोशिका भित्ति बिल्कुल नहीं होती। ये ऑक्सीजन के बिना भी जीवित रह सकते हैं और सबसे छोटे जीवित जीव हैं। ये पौधों और जंतुओं में रोगजनक होते हैं।
#### ख. जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista)
- सभी एककोशिकीय यूकैरियोट्स (Single-celled eukaryotes) इसमें शामिल हैं।
- प्रमुख समूह:
1. क्रिसफाइट्स (Chrysophytes): इसमें डायटम (Diatoms) और सुनहरे शैवाल (Desmids) आते हैं। इनकी कोशिका भित्ति साबुनदानी की तरह होती है जिसमें सिलिका होती है। इनके मरने पर जमा सिलिकायुक्त मलबा डायटमी मृदा (Diatomaceous earth) कहलाता है।
2. डाइनोफ्लैजिलेट्स (Dinoflagellates): मुख्य रूप से समुद्री और प्रकाशसंश्लेषी होते हैं। इनमें दो कशाभ होते हैं। कुछ (जैसे Gonyaulax) तेजी से गुणन करके 'रेड टाइड' (Red tide) बनाते हैं।
3. यूग्लीनोइड्स (Euglenoids): अधिकांश स्वच्छ जल में पाए जाते हैं। इनमें कोशिका भित्ति की जगह प्रोटीनयुक्त परत पेलिकल (Pellicle) होती है जो इन्हें लचीला बनाती है। सूर्य के प्रकाश में ये स्वपोषी और प्रकाश की अनुपस्थिति में परपोषी होते हैं (उदाहरण: Euglena)।
4. स्लाइम मोल्ड (Slime Moulds): ये मृतपोषी कवक (Saprophytic protists) हैं। अनुकूल परिस्थितियों में ये एक समूह बनाते हैं जिसे प्लाज्मोडियम (Plasmodium) कहते हैं।
5. प्रोटोजोआ (Protozoa): ये सभी परपोषी (परजीवी या शिकारी) होते हैं।
- अमीबीय प्रोटोजोआ (जैसे Entamoeba)
- कशाभी प्रोटोजोआ (जैसे Trypanosoma - निद्रा रोग)
- पक्ष्माभी प्रोटोजोआ (जैसे Paramoecium - इनमें गतिकी के लिए पक्ष्माभ/Cilia होते हैं)
- स्पोरोजोआ (जैसे Plasmodium - मलेरिया परजीवी)
#### ग. जगत फंजाई / कवक (Kingdom Fungi)
- ये परपोषी (Heterotrophic) जीवों का एक अद्वितीय जगत हैं। इनकी कोशिका भित्ति काइटिन (Chitin) और पॉलीसैकेराइड की बनी होती है।
- अधिकांश कवक मृतजीवी (Saprophytes) होते हैं। कुछ सहजीवी (Symbionts) के रूप में रहते हैं:
- लाइकेन (Lichens): शैवाल और कवक का सहजीवी संबंध।
- माइकोराइजा (Mycorrhiza): कवक और उच्च पौधों की जड़ों का संबंध।
- जनन (Reproduction): कायिक (Vegetative), अलैंगिक (Asexual - जैसे स्पोर, कोनिडिया) और लैंगिक (Sexual - ऊस्पोर, एस्कोस्पोर, बेसिडियोस्पोर)।
- कवक के वर्ग (Classes of Fungi):
1. फाइकोमाईसिटीज (Phycomycetes): कवकजाल पटहीन (Aseptate) और समकेंद्रकीय (Coenocytic) होता है (उदाहरण: Mucor, Rhizopus - रोटी की फफूंद)।
2. एस्कोमाईसिटीज (Ascomycetes): इन्हें थैली कवक (Sac fungi) भी कहते हैं। कवकजाल पटीय और शाखित होता है (उदाहरण: Aspergillus, Claviceps, Neurospora - आनुवंशिकी में प्रयोग, यीस्ट)।
3. बेसिडियोमाईसिटीज (Basidiomycetes): इन्हें ब्रैकेट फंगस या मशरूम कहते हैं (उदाहरण: Agaricus - मशरूम, Ustilago - स्मट, Puccinia - रस्ट रोग)।
4. ड्यूटेरोमाईसिटीज (Deuteromycetes): इन्हें 'अपूर्ण कवक' (Fungi imperfecti) कहते हैं क्योंकि इनमें केवल अलैंगिक अवस्था ज्ञात है (उदाहरण: Alternaria, Colletotrichum, Trichoderma)।
#### घ. जगत प्लांटी (Kingdom Plantae)
- इसमें सभी यूकैरियोटिक chlorophyll युक्त जीव (पौधे) शामिल हैं।
- ये मुख्य रूप से स्वपोषी होते हैं।
- जीवन चक्र में दो अवस्थाएँ होती हैं: बीजाणुकोद्भिद (Sporophytic) और युग्मकोद्भिद (Gametophytic), जो पीढ़ी एकान्तरण (Alternation of generation) दर्शाती हैं। (विस्तृत अध्ययन अगले अध्यायों में)।
#### ङ. जगत एैंमेलिया (Kingdom Animalia)
- ये बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, परपोषी (Heterotrophic) जीव हैं।
- इनमें कोशिका भित्ति नहीं पाई जाती है।
- ये भोजन का पाचन ग्लाइकोजन या वसा के रूप में संचित करके रखते हैं। इनका विकास तंत्रिका और संवेदी तंत्र से जुड़ा होता है।
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3. विषाणु, viroids, prions और लाइकेन (Viruses, Viroids, Prions and Lichens)
- विषाणु (Viruses):
- यह अकोशिकीय जीव हैं जो जीवित कोशिका के बाहर निर्जीव (अक्रिय क्रिस्टल) की तरह रहते हैं।
- एम.डब्ल्यू. बेजेरिंक (M.W. Beijerinck) ने संक्रामक जीवित तरल को "Contagium vivum fluidum" कहा।
- डब्ल्यू.एम. स्टैनले (W.M. Stanley) ने सबसे पहले विषाणु को क्रिस्टल रूप में अलग किया।
- संरचना: इसमें एक आनुवंशिक पदार्थ होता है जो या तो DNA या RNA होता है (दोनों एक साथ नहीं होते)। आनुवंशिक पदार्थ के बाहर प्रोटीन का आवरण होता है जिसे कैप्सिड (Capsid) कहते हैं, जो छोटी इकाइयों कैप्सोमियर (Capsomeres) से बना होता है।
- पादप विषाणु में एकल रज्जुक RNA (Single stranded RNA) और जंतु विषाणु में dsDNA या ssRNA होता है। बैक्टीरियोफेज (Bacteriophage) में आमतौर पर dsDNA होता है।
- वायराइड्स (Viroids):
- टी.ओ. डाइनर (T.O. Diener - 1971) ने इनकी खोज की।
- ये विषाणु से भी छोटे होते हैं।
- इनमें प्रोटीन आवरण नहीं होता, केवल मुक्त RNA होता है (जो कम आणविक भार वाला होता है)। उदाहरण: पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर रोग।
- प्रियांस (Prions):
- ये संक्रामक प्रोटीन कण हैं जो आकार में विषाणु के समान होते हैं।
- ये तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करते हैं (जैसे- बोवाइन स्पॉংजीफॉर्म एन्सेफैलोपैथी/BSE या मैड काऊ रोग, और मनुष्यों में क्रूट्ज़फेल्ट-जैकोब रोग)।
- लाइकेन (Lichens):
- शैवाल और कवक का सहजीवी (Symbiotic) संबंध।
- शैवाल घटक को फाइकोबियॉन्ट (Phycobiont) (जो भोजन बनाता है) और कवक घटक को माइकोबियॉन्ट (Mycobiont) (जो आश्रय और खनिज देता है) कहते हैं।
- महत्वपूर्ण बिंदु: लाइकेन वायु प्रदूषण (विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड - $SO_2$) के अच्छे सूचक (Indicators) हैं, ये प्रदूषित क्षेत्रों में नहीं उगते।