मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 12 रसायन विज्ञान
#### अध्याय: उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds) - त्वरित पुनरीक्षण नोट्स
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1. मुख्य शब्दावली और परिभाषाएँ (Key Definitions)
- उपसहसंयोजन यौगिक (Coordination Compounds): वे यौगिक जिनमें एक केंद्रीय धातु परमाणु या आयन निश्चित संख्या में उदासीन अणुओं या ऋणायनों (लिगेंड्स) से उपसहसंयोजक बंधों द्वारा जुड़ा होता है।
- द्विक लवण (Double Salts): ऐसे योजक यौगिक जो ठोस अवस्था में तो स्थिर होते हैं लेकिन जल में घोलने पर अपने अवयवी आयनों में पूरी तरह टूट जाते हैं।
- उदाहरण:
FeSO4 \cdot (NH4)2SO4 \cdot 6H_2O (मोह्र लवण)।
- केंद्रीय धातु परमाणु/आयन (Central Metal Atom/Ion): उपसहसंयोजन सत्ता में वह निश्चित धातु परमाणु या आयन जो निश्चित संख्या में लिगेंड्स से इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करता है और लुईस अम्ल की तरह व्यवहार करता है।
- लिगेंड (Ligands): वे आयन या उदासीन अणु जो केंद्रीय धातु परमाणु/आयन को इलेक्ट्रॉन युग्म दान करते हैं और लुईस क्षार की तरह व्यवहार करते हैं।
- उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number - CN): केंद्रीय धातु परमाणु या आयन के साथ सीधे जुड़े हुए sigma बंधों की कुल संख्या (या लिगेंड्स द्वारा बनाए गए उपसहसंयोजक बंधों की संख्या)।
- ऑक्सीकरण संख्या (Oxidation Number): केंद्रीय धातु परमाणु पर उपस्थित आवेश, यदि सभी लिगेंड्स को उनके इलेक्ट्रॉन युग्मों सहित हटा दिया जाए।
- किलेट प्रभाव (Chelate Effect): जब कोई द्विदंतुत या बहुदंतुत लिगेंड धातु आयन के साथ दो या अधिक सहसंयोजक बंध बनाकर एक वलय (Ring) जैसी संरचना बनाता है, तो इसे किलेट लिगेंड कहते हैं और इसका संकुल अधिक स्थायी होता है।
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2. लिगेंड्स के प्रकार (Types of Ligands)
- एकदंतुत (Monodentate): जो केवल एक donor atom रखते हैं। (जैसे:
Cl^-, H2O, NH3, CN^-)
- द्विदंतुत (Bidentate): जो दो donor atoms रखते हैं। (जैसे: एथिलीनडाइऐमीन
en, ऑक्सैलेट आयन C2O4^{2-})
- बहुदंतुत (Polydentate): जो दो से अधिक donor atoms रखते हैं। (जैसे: EDTA^{4-})
- उभयंतुक लिगेंड (Ambidentate Ligands): वे एकदंतुत लिगेंड जिनमें दो अलग-अलग दाता परमाणु होते हैं लेकिन एक समय में एक ही जुड़ता है। (जैसे:
-NO_2 और -ONO, -SCN और -NCS)
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3. वर्नर का उपसहसंयोजन सिद्धांत (Werner's Coordination Theory)
1. उपसहसंयोजन यौगिकों में धातु दो प्रकार की संयोजकता दर्शाती है:
- प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency): यह ऑक्सीकरण अवस्था से संबंधित होती है और आयनित होती है (इसे डॉटेड लाइन से दर्शाते हैं)।
- द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency): यह उपसहसंयोजन संख्या से संबंधित होती है, अनआयनित होती है और निश्चित ज्यामिति तय करती है (इसे ठोस लाइन से दर्शाते हैं)।
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4. उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण (IUPAC Nomenclature)
नियम:
1. हमेशा धनायन का नाम पहले और ऋणायन का नाम बाद में लिखा जाता है।
2. संकुल मंडल (Coordination sphere) के अंदर, लिगेंड्स के नाम वर्णमाला क्रम (Alphabetical order) में लिखे जाते हैं, धातु से पहले।
3. यदि लिगेंड उदासीन है तो उसका सामान्य नाम, ऋणायन है तो अंत में 'o' जोड़ा जाता है (जैसे: क्लोरो, साइनो), और धनायन है तो अंत में 'ium' आता है।
4. लिगेंड्स की संख्या बताने के लिए di, tri, tetra का प्रयोग करते हैं। यदि लिगेंड के नाम में पहले से di/tri हो, तो bis, tris का प्रयोग करते हैं।
5. यदि संकुल आयन ऋणायनी है, तो केंद्रीय धातु के नाम के अंत में '-एट' (-ate) जोड़ा जाता है (जैसे: फेरेट, अर्जेन्टेत)।
6. धातु के तुरंत बाद कोष्ठक में उसकी ऑक्सीकरण संख्या रोमन अंकों में लिखी जाती है।
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5. isomerism (समावयवता)
- त्रिविम समावयवता (Stereoisomerism):
- ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism): Cis (समान समूह एक तरफ) और Trans (समान समूह विपरीत तरफ)। सामान्यतः
[MX2L2] और [MX4L2] प्रकार के अष्टफलकीय और समतल वर्गाकार संकुलों में पाई जाती है।
- ध्रुवण समावयवता (Optical Isomerism): जो यौगिक समतल ध्रुवित प्रकाश को घुमाते हैं (ध्रुवण घूर्णक)। ये ध्रुवण समावयवी (d और l रूप) बनाते हैं।
- संरचनात्मक समावयवता (Structural Isomerism):
- आयनन समावयवता (Ionization Isomerism): संकुल के अंदर और बाहर आयनों का आदान-प्रदान (जैसे:
[Co(NH3)5SO4]Br और [Co(NH3)5Br]SO4)।
- जलयोजन समावयवता (Hydrate Isomerism): विलायक (जल के अणुओं) का अंदर और बाहर होना।
- सहसंयोजन समावयवता (Coordination Isomerism): धनायन और ऋणायन दोनों भागों में लिगेंड्स का आपस में बदलना।
- बंधन समावयवता (Linkage Isomerism): उभयंतुक लिगेंड्स के कारण उत्पन्न होती है।
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6. बंधन के सिद्धांत (Bonding Theories)
#### (क) संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory - VBT)
- धातु आयन अपने खाली कक्षकों (s, p, d) का संकरण (Hybridization) करके उपयुक्त संख्या में रिक्त कक्षक बनाता है।
- संकरण और ज्यामिति:
sp^3 $\rightarrow$ चतुष्फलकीय (Tetrahedral)
dsp^2 $\rightarrow$ समतल वर्गाकार (Square Planar)
sp^3d^2 या d^2sp^3 $\rightarrow$ अष्टफलकीय (Octahedral)
- चुंबकीय आघूर्ण (Magnetic Moment):
- सूत्र:
\mu = \sqrt{n(n + 2)} BM (बोर मैग्नेटॉन)
- यहाँ
n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों (Unpaired electrons) की संख्या है।
- आंतरिक और बाह्य कक्षक संकुल:
d^2sp^3 $\rightarrow$ आंतरिक कक्षक संकुल (निम्न चक्रण / प्रबल लिगेंड)
sp^3d^2 $\rightarrow$ बाह्य कक्षक संकुल (उच्च चक्रण / दुर्बल लिगेंड)
#### (ख) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory - CFT)
- यह एक स्थिर वैद्युत (Electrostatic) मॉडल है जिसमें लिगेंड को बिंदु आवेश (Point charge) माना जाता है।
- अष्टफलकीय संकुलों में d-कक्षकों का विभाजन:
- d-कक्षक दो सेटों में टूट जाते हैं:
t{2g} (कम ऊर्जा) और eg (अधिक ऊर्जा)।
- ऊर्जा अंतराल को Crystal Field Splitting Energy ($\Delta_o$) कहते हैं।
- स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी (Spectrochemical Series):
लिगेंड्स का उनकी बढ़ती हुई शक्ति के आधार पर क्रम:
I^- < Br^- < SCN^- < Cl^- < S^{2-} < F^- < OH^- < C2O4^{2-} < H2O < NCS^- < edta^{4-} < NH3 < en < NO_2^- < CN^- < CO
- चक्रण युग्मन ऊर्जा (P) और $\Delta_o$ का प्रभाव:
- यदि
\Deltao < P $\rightarrow$ दुर्बल लिगेंड $\rightarrow$ उच्च चक्रण संकुल (eg में इलेक्ट्रॉन जाएंगे)।
- यदि
\Deltao > P $\rightarrow$ प्रबल लिगेंड $\rightarrow$ निम्न चक्रण संकुल (t{2g} में युग्मन होगा)।
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7. उपसहसंयोजन यौगिकों के अनुप्रयोग (Applications)
- धातुओं के निष्कर्षण में (जैसे: सिल्वर और गोल्ड के सायनाइड प्रक्रम में)।
- गुणात्मक और मात्रात्मक विश्लेषण में (जैसे:
Ni^{2+} का DMG के साथ लाल अवक्षेप)।
- जैव प्रणालियों में (जैसे: क्लोरोफिल मैग्नीशियम का संकुल है, हीमोग्लोबिन आयरन का है, और विटामिन B12 कोबाल्ट का संकुल है)।
- कैंसर के उपचार में सिसप्लैटिन (
cis-[Pt(NH3)2Cl_2]) का उपयोग।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 उपसहसंयोजन यौगिक
परिचय और मूल अवधारणाएँ
द्विक लवण (डबल साल्ट)
उपसहसंयोजन यौगिक
वर्नर का उपसहसंयोजन सिद्धांत
प्राथमिक संयोजकताएँ
द्वितीयक संयोजकताएँ
महत्वपूर्ण शब्दावली
उपसहसंयोजन सत्ता
केंद्रीय धातु परमाणु/आयन
लिगेंड
एकदंतुर
द्विदंतुर
बहुदंतुर
उभयधर्मी लिगेंड
किलेट लिगेंड
उपसहसंयोजन संख्या (कोऑर्डिनेशन नंबर)
उपसहसंयोजन बहुफलक
समन्वय मंडल (कोऑर्डिनेशन स्फीयर)
ऑक्सीकरण अवस्था
नामकरण पद्धति (IUPAC)
नियम
धनायन का नाम पहले
लिगेंडों का वर्णमाला क्रम
केंद्रीय धातु का नाम
ऑक्सीकरण संख्या (रोमन अंकों में)
उदाहरण और अभ्यास
समावयवता (Isomerism)
त्रिविम समावयवता
ज्यामितीय समावयवता (सिल्स और ट्रांस)
ध्रुवण समावयवता
संरचनात्मक समावयवता
आबंधन समावयवता
समन्वय समावयवता
आयनन समावयवता
विलायकयोजन (हाइड्रेट) समावयवता
बंधन के सिद्धांत
संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT)
संकरण (जैसे $sp^3, d^2sp^3$)
आंतरिक और बाह्य कक्षा संकुल
चुंबकीय गुण
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT)
डी-कक्षकों का विपाटन (Splitting)
अष्टफलकीय संकुल ($eg$ और $t{2g}$)
चतुष्फलकीय संकुल
क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE)
स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी
रंगीन संकुल का निर्माण
धातु कार्बोनिल्स और बंधन
कार्बोनिल यौगिकों की संरचना
synergic bond ( synergistic bonding )
उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व और अनुप्रयोग
गुणात्मक और मात्रात्मक विश्लेषण
धातु निष्कर्षण (धातुकर्म)
जैविक प्रणालियाँ (क्लोरोफिल, हीमोग्लोबिन, विटामिन $B_{12}$)
औषधीय उपयोग (कैंसर उपचार में सिसप्लैटिन)
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### उपसहसंयोजन यौगिकों के लिए संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)
\nसंयोजकता आबंध सिद्धांत का प्रतिपादन लिनस पॉलिंग द्वारा उपसहसंयोजन यौगिकों के निर्माण, चुंबकीय गुणों और ज्यामितीय संरचनाओं को समझाने के लिए किया गया था। यह सिद्धांत केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और लिगेंड्स के बीच परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन पर केंद्रित है।
#### VBT के मुख्य अभिगृहीत
- **उपसहसंयोजन संख्या और कक्षक:** केंद्रीय धातु परमाणु या आयन अपने उपसहसंयोजन संख्या के बराबर रिक्त कक्षक उपलब्ध कराता है ताकि लिगेंड्स के साथ उपसहसंयोजक बंध बन सकें।
- **संकरण:** ये रिक्त कक्षक (सामान्यतः s, p, और d कक्षक) निश्चित दिशात्मक ज्यामिति वाले समतुल्य संकर कक्षकों का निर्माण करने के लिए संकरण (मिश्रण) से गुजरते हैं (उदा. चतुष्फलकीय के लिए $sp^3$, अष्टफलकीय के लिए $d^2sp^3$ या $sp^3d^2$)।
- **उपसहसंयोजक बंध का निर्माण:** प्रत्येक लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु के इन रिक्त संकर कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का एक युग्म दान करता है।
- **आंतरिक और बाह्य कक्षक संकुल:** संकरण में प्रयुक्त d-कक्षक आंतरिक $(n-1)d$ शेल के हैं या बाह्य $nd$ शेल के, इसके आधार पर संकुलों को आंतरिक कक्षक (निम्न चक्रण) या बाह्य कक्षक (उच्च चक्रण) संकुलों में वर्गीकृत किया जाता है।
- **चुंबकीय गुण:** अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति अनुचुंबकीय प्रकृति प्रदान करती है, जबकि सभी युग्मित इलेक्ट्रॉन प्रतिचुंबकीय प्रकृति उत्पन्न करते हैं।
#### $[Co(F_6)]^{3-}$ और $[Co(NH_3)_6]^{3-}$ पर अनुप्रयोग
1. **$[Co(F_6)]^{3-}$ संकुल:**
- Co की ऑक्सीकरण अवस्था $+3$ है।
- $Co^{3+}$ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $[Ar] 3d^6$ है।
- $F^-$ एक दुर्बल क्षेत्र लिगेंड है और $3d$ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराने में असमर्थ है।
- प्रयुक्त संकरण $sp^3d^2$ है जिसमें बाहरी $4s, 4p$ और $4d$ कक्षकों का उपयोग होता है।
- ज्यामिति: अष्टफलकीय।
- चुंबकीय व्यवहार: इसमें 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, अतः यह अनुचुंबकीय है और उच्च-चक्रण संकुल बनाता है।
2. **$[Co(NH_3)_6]^{3-}$ संकुल:**
- Co की ऑक्सीकरण अवस्था $+3$ है।
- $Co^{3+}$ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $[Ar] 3d^6$ है।
- $NH_3$ एक प्रबल क्षेत्र लिगेंड है और $3d$ कक्षकों के इलेक्ट्रॉनों को युग्मित होने के लिए बाध्य करता है।
- प्रयुक्त संकरण $d^2sp^3$ है जिसमें आंतरिक $3d, 4s$ और $4p$ कक्षकों का उपयोग होता है।
- ज्यामिति: अष्टफलकीय।
- चुंबकीय व्यवहार: इसमें कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होता, अतः यह प्रतिचुंबकीय है और निम्न-चक्रण संकुल बनाता है।
#### VBT की सीमाएं
- इसमें कई मान्यताएं शामिल हैं और यह चुंबकीय डेटा की मात्रात्मक व्याख्या प्रदान नहीं करता है।
- यह उपसहसंयोजन यौगिकों द्वारा प्रदर्शित रंग को नहीं समझाता है।
- यह उपसहसंयोजन यौगिकों के ऊष्मगतिकीय या गतिज स्थायित्व की मात्रात्मक व्याख्या देने में असफल रहता है।
- यह प्रायोगिक समर्थन के बिना दुर्बल और प्रबल क्षेत्र लिगेंडों के बीच ठीक से अंतर नहीं करता है।
उत्तर (Answer): ### $d^4$ अष्टफलकीय संकुल के लिए क्रिस्टल क्षेत्र स्थिरीकरण ऊर्जा (CFSE) की गणना
\nएक अष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में, पाँचों $d$ कक्षकों की अपभ्रष्टता (degeneracy) समाप्त हो जाती है और वे दो सेटों में विभाजित हो जाते हैं:
1. **$t_{2g}$ सेट:** इसमें $d_{xy}, d_{yz}, d_{zx}$ कक्षक शामिल होते हैं, जिनकी ऊर्जा बैरीसेंटर के सापेक्ष $-0.4\Delta_o$ कम होती है।
2. **$e_g$ सेट:** इसमें $d_{x^2-y^2}, d_{z^2}$ कक्षक शामिल होते हैं, जिनकी ऊर्जा बैरीसेंटर के सापेक्ष $+0.6\Delta_o$ अधिक होती है।
$t_{2g}$ और $e_g$ कक्षकों के बीच $d$ इलेक्ट्रॉनों का वितरण क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) और युग्मन ऊर्जा ($P$) के相対 परिमाणों पर निर्भर करता है।
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#### स्थिति 1: दुर्बल क्षेत्र लिगेंड वातावरण ($\Delta_o < P$)\nजब लिगेंड दुर्बल होता है, तो एक ही कक्षक में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन करने के लिए आवश्यक ऊर्जा ($P$), $t_{2g}$ और $e_g$ सेटों के बीच के ऊर्जा अंतर ($\Delta_o$) से अधिक होती है। परिणामस्वरूप, चौथा इलेक्ट्रॉन $t_{2g}$ स्तर में युग्मित होने के बजाय उच्च ऊर्जा वाले $e_g$ कक्षकों में से एक में प्रवेश करता है।
* **इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:** $t_{2g}^3 e_g^1$
* **CFSE सूत्र:**
$$\text{CFSE} = [-0.4 \times n(t_{2g}) + 0.6 \times n(e_g)]\Delta_o + mP$$
जहाँ $n(t_{2g})$ और $n(e_g)$ क्रमशः $t_{2g}$ और $e_g$ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या हैं, और $m$ निर्मित इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या है।
* **चरण-दर-चरण गणना:**
- $t_{2g}$ में इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n_{t2g}$) = $3$
- $e_g$ में इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n_{eg}$) = $1$
- निर्मित इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या ($m$) = $0$
- मान रखने पर:
$$\text{CFSE} = [(-0.4 \times 3) + (0.6 \times 1)]\Delta_o + 0 \times P$$
$$\text{CFSE} = [-1.2 + 0.6]\Delta_o = -0.6\Delta_o$$
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#### स्थिति 2: प्रबल क्षेत्र लिगेंड वातावरण ($\Delta_o > P$)\nजब लिगेंड प्रबल होता है, तो विपाटन ऊर्जा ($\Delta_o$), युग्मन ऊर्जा ($P$) से अधिक होती है। इस स्थिति में चौथे इलेक्ट्रॉन के लिए उच्च ऊर्जा वाले $e_g$ कक्षक पर अधिकार करने की तुलना में निचले-ऊर्जा वाले $t_{2g}$ कक्षकों में से एक में युग्मित होना ऊर्जावान रूप से अधिक अनुकूल होता है।
* **इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:** $t_{2g}^4 e_g^0$
* **चरण-दर-चरण गणना:**
- $t_{2g}$ में इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n_{t2g}$) = $4$
- $e_g$ में इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n_{eg}$) = $0$
- निर्मित इलेक्ट्रॉन युग्मों की संख्या ($m$) = $1$
- CFSE सूत्र में मान रखने पर:
$$\text{CFSE} = [(-0.4 \times 4) + (0.6 \times 0)]\Delta_o + 1 \times P$$
$$\text{CFSE} = [-1.6]\Delta_o + P = -1.6\Delta_o + P$$
#### परिणामों का सारांश:
- दुर्बल क्षेत्र $d^4$: $\text{CFSE} = -0.6\Delta_o$
- प्रबल क्षेत्र $d^4$: $\text{CFSE} = -1.6\Delta_o + P$
उत्तर (Answer): ### चरण-दर-चरण हल:
**(a) संरचनात्मक सूत्र का निर्धारण:**
* दिया गया मूलानुपाती सूत्र $CoCl_3 \cdot 5NH_3$ है।
* जब आधिक्य $AgNO_3$ के साथ अभिक्रिया कराई जाती है, तो यौगिक के प्रति मोल $AgCl$ के 2 मोल अवक्षेपित होते हैं। यह इंगित करता है कि 3 क्लोरीन परमाणुओं में से 2 उपसहसंयोजन क्षेत्र के बाहर आयनिक क्लोराइड आयनों के रूप में उपस्थित हैं, जबकि 1 क्लोरीन परमाणु उपसहसंयोजन क्षेत्र के अंदर है।
* अतः यौगिक का संरचनात्मक सूत्र **$[Co(NH_3)_5Cl]Cl_2$** है।
**(b) यौगिक का IUPAC नाम:**
* उपसहसंयोजन क्षेत्र: $[Co(NH_3)_5Cl]^{2+}$
* लिगंड: पाँच एमीन लिगंड और एक क्लोरिडो लिगंड।
* केंद्रीय धातु: +3 ऑक्सीकरण अवस्था में कोबाल्ट ($x + 5(0) - 1 - 2 = 0 \implies x = +3$)।
* IUPAC नाम: **पेंटाएमीनक्लोरिडोकोबाल्ट(III) क्लोराइड**।
**(c) केंद्रीय धातु आयन की द्वितीयक संयोजकता:**
* द्वितीयक संयोजकता केंद्रीय धातु आयन की उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है।
* $[Co(NH_3)_5Cl]Cl_2$ में, केंद्रीय कोबाल्ट आयन उपसहसंयोजक आबंधों द्वारा 5 $NH_3$ अणुओं और 1 $Cl^-$ आयन से जुड़ा हुआ है।
* अतः उपसहसंयोजन संख्या (द्वितीयक संयोजकता) = **6** है।
**(d) चक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण ($\mu$) की गणना:**
* केंद्रीय धातु आयन $Co^{3+}$ है।
* कोबाल्ट का परमाणु क्रमांक ($Z$) = 27।
* उदासीन Co का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = $[Ar] 3d^7 4s^2$ है।
* $Co^{3+}$ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = $[Ar] 3d^6$ है।
* $NH_3$ एक प्रबल क्षेत्र लिगंड है, जो अष्टफलकीय ज्यामिति ($d^2sp^3$ संकरण) के लिए $3d$ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन कराता है।
* अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = 0।
* चक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण का सूत्र: $\mu = \sqrt{n(n+2)}$ BM
* $n = 0$ रखने पर:
$$\mu = \sqrt{0(0+2)} = \sqrt{0} = 0 \text{ BM}$$
* संकुल का चक्रण-मात्र चुम्बकीय आघूर्ण **0 BM** है।
उत्तर (Answer): ### क्रिस्टल फील्ड थ्योरी (CFT) में आठहर्ड्रियल जटिल
क्रिस्टल फील्ड थ्योरी एक इलेक्ट्रोस्टैटिक मॉडल है जो धातु-लिगेंड बॉन्ड को आयनिक मानता है, जो धातु के धनात्मक आयन और ऋणात्मक लिगेंड (या ऋणात्मक द्विपोल लिगेंड जैसे $NH_3$ और $H_2O$) के बीच इलेक्ट्रोस्टैटिक बलों से उत्पन्न होता है।
### आठहर्ड्रियल जटिल में क्रिस्टल फील्ड स्प्लिटिंग
1. एक आठहर्ड्रियल जटिल में, धातु आयन को छह लिगेंड के केंद्रों के बीच एक आठहर्ड्रियल आकार में स्थित होता है।
2. धातु आयन के पाँच d-आर्थिक, जो एक स्वतंत्र धातु आयन में डिग्री होते हैं, जब लिगेंड के केंद्रों के पास जाते हैं, उन्हें अलग-अलग इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रतिकारों का सामना करना पड़ता है।
3. $d_{xy}$, $d_{yz}$, और $d_{xz}$ आर्थिक (संगठित $t_{2g}$ सेट के रूप में जाने जाते हैं) समन्वय के केंद्रों से दूर होते हैं, जिससे वे कम प्रतिकार का सामना करते हैं और ऊर्जा में कमी होती है।
4. $d_{x^2-y^2}$ और $d_{z^2}$ आर्थिक (संगठित $e_g$ सेट के रूप में जाने जाते हैं) समन्वय के केंद्रों के सीधे मार्ग में होते हैं, जिससे वे उच्च प्रतिकार का सामना करते हैं और ऊर्जा में वृद्धि होती है।
5. लिगेंड के क्षेत्र के प्रभाव में डिग्री के दो सेट ($t_{2g}$ और $e_g$) में डिग्री को स्प्लिट करने को **क्रिस्टल फील्ड स्प्लिटिंग** कहा जाता है, जिसे $Delta_o$ द्वारा दर्शाया जाता है।
6. $t_{2g}$ आर्थिक ऊर्जा की कमी होती है $0.4Delta_o$ (-$4q$), और $e_g$ आर्थिक ऊर्जा में वृद्धि होती है $0.6Delta_o$ (+$6q$) बैरोसेंटर की तुलना में की गई है।
### क्रिस्टल फील्ड स्प्लिटिंग ऊर्जा ($Delta_o$) के कारक
* **लिगेंड की प्रकृति:** मजबूत क्षेत्र लिगेंड (जैसे $CN^-$, $CO$) बड़े स्प्लिटिंग का कारण बनते हैं, जबकि कमजोर क्षेत्र लिगेंड (जैसे हैलाइड्स, $H_2O$) छोटे स्प्लिटिंग का कारण बनते हैं। यह स्पेक्ट्रोस्केमिकल श्रृंखला में संगठित है।
* **धातु आयन का ऑक्सीडेशन अवस्था:** उच्च ऑक्सीडेशन अवस्था के कारण धातु आयन पर एक उच्च धनात्मक आवेश होता है, जिससे लिगेंड को अधिक करीब आता है और $Delta_o$ को बढ़ाता है।
* **धातु आयन की प्रकृति:** स्प्लिटिंग ग्रुप के नीचे बढ़ती है क्योंकि डीआर्थिक के दायरे में वृद्धि होती है।
* **समन्वय संख्या:** स्प्लिटिंग जटिल की भौगोलिक संरचना पर निर्भर करती है।
### $d^4$ आयनों के लिए इलेक्ट्रॉनिक निर्धारण
एक $d^4$ प्रणाली के लिए, $t_{2g}$ और $e_g$ आर्थिक में इलेक्ट्रॉनों की वितरण क्रिस्टल फील्ड स्प्लिटिंग ऊर्जा ($Delta_o$) और पेयरिंग ऊर्जा ($P$) के अनुपात पर निर्भर करता है:
1. **जब $Delta_o > P$ (मजबूत क्षेत्र लिगेंड):** इलेक्ट्रॉनों को जोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा $e_g$ आर्थिक में इलेक्ट्रॉन को बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा से कम होती है। इसलिए, चौथा इलेक्ट्रॉन $t_{2g}$ आर्थिक में जुड़ जाता है। संकल्पना: $t_{2g}^4 e_g^0$ (लो स्पिन जटिल)।
2. **जब $Delta_o < P$ (कमजोर क्षेत्र लिगेंड):** इलेक्ट्रॉनों को जोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा $e_g$ आर्थिक में इलेक्ट्रॉन को बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक होती है। इसलिए, चौथा इलेक्ट्रॉन $e_g$ आर्थिक में प्रवेश करता है। संकल्पना: $t_{2g}^3 e_g^1$ (हाई स्पिन जटिल)।
उत्तर (Answer): ### वर्नर के उपसहसंयोजन सिद्धांत का परिचय\nअल्फ्रेड वर्नर ने 1893 में उपसहसंयोजन संस्थाओं में बंधन की प्रकृति को समझाने के लिए उपसहसंयोजन यौगिकों का अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया। उन्होंने प्राथमिक और द्वितीयक संयोजकता की अवधारणा प्रस्तावित की।
### वर्नर सिद्धांत के मुख्य अभिगृहीत
- **दो प्रकार की संयोजकताएं:** उपसहसंयोजन यौगिकों में धातुएं दो प्रकार की संयोजकताएं प्रदर्शित करती हैं: प्राथमिक संयोजकता और द्वितीयक संयोजकता।
- **प्राथमिक संयोजकता (आयनन योग्य):** यह धातु की ऑक्सीकरण अवस्था से मेल खाती है। यह आयनन योग्य है और ऋणात्मक आयनों (ऋणायन) द्वारा संतुष्ट होती है। यह अदिश होती है।
- **द्वितीयक संयोजकता (गैर-आयनन योग्य):** यह धातु की उपसहसंयोजन संख्या से मेल खाती है। यह गैर-आयनन योग्य है, उदासीन अणुओं या ऋणात्मक आयनों द्वारा संतुष्ट होती है, और अंतरिक्ष में निश्चित స్థానों की ओर निर्देशित होती है, जो संकुल की ज्यामिति निर्धारित करती है।
- **अंतरिक्ष में व्यवस्था:** द्वितीयक संयोजकता द्वारा बंधे आयन/समूह विभिन्न उपसहसंयोजन संख्याओं के अनुरूप विशिष्ट स्थानिक व्यवस्था रखते हैं (जैसे, अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय, वर्गाकार समतलीय)।
### कोबाल्ट एमीन संकुलों की व्याख्या\nवर्नेर ने क्लोराइड आयनों को सिल्वर क्लोराइड ($\text{AgCl}$) के रूप में अवक्षेपित करने के लिए अतिरिक्त सिल्वर नाइट्रेट ($\text{AgNO}_3$) विलयन के साथ कोबाल्ट(III) क्लोराइड एमीन संकुलों की अभिक्रिया का अध्ययन करके अपने सिद्धांत का परीक्षण किया।
1. **$\text{CoCl}_3 \cdot 6\text{NH}_3$ ($[\text{Co(NH}_3)_6]\text{Cl}_3$ के रूप में):**
- प्राथमिक संयोजकता = 3, द्वितीयक संयोजकता = 6.
- आयनन प्रति अणु 3 क्लोराइड आयन देता है।
- अतिरिक्त $\text{AgNO}_3$ के साथ अभिक्रिया यौगिक के प्रति मोल **$\text{AgCl}$ के 3 मोल** अवक्षेपित करती है।
2. **$\text{CoCl}_3 \cdot 5\text{NH}_3$ ($[\text{Co(NH}_3)_5\text{Cl}]\text{Cl}_2$ के रूप में):**
- प्राथमिक संयोजकता = 3, द्वितीयक संयोजकता = 6 (उपसहसंयोजन क्षेत्र के अंदर 5 $\text{NH}_3$ और 1 $\text{Cl}^-$)।
- आयनन प्रति अणु 2 क्लोराइड आयन देता है।
- अतिरिक्त $\text{AgNO}_3$ के साथ अभिक्रिया यौगिक के प्रति मोल **$\text{AgCl}$ के 2 मोल** अवक्षेपित करती है।
3. **$\text{CoCl}_3 \cdot 4\text{NH}_3$ ($[\text{Co(NH}_3)_4\text{Cl}_2]\text{Cl}$ के रूप में):**
- प्राथमिक संयोजकता = 3, द्वितीयक संयोजकता = 6 (उपसहसंयोजन क्षेत्र के अंदर 4 $\text{NH}_3$ और 2 $\text{Cl}^-$)।
- आयनन प्रति अणु 1 क्लोराइड आयन देता है।
- अतिरिक्त $\text{AgNO}_3$ के साथ अभिक्रिया यौगिक के प्रति मोल **$\text{AgCl}$ का 1 मोल** अवक्षेपित करती है।
\nइससे स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हुआ कि प्राथमिक संयोजकताएं आयनन योग्य होती हैं और उपसहसंयोजन क्षेत्र के बाहर होती हैं, जबकि द्वितीयक संयोजकताएं अंदर दृढ़ता से ब बंधी होती हैं।
उत्तर (Answer): $d^4$ विन्यास के लिए क्रिस्टल क्षेत्र स्थिरीकरण ऊर्जा (CFSE) की गणना:\nअष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में, $d$-ऑर्बिटल दो सेटों में विभाजित होते हैं: कम ऊर्जा वाले $t_{2g}$ ऑर्बिटल (3 ऑर्बिटल) और उच्च ऊर्जा वाले $e_g$ ऑर्बिटल (2 ऑर्बिटल)।
- प्रत्येक $t_{2g}$ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा = $-0.4 \Delta_o$
- प्रत्येक $e_g$ इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा = $+0.6 \Delta_o$
- CFSE सूत्र: $\text{CFSE} = [-0.4(n_{t_{2g}}) + 0.6(n_{e_g})]\Delta_o + mP$
#### स्थिति 1: दुर्बल क्षेत्र लिगैंड (उच्च चक्रण, $\Delta_o < P$)
- इलेक्ट्रॉन हुंड के नियम के अनुसार प्रवेश करते हैं। चौथा इलेक्ट्रॉन $e_g$ स्तर में प्रवेश करता है क्योंकि युग्मन ऊर्जा $P$, $\Delta_o$ से अधिक है।
- इलेक्ट्रॉन वितरण: $t_{2g}^3 e_g^1$ है।
- गणना:
$$\text{CFSE} = [(-0.4 \times 3) + (0.6 \times 1)]\Delta_o + 0P = -0.6 \Delta_o$$
#### स्थिति 2: प्रबल क्षेत्र लिगैंड (निम्न चक्रण, $\Delta_o > P$)
- युग्मन ऊर्जा $P$, $\Delta_o$ से कम है, इसलिए $e_g$ को भरने से पहले निम्न $t_{2g}$ स्तर में युग्मन होता है।
- इलेक्ट्रॉन वितरण: $t_{2g}^4 e_g^0$ है।
- गणना:
$$\text{CFSE} = [(-0.4 \times 4) + (0.6 \times 0)]\Delta_o + 1P = -1.6 \Delta_o + P$$
### क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) को प्रभावित करने वाले कारक
- **लिगैंड की प्रकृति:** प्रबल क्षेत्र लिगैंड दुर्बल क्षेत्र लिगैंड की तुलना में अधिक पाटन उत्पन्न करते हैं (स्पेक्ट्रोरसायन श्रेणी)।
- **धातु आयन पर आवेश:** धातु आयन की उच्च ऑक्सीकरण अवस्था लिगैंड के लिए मजबूत आकर्षण के कारण बड़े पाटन की ओर ले जाती है।
- **धातु ऑर्बिटल का आकार:** 4d और 5d श्रृंखला के संक्रमण तत्व अपने $d$-ऑर्बिटलों के बड़े स्थानिक विस्तार के कारण 3d श्रृंखला के तत्वों की तुलना में बड़े पाटन मान दिखाते हैं।
उत्तर (Answer): ### वैलेंस बोंड थ्योरी (VBT) का परिचय
वैलेंस बोंड थ्योरी को लिनस पॉलिंग द्वारा समन्वय जोड़त्व यौगिकों के बंधन और चुंबकीय गुणों को समझने के लिए प्रस्तावित किया गया था। यह मुख्य रूप से समन्वय जोड़त्व बंधन के गठन के बीच केंद्रीय धातु कण/आयन और लिगैंड के बीच को केंद्रित करता है।
### मुख्य सिद्धांत
- **धातु-लिगैंड परस्परक्रिया:** केंद्रीय धातु कण/आयन के खाली कणों की संख्या समन्वय संख्या के बराबर होती है, जो लिगैंड द्वारा प्रदान किए गए इलेक्ट्रॉन जोड़ों को स्वीकार करने के लिए उपलब्ध होती है।
- **हाइब्रिडाइजेशन:** धातु के खाली कणों का हाइब्रिडाइजेशन एक समान कणों के सेट को उत्पन्न करता है जिसका निश्चित भौगोलिक होता है।
- **ओवरलैप:** धातु के खाली हाइब्रिडाइज्ड कण लिगैंड के कणों के साथ ओवरलैप करते हैं जिनके पास इलेक्ट्रॉन जोड़ के रूप में एकल जोड़ इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिससे समन्वय जोड़त्व बॉन्ड का गठन होता है।
- **आंतरिक/बाह्य कणों के जटिल:** यदि आंतरिक $d$-कण $(n-1)d$ का उपयोग हाइब्रिडाइजेशन के लिए किया जाता है, तो इसे आंतरिक कणों का जटिल कहा जाता है (लो-स्पिन)। यदि बाह्य $d$-कण ($ns, np, nd$) का उपयोग किया जाता है, तो इसे बाह्य कणों का जटिल कहा जाता है (हाई-स्पिन)।
### $[Co(F_6)]^{3-}$ पर अनुप्रयोग
- कोबाल्ट का ऑक्सीडेशन स्थिति $+3$ है। कोबाल्ट का इलेक्ट्रॉनिक संरचना ($Z = 27$) $[Ar] 3d^7 4s^2$ है।
- $Co^{3+}$ संरचना: $[Ar] 3d^6$.
- फ्लोराइड ($F^-$) एक कमजोर क्षेत्र का लिगैंड है और 3d कणों में इलेक्ट्रॉन जोड़ने के लिए दबाव नहीं डालता है।
- इसलिए, $Co^{3+}$ का उपयोग एक $4s$, तीन $4p$, और दो $4d$ कणों के लिए हाइब्रिडाइजेशन के लिए किया जाता है।
- **हाइब्रिडाइजेशन:** $sp^3d^2$ (बाह्य कणों का जटिल)।
- **भौगोलिक:** अष्टभुजीय।
- **चुंबकीय व्यवहार:** इसमें 4 अनपेयर कण होते हैं, इसलिए यह उच्च स्पिन स्थिति के साथ परामagnetic प्रकृति का होता है।
### $[Co(NH_3)_6]^{3-}$ पर अनुप्रयोग
- कोबाल्ट का ऑक्सीडेशन स्थिति $+3$ है। $Co^{3+}$ संरचना: $[Ar] 3d^6$.
- अमोनिया ($NH_3$) एक मजबूत क्षेत्र का लिगैंड है और 3d कणों में इलेक्ट्रॉन जोड़ने के लिए दबाव डालता है, जो हंड के नियम के विरुद्ध है।
- दो $3d$ कण खाली हो जाते हैं, जिससे $d^2sp^3$ हाइब्रिडाइजेशन होता है।
- **हाइब्रिडाइजेशन:** $d^2sp^3$ (आंतरिक कणों का जटिल)।
- **भौगोलिक:** अष्टभुजीय।
- **चुंबकीय व्यवहार:** इसमें कोई अनपेयर कण नहीं होता है, इसलिए यह निम्न स्पिन स्थिति के साथ डायमैग्नेटिक प्रकृति का होता है।
उत्तर (Answer): ### भाग 1: चुंबकीय आघूर्ण की गणना
1. **मैंगनीज ($Mn$) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ज्ञात कीजिए:**
- $Mn$ की परमाणु संख्या = $25$
- उदासीन $Mn$ परमाणु की मूल अवस्था का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $[Ar] 3d^5 4s^2$
2. **$[Mn(H_2O)_6]^{2+}$ में $Mn$ की ऑक्सीकरण अवस्था निर्धारित कीजिए:**
- मान लीजिए $Mn$ की ऑक्सीकरण अवस्था $x$ है।
- पानी ($H_2O$) एक उदासीन लिगेंड है, इसलिए इसका आवेश $0$ है।
- $x + 6(0) = +2 \implies x = +2$
- $Mn^{2+}$ आयन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $[Ar] 3d^5 4s^0$ या सरल शब्दों में $3d^5$ है।
3. **अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) निर्धारित कीजिए:**
- $H_2O$ एक दुर्बल क्षेत्र लिगेंड है, इसलिए यह इलेक्ट्रॉनों के युग्मन का कारण नहीं बनता है।
- $3d^5$ विन्यास में, हुंड के नियम के अनुसार, सभी पांच $d$-कक्षक प्रत्येक में एक-एक इलेक्ट्रॉन रखेंगे।
- इसलिए, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = $5$ है।
4. **केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण ($\mu$) की गणना करें:**
- केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण का सूत्र है:
$$\mu = \sqrt{n(n + 2)} \text{ BM}$$ (बोर मैग्नेटन)
- सूत्र में $n = 5$ प्रतिस्थापित करें:
$$\mu = \sqrt{5(5 + 2)}$$
$$\mu = \sqrt{5(7)}$$
$$\mu = \sqrt{35}$$
$$\mu \approx 5.92 \text{ BM}$|
### भाग 2: अष्टफलकीय संकुलों में क्रिस्टल क्षेत्र पाटन
* **$d$-कक्षकों की समभ्रंशता:** एक पृथक्कृत, गैसीय संक्रमण धातु आयन में, सभी पांच $d$-कक्षक ($dxy$, $dyz$, $dxz$, $dx^2-y^2$, और $dz^2$) समभ्रंश होते हैं, जिसका अर्थ है कि उनके पास बिल्कुल समान ऊर्जा होती है।
* **लिगेंड्स का दृष्टिकोण:** जब छह लिगेंड अष्टफलकीय संकुल बनाने के लिए कार्टेशियन अक्षों ($x, y, z$) के साथ केंद्रीय धातु आयन के पास आते हैं, तो ऋणावेशित या द्विध्रुवीय लिगेंड्स का स्थिरवैद्युत क्षेत्र गोलाकार समरूपता को नष्ट कर देता है।
* **केंद्रक (Barycenter) और पाटन:** प्रतिकर्षण के कारण इन $d$-कक्षकों की औसत ऊर्जा बढ़ जाती है, जिससे एक काल्पनिक स्थिति बनती है जिसे केंद्रक कहा जाता है। इस केंद्रक से, दिशात्मक प्राथमिकताओं के कारण कक्षक दो अलग-अलग सेटों में विभाजित हो जाते हैं:
- **$e_g$ सेट:** $dx^2-y^2$ और $dz^2$ कक्षक सीधे उन अक्षों के साथ स्थित होते हैं जहाँ लिगेंड आते हैं। परिणामस्वरूप, वे अधिकतम स्थिरवैद्युत प्रतिकर्षण का अनुभव करते हैं और उनकी ऊर्जा बढ़ जाती है।
- **$t_{2g}$ सेट:** $dxy$, $dyz$, और $dxz$ कक्षक अक्षों के बीच स्थित होते हैं। वे लिगेंड्स से कम प्रतिकर्षण का अनुभव करते हैं और इस प्रकार केंद्रक के सापेक्ष उनकी ऊर्जा कम हो जाती है।
* **ऊर्जा वितरण:** $t_{2g}$ कक्षक $-0.4 \Delta_o$ (या $-2/5 \Delta_o$) की ऊर्जा द्वारा स्थिर होते हैं, और $e_g$ कक्षक $+0.6 \Delta_o$ (या $+3/5 \Delta_o$) की ऊर्जा द्वारा अस्थिर होते हैं, जहाँ $\Delta_o$ अष्टफलकीय संकुलों के लिए क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है।
उत्तर (Answer): ### क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) की परिभाषा\nअष्टफलकीय उपसहसंयोजन इकाई में क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) को अष्टफलकीय लिगेंड क्षेत्र के प्रभाव में समभ्रंश (degenerate) $d$-कक्षकों के पाटन के परिणामस्वरूप $d$-कक्षकों के दो सेटों ($t_{2g}$ और $e_g$) के बीच ऊर्जा अंतर के रूप में परिभाषित किया जाता है। जब लिगेंड केंद्रीय धातु आयन के पास आते हैं, तो पांचों $d$-कक्षकों की समभ्रंशता समाप्त हो जाती है। अक्षों की दिशा में स्थित कक्षक ($dx^2-y^2$ और $dz^2$, जिन्हें $e_g$ कहा जाता है) लिगेंड्स से अधिक स्थिरवैद्युत प्रतिकर्ष का अनुभव करते हैं और उनकी ऊर्जा बढ़ जाती है, जबकि अक्षों के बीच स्थित कक्षक ($dxy$, $dyz$, और $dxz$, जिन्हें $t_{2g}$ कहा जाता है) केंद्रक के सापेक्ष कम ऊर्जा वाले हो जाते हैं। इस ऊर्जा अंतराल के परिमाण को $\Delta_o$ द्वारा दर्शाया जाता है।
### क्रिस्टल क्षेत्र पाटन को प्रभावित करने वाले कारक
* **लिगेंड की प्रकृति:** लिगेंड्स को क्षेत्र की शक्ति के बढ़ते क्रम में एक श्रृंखला में व्यवस्थित किया जा सकता है, जिसे स्पेक्ट्रोरासायनिक श्रेणी के रूप में जाना जाता है। प्रबल क्षेत्र लिगेंड (उदा. $CO$, $CN^-$) एक बड़ी पाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) का कारण बनते हैं, जबकि दुर्बल क्षेत्र लिगेंड (उदा. $I^-$, $Br^-$, $Cl^-$) छोटी पाटन ऊर्जा का कारण बनते हैं।
* **धातु आयन की ऑक्सीकरण अवस्था:** जैसे-जैसे धातु आयन पर आवेश (ऑक्सीकरण अवस्था) बढ़ता है, लिगेंड्स अधिक दृढ़ता से आकर्षित होते हैं, जिससे धातु-लिगेंड बंध दूरी कम हो जाती है और परिणामस्वरूप $\Delta_o$ का मान बढ़ जाता है.
* **धातु आयन की प्रकृति:** भारी संक्रमण धातुओं में $d$-कक्षकों के अधिक स्थानिक विस्तार के कारण संक्रमण तत्वों के समूह में नीचे जाने पर पाटन बढ़ता है।
* **उपसहसंयोजन संख्या:** समान धातु और लिगेंड के लिए, चतुष्फलकीय संकुलों में क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ($\Delta_t$) अष्टफलकीय संकुलों ($\Delta_o$) का लगभग $4/9$ होता है।
### अष्टफलकीय क्षेत्रों में $d^4$ आयनों के लिए इलेक्ट्रॉनिक विन्यास\nअष्टफलकीय क्षेत्र में $d^4$ आयन के $d$-कक्षकों को भरते समय, $t_{2g}$ और $e_g$ कक्षकों का अधिभोग क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ऊर्जा ($\Delta_o$) और युग्मन ऊर्जा ($P$, एक कक्षक में दो इलेक्ट्रॉनों को युग्मित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा) के सापेक्ष मानों पर निर्भर करता है:
1. **जब $\Delta_o > P$ हो (प्रबल क्षेत्र लिगेंड):**
* $t_{2g}$ और $e_g$ के बीच का ऊर्जा अंतराल युग्मन ऊर्जा से अधिक होता है।
* चौथे इलेक्ट्रॉन के लिए उच्च ऊर्जा वाले $e_g$ कक्षक में कूदने के बजाय कम ऊर्जा वाले $t_{2g}$ कक्षक में युग्मित होना ऊर्जावान रूप से अधिक अनुकूल होता है।
* **इलेक्ट्रॉनी विन्यास:** $t_{2g}^4 e_g^0$ होता है। यह एक निम्न-चक्रण संकुल बनाता है।
2. **जब $\Delta_o < P$ हो (दुर्बल क्षेत्र लिगेंड):**
* क्रिस्टल क्षेत्र पाटन ऊर्जा युग्मन ऊर्जा से कम होती है।
* चौथे इलेक्ट्रॉन के लिए $t_{2g}$ कक्षक में इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण को दूर करने और युग्मित होने की तुलना में उच्च-ऊर्जा $e_g$ कक्षकों में से एक पर कब्जा करने के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
* **इलेक्ट्रॉनी विन्यास:** $t_{2g}^3 e_g^1$ होता है। यह एक उच्च-चक्रण संकुल बनाता है।
उत्तर (Answer): ### संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) का परिचय\nलाइनस पाॅलिंग द्वारा प्रतिपादित संयोजकता आबंध सिद्धांत केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और लिगेंड्स के बीच परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन पर ध्यान केंद्रित करते हुए उपसहसंयोजन यौगिकों में बंधन को समझाता है। इस सिद्धांत के मूल अभिगृहीत और मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
* **उपसहसंयोजन संख्या और कक्षक:** केंद्रीय धातु आयन लिगेंड्स के साथ उपसहसंयोजक बंध बनाने के लिए अपनी उपसहसंयोजन संख्या के बराबर खाली कक्षक उपलब्ध कराता है।
* **संकरण:** ये खाली कक्षक एक निश्चित ज्यामिति (जैसे अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय, या वर्ग समतलीय) के समतुल्य संकर कक्षकों का एक सेट बनाने के लिए संकरण (समान ऊर्जा के परमाणु कक्षकों का मिश्रण) से गुजरते हैं।
* **अतिव्यापन:** प्रत्येक लिगेंड केंद्रीय धातु परमाणु या आयन के इन संकरित खाली कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का एक जोड़ा दान करता है।
* **चुंबकीय व्यवहार:** यदि धातु आयन में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित हैं, तो संकुल प्रतिचुंबकीय होता है। यदि अयुग्मित इलेक्ट्रॉन मौजूद हैं, तो संकुल अनुचुंबकीय होता है।
### $[Co(NH_3)_6]^{3+}$ संकुल की व्याख्या
1. **कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था:** कोबाल्ट की परमाणु संख्या $27$ है। इसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $[Ar] 3d^7 4s^2$ है। $[Co(NH_3)_6]^{3+}$ में, कोबाल्ट $+3$ ऑक्सीकरण अवस्था में है, जिसके परिणामस्वरूप $3d^6$ विन्यास बनता है।
2. **इलेक्ट्रॉन युग्मन:** $NH_3$ एक प्रबल क्षेत्र लिगेंड है। इसके प्रभाव में, $3d$ कक्षकों में मौजूद इलेक्ट्रॉनों को युग्मित होने के लिए बाध्य किया जाता है, जिससे दो $3d$ कक्षक खाली हो जाते हैं।
3. **संकरण:** उपलब्ध खाली कक्षक (दो $3d$, एक $4s$, और तीन $4p$) छह समतुल्य संकर कक्षक बनाने के लिए $d^2sp^3$ संकरण से गुजरते हैं।
4. **ज्यामिति और चुंबकत्व:** ये छह संकर कक्षक छह $NH_3$ अणुओं से इलेक्ट्रॉन युग्मों को स्वीकार करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप **अष्टफलकीय ज्यामिति** प्राप्त होती है। चूंकि कोई अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं है, इसलिए संकुल **प्रतिचुंबकीय** होता है और इसे आंतरिक कक्षक या निम्न चक्रण संकुल कहा जाता है।
### $[CoF_6]^{3-}$ संकुल की व्याख्या
1. **ऑक्सीकरण अवस्था और विन्यास:** यहां भी कोबाल्ट $+3$ ऑक्सीकरण अवस्था में है, जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $3d^6$ है।
2. **दुर्बल क्षेत्र लिगेंड प्रभाव:** फ्लोराइड ($F^-$) एक दुर्बल क्षेत्र लिगेंड है और यह $3d$ इलेक्ट्रॉनों के युग्मन का कारण नहीं बनता है।
3. **संकरण:** $F^-$ आयनों से इलेक्ट्रॉनों के छह जोड़ों को समायोजित करने के लिए, बाहरी $4d$ कक्षकों का उपयोग किया जाता है। इसमें शामिल संकरण $sp^3d^2$ है।
4. **ज्यामिति और चुंबकत्व:** संकुल की **अष्टफलकीय ज्यामिति** होती है। चूंकि $3d$ स्तर में चार अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए संकुल प्रबल रूप से **अनुचुंबकीय** होता है और इसे बाहरी कक्षक या उच्च चक्रण संकुल के रूप में जाना जाता है।
उत्तर (Answer): चरण 1: केंद्रीय धातु परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था निर्धारित करें।\nमान लीजिए आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था $x$ है।
$x + 6(0) = +2$
$x = +2$\nअतः, आयरन $Fe^{2+}$ के रूप में उपस्थित है।
\nचरण 2: $Fe^{2+}$ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।\nआयरन ($Fe$) की परमाणु संख्या = 26
$Fe$ का भू-अवस्थानी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $[Ar] 3d^6 4s^2$
$Fe^{2+}$ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: $[Ar] 3d^6$
\nचरण 3: अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) निर्धारित करें।\nजल ($H_2O$) एक दुर्बल क्षेत्र लिगैंड है, इसलिए यह $3d$ कक्षकों में इलेक्ट्रॉन युग्मन का कारण नहीं बनता है। \nd कक्षकों में 6 इलेक्ट्रॉनों का वितरण: $t_{2g}^4 \, e_g^2$\nअयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की गणना करें: 6 इलेक्ट्रॉनों में से, 4 $t_{2g}$ में हैं (एक युग्मित, तीन अयुग्मित) और 2 $e_g$ में हैं (दोनों अयुग्मित)। कुल अयुग्मित इलेक्ट्रॉन ($n$) = 4।
\nचरण 4: केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण ($\mu$) की गणना करें।\nसूत्र: $\mu = \sqrt{n(n + 2)} \text{ BM}$
$n = 4$ रखें:
$\mu = \sqrt{4(4 + 2)}$
$\mu = \sqrt{4 \times 6}$
$\mu = \sqrt{24}$
$\mu \approx 4.90 \text{ BM}$
\nअतः, $[Fe(H_2O)_6]^{2+}$ के लिए केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण $4.90 \text{ BM}$ है।
उत्तर (Answer): लाइनस पॉलिंग द्वारा प्रतिपादित संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT), परमाणु कक्षकों के अतिव्यापन पर विचार करके समन्वय यौगिकों के निर्माण की व्याख्या करता है। VBT के अनुसार, केंद्रीय धातु परमाणु/आयन लिगैंड्स के साथ उपसहसंयोजक बंधों के निर्माण के लिए अपनी समन्वय संख्या के बराबर संख्या में खाली कक्षक उपलब्ध कराता है। ये खाली कक्षक निश्चित ज्यामिति के समतुल्य कक्षकों का एक सेट प्राप्त करने के लिए संकरित होते हैं।
\nसंकुल $[Co(F_6)]^{3-}$ के लिए, आइए इसकी ज्यामिति और चुंबकीय व्यवहार का विश्लेषण करें:
1. कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था: कोबाल्ट +3 ऑक्सीकरण अवस्था ($Co^{3+}$) में है, जिसका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास $[Ar] 3d^6$ है।
2. संकरण: चूंकि फ्लोराइड ($F^-$) एक दुर्बल क्षेत्र लिगैंड है, यह $3d$ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के युग्मन का कारण नहीं बनता है। छह $F^-$ लिगैंड्स से इलेक्ट्रॉनों के छह जोड़ों को समायोजित करने के लिए, धातु एक $3d$, एक $4s$, और तीन $4p$ कक्षकों का उपयोग करती है, जिससे $sp^3d^2$ संकरण होता है। विशेष रूप से, यह बाहरी कक्षकों ($4d$) का उपयोग करता है, जिससे यह एक बाहरी कक्षीय या उच्च-स्पिन संकुल बन जाता है।
3. ज्यामिति: $sp^3d^2$ संकरण अष्टफलकीय ज्यामिति से मेल खाता है।
4. चुंबकीय गुण: दुर्बल क्षेत्र $F^-$ के साथ $3d^6$ विन्यास 4 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन छोड़ता है। इसलिए, संकुल उच्च स्पिन अवस्था के साथ अनुचुंबकीय (पैरामैग्नेटिक) होता है।
उत्तर (Answer): चरण 1: दुर्बल क्षेत्र में $d^5$ प्रणाली के लिए $d$ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों के वितरण को निर्धारित करें।\nअष्टफलकीय क्रिस्टल क्षेत्र में, $d$ कक्षक $t_{2g}$ और $e_g$ सेटों में विभाजित हो जाते हैं। दुर्बल क्षेत्र लिगैंड के लिए, क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा ($\Delta_0$) युग्मन ऊर्जा ($P$) से कम होती है। इसलिए, युग्मन होने से पहले इलेक्ट्रॉन सभी पांच $d$ कक्षकों में एकल रूप से प्रवेश करेंगे (हुंड का नियम)।\nइलेक्ट्रॉन वितरण: $t_{2g}^3 \, e_g^2$
\nचरण 2: अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) ज्ञात कीजिए।\nअयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ($n$) = 5
\nचरण 3: केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण के सूत्र का उपयोग करें।
$\mu = \sqrt{n(n + 2)} \text{ BM}$
\nचरण 4: सूत्र में $n = 5$ रखें।
$\mu = \sqrt{5(5 + 2)}$
$\mu = \sqrt{5 \times 7}$
$\mu = \sqrt{35}$
$\mu \approx 5.92 \text{ BM}$
\nअतः, समन्वय इकाई का केवल-चक्रण चुंबकीय आघूर्ण $5.92 \text{ BM}$ है।
उत्तर (Answer): बंधन समावयवता (लिंकेज आइसोमेरिज्म) उन समन्वय यौगिकों में उत्पन्न होती है जिनमें उभयंतुक (एम्बिडेंटेट) लिगैंड होते हैं। उभयंतुक लिगैंड वे लिगैंड होते हैं जिनमें दो अलग-अलग दाता परमाणु होते हैं और वे केंद्रीय धातु परमाणु से दो परमाणुओं में से किसी एक के माध्यम से जुड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, नाइट्राइट आयन ($NO_2^-$) नाइट्रोजन के माध्यम से जुड़कर नाइट्रो संकुल बना सकता है, या ऑक्सीजन के माध्यम से जुड़कर नाइट्रिटो संकुल बना सकता है। उदाहरण: $[Co(NH_3)_5(NO_2)]Cl_2$ (पेंटाएम्मीननाइट्रोकोबाल्ट(III) क्लोराइड, पीला) और $[Co(NH_3)_5(ONO)]Cl_2$ (पेंटाएम्मीननाइट्रिटोकोबाल्ट(III) क्लोराइड, लाल)।
\nउपसहसंयोजन समावयवता संकुल में उपस्थित विभिन्न धातु आयनों की धनायनिक और ऋणायनिक इकाइयों के बीच लिगैंड्स के आदान-प्रदान से उत्पन्न होती है। ऐसे यौगिकों में धनायन और ऋणायन दोनों संकुल आयन होते हैं। उदाहरण: $[Co(NH_3)_6][Cr(CN)_6]$ (हेक्साएम्मीनकोबाल्ट(III) हेक्सासायैनोक्रोमेट(III)) और $[Cr(NH_3)_6][Co(CN)_6]$ (हेक्साएम्मीनक्रोमियम(III) हेक्सासायैनोकोबाल्टेट(III))। इन समावयवियों में, दो धातु केंद्रों के बीच लिगैंड्स का वितरण उलट जाता है।
उत्तर (Answer): चरण 1: कुल निर्माण स्थिरांक ($\beta_n$) और कुल वियोजन साम्यावस्था स्थिरांक ($K_{diss}$) के बीच संबंध को समझें।
\nसंकुल $[Cu(NH_3)_4]^{2+}$ के लिए कुल निर्माण स्थिरांक ($\beta_4$) कुल वियोजन स्थिरांक ($K_{diss}$) का व्युत्क्रम होता है। \nसूत्र: $K_{diss} = \frac{1}{\beta_4}$
\nचरण 2: $\beta_4$ का दिया गया मान रखें।\nदिया गया है $\beta_4 = 2.1 \times 10^{13}$
\nचरण 3: गणना करें।
$K_{diss} = \frac{1}{2.1 \times 10^{13}}$
$K_{diss} = 4.76 \times 10^{-14}$
\nअतः, $[Cu(NH_3)_4]^{2+}$ के लिए कुल संकुल वियोजन साम्यावस्था स्थिरांक $4.76 \times 10^{-14}$ है।