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हैलोऐल्केन तथा हैलोऐरीन

Subject: रसायन विज्ञान | Class: Class 12 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
अध्याय: हैलोएल्केन तथा हैलोएरीन (Haloalkanes and Haloarenes) - त्वरित पुनरीक्षण नोट्स

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1. परिचय एवं वर्गीकरण (Introduction and Classification)

1. हैलाइडों की संख्या के आधार पर: मोनो-, डाई-, ट्राई- या पॉलीहैलो यौगिक।

2. $sp^3 C-X$ आबंध वाले यौगिक:

3. $sp^2 C-X$ आबंध वाले यौगिक:


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2. नामकरण (Nomenclature)

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3. बनाने की विधियाँ (Methods of Preparation)

1. $ROH + HCl \xrightarrow{ZnCl2} R-Cl + H2O$ (ग्रूव प्रक्रम)

2. $ROH + NaBr + H2SO4 \rightarrow R-Br + NaHSO4 + H2O$

3. $3ROH + PX3 \rightarrow 3RX + H3PO_3$ ($X = Cl, Br$)

4. $ROH + PCl5 \rightarrow R-Cl + POCl3 + HCl$

5. $ROH + SOCl2 \rightarrow R-Cl + SO2 \uparrow + HCl \uparrow$ (सर्वोत्तम विधि क्योंकि उपोत्पाद गैसें होती हैं)


1. एल्केनों के मुक्त मूलक क्लोरीनीकरण द्वारा:

$R-H + Cl_2 \xrightarrow{UV \text{ प्रकाश}} R-Cl + HCl$

2. एल्कीन से (Electrophilic Addition):

$R-CH=CH2 + HBr \xrightarrow{Peroxide} R-CH2-CH_2-Br$


1. फिंकेलस्टीन अभिक्रिया (Finkelstein Reaction - आयोडीन बनाने के लिए):

$R-Cl + NaI \xrightarrow{Dry\ Acetone} R-I + NaCl\downarrow$

2. स्वाट्स अभिक्रिया (Swarts Reaction - फ्लोराइड बनाने के लिए):

$R-Br + AgF \rightarrow R-F + AgBr\downarrow$ ($Hg2F2, CoF_2$ का भी उपयोग होता है)


$C6H5-H + Cl2 \xrightarrow{FeCl3 \text{ उत्प्रेरक}} C6H5-Cl + HCl$ (ऑर्थो और पैरा समावयवी बनते हैं)


$Ar-N2^+Cl^- \xrightarrow{Cu2Cl2 / HCl} Ar-Cl + N2$


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4. भौतिक गुण (Physical Properties)

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5. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions)

हैलोएल्केन मुख्य रूप से तीन प्रकार की अभिक्रियाएँ दर्शाते हैं:

1. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (Nucleophilic Substitution Reactions)

2. विलोपन अभिक्रियाएँ (Elimination Reactions)

3. धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ (Reaction with Metals)


#### (अ) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ ($SN1$ और $SN2$):



#### (ब) विलोपन अभिक्रियाएँ (Elimination Reactions - $\beta$-Elimination):


#### (स) धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ (Reaction with Metals):

1. गिर्ना ग्रिगनार्ड अभिकर्मक का निर्माण (Grignard Reagent):

$R-X + Mg \xrightarrow{Dry\ Ether} R-Mg-X$ (ऑर्गनोमैटेलिक यौगिक)

2. वुर्ट्ज़ अभिक्रिया (Wurtz Reaction):

$2R-X + 2Na \xrightarrow{Dry\ Ether} R-R + 2NaX$ (सममित एल्केन बनाने के लिए)

3. फिटीग अभिक्रिया (Fittig Reaction):

दो एरिल हैलाइड सोडियम के साथ मिलकर डाइफेनिल बनाते हैं।

4. वुर्ट्ज़-फिटीग अभिक्रिया (Wurtz-Fittig Reaction):

एल्काइल हैलाइड + एरिल हैलाइड + $Na$ (शुष्क ईथर) $\rightarrow$ एल्काइल बेंजीन।


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6. हैलोएरीन के गुण (Properties of Haloarenes)

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7. महत्वपूर्ण बहुपयोगी यौगिक (Important Polyhalogen Compounds)

1. डाइक्लोरोमेथेन ($CH2Cl2$ - Methylene chloride): विलायक के रूप में, पेंट हटाने वाले और एरोसोल प्रणोदक में प्रयुक्त।

2. क्लोरोफॉर्म ($CHCl3$): इसे संज्ञाहारी (Anesthetic) के रूप में प्रयोग किया जाता है। प्रकाश और वायु की उपस्थिति में यह विषैली गैस फॉस्जीन ($COCl2$) बनाता है।

$2CHCl3 + O2 \xrightarrow{Light} 2COCl_2 + 2HCl$

3. आयोडोफॉर्म ($CHI_3$): रोगाणुनाशक (Antiseptic) के रूप में उपयोग होता है।

4. कार्बन टेट्राक्लोराइड ($CCl_4$): अग्निशामक (Pyrene) के रूप में प्रयुक्त।

5. DDT (डाइक्लोरोडाइफेनिलट्राइक्लोरोएथेन): एक शक्तिशाली कीटनाशक है।

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 हेलोएल्केन तथा हेलोएरीन
Overview
परिचय और वर्गीकरण वर्गीकरण का आधार हैलोजन परमाणुओं की संख्या (मोनो, डाई, पॉली) $sp^3$ $C-X$ आबंध वाले यौगिक (ऐल्किल हैलाइड, ऐलीलिय, बेंजिलिक) $sp^2$ $C-X$ आबंध वाले यौगिक (वाइनिलिक, ऐरिल हैलाइड) नामपद्धति (Nomenclature) सामान्य नाम (Common Names) आई.यू.पी.ए.सी. नाम (IUPAC Names) प्रकृति (Nature of $C-X$ Bond) ध्रुवीय प्रकृति (Polarity) आबंध लंबाई और आबंध एन्थैल्पी हेलोएल्केन के विरचन की विधियाँ (Preparation) ऐल्कोहॉलों से ($HX$, $PCl3$, $PCl5$, $SOCl_2$ द्वारा) हाइड्रोकार्बन से (ऐल्केन के मुक्त मूलक हैलोजनीकरण द्वारा) ऐल्कीन से (है हाइड्रोजन हैलाइड का योग, मारकोनीकॉफ नियम) हैलोजन विनिमय (फिंकेलस्टीन अभिक्रिया, स्वार्ट्स अभिक्रिया) हेलोएरीन के विरचन की विधियाँ (Preparation) हाइड्रोकार्बन के इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन से (क्लोरीन, ब्रोमीन द्वारा) -सैंडमेयर अभिक्रिया (डाईएजोनियम लवण से) भौतिक गुण (Physical Properties) गलनांक और क्वथनांक विलेयता (Solubility) रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions) नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ (Nucleophilic Substitution) $S_N1$ अभिक्रिया (क्रियाविधि और कोटि) $S_N2$ अभिक्रिया (क्रियाविधि और कोटि) विलोपन अभिक्रियाएँ ($\beta$-विलोपन, सैत्जेफ नियम) धातुओं के साथ अभिक्रियाएँ ग्रिगनार्ड अभिकर्मक का निर्माण वुर्ट्स अभिक्रिया हेलोएरीन की रासायनिक अभिक्रियाएँ नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन में मंद गति (कम सक्रियता) इलेक्ट्रोफिलिक ऐरिल प्रतिस्थापन (हैलोजनीकरण, नाइट्रेशन, सल्फोनेशन, फ्रिडल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया) धातुओं के साथ अभिक्रिया (फिटिग अभिक्रिया, वुर्ट्स-फिटिग अभिक्रिया) पॉलीहैलोजन यौगिक (Polyhalogen Compounds) डाइक्लोरोमेथेन (मेथिललीन क्लोराइड) ट्राइक्लोरोमेथेन (क्लोरोफॉर्म) टेट्राक्लोरोमेथेन (कार्बन टेट्राक्लोराइड) आयोडोफॉर्म फ्रिऑन (Freons) डी.डी.टी. (DDT) - पर्यावरण पर प्रभाव
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. उपयुक्त उदाहरणों और त्रिविम रासायनिक विचारों के साथ हैलोएल्केन की $S_N1$ और $S_N2$ अभिक्रियाओं की क्रियाविधि की विवेचना कीजिए। इन दोनों अभिक्रिया मार्गों को प्रभावित करने वाले कारकों को भी समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का परिचय\nनाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ हैलोएल्केन की सबसे महत्वपूर्ण अभिक्रियाओं में से एक हैं। इन अभिक्रियाओं में, एक नाभिकस्नेही उस इलेक्ट्रोफिलिक कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है जो हैोजन परमाणु से जुड़ा होता है, और हैलाइड आयन (निष्कासित समूह) को प्रतिस्थापित कर देता है। ये अभिक्रियाएँ मुख्य रूप से दो प्रमुख क्रियाविधियों द्वारा आगे बढ़ती हैं: $S_N2$ (द्विअणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) और $S_N1$ (एकअणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन)। ### 1. $S_N2$ क्रियाविधि (द्विअणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) - **बलगतिकी और वेग नियम:** $S_N2$ अभिक्रिया का वेग हैलोएल्केन और नाभिकस्नेही दोनों की सांद्रता पर निर्भर करता है। इसलिए, यह द्वितीय कोटि की बलगतिकी का पालन करती है: $\text{वेग} = k[\text{हैलोएल्केन}][\text{नाभिकस्नेही}]$ - **क्रियाविधि:** यह एक समकालिक, एकल-पद प्रक्रिया है। आने वाला नाभिकस्नेही हैलोजन परमाणु की विपरीत दिशा से (पश्च आक्रमण) आक्रमण करता है क्योंकि उस दिशा से त्रिविम बाधा न्यूनतम होती है। जैसे-जैसे कार्बन-नाभिकस्नेही बंध बनता है, वैसे-वैसे कार्बन-हैलोजन बंध एक अस्थायी संक्रमण अवस्था के माध्यम से टूटने लगता है जिसमें सभी तीन समूह और कार्बन परमाणु एक ही तल में होते हैं। - **त्रिविम रसायन:** $S_N2$ क्रियाविधि विन्यास के पूर्ण व्युत्क्रमण (वाल्डन व्युत्क्रमण) द्वारा caractérisée होती है। यदि हम एक विशिष्ट ध्रुव घूर्णन वाले चिरल अभिकारक से शुरू करते हैं, तो उत्पाद का विन्यास विपरीत होगा। - **$S_N2$ को प्रभावित करने वाले कारक:** - *सब्सट्रेट की संरचना:* न्यूनतम त्रिविम बाधा के कारण प्राथमिक हैलाइड सबसे तेजी से अभिक्रिया करते हैं, उसके बाद द्वितीयक हैलाइड आते हैं। तृतीयक हैलाइड अत्यधिक भीड़भाड़ के कारण व्यावहारिक रूप से $S_N2$ अभिक्रियाओं से नहीं गुजरते हैं। - *नाभिकस्नेही की शक्ति:* प्रबल, ऋणावेशित नाभिकस्नेही (जैसे $\text{OH}^-, \text{CN}^-$) $S_N2$ मार्गों को बढ़ावा देते हैं। - *विलायक:* अप्रोटिक ध्रुवीय विलायक (जैसे एसीटोन, DMSO, DMF) $S_N2$ अभिक्रियाओं की दर को बहुत बढ़ा देते हैं। ### 2. $S_N1$ क्रियाविधि (एकअणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) - **बलगतिकी और वेग नियम:** $S_N1$ अभिक्रिया का वेग केवल हैलोएल्केन की सांद्रता पर निर्भर करता है और नाभिकस्नेही की सांद्रता से स्वतंत्र होता है। इस प्रकार, यह प्रथम कोटि की बलगतिकी का पालन करती है: $\text{वेग} = k[\text{हैलोएल्केन}]$ - **क्रियाविधि:** यह एक द्वि-चरणीय प्रक्रिया है। पहले और वेग-निर्धारक चरण में, कार्बन-हैलोजन बंध एक कार्बधनायन मध्यवर्ती और एक हैलाइड आयन बनाने के लिए विदलित होता है। दूसरे चरण में, नाभिकस्नेही अंतिम उत्पाद बनाने के लिए समतलीय कार्बधनायन पर तेजी से आक्रमण करता है। - **त्रिविम रसायन:** चूँकि मध्यवर्ती कार्बधनायन $sp^2$ संकरित और समतलीय होता है, इसलिए नाभिकस्नेही सामने या पीछे दोनों तरफ से समान प्रायिकता के साथ आक्रमण कर सकता है। इससे रेसिमीकरण (डेक्सट्रोरोटेटरी और लेवोरोटेटरी दोनों समावयवियों की समान मात्रा वाले रेसिमिक मिश्रण का निर्माण) होता है। - **$S_N1$ को प्रभावित करने वाले कारक:** - *सब्सट्रेट की संरचना:* कार्बधनायन का स्थायित्व महत्वपूर्ण है। तृतीयक हैलाइड सबसे तेजी से अभिक्रिया करते हैं क्योंकि तृतीयक कार्बधनायन प्रेरण प्रभाव और अतिसंयुग्मन द्वारा अत्यधिक स्थिर होते हैं। द्वितीयक हैलाइड मध्यम रूप से अभिक्रिया करते हैं, जबकि प्राथमिक हैलाइड शायद ही कभी $S_N1$ से गुजरते हैं। - *विलायक:* प्रोटिक ध्रुवीय विलायक (जैसे जल, अल्कोहल, एसिटिक एसिड) कार्बधनायन को स्थिर करते हैं और कार्बन-हैलोजन बंध के आयनीकरण को सुगम बनाते हैं, जिससे $S_N1$ अभिक्रियाओं को बढ़ावा मिलता है। ### सारांश\nनिष्कर्षतः, हैलोएल्केन द्वारा चुना गया मार्ग एल्किल समूह की प्रकृति (प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयक), नाभिकस्नेही की प्रतिक्रियाशीलता और अभिक्रिया विलायक की ध्रुवीयता पर महत्वपूर्ण रूप से निर्भर करता है।
Q2. 2-क्लोरोब्यूटान का उदाहरण लेते हुए काइरल और अकाइरल अणुओं, समतल-ध्रुवीकृत प्रकाश, enantiomers और रेसेमिक मिश्रण के विशेष संदर्भ में एल्किल हैलाइड्स में प्रकाशिक समावयवता के त्रिविमरासायनिक पहलुओं को समझाइए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. प्रकाशिक समावयवता और काइरलता का परिचय\nप्रकाशिक समावयवता त्रिविम समावयवता का एक प्रकार है जो ऐसे यौगिकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जो समतल-ध्रुवीकृत प्रकाश के ध्रुवण तल को घुमाते हैं। प्रकाशिक समावयवता का आधार **काइरलता** (असमरूपता) है। - **काइरल अणु:** एक अणु को काइरल कहा जाता है यदि वह अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपण योग्य (superimposable) न हो। जिस केंद्रीय कार्बन परमाणु से चार अलग-अलग समूह जुड़े होते हैं, उसे काइरल केंद्र कहा जाता है। - **अकाइरल अणु:** वे अणु जो अपने दर्पण प्रतिबिंब पर अध्यारोपण योग्य होते हैं, अकाइरल अणु कहलाते हैं। ### 2. उदाहरण: 2-क्लोरोब्यूटैन\nआइए 2-क्लोरोब्यूटैन ($\text{CH}_3-\text{CH(Cl)}-\text{CH}_2-\text{CH}_3$) पर विचार करें। - इसका दूसरा कार्बन चार पूरी तरह से अलग समूहों ( $-\text{CH}_3$, $-\text{CH}_2\text{CH}_3$, $-\text{Cl}$, और $-\text{H}$ ) से जुड़ा है। - इसलिए, कार्बन-2 एक काइरल केंद्र है, जो 2-क्लोरोब्यूटैन को एक काइरल अणु बनाता है। ### 3. एनैन्शियोमर्स (Enantiomers)\nत्रिविम समावयवी जो एक-दूसरे के अध्यारोपण योग्य दर्पण प्रतिबिंब नहीं होते हैं, **एनैन्शियोमर्स** कहलाते हैं। - इनके भौतिक गुण समान होते हैं सिवाय इसके कि वे समतल-ध्रुवीकृत प्रकाश को किस दिशा में घुमाते हैं। - **दक्षिण-ध्रुवण घूर्णक ($d$ या $+$):** प्रकाश को दाईं ओर घुमाता है। - **वाम-ध्रुवण घूर्णक ($l$ या $-$):** प्रकाश को बाईं ओर घुमाता है। ### 4. रेसेमिक मिश्रण\nकिसी एनैन्शियोमर और उसके दर्पण प्रतिबिंब (d- और l-रूप) के सममोलर मिश्रण को **रेसेमिक मिश्रण** कहा जाता है। - चूंकि एक एनैन्शियोमर द्वारा उत्पन्न ध्रुवण घूर्णन दूसरे द्वारा उत्पन्न समान और विपरीत घूर्णन द्वारा रद्द कर दिया जाता है, इसलिए रेसेमिक मिश्रण **प्रकाशिक रूप से निष्क्रिय** होता है। इस परिघटना को बाह्य प्रतिकर (External compensation) कहा जाता है।
Q3. सैंडमेयर अभिक्रिया और गाटरमान अभिक्रिया के माध्यम से हैलोएरीन के विरचन की विवेचना कीजिए। समझाइए कि हैलोएल्केन की तुलना में हैलोएरीन नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति बहुत कम क्रियाशील क्यों होते हैं, इसके लिए कम से कम तीन अलग-अलग रासायनिक या संरचनात्मक कारण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. हैलोएरीन का विरचन\nडाइएजोनियम लवण से जुड़ी विधियों द्वारा हैलोएरीन को प्रभावी ढंग से तैयार किया जा सकता है। - **सैंडमेयर अभिक्रिया:** जब प्राथमिक ऐरोमैटिक एमीन को ठंडे जलीय खनिज अम्ल ($HCl$) में घोला जाता है और $273-278K$ पर नाइट्रस अम्ल ($HNO_2$ या $NaNO_2 + HCl$) के साथ उपचारित किया जाता है, तो डाइएजोनियम लवण बनता है। जब इस डाइएजोनियम लवण विलयन की अभिक्रिया क्यूप्रस क्लोराइड ($Cu_2Cl_2$) या क्यूप्रस ब्रोमाइड ($Cu_2Br_2$) के साथ कराई जाती है, तो डाइएजो समूह $-Cl$ या $-Br$ द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है और एरिल हैलाइड बनते हैं। $$\text{Ar-N}_2^+\text{Cl}^- \xrightarrow{Cu_2Cl_2 / HCl} \text{Ar-Cl} + \text{N}_2$$ - **गाटरमान अभिक्रिया:** यह सैंडमेयर अभिक्रिया का ही एक संशोधित रूप है। क्यूप्रस हैलाइड्स का उपयोग करने के बजाय, डाइएजोनियम क्लोराइड विलयन को संबंधित हैलोजन अम्ल ($HCl$ या $HBr$) की उपस्थिति में कॉपर चूर्ण के साथ गर्म किया जाता है, जिससे एरिल हैलाइड प्राप्त होते हैं। $$\text{Ar-N}_2^+\text{Cl}^- \xrightarrow{Cu / HCl} \text{Ar-Cl} + \text{N}_2 + \text{HCl}$$ ### 2. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति हैलोएरीन की कम क्रियाशीलता\nहैलोएल्केन की तुलना में हैलोएरीन सौम्य परिस्थितियों में नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति अत्यधिक अक्रियाशील होते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: - **अनुनाद प्रभाव:** हैलोएरीन में हैलोजीन परमाणु पर उपस्थित एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म बेंजीन वलय के $\pi$-इलेक्ट्रॉनों के साथ संयुग्मन में होते हैं। इसके परिणामस्वरूप कार्बन-क्लोराइड बंध में आंशिक द्विबंध आ जाता है, जिसे तोड़ना कठिन होता है। - **संकरण में अंतर:** हैलोएल्केन में हैलोजन से जुड़ा कार्बन $sp^3$ संकरित होता है, जबकि हैलोएरीन में यह $sp^2$ संकरित होता है। $sp^2$ संकरित कार्बन अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है, इलेक्ट्रॉन युग्म को कसकर बांधता है और इसकी बंध लंबाई छोटी ($169pm$) होती है। - **नाभिकस्नेही और इलेक्ट्रॉन-समृद्ध वलय के बीच प्रतिकर्ष:** चूंकि एरोमैटिक वलय इलेक्ट्रॉन-समृद्ध होता है, इसलिए आने वाला ऋणावेशित नाभिकस्नेही electrostatic प्रतिकर्ष का अनुभव करता है।
Q4. $S_N1$ और $S_N2$ नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं की क्रियाविधि को क्रमशः टर्शियरी ब्यूटिल क्लोराइड और प्राइमरी ब्यूटिल क्लोराइड के उदाहरण लेकर समझाइए। इनके त्रिविमरासायनिक पहलुओं और इन्हें प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का परिचय\nनाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ हैलोएल्केन की मूलभूत अभिक्रियाएँ हैं जिनमें एक नाभिकस्नेही कार्बन परमाणु से जुड़े हैलोजन परमाणु को विस्थापित करता है। ये मुख्य रूप से दो क्रियाविधियों के माध्यम से आगे बढ़ती हैं: $S_N1$ (एकाणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) और $S_N2$ (द्विणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन)। ### 2. $S_N2$ क्रियाविधि (द्विणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) - **अभिक्रिया और बलगतिकी:** प्राइमरी ब्यूटिल क्लोराइड जैसे प्राथमिक एल्किल हैलाइड आमतौर पर $S_N2$ क्रियाविधि द्वारा अभिक्रिया करते हैं। अभिक्रिया की दर अभिकारक और नाभिकस्नेही दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है, जो द्वितीय कोटि की बलगतिकी का पालन करती है। - **चरण-दर-चरण क्रियाविधि:** यह एक एकल-चरण की सहवर्ती अभिक्रिया है। इसमें कोई मध्यवर्ती नहीं बनता है। आने वाला नाभिकस्नेही, हैलोजन परमाणु के विपरीत दिशा से कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है (पश्च आक्रमण)। - **संक्रमण अवस्था:** जैसे-जैसे नाभिकस्नेही और कार्बन के बीच का बंध बनता है, वैसे-वैसे कार्बन और हैलोजन के बीच का बंध टूट जाता है, और एक अस्थायी संक्रमण अवस्था से गुजरता है जिसमें अन्य सभी तीन बंध समतलीय होते हैं। - **त्रिविम रसायन:** इस क्रियाविधि के परिणामस्वरूप विन्यास का पूर्ण प्रतिफलन (Inversion) होता है, जिसे वाल्डेन प्रतिफलन कहा जाता है। - **प्रभावित करने वाले कारक:** त्रिविम बाधा (Steric hindrance) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राथमिक हैलाइडों में न्यूनतम त्रिविम बाधा होती है, इसलिए वे $S_N2$ के माध्यम से सबसे तेज प्रतिक्रिया करते हैं। ध्रुवीय एप्रोटिक विलायक इस प्रतिक्रिया के अनुकूल होते हैं। ### 3. $S_N1$ क्रियाविधि (एकाणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) - **अभिक्रिया और बलगतिकी:** टर्शियरी ब्यूटिल क्लोराइड जैसे तृतीयक एल्किल हैलाइड $S_N1$ क्रियाविधि द्वारा प्रतिक्रिया करते हैं। अभिक्रिया की दर केवल एल्किल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करती है, जो प्रथम कोटि की बलगतिकी का पालन करती है। - **चरण-दर-चरण क्रियाविधि:** यह दो चरणों में होती है: 1. **चरण 1 (धीमा चरण):** ध्रुवीकृत C-X बंध टूटकर कार्बोनियम आयन मध्यवर्ती और हैलाइड आयन बनाता है। यह दर-निर्धारक चरण है। 2. **चरण 2 (तेज़ चरण):** नाभिकस्नेही समतलीय कार्बोनियम आयन पर तेजी से आक्रमण करके अंतिम उत्पाद बनाता है। - **त्रिविम रसायन:** चूंकि कार्बोनियम आयन $sp^2$ संकरित और समतलीय होता है, नाभिकस्नेही दोनों तरफ से समान प्रायिकता के साथ आक्रमण कर सकता है, जिससे रेसमीकरण (Racemization) होता है। - **प्रभावित करने वाले कारक:** कार्बोनियम आयन का स्थायित्व प्रतिक्रियाशीलता निर्धारित करता है। तृतीयक कार्बोनियम आयन सबसे अधिक स्थिर होते हैं, इसलिए तृतीयक हैलाइड $S_N1$ के माध्यम से सबसे तेज प्रतिक्रिया करते हैं। ध्रुवीय प्रोटिक विलायक इस मार्ग के अनुकूल होते हैं।
Q5. संतुलित रासायनिक समीकरणों के साथ निम्नलिखित नाम अभिक्रियाओं को समझाइए: 1. सैंडमेयर अभिक्रिया 2. वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया 3. क्लोरोबेंजीन का फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलन 5 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. सैंडमेयर अभिक्रिया - **परिभाषा:** सैंडमेयर अभिक्रिया का उपयोग प्राथमिक एरोमैटिक एमीन से डाइएजोनियम समूह को प्रतिस्थापित करके एरिल क्लोराइड, ब्रोमाइड और साइनाइड तैयार करने के लिए किया जाता है। - **प्रक्रिया:** जब ठंडे जलीय खनिज एसिड में घुले प्राथमिक एरोमैटिक एमीन को 273-278 K पर नाइट्रस एसिड ($NaNO_2 + HX$) के साथ उपचारित किया जाता है, तो डाइएजोनियम लवण बनता है। इस डाइएजोनियम लवण को क्यूप्रस हैलाइड ($Cu_2Cl_2$ या $Cu_2Br_2$) के साथ मिलाने पर डाइएजोनियम समूह $-Cl$, $-Br$, या $-CN$ समूह द्वारा प्रतिस्थापित हो जाता है। - **रासायनिक समीकरण:** $$C_6H_5NH_2 + HNO_2 + HCl \xrightarrow{273-278 K} C_6H_5N_2^+Cl^- + 2H_2O$$ $$C_6H_5N_2^+Cl^- \xrightarrow{Cu_2Cl_2 / HCl} C_6H_5Cl + N_2$$ ### 2. वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया - **परिभाषा:** शुष्क ईथर की उपस्थिति में सोडियम के साथ उपचारित करने पर एक ऐल्किल हैलाइड और एक एरिल हैलाइड का मिश्रण ऐल्किलएरीन देता है। इस अभिक्रिया को वुर्ट्ज-फिटिग अभिक्रिया कहा जाता है। - **प्रक्रिया:** इस युग्मन अभिक्रिया में, दो अलग-अलग हैलोजन-युक्त अणु (एक एलिफैटिक और एक एरोमैटिक) निर्जल ईथरीय माध्यम में धात्विक सोडियम के साथ अभिक्रिया करके एक प्रतिस्थापित एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन बनाते हैं। - **रासायनिक समीकरण:** $$C_6H_5Cl + 2Na + Cl-CH_3 \xrightarrow{Dry Ether} C_6H_5-CH_3 + 2NaCl$$ ### 3. क्लोरोबेंजीन का फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलन - **परिभाषा:** फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलन में निर्जल एल्युमिनियम क्लोराइड ($AlCl_3$) जैसे लुईस एसिड उत्प्रेरक की उपस्थिति में क्लोरोबेंजीन की बेंजीन रिंग में एक ऐल्किल समूह का प्रवेश शामिल है। - **प्रक्रिया:** क्लोरोबेंजीन निर्जल $AlCl_3$ की उपस्थिति में ऐल्किल हैलाइड (जैसे, méthyl chloride) के साथ अभिक्रिया करता है। चूंकि क्लोरीन अनुनाद के कारण ऑर्थो- और पैरा-नियोजक समूह है, इसलिए 1-क्लोरो-4-मेथिलबेंजीन (मुख्य उत्पाद) और 1-क्लोरो-2-मेथिलबेंजीन (अल्प उत्पाद) का मिश्रण प्राप्त होता है। - **रासायनिक समीकरण:** $$C_6H_5Cl + CH_3Cl \xrightarrow{Anhydrous AlCl_3} o-Chlorotoluene + p-Chlorotoluene$$
Q6. आणविक सूत्र $C_3H_7Cl$ वाला एक हैलोऐल्केन 'A' जलीय KOH के साथ उपचार करने पर सूत्र $C_3H_8O$ का यौगिक 'B' देता है। यौगिक 'A' एल्कोहॉलिक KOH के साथ उपचार करने पर सूत्र $C_3H_6$ का यौगिक 'C' देता है। 'A', 'B' और 'C' को पहचानिए और शामिल सभी रासायनिक समीकरण लिखिए। इसके अलावा, समझाइए कि ऐरिल हैलाइड ऐल्किल हैलाइडों की तुलना में नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति अत्यधिक कम प्रतिक्रियाशील क्यों होते हैं? 5 Marks
उत्तर (Answer): ### यौगिकों 'A', 'B' और 'C' की पहचान 1. **'A' का दिया गया आणविक सूत्र:** $C_3H_7Cl$ 2. **जलीय KOH के साथ अभिक्रिया:** हैलोऐल्केन 'A' अल्कोहल 'B' ($C_3H_8O$) बनाने के लिए नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के माध्यम से जलीय KOH के साथ अभिक्रिया करता है। 3. **अल्कोहॉलिक KOH के साथ अभिक्रिया:** हैलोऐल्केन 'A' ऐल्कीन 'C' ($C_3H_6$) बनाने के लिए अल्कोहॉलिक KOH के साथ डीहाइड्रोहैलोजनीकरण से गुजरता है। 4. इसलिए, यौगिक 'A' 1-क्लोरोपरोपेन ($CH_3-CH_2-CH_2Cl$), यौगिक 'B' प्रोपेन-1-ऑल ($CH_3-CH_2-CH_2OH$) और यौगिक 'C' प्रोपिन ($CH_3-CH=CH_2$) है। ### रासायनिक समीकरण: - **'B' का निर्माण:** $$CH_3-CH_2-CH_2Cl + KOH (aq) \rightarrow CH_3-CH_2-CH_2OH + KCl$$ - **'C' का निर्माण:** $$CH_3-CH_2-CH_2Cl + KOH (alc) \rightarrow CH_3-CH=CH_2 + KCl + H_2O$$ ### नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति ऐरिल हैलाइडों की कम प्रतिक्रियाशीलता:\nऐरिल हैलाइड (जैसे क्लोरोबेंजीन) निम्नलिखित कारकों के कारण ऐल्किल हैलाइडों की तुलना में नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति अत्यधिक कम प्रतिक्रियाशील होते हैं: 1. **अनुनाद प्रभाव:** हैलोएरीन में, हैोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के लोन पेयर बेंजीन रिंग के $\pi$-इलेक्ट्रॉनों के साथ संयुग्मन में होते हैं। इससे कार्बन-क्लोरिन बंध को आंशिक द्विबंध चरित्र मिलता है। 2. **संकरण में अंतर:** हैलोऐल्केन में, हैलोजन से जुड़ा कार्बन परमाणु $sp^3$ संकरित होता है, जबकि हैलोएरीन में कार्बन परमाणु $sp^2$ संकरित होता है। $sp^2$ संकरित कार्बन अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है। 3. **फेनिल धनायन की अस्थिरता:** यदि $S_N1$ क्रियाविधि होती, तो यह एक अस्थिर फेनिल धनायन बनाती। 4. **प्रतिकर्ष:** बेंजीन रिंग की इलेक्ट्रॉन-समृद्ध प्रकृति के कारण, इलेक्ट्रॉन-समृद्ध नाभिकस्नेही को प्रतिकर्ष का सामना करना पड़ता है।
Q7. ऐल्किल हैलाइडों के संबंध में $S_N1$ और $S_N2$ अभिक्रियाओं की क्रियाविधि को समझाइए। दोनों क्रियाविधि के त्रिविमरासायनिक पहलुओं की विस्तार से चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का परिचय\nनाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ हैलोऐल्केन की सबसे महत्वपूर्ण अभिक्रियाओं में से एक हैं। ये अभिक्रियाएँ मुख्य रूप से दो प्रमुख क्रियाविधियों द्वारा आगे बढ़ती हैं: $S_N1$ (एकणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) और $S_N2$ (द्विणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन)। ### 1. $S_N2$ क्रियाविधि (द्विणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) - **गतिक लक्षण:** अभिक्रिया की दर ऐल्किल हैलाइड और नाभिकस्नेही दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है। इसलिए, यह द्वितीय कोटि की अभिक्रिया है। - **क्रियाविधि के चरण:** यह एक एकल-चरण की समेकित प्रक्रिया है जिसमें बंध का निर्माण और बंध का टूटना एक साथ होता है। इसमें कोई मध्यवर्ती नहीं बनता है। - **संक्रमण अवस्था:** अभिक्रिया के दौरान, आने वाला नाभिकस्नेही छोड़ने वाले समूह के विपरीत दिशा से आक्रमण करता है (पश्च आक्रमण)। यह एक अस्थिर संक्रमण अवस्था बनाता है जहां नाभिकस्नेही और छोड़ने वाला समूह दोनों कार्बन परमाणु से आंशिक रूप से जुड़े होते हैं। - **त्रिविमरासायनिक परिणाम:** इस पश्च आक्रमण के परिणामस्वरूप विन्यास का व्युत्क्रमण होता है, जिसे आमतौर पर वाल्डेन व्युत्क्रमण के रूप में जाना जाता है। - **अभिक्रियाशीलता का क्रम:** प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड > द्वितीयक ऐल्किल हैलाइड > तृतीयक ऐल्किल हैलाइड। ### 2. $S_N1$ क्रियाविधि (एकणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) - **गतिक लक्षण:** अभिक्रिया की दर केवल ऐल्किल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करती है और नाभिकस्नेही की सांद्रता से स्वतंत्र होती है। अतः, यह प्रथम कोटि की अभिक्रिया है। - **क्रियाविधि के चरण:** यह दो चरणों में होती है: 1. **चरण 1:** ध्रुवीकृत कार्बन-हैलोजन बंध एक समतलीय कार्बधनायन मध्यवर्ती बनाने के लिए टूटता है। यह सबसे धीमा और दर-निर्धारक चरण है। 2. **चरण 2:** नाभिकस्नेही अंतिम प्रतिस्थापन उत्पाद बनाने के लिए किसी भी तरफ से समतलीय कार्बधनायन पर तेजी से आक्रमण करता है। - **त्रिविमरासायनिक परिणाम:** चूंकि कार्बधनायन मध्यवर्ती समतलीय होता है ($sp^2$ संकरित), इसलिए आने वाले नाभिकस्नेही के सामने या पीछे से आक्रमण करने की समान संभावना होती है। इससे रेसिमीकरण होता है। - **अभिक्रियाशीलता का क्रम:** तृतीयक ऐल्किल हैलाइड > द्वितीयक ऐल्किल हैलाइड > प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड।
Q8. आणविक सूत्र $C_4H_9Cl$ वाला एक कार्बनिक यौगिक 'A' जलीय KOH के साथ उपचारित करने पर आणविक सूत्र $C_4H_{10}O$ वाला यौगिक 'B' देता है। यौगिक 'A' ऐकोहॉलिक KOH के साथ उपचारित करने पर एक ऐल्कीन 'C' ($C_4H_8$) देता है। ऐल्कीन 'C' का ओजोनी अपघटन दो अलग-अलग ऐल्डिहाइड देता है। पूर्ण रासायनिक अभिक्रियाओं के साथ यौगिक A, B और C की पहचान कीजिए और चरणों को स्पष्ट रूप से समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. आणविक सूत्र और अभिक्रियाओं का विश्लेषण - यौगिक 'A' का आणविक सूत्र $C_4H_9Cl$ है, जो एक ऐल्किल क्लोराइड है। - **अभिक्रिया 1 (जलीय KOH):** यौगिक 'A' जलीय KOH के साथ अभिक्रिया करके यौगिक 'B' ($C_4H_{10}O$) देता है, जो नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन को दर्शाता है। - **अभिक्रिया 2 (ऐकोहॉलिक KOH):** यौगिक 'A' ऐकोहॉलिक KOH के साथ विहाइड्रोहैलोजनीकरण (लोपन अभिक्रिया) से गुजरकर ऐल्कीन 'C' ($C_4H_8$) बनाता है। - **अभिक्रिया 3 (C का ओजोनी अपघटन):** ऐल्कीन 'C' का ओजोनी अपघटन दो अलग-अलग ऐल्डिहाइड देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ऐल्कीन 'C' **बूट-1-ईन** ($CH_3-CH_2-CH=CH_2$) है। ### 2. ऐल्किल हैलाइड 'A' की पहचान\nचूँकि ऐल्कीन 'C' बूट-1-ईन है, इसलिए मूल ऐल्किल क्लोराइड 'A' **1-क्लोरोबूटेंस** ($CH_3-CH_2-CH_2-CH_2Cl$) है। ### 3. चरण-दर-चरण रासायनिक अभिक्रियाएँ **चरण 1: A से B का रूपांतरण** $$CH_3-CH_2-CH_2-CH_2Cl + KOH (aq) \xrightarrow{\Delta} CH_3-CH_2-CH_2-CH_2OH + KCl$$ *(यौगिक A: 1-क्लोरोब्यूटेन, यौगिक B: ब्यूटेन-1-ऑल)* **चरण 2: A से C का रूपांतरण** $$CH_3-CH_2-CH_2-CH_2Cl + KOH (alc) \xrightarrow{\Delta} CH_3-CH_2-CH=CH_2 + KCl + H_2O$$ *(यौगिक C: ब्यूट-1-ईन)* **चरण 3: C का ओजोनी अपघटन** $$CH_3-CH_2-CH=CH_2 + O_3 \xrightarrow{CCl_4} [Molozonide] \xrightarrow{Zn/H_2O} CH_3-CH_2-CHO + HCHO$$ *(उत्पाद: प्रोपेनेल और मेथेनेल — दो अलग-अलग ऐल्डिहाइड)* ### 4. अंतिम निष्कर्ष - **यौगिक A:** 1-क्लोरोब्यूटेन ($C_4H_9Cl$) - **यौगिक B:** ब्यूटेन-1-ऑल ($C_4H_{10}O$) - **यौगिक C:** ब्यूट-1-ईन ($C_4H_8$)
Q9. हैलोऐरीन के बनाने की विधियों की चर्चा कीजिए। समझाइए कि हैलोऐरीन, हैलोऐल्केन की तुलना में नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के प्रति बहुत कम सक्रिय क्यों होते हैं, और दो उदाहरणों के साथ उनकी इलेक्ट्रोफिलिक ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं का वर्णन कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. हैलोऐरीन बनाने की विधियाँ - **इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन द्वारा हाइड्रोकार्बन से:** ऐरिल क्लोराइड और ब्रोमाइड को आयरन(III) क्लोराइड या आयरन(III) ब्रोमाइड जैसे लुईस अम्ल उत्प्रेरकों की उपस्थिति में क्लोरीन और ब्रोमीन के साथ हैलोऐरीन के इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन द्वारा आसानी से तैयार किया जा सकता है। - **सैंडमेयर अभिक्रिया:** जब खनिज अम्ल में घुले प्राथमिक ऐरोमैटिक ऐमीन को ठंडे नाइट्रस अम्ल ($HNO_2$) के साथ अभिकृत किया जाता है, तो डाइऐजोनियम लवण बनते हैं। इस विलयन को कॉपर(I) क्लोराइड या कॉपर(I) ब्रोमाइड के साथ मिलाने पर $-Cl$ या $-Br$ द्वारा डाइऐजोनियम समूह का प्रतिस्थापन होता है। ### 2. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति हैलोऐरीन की कम सक्रियता के कारण\nनिम्नलिखित कारकों के कारण हैलोऐरीन, हैलोऐल्केन की तुलना में नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन के प्रति अत्यधिक कम सक्रिय होते हैं: - **अनुनाद प्रभाव:** हैलोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉनों के एकांकी युग्म बेंजीन वलय के $\pi$-इलेक्ट्रॉनों के साथ संयुग्मन में होते हैं। इससे C-Cl बंध में आंशिक द्विबंध गुण आ जाता है, जो इसे एकल बंध की तुलना में मजबूत बनाता है। - **संकरण में अंतर:** हैलोऐल्केन में, हैलोजन से जुड़ा कार्बन $sp^3$ संकरित होता है, जबकि हैलोऐरीन में यह $sp^2$ संकरित होता है। $sp^2$ संकरित कार्बन अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है। - **फेनिल धनायन का आस्थायित्व:** $S_N1$ तंत्र की स्थिति में, स्वतः आयनीकरण द्वारा बना फेनिल धनायन अनुनाद द्वारा स्थिर नहीं होता है। - **प्रतिकर्षन:** इलेक्ट्रॉन-समृद्ध नाभिकस्नेही, बेंजीन वलय के इलेक्ट्रॉन-समृद्ध $\pi$-मेघ के पास आने पर प्रतिकर्षण का अनुभव करते हैं। ### 3. इलेक्ट्रोफिलिक ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ\nहैलोऐरीन बेंजीन वलय की सामान्य इलेक्ट्रोफिलिक अभिक्रियाओं से गुजरते हैं। हैलोजन परमाणु $-I$ प्रभाव और $+R$ प्रभाव प्रदर्शित करता है। $+R$ प्रभाव आने वाले इलेक्ट्रोफाइल को ऑर्थो- और पैरा-स्थानों पर निर्देशित करता है। - **हैलोजनकरण:** निर्जल $AlCl_3$ की उपस्थिति में क्लोरोobenzene की क्लोरीन के साथ अभिक्रिया से 1,4-डाइक्लोरोबेंजीन (मुख्य) और 1,2-डाइक्लोरोबेंजीन (अल्प) प्राप्त होते हैं। - **फ्रीडेल-क्राफ्ट्स ऐल्किलन:** निर्जल ऐलुमिनियम क्लोराइड की उपस्थिति में क्लोरोबेंजीन की ऐल्किल क्लोराइड के साथ अभिक्रिया से 1-क्लोरो-4-मेथिलबेंजीन प्राप्त होती है।
Q10. ऐल्किल हैलाइडों के संबंध में $S_N1$ और $S_N2$ अभिक्रियाओं की क्रियाविधि समझाइए। इनके त्रिविम रासायनिक परिणामों और इन दोनों मार्गों को प्रभावित करने वाले कारकों की विस्तार से चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन का परिचय\nऐल्किल हैलाइडों की नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं को उनकी गतिज और क्रियाविधि के आधार पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है: $S_N1$ (एकणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) और $S_N2$ (द्विणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन)। ### 2. $S_N2$ (द्विणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) अभिक्रिया की क्रियाविधि - **गतिकी:** अभिक्रिया की दर ऐल्किल हैलाइड और नाभिकस्नेही दोनों की सांद्रता पर निर्भर करती है। अतः यह द्वितीय कोटि की अभिक्रिया है। - **क्रियाविधि:** यह बिना किसी मध्यवर्ती के एक ही चरण में होती है। आने वाला नाभिकस्नेही, हैलोजन परमाणु के विपरीत दिशा से कार्बन परमाणु पर आक्रमण करता है (पश्च आक्रमण)। - **संक्रमण अवस्था:** एक पंचसंयोजी संक्रमण अवस्था बनती है जिसमें आंशिक रूप से बंध बनते और टूटते हैं। - **त्रिविम रसायन:** विन्यास का प्रतिपन्न होता है, जिसे वाल्डेन प्रतिपन्न कहा जाता है, जहाँ एक दक्षिणध्रुवण घूर्णक यौगिक वामाध्रुवण घूर्णक में बदल सकता है। ### 3. $S_N1$ (एकणुक नाभिकस्नेही प्रतिस्थापन) अभिक्रिया की क्रियाविधि - **गतिकी:** अभिक्रिया की दर केवल ऐल्किल हैलाइड की सांद्रता पर निर्भर करती है और नाभिकस्नेही की सांद्रता से स्वतंत्र होती है। अतः यह प्रथम कोटि की अभिक्रिया है। - **क्रियाविधि:** यह दो चरणों में पूरी होती है: 1. *चरण 1:* ध्रुवीय C-X बंध का धीमा विदलन होता है जिससे समतलीय कार्बधनायन और हैलाइड आयन बनते हैं। यह दर-निर्धारक चरण है। 2. *चरण 2:* नाभिकस्नेही तेजी से कार्बधनायन पर दोनों तरफ से आक्रमण करके अंतिम उत्पाद बनाता है। - **त्रिविम रसायन:** चूँकि कार्बधनायन $sp^2$ संकरित और समतलीय होता है, नाभिकस्नेही आगे और पीछे दोनों पृष्ठों से समान प्रायिकता के साथ आक्रमण कर सकता है, जिससे रेसिमीकरण (रेसिमिक मिश्रण का निर्माण) होता है। ### 4. $S_N1$ और $S_N2$ मार्गों को प्रभावित करने वाले कारक - **ऐल्किल समूह की प्रकृति:** $S_N2$ के लिए, न्यूनतम त्रिविम बाधा के कारण प्राथमिक हैलाइड सबसे तेजी से अभिक्रिया करते हैं ($1^0 > 2^0 > 3^0$)। $S_N1$ के लिए, तृतीयक कार्बधनायन के उच्च स्थायित्व के कारण तृतीयक हैलाइड सबसे तेज अभिक्रिया करते हैं ($3^0 > 2^0 > 1^0$)। - **नाभिकस्नेही की प्रकृति:** एक प्रबल नाभिकस्नेही $S_N2$ मार्ग को बढ़ावा देता है, जबकि दुर्बल नाभिकस्नेही $S_N1$ तंत्र को बढ़ावा देता है। - **विलायक की प्रकृति:** ध्रुवीय प्रोटिक विलायक (जैसे जल, एथेनॉल) कार्बधनायन को स्थिर करके $S_N1$ को बढ़ावा देते हैं। ध्रुवीय अप्रोटिक विलायक (जैसे एसीटोन) $S_N2$ को बढ़ावा देते हैं।
Q11. 2-bromobutane के साथ होने वाली $S_N1$ अभिक्रिया की क्रियाविधि समझाइए। इसके परिणामस्वरूप रेसेमिक मिश्रण क्यों प्राप्त होता है? 3 Marks
उत्तर (Answer): 2-bromobutane के लिए $S_N1$ (विस्थापन नाभिकस्नेही एकाणुक) अभिक्रिया की क्रियाविधि दो चरणों में संपन्न होती है। पहले और वेग-निर्धारक चरण में, कार्बन-ब्रोमीन बंध का विषमांगी विदलन होता है जिससे एक समतलीय कार्बोकेटाइन मध्यवर्ती और ब्रोमाइड आयन बनता है। यह चरण धीमा और उत्क्रमणीय होता है। द्वितीयक कार्बोकेटाइन का स्थायित्व इस प्रक्रिया को सुगम बनाता है। दूसरे चरण में, नाभिकस्नेही दोनों तरफ से समतलीय कार्बोकेटाइन पर समान प्रायिकता के साथ आक्रमण करता है। चूंकि कार्बोकेटाइन $sp^2$ संकरित और समतलीय होता है, इसलिए आने वाले नाभिकस्नेही के सामने की ओर से 50% और पीछे की ओर से आक्रमण करने की 50% संभावना होती है। इससे दो एनाएंटीओमर का सममोलर मिश्रण बनता है, जिसे रेसेमिक मिश्रण कहा जाता है। चूँकि एक एनाएंटीओमर समतल-ध्रुवित प्रकाश को बाईं ओर (वामघूर्णक) और दूसरा दाईं ओर (दक्षिणघूर्णक) समान मात्रा में घुमाता है, इसलिए बाह्य प्रतिकर के कारण परिणामी मिश्रण का प्रकाशीय घूर्णन शून्य हो जाता है। इस प्रकार, एक प्रकाशीय सक्रिय अभिकारक एक प्रकाशीय अक्रिय उत्पाद देता है।
Q12. निम्नलिखित नाम प्रतिक्रियाओं के संतुलित रासायनिक समीकरणों को समझाएं: 1. सैंडमेयर प्रतिक्रिया 2. फिंकेलस्टीन प्रतिक्रिया 3 Marks
उत्तर (Answer): यहाँ दो मांगी गई नाम प्रतिक्रियाओं के व्याख्या और रासायनिक समीकरण हैं: 1. **सैंडमेयर प्रतिक्रिया:** जब प्राथमिक वस्त्रीय अमाइनों को ठंडे जलीय खनिज एसिड में घोला जाता है और नमक नाइट्राइट से उपचार किया जाता है, तो डाइजोनियम लवण बनते हैं। यह ताज़ा तैयार किया गया डाइजोनियम लवण समाधान को कॉपरस क्लोराइड ($ ext{Cu}_2 ext{Cl}_2$) या कॉपरस ब्रोमाइड ($ ext{Cu}_2 ext{Br}_2$) के साथ मिलाने पर डाइजोनियम समूह की जगह पर क्लोरीन या ब्रोमीन अणु की प्रतिस्थापना होती है। यह पद्धति बेंजीनring में हैलोजन अणुओं की प्रतिष्ठापना की अनुमति देती है। $$ ext{C}_6 ext{H}_5 ext{NH}_2 + ext{HNO}_2 + ext{HCl} xrightarrow{0-5^circ ext{C}} ext{C}_6 ext{H}_5 ext{N}_2^+ ext{Cl}^- + ext{2H}_2 ext{O}$$ $$ ext{C}_6 ext{H}_5 ext{N}_2^+ ext{Cl}^- xrightarrow{ ext{Cu}_2 ext{Cl}_2 / ext{HCl}} ext{C}_6 ext{H}_5 ext{Cl} + ext{N}_2$$ 2. **फिंकेलस्टीन प्रतिक्रिया:** फिंकेलस्टीन प्रतिक्रिया एक विशेष रूप से हैलोजनों की प्रतिस्थापना पद्धति है जिसका उपयोग अल्किल आयोडाइडों की तैयारी के लिए किया जाता है। अल्किल क्लोराइड या ब्रोमाइड को सूखे एसिटोन में सोडियम आयोडाइड के साथ गरम किया जाता है। सोडियम क्लोराइड या सोडियम ब्रोमाइड सूखे एसिटोन में असंगत होते हैं, जो लेचातेलियर के सिद्धांत के अनुसार प्रतिक्रिया को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। $$ ext{R-X} + ext{NaI} xrightarrow{ ext{dry acetone}} ext{R-I} + ext{NaX} quad ( ext{where X = Cl, Br})$$
Q13. हालोरीन्स नाभिकीय प्रतिस्थापन प्रतिक्रियाओं के प्रति बहुत कम प्रतिक्रियाशील होते हैं क्योंकि हालोअल्केन्स की तुलना में? तीन महत्वपूर्ण कारण दें. 3 Marks
उत्तर (Answer): हालोरीन्स नाभिकीय प्रतिस्थापन प्रतिक्रियाओं के प्रति बहुत कम प्रतिक्रियाशील होते हैं क्योंकि हालोअल्केन्स की तुलना में कई संरचनात्मक और इलेक्ट्रॉनिक कारकों के कारण। यह निम्न प्रतिक्रियाशीलता को समझाने वाले तीन मुख्य और महत्वपूर्ण कारण यहाँ दिए गए हैं: 1. **रेजोनेंस प्रभाव:** हालोरीन्स में, हैलोजन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन का एकल जोड़ा आमतौर पर बेंजीन के रिंग के π-इलेक्ट्रॉनों के साथ मेल खाता है। रेजोनेंस के कारण, कार्बन-हैलोजन बंधन एक आंशिक द्विआवश्यक बंधन का वर्णन करता है। क्योंकि एक द्विआवश्यक बंधन एक सिंगल बॉन्ड से मजबूत और छोटा होता है, तो हालोरीन्स में कार्बन-हैलोजन बंधन को तोड़ने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जहां बंधन पूरी तरह से एकल बॉन्ड होता है, जैसे हालोअल्केन्स में। 2. **कार्बन की हाइब्रिडाइजेशन में अंतर:** हालोअल्केन्स में, हैलोजन परमाणु को एक $sp^3$ हाइब्रिडाइज्ड कार्बन परमाणु के साथ जोड़ा जाता है, जबकि हालोरीन्स में, कार्बन परमाणु को हैलोजन के साथ जोड़ा जाता है $sp^2$ हाइब्रिडाइज्ड। एक $sp^2$ हाइब्रिडाइज्ड कार्बन एक उच्च $s$-चरित्र (लगभग 33%) के साथ होता है जो एक $sp^3$ हाइब्रिडाइज्ड कार्बन (25%) की तुलना में होता है। परिणामस्वरूप, $sp^2$ कार्बन अधिक विद्युतगत और C-X बॉन्ड के इलेक्ट्रॉन को अधिक कसकर पकड़ता है, जिससे बंधन छोटा और मजबूत हो जाता है, जिससे हेटरोलिटिक विखंडन को रोका जा सकता है। 3. **फेनिल केशन की अस्थिरता:** नाभिकीय प्रतिस्थापन के माध्यम से एक विखंडन ($S_N1$) मार्ग के माध्यम से एक फेनिल केशन के रूप में एक मध्यवर्ती बनता है। यह फेनिल केशन अत्यधिक अस्थिर है क्योंकि इसमें रेजोनेंस स्थिरीकरण की कमी है और उच्च ऊर्जा है, जिससे आइसोलेशन कदम अत्यधिक अप्रिय हो जाता है सामान्य परिस्थितियों के तहत।
Q14. फोटोआइसोमरिज़्म के स्टीरोकेमिकल पहलुओं को समझाएं, विशेष रूप से चिरलिटी केंद्रों और इनेन्टियोमर्स पर ध्यान देते हुए, 2-क्लोरोब्यूटेन के उदाहरण के रूप में。 3 Marks
उत्तर (Answer): हलोजनीकृत एल्केन में फोटोआइसोमरिज़्म को सबसे अच्छी तरह से चिरल मॉलिक्यूल के माध्यम से समझा जा सकता है। एक चिरल मॉलिक्यूल वह है जो अपने मिरर इमेज के साथ ओवरलैप नहीं किया जा सकता है। 2-क्लोरोब्यूटेन ($CH_3-CH(Cl)-CH_2-CH_3$) को देखते हुए, इसमें दूसरे कार्बन परमाणु को चार पूरी तरह से अलग समूहों से जोड़ा गया है: एक मेथिल समूह, एक इथिल समूह, एक क्लोरीन परमाणु, और एक हाइड्रोजन परमाणु। इस प्रकार का कार्बन परमाणु असिंमता कार्बन या एक चिरल केंद्र के रूप में जाना जाता है।
Q15. उपयुक्त रासायनिक समीकरणों और उनकी सीमाओं के साथ वुर्ट्स अभिक्रिया और वुर्ट्स-फिटिग अभिक्रिया की चर्चा कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): 1. वुर्ट्स अभिक्रिया: एल्किल हैलाइड शुष्क ईथर में सोडियम के साथ अभिक्रिया करके उच्च एल्केन देते हैं जिनमें एल्किल हैलाइड में मौजूद कार्बन परमाणुओं की संख्या से दोगुनी संख्या होती है।\nसमीकरण: $2R-X + 2Na \xrightarrow{\text{dry ether}} R-R + 2NaX$\nसीमा: यह असममित एल्केन की तैयारी के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि यह एल्केन का मिश्रण देता है जिसे समान क्वथनांक के कारण अलग करना मुश्किल होता है। 2. वुर्ट्स-फिटिग अभिक्रिया: शुष्क ईथर में सोडियम के साथ उपचारित करने पर एक एरिल हैलाइड और एक एल्किल हैलाइड का मिश्रण एक एल्किलएरीन देता है।\nसमीकरण: $Ar-X + 2Na + R-X \xrightarrow{\text{dry ether}} Ar-R + 2NaX$\nये युग्मन अभिक्रियाएं कार्बन-कार्बन बंध निर्माण के लिए व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं।