मुख्य सूत्र (Key Formulas)
अध्याय: अर्dhचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ (Semiconductor Electronics)
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1. ऊर्जा बैंड (Energy Bands in Solids)
ठोसों में ऊर्जा बैंड परमाणुओं के अंतःक्रिया के कारण बनते हैं।
- चालन बैंड (Conduction Band): यह वह ऊर्जा बैंड है जिसमें इलेक्ट्रॉन गति करने के लिए स्वतंत्र होते हैं और विद्युत धारा का चालन करते हैं। इसमें इलेक्ट्रॉन आंशिक रूप से भरे हो सकते हैं या खाली हो सकते हैं।
- संयोजकता बैंड (Valence Band): यह चालन बैंड के नीचे का ऊर्जा बैंड है जो संयोजकता इलेक्ट्रॉनों से भरा होता है।
- वर्जित ऊर्जा अंतराल (Energy Band Gap - $E_g$): संयोजकता बैंड के शीर्ष और चालन बैंड के तल के बीच के ऊर्जा अंतर को वर्जित ऊर्जा अंतराल कहते हैं।
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2. चालकों, रोषियों और अर्धचालकों में अंतर (Classification of Solids)
- चालक (Conductors):
- $E_g \approx 0$ (वर्जित अंतराल लगभग शून्य होता है)।
- संयोजकता बैंड और चालन बैंड अतिव्यापित (overlap) होते हैं।
- विद्युत रोधी (Insulators):
- $E_g > 3\text{ eV}$ (वर्जित अंतराल बहुत अधिक होता है)।
- इलेक्ट्रॉन चालन बैंड में नहीं जा पाते।
- अर्धचालक (Semiconductors):
- $E_g < 3\text{ eV}$ (वर्जित अंतराल कम होता है, जैसे सिलिकॉन के लिए $1.1\text{ eV}$ और जर्मेनियम के लिए $0.7\text{ eV}$)।
- सामान्य ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन ऊर्जा पाकर चालन बैंड में चले जाते हैं।
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3. अर्धचालकों के प्रकार (Types of Semiconductors)
#### (क) नैज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors)
- ये शुद्ध रूप में होते हैं (जैसे- शुद्ध सिलिकॉन या जर्मेनियम)।
- तापीय उत्तेजना के कारण, सहसंयोजक बंध टूटने से इलेक्ट्रॉन-कोटर (Electron-Hole pairs) युग्म बनते हैं।
- किसी भी समय: $ne = nh = n_i$
- जहाँ $n_e =$ इलेक्ट्रॉनों की सांद्रता
- $n_h =$ कोटरों (Holes) की सांद्रता
- $n_i =$ नैज आवेश वाहक सांद्रता
#### (ख) अपद्रव्यी या बाह्य अर्धचालक (Extrinsic Semiconductors)
चालकता बढ़ाने के लिए शुद्ध अर्धचालक में अशुद्धि मिलाई जाती है, जिसे डोपिंग (Doping) कहते हैं।
1. n-प्रकार के अर्धचालक (n-type Semiconductors):
- जब शुद्ध अर्धचालक (चतुर्जीयी - Si/Ge) में पंचसंयोजी अशुद्धि (जैसे- फॉस्फोरस, आर्सेनिक) मिलाई जाती है।
- यहाँ आवेश के मुख्य वाहक इलेक्ट्रॉन होते हैं ($ne \gg nh$) और दाता परमाणु अशुद्धि मिलाई जाती है।
2. p-प्रकार के अर्धचालक (p-type Semiconductors):
- जब शुद्ध अर्धचालक में त्रिसंयोजी अशुद्धि (जैसे- एल्युमिनियम, इंडियम, बोरॉन) मिलाई जाती है।
- यहाँ आवेश के मुख्य वाहक कोटर (Holes) होते हैं ($nh \gg ne$) और ग्राही परमाणु अशुद्धि मिलाई जाती है।
- द्रव्यमान क्रिया का नियम (Law of Mass Action):
$$ne \cdot nh = n_i^2$$
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4. p-n संधि डायोड (p-n Junction Diode)
जब एक p-प्रकार के अर्धचालक को n-प्रकार के अर्धचालक के साथ विशेष विधि से जोड़ा जाता है, तो p-n संधि बनती है।
- अवक्षय परत (Depletion Region): संधि के दोनों ओर का वह क्षेत्र जहाँ गतिमान आवेश वाहक (इलेक्ट्रॉन और कोटर) समाप्त हो जाते हैं, अवक्षय परत कहलाता है। यहाँ अचल आयन बचते हैं।
- विभव प्राचीर (Potential Barrier): अवक्षय परत के कारण उत्पन्न आंतरिक विद्युत क्षेत्र के कारण जो विभव अवरोध बनता है, उसे विभव प्राचीर कहते हैं।
#### बायसिंग (Biasing):
1. अग्र बायसिंग (Forward Biasing):
- p-क्षेत्र को बैटरी के धन (+) सिरी से और n-क्षेत्र को ऋण (-) सिरे से जोड़ा जाता है।
- अवक्षय परत की चौड़ाई घटती है।
- संधि का प्रतिरोध बहुत कम हो जाता है और धारा आसानी से बहती है।
2. पश्च बायसिंग (Reverse Biasing):
- p-क्षेत्र को बैटरी के ऋण (-) सिरे से और n-क्षेत्र को धन (+) सिरे से जोड़ा जाता है।
- अवक्षय परत की चौड़ाई बढ़ती है।
- संधि का प्रतिरोध बहुत अधिक हो जाता है और लगभग कोई धारा नहीं बहती (अल्प मात्रा में उत्क्रम संतृप्त धारा बहती है)।
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5. डायोड के विशेष अनुप्रयोग (Special Purpose p-n Junction Diodes)
- जेनर डायोड (Zener Diode):
- यह एक विशेष रूप से निर्मित उच्च डोपिंग वाला p-n संधि डायोड है जो हमेशा पश्च बायस (Reverse Bias) में जेनर भंजन क्षेत्र में काम करता है।
- इसका उपयोग वोल्टेज नियंत्रक (Voltage Regulator) के रूप में किया जाता है।
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6. दिष्टकारी (Rectifiers)
दिष्टकारी वह युक्ति है जो प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में बदलती है।
- अर्ध-तरंग दिष्टकारी (Half-Wave Rectifier):
- इसमें केवल एक डायोड का उपयोग होता है।
- निवेशी AC आवृत्ति $f$ के लिए निर्गत DC आवृत्ति भी $f$ होती है।
- अधिकतम दक्षता $\approx 40.6\%$ होती है।
- पूर्ण-तरंग दिष्टकारी (Full-Wave Rectifier):
- इसमें दो डायोडों का उपयोग किया जाता है (सेंटर-टैप ट्रांसफार्मर के साथ) या चार डायोडों का ब्रिज दिष्टकारी (Bridge Rectifier) बनाया जाता है।
- निवेशी AC आवृत्ति $f$ के लिए निर्गत DC आवृत्ति दोगुनी यानी $2f$ होती है।
- अधिकतम दक्षता $\approx 81.2\%$ होती है।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी: पदार्थ, युक्तियाँ तथा सरल परिपथ
परिचय एवं वर्गीकरण
ऊर्जा बैंड सिद्धांत
चालन बैंड
संयोजकता बैंड
वर्जित ऊर्जा अंतराल
चालकों, विद्युत रोधियों एवं अर्धचालकों में भेद
अर्धचालक के प्रकार
नैज अर्धचालक (शुद्ध)
इलेक्ट्रॉन-होल युग्म
तापीय उत्तेजन
बाह्य अर्धचालक (अशुद्ध)
अपमार्जन (डोपिंग) प्रक्रिया
n-प्रकार अर्धचालक (पंचसंयोजी अशुद्धि)
p-प्रकार अर्धचालक (त्रिसंयोजी अशुद्धि)
पी-एन संधि डायोड
संधि निर्माण
अवक्षय परत
विभव प्राचीर
अभिनति (बायसिंग)
अग्र अभिनति (फॉरवर्ड बायस)
पश्य अभिनति (रिवर्स बायस)
दिष्टकारी (रेक्टिफायर) के रूप में कार्य
अर्ध-तरंग दिष्टकारी
पूर्ण-तरंग दिष्टकारी
विशेष प्रयोजन पी-एन संधि डायोड
ज़ीनर डायोड (वोल्टेज नियंत्रक)
प्रकाश उत्सर्जक डायोड (LED)
फोटोडायोड
सौर सेल
संधि ट्रांजिस्टर
ट्रांजिस्टर के प्रकार
n-p-n ट्रांजिस्टर
p-n-p ट्रांजिस्टर
मुख्य भाग
उत्सर्जक (Emitter)
आधार (Base)
संग्राहक (Collector)
विधाएँ (Configurations)
उभयनिष्ठ आधार (CB)
उभयनिष्ठ उत्सर्जक (CE)
ट्रांजिस्टर के उपयोग
प्रवर्धक (Amplifier)
दोलित्र (Oscillator)
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी एवं तर्क द्वार (Logic Gates)
मूल तर्क द्वार
NOT द्वार
AND द्वार
OR द्वार
सार्वत्रिक द्वार
NAND द्वार
NOR द्वार
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### p-n जंक्शन डायोड की परिभाषा\np-n जंक्शन डायोड एक दो-टर्मिनल अर्धचालक उपकरण है जिसे एक p-प्रकार के अर्धचालक और एक n-प्रकार के अर्धचालक को एक साथ जोड़कर बनाया जाता है। इन दोनों क्षेत्रों के बीच की संपर्क सीमा को p-n जंक्शन कहा जाता है। यह विद्युत धारा को एक दिशा में आसानी से गुजरने देता है जबकि विपरीत दिशा में इसे रोकता है, जो इसे दृष्टकारी और स्विचिंग के लिए मौलिक बनाता है।
### अवक्षय क्षेत्र और विभव प्राचीर का निर्माण
* **आवेश वाहकों का विसरण:** p-n जंक्शन के निर्माण के तुरंत बाद, सांद्रता प्रवणता के कारण p-पक्ष से कोटर (holes) n-पक्ष में विसरित होते हैं, और n-पक्ष से इलेक्ट्रॉन p-पक्ष में विसरित होते हैं।
* **पुनरुत्पत्ति (Recombination):** जंक्शन के पास, इलेक्ट्रॉन और कोटर पुनरुत्पत्ति करते हैं, जिससे एक-दूसरे को उदासीन किया जाता है।
* **अचल आयनों का निर्माण:** जैसे ही इलेक्ट्रॉन n-पक्ष को छोड़ते हैं, वे पीछे धनात्मक रूप से आवेशित दाता आयन छोड़ जाते हैं। इसी प्रकार, जैसे ही कोटर p-पक्ष को छोड़ते हैं (या इलेक्ट्रॉन स्वीकार करते हैं), p-पक्ष पर ऋणात्मक रूप से आवेशित ग्राही आयन छूट जाते हैं।
* **अवक्षय क्षेत्र (Depletion Region):** जंक्शन के दोनों ओर का यह अंतरिक्ष-आवेश क्षेत्र स्वतंत्र गतिमान आवेश वाहकों से रहित हो जाता है और इसे अवक्षय क्षेत्र कहा जाता है।
* **विभव प्राचीर (Potential Barrier):** n-पक्ष पर धनात्मक आयनों और p-पक्ष पर ऋणात्मक आयनों का संचय n-पक्ष से p-पक्ष की ओर निर्देशित एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र स्थापित करता है। यह विद्युत क्षेत्र जंक्शन के पार एक विभव प्राचीर बनाता है जो बहुमत आवेश वाहकों के आगे के विसरण को रोकता है। इस प्राचीर की ऊँचाई अर्धचालक सामग्री पर निर्भर करती है (सिलिकॉन के लिए लगभग 0.7 V, जर्मेनियम के लिए 0.3 V)।
### V-I विशेषताएँ
* **अग्र अभिनति (Forward Bias):** जब बाहरी बैटरी का धनात्मक टर्मिनल p-प्रकार से और ऋणात्मक टर्मिनल n-प्रकार से जुड़ा होता है, तो डायोड अग्र-अभिनत होता है। बाहरी क्षेत्र विभव प्राचीर का विरोध करता है, जिससे अवक्षय क्षेत्र संकीर्ण हो जाता है। धारा एक छोटे थ्रेशोल्ड वोल्टेज (कट-इन वोल्टेज) पर बहना शुरू होती है और अग्र वोल्टेज में वृद्धि के साथ तेजी से बढ़ती है।
* **पश्व अभिनति (Reverse Bias):** जब धनात्मक टर्मिनल n-प्रकार से और ऋणात्मक टर्मिनल p-प्रकार से जुड़ा होता है, तो डायोड पश्व-अभिनत होता है। बाहरी क्षेत्र विभव प्राचीर में सहायता करता है, जिससे अवक्षय क्षेत्र चौड़ा हो जाता है। केवल एक बहुत ही छोटी पश्व संतृप्ति धारा (अल्पसंख्यक वाहकों के कारण) बहती है, जो तब तक लगभग स्थिर रहती है जब तक कि ब्रेकडाउन वोल्टेज तक नहीं पहुँच जाता, जहाँ डायोड धारा नाटकीय रूप से बढ़ जाती है।
उत्तर (Answer): दिए गए आँकड़े:
* इनपुट प्रतिरोध, $R_i = 200 \; \Omega$
* लोड प्रतिरोध, $R_L = 4 \; \text{k}\Omega = 4 \times 10^3 \; \Omega = 4000 \; \Omega$
* आधार धारा में परिवर्तन, $\Delta I_b = 15 \; \mu\text{A} = 15 \times 10^{-6} \; \text{A}$
* कलेक्टर धारा में परिवर्तन, $\Delta I_c = 3 \; \text{mA} = 3 \times 10^{-3} \; \text{A} = 3000 \; \mu\text{A}$
**(i) धारा प्रवर्धन कारक ($\beta$) की गणना:**\nउभयनिष्ठ उत्सर्जक विन्यास में धारा प्रवर्धन कारक सूत्र द्वारा दिया जाता है:
$$\beta = \frac{\Delta I_c}{\Delta I_b}$$\nदिए गए मानों को प्रतिस्थापित करने पर:
$$\beta = \frac{3 \times 10^{-3} \; \text{A}}{15 \times 10^{-6} \; \text{A}}$$
$$\beta = \frac{3000}{15} = 200$$\nअतः, धारा प्रवर्धन कारक **200** है।
**(ii) वोल्टेज लाभ ($A_v$) की गणना:**\nवोल्टेज लाभ, धारा प्रवर्धन कारक ($\beta$) और लोड प्रतिरोध तथा इनपुट प्रतिरोध के अनुपात ($R_L / R_i$) का गुणनफल होता है:
$$A_v = \beta \times \frac{R_L}{R_i}$$\nमानों को प्रतिस्थापित करने पर:
$$A_v = 200 \times \frac{4000 \; \Omega}{200 \; \Omega}$$
$$A_v = 200 \times 20 = 4000$$\nअतः, प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ **4000** है।
**(iii) पावर लाभ ($A_p$) की गणना:**\nपावर लाभ, धारा प्रवर्धन कारक और वोल्टेज लाभ का गुणनफल होता है:
$$A_p = \beta \times A_v$$\nमानों को प्रतिस्थापित करने पर:
$$A_p = 200 \times 4000 = 800,000 = 8 \times 10^5$$\nअतः, प्रवर्धक का पावर लाभ **$8 \times 10^5$** है।
उत्तर (Answer): ### पूर्ण-तरंग दृष्टकारी का परिचय\nपूर्ण-तरंग दृष्टकारी एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक परिपथ है जिसका उपयोग प्रत्यावर्ती धारा (AC) इनपुट को स्पंदित दिष्ट धारा (DC) आउटपुट में बदलने के लिए किया जाता है। अर्ध-तरंग दृष्टकारी के विपरीत जो AC इनपुट के केवल एक आधे चक्र का उपयोग करता है, पूर्ण-तरंग दृष्टकारी AC चक्र के दोनों अर्ध-भागों का उपयोग करता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च औसत आउटपुट वोल्टेज और अधिक दक्षता प्राप्त होती है।
### परिपथ आरेख और घटक
* **ट्रांसफार्मर:** प्रत्यावर्ती वोल्टेज की आपूर्ति के लिए आमतौर पर एक सेंटर-टैप किए गए स्टेप-डाउन ट्रांसफार्मर का उपयोग किया जाता है।
* **डાયोड:** ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली के सिरों से दो जंक्शन डायोड ($D_1$ और $D_2$) जुड़े होते हैं।
* **लोड प्रतिरोध ($R_L$):** द्वितीयक कुंडली के सेंटर टैप और दोनों डायोड के सामान्य बिंदु के बीच जुड़ा होता है, जिसके पार आउटपुट DC वोल्टेज प्राप्त होता है।
### कार्यप्रणाली
* **धनात्मक अर्ध-चक्र:** AC इनपुट के धनात्मक अर्ध-चक्र के दौरान, मान लीजिए कि द्वितीयक कुंडली का ऊपरी सिरा धनात्मक और निचला सिरा ऋणात्मक है। डायोड $D_1$ अग्र-अभिनत (forward-biased) हो जाता है और लोड प्रतिरोध $R_L$ के माध्यम से धारा प्रवाहित करता है। साथ ही, डायोड $D_2$ पश्व-अभिनत (reverse-biased) होता है और चालन नहीं करता है।
* **ऋणात्मक अर्ध-चक्र:** AC इनपुट के ऋणात्मक अर्ध-चक्र के दौरान, ध्रुवता उलट जाती है; ऊपरी सिरा ऋणात्मक और निचला सिरा धनात्मक हो जाता है। डायोड $D_2$ अग्र-अभिनत हो जाता है और लोड प्रतिरोध $R_L$ के माध्यम से पहले की ही दिशा में धारा प्रवाहित करता है। इस बीच, डायोड $D_1$ पश्व-अभिनत होता है और बंद रहता है।
* **आउटपुट:** चूँकि दोनों अर्ध-चक्रों के दौरान लोड प्रतिरोधक $R_L$ से धारा एक ही दिशा में बहती है, आउटपुट एक-दिशात्मक स्पंदों की एक निरंतर श्रृंखला होती है।
### पूर्ण-तरंग दृष्टकारी की दक्षता\nदृष्टकारी की दक्षता ($\eta$) DC आउटपुट पावर और AC इनपुट पावर के अनुपात के रूप में परिभाषित की जाती है:
$$\eta = \frac{P_{dc}}{P_{ac}} \times 100\%$$\nएक पूर्ण-तरंग दृष्टकारी के लिए, अधिकतम सैद्धांतिक दक्षता लगभग **81.2%** होती है, जो अर्ध-तरंग दृष्टकारी (40.6%) से दोगुनी है।
### अर्ध-तरंग दृष्टकारी की तुलना में लाभ
1. **उच्च दक्षता:** यह AC को DC में अधिक कुशलता से परिवर्तित करता है (81.2% बनाम 40.6%)।
2. **कम रिपल:** आउटपुट में कम रिपल (स्पंदन) होता है, जिससे सुचारू DC प्राप्त करने के लिए कैपेसिटर या इंडक्टर का उपयोग करके इसे फ़िल्टर करना आसान हो जाता है।
3. **उच्च आउटपुट वोल्टेज:** औसत DC लोड करंट और वोल्टेज काफी अधिक होते हैं।
उत्तर (Answer): ### ऊर्जा बैंड निर्माण का परिचय\nएक पृथक्कृत परमाणु में, इलेक्ट्रॉन अच्छी तरह से परिभाषित, विविक्त ऊर्जा स्तरों पर कब्जा करते हैं। हालांकि, जब एक ठोस क्रिस्टल बनाने के लिए बड़ी संख्या में परमाणुओं ($10^{23}$ परमाणु/सेमी³ की कोटि के) को एक साथ लाया जाता है, तो सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन पड़ोसी परमाणुओं के साथ दृढ़ता से बातचीत करते हैं। पाउली के अपवर्जन सिद्धांत के अनुसार, कोई भी दो इलेक्ट्रॉन सभी चार क्वांटम संख्याओं का एक ही सेट नहीं रख सकते हैं। इस पारस्परिक अन्योन्यक्रिया के कारण, प्रत्येक विविक्त परमाणु ऊर्जा स्तर बारीकी से बसे हुए, निरंतर ऊर्जा स्तरों की एक बड़ी संख्या में विभाजित हो जाता है जिसे **ऊर्जा बैंड** कहा जाता है।
### महत्वपूर्ण ऊर्जा बैंड
- **संयोजकता बैंड (VB):** संयोजकता इलेक्ट्रॉनों वाले ऊर्जा बैंड को संयोजकता बैंड कहा जाता है। यह सामान्य रूप से परम शून्य तापमान पर इलेक्ट्रॉनों से भरा होता है और उच्च तापमान पर आंशिक रूप से या पूरी तरह से भरा हो सकता है। इस बैंड में इलेक्ट्रॉन विद्युत चालन में योगदान नहीं दे सकते हैं।
- **चालन बैंड (CB):** संयोजकता बैंड के ऊपर के ऊर्जा बैंड को चालन बैंड कहा जाता है। यह खाली हो सकता है या इलेक्ट्रॉनों से आंशिक रूप से भरा हो सकता है। इस बैंड में इलेक्ट्रॉन क्रिस्टल के माध्यम से स्थानांतरित होने के लिए स्वतंत्र होते हैं और विद्युत चालन के लिए जिम्मेदार होते हैं।
- **वर्जित ऊर्जा अंतराल ($E_g$):** संयोजकता बैंड के शीर्ष और चालन बैंड के निचले भाग के बीच के ऊर्जा अंतराल को वर्जित ऊर्जा अंतराल कहा जाता है। इस क्षेत्र में कोई भी इलेक्ट्रॉन नहीं रह सकता है।
### ऊर्जा बैंड के आधार पर ठोसों का वर्गीकरण
1. **चालक (धातु):**
- चालकों में, संयोजकता बैंड और चालन बैंड एक-दूसरे को ओवरलैप करते हैं, या वर्जित अंतराल अत्यधिक छोटा होता है ($E_g = 0)।
- कम तापमान पर भी चालन के लिए बड़ी संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन उपलब्ध होते हैं।
- उदाहरण: तांबा, एल्युमिनियम।
2. **कुचालक:**
- कुचालकों में, वर्जित ऊर्जा अंतराल बहुत बड़ा होता है ($E_g > 3 \text{ eV}$)।
- संयोजकता बैंड पूरी तरह से भरा होता है, और चालन बैंड पूरी तरह से खाली होता है।
- कमरे के तापमान पर, थर्मल ऊर्जा संयोजकता बैंड से चालन बैंड में इलेक्ट्रॉनों को बढ़ावा देने के लिए अपर्याप्त है, इसलिए वे बिजली का संचालन नहीं करते हैं।
- उदाहरण: हीरा, कांच।
3. **अर्धचालक:**
- अर्धचालकों में, वर्जित ऊर्जा अंतराल छोटा होता है ($E_g \approx 1 \text{ eV}$, उदा., सिलिकॉन के लिए $1.1 \text{ eV}$ और जर्मेनियम के लिए $0.7 \text{ eV}$)।
- परम शून्य तापमान पर, संयोजकता बैंड पूरी तरह से भरा होता है और चालन बैंड पूरी तरह से खाली होता है, जो कुचालक के रूप में कार्य करता है।
- कमरे के तापमान पर, थर्मल उत्तेزاز कुछ संयोजकता इलेक्ट्रॉनों को चालन बैंड में छोटे वर्जित अंतराल को पार करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे मध्यम चालकता मिलती है।
- उदाहरण: सिलिकॉन, जर्मेनियम।
उत्तर (Answer): ### दिए गए आंकड़े:
- इनपुट AC मेंस की आवृत्ति ($f$) = 50 Hz
- टर्न्स अनुपात = 2:1
- लोड प्रतिरोध ($R_L$) = 1000 $\Omega$
- द्वितीयक AC वोल्टेज का शिखर मान ($V_m$) = 50 V
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#### (i) आउटपुट धारा का शिखर मान ($I_m$):\nशिखर धारा, शिखर द्वितीयक वोल्टेज और परिपथ में कुल प्रतिरोध पर निर्भर करती है। शून्य अग्र प्रतिरोध वाले आदर्श डायोड मानकर:
$$I_m = \frac{V_m}{R_L}$$
$$I_m = \frac{50 \text{ V}}{1000 \, \Omega} = 0.05 \text{ A} = 50 \text{ mA}$$
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#### (ii) आउटपुट धारा का DC मान ($I_{dc}$):\nपूर्ण-तरंग दिष्टकारी के लिए, DC आउटपुट धारा का सूत्र है:
$$I_{dc} = \frac{2 I_m}{\pi}$$
$I_m$ का मान रखने पर:
$$I_{dc} = \frac{2 \times 0.05}{\pi} = \frac{0.1}{3.1416} \approx 0.0318 \text{ A} = 31.8 \text{ mA}$$
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#### (iii) आउटपुट धारा का RMS मान ($I_{rms}$):\nपूर्ण-तरंग दिष्टकारी के लिए आउटपुट धारा का रूट-मीन-स्क्वायर मान है:
$$I_{rms} = \frac{I_m}{\sqrt{2}}$$
$I_m$ का मान रखने पर:
$$I_{rms} = \frac{0.05}{1.414} \approx 0.0354 \text{ A} = 35.4 \text{ mA}$$
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#### (iv) आउटपुट की रिपल आवृत्ति ($f_{ripple}$):\nपूर्ण-तरंग दिष्टकारी में, इनपुट AC के धनात्मक और ऋणात्मक दोनों अर्ध-चक्रों को आउटपुट स्पंदों में दिष्टीकृत किया जाता है। इसलिए, आउटपुट रिपल की आवृत्ति इनपुट AC मेंस की आवृत्ति से दोगुनी होती है।
$$f_{ripple} = 2 \times f$$
$$f_{ripple} = 2 \times 50 \text{ Hz} = 100 \text{ Hz}$$
उत्तर (Answer): ### नैज अर्धचालक की परिभाषा\nनैज अर्धचालक अपने अत्यधिक परिष्कृत रूप में एक शुद्ध अर्धचालक सामग्री है, जिसमें कोई उल्लेखनीय अशुद्धियाँ नहीं होती हैं। उदाहरणों में जर्मेनियम (Ge) और सिलिकॉन (Si) के शुद्ध क्रिस्टल शामिल हैं। परम शून्य तापमान पर, एक नैज अर्धचालक एक कुचालक के रूप में कार्य करता है क्योंकि सभी संयोजी इलेक्ट्रॉन सहसंयोजक बंधों में कसकर बंधे होते हैं। कमरे के तापमान पर, तापीय उत्तेजना कुछ सहसंयोजक बंधों को तोड़ देती है, जिससे चालन बैंड में मुक्त इलेक्ट्रॉन और संयोजकता बैंड में कोटर (holes) उत्पन्न होते हैं। हालाँकि, नैज चालकता बहुत कम होती है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए व्यावहारिक रूप से सीमित होती है।
### डोपिंग और बाह्य अर्धचालक की अवधारणा\nनैज अर्धचालकों की विद्युत चालकता में सुधार करने के लिए, शुद्ध क्रिस्टल में उपयुक्त अशुद्धता परमाणुओं की एक नियंत्रित मात्रा मिलाई जाती है। इस प्रक्रिया को **डोपिंग** कहा जाता है, और परिणामी सामग्री को **बाह्य अर्धचालक** कहा जाता है। बाह्य अर्धचालकों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
### 1. n-प्रकार का बाह्य अर्धचालक
- **निर्माण:** जब एक शुद्ध अर्धचालक (सिलिकॉन या जर्मेनियम, जो समूह 14 से संबंधित है) को **पंचगुणी अशुद्धता** (जैसे फॉस्फोरस, आर्सेनिक या एंटीमनी जो समूह 15 से संबंधित है) के साथ डोप किया जाता है, तो पांच में से चार संयोजी इलेक्ट्रॉन चार पड़ोसी सिलिकॉन परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बंध बनाते हैं। पांचवां इलेक्ट्रॉन शिथिल रूप से बंधा होता है और इसे स्वतंत्र होने के लिए बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
- **आवेश वाहक:** ये अशुद्धता परमाणु अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन दान करते हैं और इन्हें **दाता अशुद्धियाँ (donor impurities)** कहा जाता है। n-प्रकार के अर्धचालक में, इलेक्ट्रॉन **बहुसंख्यक आवेश वाहक** होते हैं और कोटर **अल्पसंख्यक आवेश वाहक** होते हैं।
- **ऊर्जा बैंड प्रतिनिधित्व:** चालन बैंड के ठीक नीचे एक दाता ऊर्जा स्तर बनता है, जिससे कमरे के तापमान पर इलेक्ट्रॉनों के लिए चालन बैंड में कूदना बहुत आसान हो जाता है।
### 2. p-प्रकार का बाह्य अर्धचालक
- **निर्माण:** जब समूह 14 के एक शुद्ध अर्धचालक को **त्रिगुणी अशुद्धता** (जैसे बोरॉन, इंडियम या एल्यूमीनियम जो समूह 13 से संबंधित है) के साथ डोप किया जाता है, तो इसके तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन तीन पड़ोसी सिलिकॉन परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बंध बनाते हैं। चौथे बंध स्थान पर एक रिक्ति या गायब इलेक्ट्रॉन मौजूद होता है, जिसे **कोटर (hole)** कहा जाता है।
- **आवेश वाहक:** अशुद्धता परमाणु संरचना को पूरा करने के लिए पड़ोसी बंधों से इलेक्ट्रॉन स्वीकार करते हैं और इन्हें **ग्राही अशुद्धियाँ (acceptor impurities)** कहा जाता है। p-प्रकार के अर्धचालक में, कोटर **बहुसंख्यक आवेश वाहक** होते हैं और मुक्त इलेक्ट्रॉन **अल्पसंख्यक आवेश वाहक** होते हैं।
- **ऊर्जा बैंड प्रतिनिधित्व:** संयोजकता बैंड के ठीक ऊपर एक ग्राही ऊर्जा स्तर बनता है, जिससे संयोजकता बैंड के इलेक्ट्रॉनों को आसानी से इस ग्राही स्तर में कूदने की अनुमति मिलती है, जिससे संयोजकता बैंड में गतिमान कोटर बनते हैं।
उत्तर (Answer): ### दिया गया डेटा:
- सिलिकॉन डायोड का थ्रेशोल्ड वोल्टेज ($V_0$) = $0.7\text{ V}$
- प्रतिरोध ($R$) = $200\text{ }\Omega$
- बैटरी वोल्टेज ($V$) = $5\text{ V}$
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### (i) परिपथ धारा ($I$) की गणना:\nजब डायोड अग्र-बायस में है और चालन कर रहा है, तो परिपथ में धारा प्रवाहित करने वाला प्रभावी वोल्टेज बैटरी वोल्टेज माइनस डायोड का थ्रेशोल्ड वोल्टेज होता है।
$$\text{प्रभावी वोल्टेज } (V_{\text{eff}}) = V - V_0$$
$$V_{\text{eff}} = 5\text{ V} - 0.7\text{ V} = 4.3\text{ V}$$
\nओम के नियम का उपयोग करते हुए, परिपथ धारा $I$ है:
$$I = \frac{V_{\text{eff}}}{R}$$
$$I = \frac{4.3\text{ V}}{200\text{ }\Omega} = 0.0215\text{ A} = 21.5\text{ mA}$$
**उत्तर (i):** परिपथ धारा **$21.5\text{ mA}$** है।
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### (ii) प्रतिरोधक पर विभवांतर ($V_R$) की गणना:\nप्रतिरोधक $R$ पर विभवांतर की गणना ओम के नियम से की जा सकती है:
$$V_R = I \times R$$
$$V_R = 0.0215\text{ A} \times 200\text{ }\Omega = 4.3\text{ V}$$
**उत्तर (ii):** प्रतिरोधक पर विभवांतर **$4.3\text{ V}$** है।
---
### (iii) गतिक प्रतिरोध ($r_d$) की गणना:\nगतिक प्रतिरोध को वोल्टेज में थोड़े से परिवर्तन और धारा में संगत थोड़े से परिवर्तन के अनुपात के रूप में परिभाषित किया जाता है।
$$\Delta V = 0.1\text{ V}$$
$$\Delta I = 15\text{ mA} - 10\text{ mA} = 5\text{ mA} = 5 \times 10^{-3}\text{ A}$$
\nगतिक प्रतिरोध के सूत्र का उपयोग करते हुए:
$$r_d = \frac{\Delta V}{\Delta I}$$
$$r_d = \frac{0.1\text{ V}}{5 \times 10^{-3}\text{ A}} = \frac{0.1}{0.005} = 20\text{ }\Omega$$
**उत्तर (iii):** गतिक प्रतिरोध **$20\text{ }\Omega$** है।
उत्तर (Answer): ### 1. नैज अर्धचालक (Intrinsic Semiconductors)\nनैज अर्धचालक बिना किसी महत्वपूर्ण अशुद्धता परमाणु को मिलाए अपने अत्यधिक परिष्कृत रूप में एक शुद्ध अर्धचालक सामग्री है। उदाहरणों में शुद्ध सिलिकॉन (Si) और जर्मेनियम (Ge) शामिल हैं।
* **मुख्य विशेषताएं:**
* निरपेक्ष शून्य तापमान ($0\text{ K}$) पर, संयोजी बैंड पूरी तरह से भरे होते हैं और चालन बैंड पूरी तरह से खाली होते हैं, जिससे यह एक आदर्श कुचालक के रूप में कार्य करता है।
* कमरे के तापमान पर, ऊष्मीय ऊर्जा सहसंयोजक बंधों को तोड़ती है, जिससे मुक्त इलेक्ट्रॉनों और कोटरों (holes) की समान संख्या उत्पन्न होती है ($n_e = n_h = n_i$)।
* कमरे के तापमान पर विद्युत चालकता काफी कम होती है।
### 2. बाह्य अर्धचालक और डोपिंग\nव्यावहारिक इलेक्ट्रॉनिक अनुप्रयोगों के लिए नैज अर्धचालकों की विद्युत चालकता में सुधार करने के लिए, उपयुक्त अशुद्धता परमाणुओं की एक छोटी, नियंत्रित मात्रा मिलाई जाती है। इस प्रक्रिया को **डोपिंग** कहा जाता है, और परिणामी अशुद्ध अर्धचालक को **बाह्य (extrinsic) अर्धचालक** कहा जाता है।
* मिलाई गई अशुद्धता के प्रकार के आधार पर, बाह्य अर्धचालकों को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
### 3. n-प्रकार के अर्धचालक (n-Type Semiconductors)\nएक n-प्रकार का अर्धचालक तब बनता है जब एक शुद्ध अर्धचालक (सिलिकॉन जैसे समूह 14 के तत्व) को पंचसंयोजी (pentavalent) अशुद्धता परमाणु (समूह 15 का तत्व जैसे आर्सेनिक, एंटीमनी, या फॉस्फोरस) के साथ डोप किया जाता है।
* **तंत्र:** अशुद्धता परमाणु के चार संयोजी इलेक्ट्रॉन चार पड़ोसी सिलिकॉन परमाणुओं के साथ सहसंयोजक बंध बनाते हैं। पांचवां संयोजी इलेक्ट्रॉन शिथिल रूप से बंधा होता है और चालन बैंड में प्रवेश करने के लिए बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो एक दाता (donor) के रूप में कार्य करता है।
* **आवेश वाहक:** इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं, और कोटर अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं।
### 4. p-प्रकार के अर्धचालक (p-Type Semiconductors)\nएक p-प्रकार का अर्धचालक तब बनता है जब एक शुद्ध अर्धचालक (सिलिकॉन जैसे समूह 14 के तत्व) को त्रिसंयोजी (trivalent) अशुद्धता परमाणु (समूह 13 का तत्व जैसे बोरॉन, इंडियम, या गैलियम) के साथ डोप किया जाता है।
* **तंत्र:** अशुद्धता के तीन संयोजी इलेक्ट्रॉन तीन पड़ोसी सिलिकॉन के साथ सहसंयोजक बंध बनाते हैं, जिससे चौथे बंध में एक रिक्ति या 'कोटर' (hole) छूट जाता है। यह संयोजी बैंड के ठीक ऊपर एक ग्राही स्तर बनाता है, जो इलेक्ट्रॉन को स्वीकार करने के लिए तैयार रहता है।
* **आवेश वाहक:** कोटर बहुसंख्यक आवेश वाहक होते हैं, और इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक आवेश वाहक होते हैं।
### अंतर की सारांश तालिका:
| विशेषता | नैज अर्धचालक | n-प्रकार अर्धचालक | p-प्रकार अर्धचालक |
| :--- | :--- | :--- | :--- |
| **शुद्धता** | शुद्ध रूप | पंचसंयोजी अशुद्धता से डोपित | त्रिसंयोजी अशुद्धता से डोपित |
| **आवेश वाहक** | $n_e = n_h$ | $n_e \gg n_h$ (इलेक्ट्रॉन बहुसंख्यक) | $n_h \gg n_e$ (कोटर बहुसंख्यक) |
| **चालकता** | कम | उच्च | उच्च |
उत्तर (Answer): ### दिया गया डेटा:
* धारा लाभ ($\beta$) = $50$
* लोड प्रतिरोध ($R_L$) = $4 \text{ k}\Omega = 4 \times 10^3 \Omega$
* इनपुट प्रतिरोध ($r_i$) = $1 \text{ k}\Omega = 1 \times 10^3 \Omega$
### सूत्र:
1. **वल्टेज लाभ ($A_v$):**
$$A_v = \beta \times \frac{R_L}{r_i}$$
वैकल्पिक रूप से, $A_v = \text{धारा लाभ} \times \text{प्रतिरोध लाभ}$
2. **शक्ति लाभ ($A_p$):**
$$A_p = \beta^2 \times \frac{R_L}{r_i}$$
वैकल्पिक रूप से, $A_p = \text{वोल्टेज लाभ} \times \text{धारा लाभ}$
### चरण-दर-चरण गणना:
**चरण 1: वोल्टेज लाभ ($A_v$) की गणना करें**\nदिए गए मानों को वोल्टेज लाभ सूत्र में प्रतिस्थापित करें:
$$A_v = 50 \times \left( \frac{4 \times 10^3 \Omega}{1 \times 10^3 \Omega} \right)$$
$$A_v = 50 \times 4$$
$$A_v = 200$$
**चरण 2: शक्ति लाभ ($A_p$) की गणना करें**\nपरिकलित वोल्टेज लाभ और दिए गए धारा लाभ को शक्ति लाभ सूत्र में प्रतिस्थापित करें:
$$A_p = A_v \times \beta$$
$$A_p = 200 \times 50$$
$$A_p = 10,000$$
\nवैकल्पिक रूप से, प्रत्यक्ष शक्ति लाभ सूत्र का उपयोग करके:
$$A_p = (50)^2 \times \left( \frac{4 \times 10^3}{1 \times 10^3} \right)$$
$$A_p = 2500 \times 4 = 10,000$$
### अंतिम उत्तर:
* प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ **200** है।
* प्रवर्धक का शक्ति लाभ **10,000** है।
उत्तर (Answer): ### दृष्टकारी का परिचय\nदृष्टकारी एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक युक्ति है जिसका उपयोग प्रत्यावर्ती धारा (AC) को दिष्ट धारा (DC) में बदलने के लिए किया जाता है। एक अकेला p-n संधि डायोड अर्ध-तरंग दृष्टकारी के रूप में कार्य कर सकता है क्योंकि यह केवल तभी विद्युत धारा को आसानी से प्रवाहित होने देता है जब यह अग्र अभिनत (forward biased) होता है।
### परिपथ आरेख और घटक\nअर्ध-तरंग दृष्टकारी परिपथ में निम्नलिखित शामिल होते हैं:
* एक AC स्रोत जो प्रत्यावर्ती इनपुट वोल्टेज प्रदान करता है।
* उच्च AC वोल्टेज को वांछित निचले मान तक कम करने के लिए एक उच्चायी/अपचायी ट्रांसफार्मर।
* ट्रांसफार्मर की द्वितीयक कुंडली और एक लोड प्रतिरोध $R_L$ के साथ श्रेणी क्रम में जुड़ा एक p-n संधि डायोड।
* आउटपुट वोल्टेज ($V_0$) लोड प्रतिरोध $R_L$ के सिरों पर प्राप्त किया जाता है।
### कार्यप्रणाली\nअर्ध-तरंग दृष्टकारी की कार्यप्रणाली को AC इनपुट के दो अर्ध-चक्रों में विभाजित किया जा सकता है:
1. **धनात्मक अर्ध-चक्र के दौरान:** जब प्रत्यावर्ती इनपुट वोल्टेज अपने धनात्मक अर्ध-चक्र से गुजरता है, तो ट्रांसफार्मर के द्वितीयक का सिरा A, सिरे B के सापेक्ष धनात्मक हो जाता है। इससे p-n संधि डायोड अग्र-अभिनत हो जाता है। परिणामस्वरूप, डायोड बहुत कम प्रतिरोध प्रदान करता है, और लोड प्रतिरोध $R_L$ के माध्यम से धारा प्रवाहित होती है, जिससे $R_L$ के सिरों पर एक संगत धनात्मक वोल्टेज पतन उत्पन्न होता है।
2. **ऋणात्मक अर्ध-चक्र के दौरान:** अगले अर्ध-चक्र के दौरान, इनपुट AC वोल्टेज अपनी ध्रुवीयता को उलट देता है। सिरा A ऋणात्मक और सिरा B धनात्मक हो जाता है। इससे p-n संधि डायोड पश्च-अभिनत (reverse-biased) हो जाता है। इस स्थिति में, डायोड अत्यधिक उच्च प्रतिरोध प्रदान करता है, और परिपथ में व्यावहारिक रूप से कोई धारा प्रवाहित नहीं होती है। परिणामस्वरूप, लोड प्रतिरोध $R_L$ के सिरों पर आउटपुट वोल्टेज शून्य होता है।
### आउटपुट तरंग रूप और दक्षता
* **तरंग रूप:** चूंकि धारा केवल इनपुट AC के धनात्मक अर्ध-चक्रों के दौरान प्रवाहित होती है, इसलिए लोड प्रतिरोध पर आउटपुट में शून्य धारा की अवधि से अलग एकदिशात्मक पल्स होते हैं। इस प्रकार, इनपुट AC तरंग का केवल आधा भाग उपयोग किया जाता है, इसलिए इसे 'अर्ध-तरंग दृष्टकारी' कहा जाता है।
* **दक्षता:** अर्ध-तरंग दृष्टकारी की अधिकतम सैद्धांतिक दक्षता लगभग 40.6% होती है। इसके स्पंदित आउटपुट और कम दक्षता के कारण, इसे भारी शक्ति अनुप्रयोगों के लिए पसंद नहीं किया जाता है, लेकिन यह कम-शक्ति वाले इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में उपयोगी है।
उत्तर (Answer): जेनर डायोड एक भारी रूप से अपमिश्रित सिलिकॉन p-n संधि डायोड है जिसे विशेष रूप से बिना किसी क्षति के पश्च भंजन क्षेत्र (reverse breakdown region) में संचालित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। सामान्य डायोडों के विपरीत जो अपनी पश्च भंजन वोल्टता से आगे संचालित होने पर नष्ट हो सकते हैं, जेनर डायोड पश्च धाराओं की एक विस्तृत श्रृंखला में अपने टर्मिनलों पर लगभग स्थिर भंजन वोल्टता ($V_z$) बनाए रखता है।
\nएक वोल्टता नियामक के रूप में, जेनर डायोड को भार प्रतिरोध ($R_L$) के पार समानांतर में जोड़ा जाता है जहाँ एक स्थिर DC वोल्टता की आवश्यकता होती है, और कुल धारा को सीमित करने के लिए परिपथ में एक श्रेणी प्रतिरोध ($R_s$) रखा जाता है। जब इनपुट DC वोल्टता उतार-चढ़ाव करती है या बढ़ती है, तो जेनर डायोड के पार वोल्टता बढ़ने लगती है। चूंकि जेनर डायोड अपने भंजन क्षेत्र में काम करता है, इसलिए इनपुट वोल्टता में कोई भी वृद्धि पूरी तरह से श्रेणी प्रतिरोधक $R_s$ पर गिरती है, जबकि जेनर डायोड पर और इसलिए समानांतर भार पर वोल्टता वस्तुतः $V_z$ पर स्थिर रहती है। यदि भार धारा घट जाती है, तो जेनर डायोड कुल धारा को स्थिर बनाए रखने के लिए स्वचालित रूप से अधिक धारा खींचता है, जिससे भार पर एक स्थिर और विनियमित आउटपुट वोल्टता सुनिश्चित होती है।
उत्तर (Answer): दिए गए आँकड़े:
- धारा लाभ ($\beta$) = 50
- आधार धारा में परिवर्तन ($\Delta I_B$) = $20 \text{ }\mu\text{A} = 20 \times 10^{-6} \text{ A}$
1. संग्राहक धारा में परिवर्तन ($\Delta I_C$) की गणना:\nधारा लाभ $\beta$, संग्राहक धारा में परिवर्तन और आधार धारा में परिवर्तन के बीच का संबंध है:
$\beta = \frac{\Delta I_C}{\Delta I_B}$\nअतः,
$\Delta I_C = \beta \times \Delta I_B$
$\Delta I_C = 50 \times (20 \times 10^{-6} \text{ A})$
$\Delta I_C = 1000 \times 10^{-6} \text{ A} = 1 \times 10^{-3} \text{ A} = 1 \text{ mA}$
2. उत्सर्जक धारा में परिवर्तन ($\Delta I_E$) की गणना:\nट्रांजिस्टर के लिए किर्चॉफ के धारा नियम के अनुसार, उत्सर्जक धारा संग्राहक धारा और आधार धारा का योग होती है:
$\Delta I_E = \Delta I_C + \Delta I_B$
$\Delta I_E = 1 \text{ mA} + 0.02 \text{ mA} = 1.02 \text{ mA}$
\nअतः, संग्राहक धारा में परिवर्तन 1 mA है और उत्सर्जक धारा में परिवर्तन 1.02 mA है।
उत्तर (Answer): अर्धचालकों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: नैज और अपद्रव्यी। एक नैज अर्धचालक प्रकृति में रासायनिक रूप से शुद्ध होता है, जिसमें कोई महत्वपूर्ण अशुद्धि परमाणु नहीं होते हैं। इसके विपरीत, एक अपद्रव्यी अर्धचालक एक शुद्ध अर्धचालक में थोड़ी सी, नियंत्रित मात्रा में अशुद्धि परमाणुओं (या तो त्रिसंयोजक या पंचसंयोजक) को जानबूझकर अपमिश्रित (doping) करके बनाया जाता है।
\nविद्युत चालकता के संबंध में, कमरे के तापमान पर नैज अर्धचालक की विद्युत चालकता बहुत कम होती है क्योंकि आवेश वाहक (मुफ्त इलेक्ट्रॉन और कोटर) पूरी तरह से सहसंयोजक बंधों के तापीय टूटने के कारण उत्पन्न होते हैं। दूसरी ओर, अपद्रव्यी अर्धचालक में अशुद्धि अपमिश्रण प्रक्रिया द्वारा लाए गए इलेक्ट्रॉनों (n-प्रकार में) या कोटरों (p-प्रकार में) की बड़ी अधिकता के कारण काफी अधिक विद्युत चालकता होती है।
\nतापमान निर्भरता के संदर्भ में, तापमान में वृद्धि के साथ दोनों प्रकारों की चालकता बढ़ती है, लेकिन तंत्र भिन्न होता है। नैज अर्धचालकों में, तापीय रूप से उत्पन्न इलेक्ट्रॉन-कोटर युग्मों में तेजी से वृद्धि के कारण चालकता घातीय रूप से बढ़ती है। अपद्रव्यी अर्धचालकों में, मध्यम तापमान सीमा पर चालकता अपेक्षाकृत स्थिर होती है क्योंकि वाहक सांद्रता मुख्य रूप से अपमिश्रण स्तर द्वारा निर्धारित होती है, हालांकि बहुत उच्च तापमान नैज-जैसी स्थिति पैदा कर सकता है क्योंकि तापीय उत्पादन अशुद्धि योगदान से अधिक हो जाता है।
उत्तर (Answer): दिए गए आँकड़े:
- स्रोत वोल्टता ($V$) = 12 V
- सिलिकॉन डायोड पर अगर विभव पतन ($V_d$) = 0.7 V
- प्रतिरोध ($R$) = $2.2 \text{ k}\Omega = 2.2 \times 10^3 \Omega = 2200 \Omega$
\nपरिपथ के लिए किर्चॉफ के वोल्टता नियम के अनुसार, प्रतिरोधक पर उपलब्ध कुल वोल्टता है:
$V_R = V - V_d$
$V_R = 12 \text{ V} - 0.7 \text{ V} = 11.3 \text{ V}$
\nओम के नियम का उपयोग करते हुए, परिपथ में बहने वाली धारा $I$ है:
$I = \frac{V_R}{R}$
$I = \frac{11.3 \text{ V}}{2200 \Omega}$
$I \approx 0.005136 \text{ A}$
$I \approx 5.14 \text{ mA}$
\nअतः, परिपथ में प्रवाहित होने वाली धारा लगभग 5.14 mA है।
उत्तर (Answer): अर्ध-तरंग दृष्टिकारी के लिए, आउटपुट आवृत्ति इनपुट आवृत्ति के बराबर होती है। इसलिए, यदि इनपुट आवृत्ति 50 Hz है, तो आउटपुट आवृत्ति भी 50 Hz होगी। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अर्ध-तरंग दृष्टिकारी प्रत्यावर्ती इनपुट वोल्टता के केवल एक अर्ध-चक्र (धनात्मक या ऋणात्मक) को भार तक पहुँचने देता है और दूसरे अर्ध-चक्र को अवरुद्ध कर देता है। चूकि इनपुट AC वोल्टता के प्रत्येक पूर्ण चक्र के लिए आउटपुट धारा का केवल एक स्पंद प्राप्त होता है, इसलिए स्पंदित आउटपुट की आवृत्ति इनपुट AC के समान ही रहती है।
\nदूसरी ओर, पूर्ण-तरंग दृष्टिकारी के लिए, आउटपुट आवृत्ति इनपुट आवृत्ति की दोगुनी होती है। इसलिए, यदि इनपुट आवृत्ति 50 Hz है, तो आउटपुट आवृत्ति 2 × 50 = 100 Hz होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूर्ण-तरंग दृष्टिकारी इनपुट प्रत्यावर्ती वोल्टता के धनात्मक और ऋणात्मक दोनों अर्ध-चक्रों का उपयोग करता है। इनपुट AC के प्रत्येक पूर्ण चक्र के लिए, आउटपुट धारा के दो स्पंद प्राप्त होते हैं (धनात्मक अर्ध-चक्र के लिए एक और धनात्मक में परिवर्तित ऋणात्मक अर्ध-चक्र के लिए दूसरा)। परिणामस्वरूप, आउटपुट में प्रति सेकंड चक्रों की संख्या दोगुनी हो जाती है, जिससे आउटपुट आवृत्ति इनपुट आवृत्ति से दोगुनी हो जाती है।