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कक्षा: 12वीं (रसायन विज्ञान)
अध्याय: ऐल्कोहॉल, फ़ीनाल और ईथर (Alcohols, Phenols and Ethers)
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1. परिचय और वर्गीकरण (Introduction and Classification)
ऐल्कोहॉल, फ़ीनाल और ईथर हाइड्रोकार्बन के हाइड्रॉक्सी व्युत्पन्न (Hydroxy derivatives) हैं।
- ऐल्कोहॉल (Alcohols): जब ऐलिफ़ैटिक हाइड्रोकार्बन के हाइड्रोजन परमाणु को
-OH (हाइड्रॉक्सी) समूह द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
- सामान्य सूत्र:
R-OH (जहाँ R ऐल्किल समूह है)।
- फ़ीनाल (Phenols): जब ऐरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (बेंजीन) के हाइड्रोजन परमाणु को सीधे
-OH समूह द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
- सामान्य सूत्र:
Ar-OH (जहाँ Ar एरिल समूह है)।
- ईथर (Ethers): जब ऐल्कोहॉल या फ़ीनाल के हाइड्रोजन (
-H) को ऐल्किल या एरिल समूह (R या Ar) द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
- सामान्य सूत्र:
R-O-R' या R-O-Ar
OH समूहों की संख्या के आधार पर वर्गीकरण:
1. मोनोहाइड्रिक (Monohydric): एक -OH समूह (जैसे, एथेनॉल)
2. डाईहाइड्रिक (Dihydrodric): दो -OH समूह (जैसे, एथिलीन ग्लाइकोल)
3. ट्राईहाइड्रिक (Trihydric): तीन -OH समूह (जैसे, ग्लिसरोल)
मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल का वर्गीकरण (C-OH आबंध के आधार पर):
- प्राथमिक (1°), द्वितीयक (2°), और तृतीयक (3°) ऐल्कोहॉल: कार्बन की प्रकृति पर निर्भर करता है जिससे
-OH जुड़ा है।
- ऐलीलियक ऐल्कोहॉल (Allylic alcohols):
-OH समूह C=C के अगले sp³ संकरित कार्बन से जुड़ा होता है।
- बेंजिलिक ऐल्कोहॉल (Benzylic alcohols):
-OH समूह बेंजीन वलय से जुड़े sp³ कार्बन से जुड़ा होता है।
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2. नामकरण (Nomenclature)
- ऐल्कोहॉल: IUPAC पद्धति में ऐल्केन के अंत में 'e' हटाकर
-ol जोड़ा जाता है (ऐल्केनाल $\rightarrow$ ऐल्केनाेल / Alkanol)।
- फ़ीनाल: इसका सबसे सरल सदस्य 'फीनाल' ही है। IUPAC में इसे 'बेन्जीन-1-ऑल' भी कहते हैं।
- ईथर: सामान्य नाम 'ऐल्किल ऐल्किल ईथर' (अल्फाबेटिकल क्रम में)। IUPAC नाम 'ऐल्कोएक्सी ऐल्केन' (Alkoxyalkane) होता है (छोटे ऐल्किल समूह के साथ 'ऑक्सी' जुड़ता है)।
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3. बनाने की विधियाँ (Preparation Methods)
#### क. ऐल्कोहॉल बनाने की विधियाँ:
1. ऐल्कीन के जलयोजन (Hydration) द्वारा:
- अम्लीय माध्यम में जल के योग से (मार्कोनीकॉव नियम के अनुसार)।
-
CH3-CH=CH2 + H2O -> (H+) -> CH3-CH(OH)-CH3 (प्रोपेन-2-ऑल)
2. कार्बोनिल यौगिकों के अपचयन (Reduction) द्वारा:
- ऐल्डिहाइड के अपचयन से $\rightarrow$ प्राथमिक (1°) ऐल्कोहॉल (
R-CHO + H2 -> R-CH2OH)
- कीटोन के अपचयन से $\rightarrow$ द्वितीयक (2°) ऐल्कोहॉल (
R-CO-R' + H2 -> R-CH(OH)-R')
- कार्बोक्सिलिक अम्ल और एस्टर के अपचयन $\rightarrow$
LiAlH4 द्वारा प्राथमिक ऐल्कोहॉल।
3. गिर्नाइट अभिकर्मक (Grignard Reagent) द्वारा:
-
HCHO के साथ $\rightarrow$ प्राथमिक (1°) ऐल्कोहॉल
- अन्य ऐल्डिहाइड के साथ $\rightarrow$ द्वितीयक (2°) ऐल्कोहॉल
- कीटोन के साथ $\rightarrow$ तृतीयक (3°) ऐल्कोहॉल
#### ख. फ़ीनाल बनाने की विधियाँ:
1. हैलोएरीन (क्लोरोबेंजीन) से (डows प्रक्रम):
-
C6H5Cl + NaOH (623K, 300 atm) -> C6H5ONa -> (H+) -> C6H5OH
2. बेंजीनसल्फोनिक अम्ल से:
-
C6H5SO3H + NaOH -> C6H5ONa -> (H+) -> C6H5OH
3. डाइएजोनियम लवण से:
-
C6H5N2+Cl- + H2O -> (Warm) -> C6H5OH + N2 + HCl
4. क्यूमीन (Cumene) से (औद्योगिक विधि):
- क्यूमीन के ऑक्सीकरण से क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड बनता है, जो तनु अम्ल के साथ अपघटन पर फ़ीनाल और एसीटोन देता है।
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4. भौतिक गुण (Physical Properties)
- क्वथनांक (Boiling Points): अन्तराअणुक हाइड्रोजन बंध (
Intermolecular Hydrogen bonding) के कारण ऐल्कोहॉल और फ़ीनाल के क्वथनांक समान आणविक द्रव्यमान वाले हाइड्रोकार्बन और ईथर से बहुत अधिक होते हैं।
- विलेयता (Solubility): जल के साथ हाइड्रोजन बंध बनाने के कारण निम्न ऐल्कोहॉल जल में घुलनशील होते हैं। आणविक द्रव्यमान बढ़ने पर विलेयता घटती है।
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5. रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions)
#### क. ऐल्कोहॉल की अभिक्रियाएँ (O-H आबंध का विदलन):
1. सक्रिय धातुओं (Na, K) के साथ:
-
2ROH + 2Na -> 2RONa + H2 (सोडियम ऐल्कोक्साइड बनता है और हाइड्रोजन गैस निकलती है)।
2. एस्टरतीकरण (Esterification):
- कार्बोक्सिलिक अम्ल के साथ सांद्र
H2SO4 की उपस्थिति में अभिक्रिया कर एस्टर बनाते हैं।
-
R-OH + R'-COOH ⇌ R'-COOR + H2O
#### ख. ऐल्कोहॉल की अभिक्रियाएँ (C-O आबंध का विदलन):
1. हाइड्रोजन हैलाइड (HX) के साथ (लुकास अभिकर्मक):
-
ROH + HX -> R-X + H2O
- लुकास परीक्षण (Lucas Test): 1°, 2° और 3° ऐल्कोहॉल में विभेद करने के लिए (
ZnCl2 + Conc. HCl)।
- 3° ऐल्कोहॉल $\rightarrow$ तुरंत धुंधलापन (Turbidity)
- 2° ऐल्कोहॉल $\rightarrow$ 5 मिनट बाद धुंधलापन
- 1° ऐल्कोहॉल $\rightarrow$ सामान्य ताप पर कोई अभिक्रिया नहीं।
2. निर्जलीकरण (Dehydration):
- सांद्र
H2SO4 या H3PO4 के साथ गर्म करने पर ऐल्कीन बनाते हैं।
-
CH3-CH2-OH -> (Conc. H2SO4, 443K) -> CH2=CH2 + H2O
3. ऑक्सीकरण (Oxidation):
- 1° ऐल्कोहॉल $\rightarrow$ ऐल्डिहाइड $\rightarrow$ कार्बोक्सिलिक अम्ल
- 2° ऐल्कोहॉल $\rightarrow$ कीटोन
- 3° ऐल्कोहॉल $\rightarrow$ सामान्य परिस्थितियों में ऑक्सीकरण नहीं दर्शाते।
#### ग. फ़ीनाल की विशिष्ट अभिक्रियाएँ (इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन):
फ़ीनाल में -OH समूह ऑर्थो (ortho) और पैरा (para) निर्देशक (Activating) होता है।
1. हैलोजनीकरण (Halogenation):
- तनु
HNO3 के साथ $\rightarrow$ ऑर्थो और पैरा नाइट्रोफ़ीनाल का मिश्रण।
- ब्रोमीन जल के साथ $\rightarrow$
2,4,6-ट्राइब्रोमोफ़ीनाल का श्वेत अवक्षेप बनता है।
2. कोल्बे अभिक्रिया (Kolbe's Reaction):
- फ़ीनाल के सोडियम लवण (सोडियम फ़ीनाक्साइड) को
CO2 के साथ 398K ताप और 4-7 वायुमंडलीय दाब पर गर्म करने पर सेलिसाइलिक अम्ल (Salicylic acid) बनता है।
3. राइमर-टीमैन अभिक्रिया (Reimer-Tiemann Reaction):
- फ़ीनाल की क्रिया सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म (
CHCl3) से कराने पर -CHO समूह ऑर्थो स्थिति पर प्रवेश करता है, जिससे सेलिऐल्डिहाइड (Salicylaldehyde) बनता है।
4. जिंक चूर्ण के साथ आसवन (Reaction with Zinc dust):
-
C6H5OH + Zn -> C6H5 + ZnO (बेंजीन बनता है)।
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6. ईथर (Ethers)
#### क. बनाने की विधि (Preparation):
1. विलियमसन संश्लेषण (Williamson Synthesis):
- यह सममित (Symmetrical) और असममित (Unsymmetrical) दोनों प्रकार के ईथर बनाने की उत्तम विधि है।
-
R-X + R'-ONa -> R-O-R' + NaX
#### ख. भौतिक गुण:
- द्विध्रुव आघूर्ण (Dipole moment) कम होने के कारण इनके क्वथनांक isomeric ऐल्कोहॉल से बहुत कम होते हैं।
#### ग. रासायनिक अभिक्रियाएँ:
1. Hl के साथ विपाटन (Cleavage of C-O bond in Ethers):
-
R-O-R' + HI -> R-I + R'-OH
- यदि अधिक आधिक्य में
HI हो, तो दोनों ऐल्किल समूह् हैलाइड बनाते हैं।
- ऐल्किल एरिल ईथर (जैसे एनिसोल) के साथ हमेशा फ़ीनाल और ऐल्किल आयोडाइड बनता है।
-
C6H5-O-CH3 + HI -> C6H5-OH + CH3I
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 एल्कोहॉल, फीनॉल और ईथर
परिचय और वर्गीकरण
एल्कोहॉल
मोनोहाइड्रिक
डाइहाइड्रिक
पॉलीहाइड्रिक
फीनॉल
मोनोहाइड्रिक
डाइहाइड्रिक
ट्राइहाइड्रिक
ईथर
सरल ईथर (सममित)
मिश्रित ईथर (असममित)
नामपद्धति (नोमेक्लेचर)
सामान्य नाम
आईयूपीएसी (IUPAC) नाम
संरचना और आबंधन
सी-ओ-एच (C-O-H) बंध कोण (एल्कोहॉल और फीनॉल)
सी-ओ-सी (C-O-C) बंध कोण (ईथर)
एल्कोहॉल का विरचन (तैयारी)
एल्कीन के जलयोजन से
कार्बोनिल यौगिकों के अपचयन से
एल्डिहाइड और कीटोन से
कार्बोक्सिलिक अम्ल और एस्टर से
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक से
फीनॉल का विरचन (तैयारी)
हेलोएरीन से
बेंजीनसल्फोनिक अम्ल से
डाइएजोनियम लवण से
क्यूमीन से
भौतिक गुणधर्म
क्वथनांक
हाइड्रोजन आबंधन का प्रभाव
विलेयता
जल के साथ हाइड्रोजन आबंध
रासायनिक अभिक्रियाएँ
एल्कोहॉल की अभिक्रियाएँ
सी-ओ (C-O) बंध का विदलन
ओ-एच (O-H) बंध का विदलन
ऑक्सीकरण अभिक्रियाएँ
निर्जलीकरण अभिक्रियाएँ
फीनॉल की अभिक्रियाएँ
इलेक्ट्रोफिलिक aromatic प्रतिस्थापन
हैलोजनीकरण
नाइट्रीकरण
सल्फोनीकरण
कोल्बे अभिक्रिया
रीमर-टीमैन अभिक्रिया
जिंक चूर्ण के साथ अपचयन
ईथर
विरचन
विलियमसन ईथर संश्लेषण
एल्कोहॉलों के निर्जलीकरण द्वारा
भौतिक गुणधर्म
क्वथनांक और विलेयता
रासायनिक अभिक्रियाएँ
सी-ओ (C-O) बंध का विदलन
इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन (एरोमेटिक ईथर)
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### अल्कोहल का अम्ल-उत्प्रेरित निर्जलीकरण द्वारा एल्कीन निर्माण
\nअम्ल-उत्प्रेरित निर्जलीकरण में अम्ल (जैसे सांद्र $H_2SO_4$ या $H_3PO_4$) की उपस्थिति में अल्कोहल से एक जल का अणु निष्कासित होकर एल्कीन का निर्माण करता है। यह एक विलोपन (elimination) अभिक्रिया है, जो द्वितीयक और तृतीयक अल्कोहलों के लिए विशेष रूप से $E1$ विलोपन पथ का अनुसरण करती है।
#### चरण-दर-चरण क्रियाविधि
1. **अल्कोहल का प्रोटोनीकरण (Protonation):**
- अल्कोहल के ऑक्सीजन परमाणु पर एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म (lone pairs) होते हैं, जिससे यह क्षारीय प्रकृति का होता है। अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में यह प्रोटॉन ($H^+$) ग्रहण करके ऑक्सोनियम आयन (प्रोटोनीकृत अल्कोहल) बनाता है।
- *समीकरण:* $R-CH_2-OH + H^+ \rightleftharpoons R-CH_2-O^+H_2$
- यह चरण अत्यधिक तीव्र और उत्क्रमणीय होता है।
2. **कार्बोकैटायन का निर्माण (वेग-निर्धारक चरण):**
- प्रोटोनीकृत अल्कोहल C-O बंध के टूटने के कारण जल के अणु ($H_2O$) को त्याग देता है और कार्बोकैटायन बनाता है। चूँकि जल एक बहुत अच्छा निष्कासक समूह (leaving group) है, यह चरण आसानी से होता है।
- *समीकरण:* $R-CH_2-O^+H_2 \rightarrow R-CH_2^+ + H_2O$
- यह क्रियाविधि का सबसे धीमा चरण है और इसलिए पूरी अभिक्रिया का वेग-निर्धारक चरण (rate-determining step) होता है।
-
3. **प्रोटॉन त्याग द्वारा एल्कीन का निर्माण:**
- कार्बोकैटायन निकटवर्ती कार्बन परमाणु (alpha-carbon) से एक प्रोटॉन ($H^+}$) त्यागकर उदासीन एल्कीन बनाता है। यह प्रोटॉन किसी क्षारक (जैसे जल या हाइड्रोजनसल्फेट आयन) द्वारा ग्रहण किया जाता है, जिससे अम्ल उत्प्रेरक पुनः प्राप्त हो जाता है।
- *समीकरण:* $R-CH-CH_2^+ + B \rightarrow R-CH=CH_2 + BH^+$
#### अल्कोहलों की क्रियाशीलता का क्रम
- अम्ल-उत्प्रेरित निर्जलीकरण के प्रति अल्कोहलों की क्रियाशीलता का क्रम निम्नलिखित होता है:
$$\text{तृतीयक (3°)} > \text{द्वितीयक (2°)} > \text{प्राथमिक (1°)}$$
- **कारण:** वेग-निर्धारक चरण में कार्बोकैटायन मध्यवर्ती का निर्माण होता है। चूँकि कार्बोकैटायन का स्थायित्व $3^\circ > 2^\circ > 1^\circ$ के क्रम में होता है, इसलिए तृतीयक अल्कोहल अत्यधिक स्थायी तृतीयक कार्बोकैटायन बनाते हैं और आसानी से तथा बहुत तेजी से निर्जलीकरण दर्शाते हैं। प्राथमिक अल्कोहल कम स्थायी प्राथमिक कार्बोकैटायन बनाते हैं, जिसके लिए निर्जलीकरण हेतु कठोर परिस्थितियों (उच्च तापमान और सांद्र अम्ल) की आवश्यकता होती है।
उत्तर (Answer): ### विलियमसन ईथर संश्लेषण क्रियाविधि\nविलियमसन ईथर संश्लेषण सममित और असममित ईथर की तैयारी के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि है। इसमें सोडियम एल्कोक्साइड के साथ एक एल्किल हैलाइड की प्रतिक्रिया शामिल है।
- **सामान्य प्रतिक्रिया:** $R-\text{X} + R'-\text{ONa} \rightarrow R-\text{O}-R' + \text{NaX}$
- **क्रियाविधि:** प्रतिक्रिया आम तौर पर प्राथमिक एल्किल हैलाइड के लिए $S_N2$ क्रियाविधि का पालन करती है। एल्कोक्साइड आयन एक मजबूत न्यूक्लियोफाइल के रूप में कार्य करता है और एल्किल हैलाइड में हैोजन परमाणु से जुड़े कार्बन परमाणु पर हमला करता है, और विन्यास के व्युत्क्रमण के साथ एक संयुक्त एकल-चरण प्रक्रिया में हैलाइड आयन ($X^-$) को विस्थापित करता है।
### सोडियम मेथोक्साइड के साथ 2-क्लोरो-2-मेथिलप्रोपेन की प्रतिक्रिया\nजब तृतीयक एल्किल हैलाइड जैसे 2-क्लोरो-2-मेथिलप्रोपेन सोडियम मेथोक्साइड जैसे मजबूत न्यूक्लियोफाइल/बेस के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, तो स्टिरिक बाधा (steric hindrance) के कारण प्रतिस्थापन पर विलोपन (elimination) प्रबल रूप से हावी हो जाता है।
- **प्रतिक्रिया समीकरण:**
$$\text{(CH}_3)_3\text{C}-\text{Cl} + \text{CH}_3\text{ONa} \rightarrow \text{(CH}_3)_2\text{C}=\text{CH}_2 + \text{CH}_3\text{OH} + \text{NaCl}$$
- **उत्पाद की व्याख्या:** $S_N2$ प्रतिस्थापन के माध्यम से ईथर बनाने के बजाय (जो तृतीयक कार्बन पर तीन भारी मेथिल समूहों द्वारा बाधित होता है), सोडियम मेथोक्साइड एक मजबूत आधार के रूप में कार्य करता है और मेथिल समूहों में से एक से एक प्रोटॉन को अलग करता है। यह एक $E2$ विलोपन प्रतिक्रिया को ट्रिगर करता है, जिससे मेथनॉल और सोडियम क्लोराइड के साथ मुख्य उत्पाद के रूप में **2-मेथिलप्रोपेन** (एक एल्कीन) का निर्माण होता है।
उत्तर (Answer): ### एसिड-चेतक जलीकरण का परिचय
अल्कीन प्रोटिक एसिड के उपस्थिति में पानी के साथ प्रतिक्रिया करता है और अल्कोहल बनाता है। यह प्रतिक्रिया मार्कोवनिकोव के नियम का पालन करती है। यह प्रतिक्रिया तीन मूलभूत चरणों में होती है।
### चरण-दर-चरण विधि
#### चरण 1: अल्कीन का प्रोटोनेशन
प्रोटिक एसिड के कैटलिस्ट ($H_2SO_4$ या $H^+/H_2O$) का विघटन होता है जिससे एक प्रोटॉन ($H^+$, जो हाइड्रोनियम आयन, $H_3O^+$ के रूप में मौजूद होता है) की प्राप्ति होती है। अल्कीन एक न्यूक्लियोफिल और हाइड्रोनियम आयन को हमला करता है और एक कार्बोकेशन का निर्माण करता है।
$$ ext{CH}_3- ext{CH}= ext{CH}_2 + ext{H}_3 ext{O}^+
ightarrow ext{CH}_3- ext{CH}^+- ext{CH}_3 + ext{H}_2 ext{O}$$
यह चरण सबसे धीमा होता है और इसलिए प्रतिक्रिया की दर निर्धारित करने वाला चरण होता है।
#### चरण 2: पानी का न्यूक्लियोफिलिक हमला
पहले चरण में बने कार्बोकेशन को विद्युतग्राही प्रकृति का होता है। एक पानी का अणु, न्यूक्लियोफिल के रूप में कार्य करता है, कार्बोकेशन पर हमला करता है और एक प्रोटोनेटेड अल्कोहल (ऑक्सियम आयन) का निर्माण करता है।
$$ ext{CH}_3- ext{CH}^+- ext{CH}_3 + ext{H}_2 ext{O}
ightarrow ext{CH}_3- ext{CH}( ext{OH}_2^+)- ext{CH}_3$$
#### चरण 3: प्रोटोन का छूटना
प्रोटोनेटेड अल्कोहल से एक प्रोटॉन ($H^+$) का छूटना होता है जो दूसरे पानी के अणु से होता है और एक गैर-चुंबकी अल्कोहल अणु और हाइड्रोनियम आयन (कैटलिस्ट) को पुनः प्राप्त करता है।
$$ ext{CH}_3- ext{CH}( ext{OH}_2^+)- ext{CH}_3 + ext{H}_2 ext{O}
ightarrow ext{CH}_3- ext{CH}( ext{OH})- ext{CH}_3 + ext{H}_3 ext{O}^+$$
### निष्कर्ष
इस प्रकार, इन तीन चरणों के माध्यम से, अल्कीन सफलतापूर्वक एक संबंधित अल्कोहल में परिवर्तित हो जाता है, जो मार्कोवनिकोव के पानी के जोड़ को पूरा करता है।
उत्तर (Answer): ### अम्लीय प्रकृति का परिचय\nफिनोल, अल्कोहल और जल की तुलना में काफी अधिक अम्लीय होते हैं, लेकिन कार्बोक्सिलिक एसिड से कम। फिनोल की अम्लता का श्रेय फिनॉक्साइड आयन द्वारा अनुनाद (resonance) के माध्यम से ऋणावेश को फैलाने की क्षमता को जाता है।
### अल्कोहल और जल के साथ तुलना
- **फिनोल बनाम अल्कोहल:** अल्कोहल बहुत दुर्बल अम्ल होते हैं। जब एक अल्कोहल प्रोटोन खोता है, तो यह एल्कोक्साइड आयन ($RO^-$) बनाता है जहाँ ऋणावेश ऑक्सीजन परमाणु पर स्थानीयकृत होता है। इसके विपरीत, जब फिनोल प्रोटोन खोता है, तो यह फिनॉक्साइड आयन ($C_6H_5O^-$) बनाता है। फिनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थिर होता है, जिससे फिनोल में अल्कोहल की तुलना में प्रोटोन ($H^+$) का निष्कासन बहुत आसान हो जाता है।
- **फिनोल बनाम जल:** फिनोल का पृथक्करण स्थिरांक ($K_a$) लगभग $1.3 \times 10^{-10}$ होता है, जबकि जल का $1.8 \times 10^{-16}$ होता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि फिनोल जल की तुलना में एक प्रबल अम्ल है।
### प्रतिस्थापियों का फिनोल की अम्लता पर प्रभाव\nबेंजीन रिंग पर विभिन्न समूहों की उपस्थिति फिनोल की अम्लता को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है:
- **इलेक्ट्रॉन-अपसारक समूह (EWGs):** नाइट्रो ($-\text{NO}_2$), हैलोजन ($-\text{Cl}, -\text{Br}$), और सायनो ($-\text{CN}$) जैसे समूह फिनोल की अम्लता को बढ़ाते हैं। वे प्रेरणिक ($-I$) और अनुनादी ($-M$) प्रभावों के माध्यम से बेंजीन रिंग और ऑक्सीजन परमाणु से इलेक्ट्रॉन घनत्व को खींचते हैं, जिससे फिनॉक्साइड आयन स्थिर होता है और प्रोटोन का निकलना आसान हो जाता है। उदाहरण के लिए, ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर नाइट्रो समूह की उपस्थिति अम्लता को नाटकीय रूप से बढ़ा देती है (जैसे, पिक्रिक एसिड एक बहुत मजबूत अम्ल है)।
- **इलेक्ट्रॉन-दाता समूह (EDGs):** एल्किल समूह ($-\text{CH}_3$, $-\text{C}_2\text{H}_5$) और एल्कोक्सी समूह ($-\text{OCH}_3$) जैसे समूह फिनोल की अम्लता को कम करते हैं। ये समूह $+I$ और $+M$ प्रभावों के माध्यम से रिंग को इलेक्ट्रॉन घनत्व दान करते हैं, ऑक्सीजन परमाणु पर ऋणावेश को तीव्र करते हैं, फिनॉक्साइड आयन को अस्थिर करते हैं, और प्रोटोन के निष्कासन को कठिन बनाते हैं। परिणामतः, क्रेसोल फिनोल की तुलना में दुर्बल अम्ल होते हैं।
उत्तर (Answer): ### फेनोल के महत्वपूर्ण नाम प्रतिक्रियाएं और रासायनिक गुणधर्म
फेनोल में हाइड्रॉक्सिल समूह के कारण, जो सीधे बेंजीन रिंग से जुड़ा है, एक अद्वितीय रासायनिक गतिविधि को दर्शाता है, जो इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन की ओर मजबूत सक्रियण को प्रेरित करता है और विशिष्ट नाम प्रतिक्रियाओं को दर्शाता है।
* **1. कोल्बे की प्रतिक्रिया (कोल्बे - श्मिट प्रतिक्रिया):**
* **विवरण:** फेनोल को सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ उपचार करने से उत्पन्न होने वाला फेनोक्साइड आयन, इलेक्ट्रोफिलिक芳香ीय प्रतिस्थापन के प्रति अधिक सक्रिय होता है। इस प्रकार, यह कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) के साथ इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन का अनुभव करता है, जो एक कमजोर इलेक्ट्रोफिल है, जिससे सलिसिलिक एसिड (2-हाइड्रॉक्सीबेंजोइक एसिड) के रूप में प्राथमिक उत्पाद का निर्माण होता है।
* **प्रतिक्रिया समीकरण:**
$C_6H_5OH + NaOH
ightarrow C_6H_5ONa + H_2O$
$C_6H_5ONa + CO_2 xrightarrow{398K, 4-7 atm} C_6H_4(OH)(COONa) xrightarrow{H^+} C_6H_4(OH)(COOH)$ (सलिसिलिक एसिड)।
* **2. रीमर-टिमैन प्रतिक्रिया:**
* **विवरण:** जब फेनोल को क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$) के साथ सोडियम हाइड्रॉक्साइड ($NaOH$) के उपस्थिति में 340 K पर उपचार किया जाता है, तो बेंजीन रिंग के ortho- स्थान पर एक अल्डिहाइड समूह ($- ext{CHO}$) का प्रवेश होता है, जिससे सलिसिलाल्डिहाइड (2-हाइड्रॉक्सीबेंजाल्डिहाइड) का निर्माण होता है। प्रतिक्रिया इलेक्ट्रोफिलिक कार्बेन इंटरमीडिएट, डाइक्लोरोकार्बेन (: $CCl_2$) के उत्पादन के माध्यम से संचालित होती है।
* **प्रतिक्रिया समीकरण:**
$C_6H_5OH + CHCl_3 + 3NaOH
ightarrow C_6H_4(OH)(CHO) + 3NaCl + 2H_2O$.
* **3. इलेक्ट्रोफिलिक芳香ीय प्रतिस्थापन फेनोल में:**
बेंजीन रिंग पर $- ext{OH}$ समूह के कारण, $+R$ (सांघात्मक) प्रभाव के कारण, ortho- और para- स्थानों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व को बढ़ाता है।
* **नाइट्रेशन:**
* प्रतिबलित नाइट्रिक एसिड के साथ निम्न तापमान (298 K) पर, फेनोल में ortho- और para-नाइट्रोफेनोल का मिश्रण प्राप्त होता है।
* प्रतिबलित नाइट्रिक एसिड ($HNO_3$) के साथ सांद्रित $H_2SO_4$ की उपस्थिति में, फेनोल 2,4,6-त्रिनाइट्रोफेनोल में परिवर्तित हो जाता है, जिसे आम तौर पर पिक्रिक एसिड कहा जाता है।
* **ब्रोमीनीकरण:**
* जब फेनोल को ब्रोमीन ($Br_2$) के साथ एक कम पोलारिटी वाले घोल जैसे कि क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$) या $CS_2$ के साथ निम्न तापमान पर उपचार किया जाता है, तो ortho- और para- ब्रोमोफेनोल का मिश्रण बनता है, जिसमें para- आइसोमर सबसे अधिक उत्पाद होता है।
* जब फेनोल को ब्रोमीन पानी (आक्टू $Br_2$) के साथ उपचार किया जाता है, तो तुरंत 2,4,6-त्रِب्रोमोफेनोल का सफेद निशान बनता है, जो उच्च सक्रियण के कारण होता है।
उत्तर (Answer): ### चरण 1: ईथर की पहचान\nडाइअल्किल ईथर का सामान्य सूत्र $C_nH_{2n+2}O$ है।\nदिया गया मोलर द्रव्यमान = $88 \text{ g/mol}$।\nसामान्य आणविक द्रव्यमान सूत्र का उपयोग करके $n$ के मान की गणना करते हैं:
$12n + 1(2n+2) + 16 = 88$
$12n + 2n + 2 + 16 = 88$
$14n + 18 = 88$
$14n = 70$
$n = 5$
\nअतः ईथर का आणविक सूत्र $C_5H_{12}O$ है।\nयौगिक मेथिल टर्ट-ब्यूटिल ईथर (MTBE) है: $CH_3-O-C(CH_3)_3$, जिसका मोलर द्रव्यमान $88 \text{ g/mol}$ है।
### चरण 2: HI के साथ विदलन की अभिक्रियाएँ
1. ईथर का प्रोटोनीकरण:
$CH_3-O-C(CH_3)_3 + HI \rightleftharpoons CH_3-O^+H-C(CH_3)_3 + I^-$
2. आयोडाइड आयन द्वारा न्यूक्लियोफिलिक आक्रमण:
$S_N1$ क्रियाविधि के माध्यम से टर्ट-ब्यूटिल आयोडाइड और मेथनॉल बनते हैं।
3. आधिक्य HI के साथ मेथनॉल की अभिक्रिया:
$CH_3OH + HI \rightarrow CH_3I + H_2O$
### चरण 3: एल्किल आयोडाइड के द्रव्यमान की गणना\nईथर का दिया गया द्रव्यमान = $17.6 \text{ g}$।\nईथर के मोलों की संख्या = $\frac{17.6}{88} = 0.2 \text{ mol}$।
\nकुल अभिक्रिया के अनुसार:
$C_5H_{12}O + 2HI \rightarrow CH_3I + (CH_3)_3CI + H_2O$
\nउत्पादित कुल एल्किल आयोडाइड के मोल = $0.2 \times 2 = 0.4 \text{ mol}$ (या प्रत्येक के $0.2 \text{ mol}$)।
$CH_3I$ का मोलर द्रव्यमान = $142 \text{ g/mol}$।
$(CH_3)_3CI$ का मोलर द्रव्यमान = $184 \text{ g/mol}$।
$CH_3I$ का द्रव्यमान = $0.2 \times 142 = 28.4 \text{ g}$।
$(CH_3)_3CI$ का द्रव्यमान = $0.2 \text{ |84 = 36.8 \text{ g}$।\nउत्पादित एल्किल आयोडाइडों का कुल द्रव्यमान = $28.4 + 36.8 = 65.2 \text{ g}$।
उत्तर (Answer): ### एथनॉल के अम्ल-उत्प्रेरित निर्जलीकरण की क्रियाविधि
\nसांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) की उपस्थिति में 443 K पर एथनॉल का एथीन में निर्जलीकरण निम्नलिखित तीन चरणों में संपन्न होता है:
* **चरण 1: एथनॉल का प्रोटोनीकरण:**
अम्ल द्वारा प्रदान किए गए हाइड्रोनियम आयन ($H_3O^+$) के इलेक्ट्रॉनीस्नेही आक्रमण द्वारा एथनॉल का तेजी से प्रोटोनीकरण होता है जिससे प्रोटोनीकृत एथनॉल (एथिलॉक्सोनियम आयन) बनता है। यह ऑक्सीजन परमाणु को इलेक्ट्रॉन-न्यून बनाता है और एक अच्छा निष्कासित समूह स्थापित करता है।
समीकरण: $CH_3-CH_2-OH + H^+ \rightleftharpoons CH_3-CH_2-OH_2^+$
* **चरण 2: कार्बोकेटाइन का निर्माण:**
प्रोटोनीकृत एथनॉल अणु प्राथमिक कार्बोकेटाइन ($CH_3-CH_2^+$) बनाने के लिए पानी के एक अणु ($H_2O$) को खो देता है। यह संपूर्ण अभिक्रिया क्रियाविधि का सबसे धीमा और दर-निर्धारक चरण है।
समीकरण: $CH_3-CH_2-OH_2^+ \rightarrow CH_3-CH_2^+ + H_2O$
* **चरण 3: प्रोटोन का निष्कासन:**
कार्बोकेटाइन एथीन बनाने के लिए किसी क्षार (जैसे पानी) को एक प्रोटोन ($H^+$) देता है। अम्ल उत्प्रेरक को पुनर्जीवित करने के लिए प्रोटोन पुनः प्राप्त कर लिया जाता है।
समीकरण: $CH_3-CH_2^+ \rightarrow CH_2=CH_2 + H^+$
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### फिनॉल और एल्कोहल की अम्लीय प्रकृति की तुलना
* **एल्कोहल की अम्लता:**
एल्कोहल बहुत दुर्बल अम्ल होते हैं। जब कोई एल्कोहल एक प्रोटोन खो देता है, तो यह एल्काक्साइड आयन ($R-O^-$) बनाता है। एल्किल समूह ($R-$) में इलेक्ट्रॉन-मुक्ति (+I प्रभाव) की प्रकृति होती है, जो ऑक्सीजन परमाणु पर ऋणावेश को तीव्र करती है, एल्काक्साइड आयन को अस्थिर करती है और एल्कोहल के लिए प्रोटोन छोड़ना कठिन बनाती है।
* **फिनॉल की अम्लता:**
फिनॉल एल्कोहल और पानी की तुलना में काफी अधिक अम्लीय होते हैं। जब फिनॉल एक प्रोटोन खो देता है, तो यह फिनॉक्साइड आयन ($C_6H_5O^-$) बनाता है। फिनॉक्साइड आयन अनुनाद द्वारा स्थिर होता है क्योंकि ऋणावेश बेंजीन वलय पर विस्थापित होता है। इसके अलावा, बिना आयनित फिनॉल फिनॉक्साइड आयन जितनी सीमा तक अनुनाद स्थिरीकरण प्रदर्शित नहीं करता है। परिणामस्वरुप, साम्य फिनॉक्साइड आयन के निर्माण की ओर स्थानांतरित हो जाता है, जिससे फिनॉल एलिफैटिक एल्कोहल की तुलना में बहुत मजबूत अम्ल बन जाते हैं।
उत्तर (Answer): ### संख्यात्मक समस्या: एथेनॉल के द्रव्यमान की गणना
**ग्लूकोज के किण्वन के लिए रासायनिक समीकरण:**
$$\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 \xrightarrow{\text{जाइमेस}} 2\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + 2\text{CO}_2$$
**चरण 1: आणविक द्रव्यमान निर्धारित करें**
* ग्लूकोज का आणविक द्रव्यमान ($\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6$) = $(6 \times 12) + (12 \times 1) + (6 \times 16) = 72 + 12 + 96 = 180 \text{ g/mol}$
* एथेनॉल का आणविक द्रव्यमान ($\text{C}_2\text{H}_5\text{OH}$) = $(2 \times 12) + (5 \times 1) + 16 + 1 = 24 + 5 + 16 + 1 = 46 \text{ g/mol}$
**चरण 2: सैद्धांतिक उपज की गणना करें**\nसंतुलित समीकरण से, $180 \text{ g}$ ग्लूकोज $2 \times 46 = 92 \text{ g}$ एथेनॉल देता है।
\nइसलिए, $100 \text{ g}$ ग्लूकोज सैद्धांतिक रूप से देगा:
$$\text{सैद्धांतिक उपज} = \frac{92 \text{ g}}{180 \text{ g}} \times 100 \text{ g} = 51.11 \text{ g एथेनॉल}$$
**चरण 3: वास्तविक उपज की गणना करें (80% रूपांतरण के साथ)**
$$\text{वास्तविक उपज} = \text{सैद्धांतिक उपज} \times \frac{\text{प्रतिशत उपज}}{100}$$
$$\text{वास्तविक उपज} = 51.11 \text{ g} \times \frac{80}{100} = 40.89 \text{ g एथेनॉल}$$
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### शीरे से एथेनॉल का औद्योगिक निर्माण
\nशीरा (Molasses) गन्ने की चीनी के क्रिस्टलीकरण के बाद बचा हुआ मातृ द्रव है। यह सुक्रोज (लगभग 50%) का एक समृद्ध स्रोत है और किण्वन के माध्यम से एथेनॉल के व्यावसायिक उत्पादन के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
* **शीरे का तनुकरण:** शीरे को पानी के साथ तब तक मिलाया जाता है जब तक कि इसकी शर्करा सांद्रता इष्टतम सूक्ष्मजीव गतिविधि सुनिश्चित करने के लिए लगभग 8-10% तक न गिर जाए।
* **नाइट्रोजन स्रोत का संयोजन:** खमीर (yeast) के लिए पोषक तत्व/भोजन स्रोत के रूप में अमोनियम सल्फेट या अमोनियम फॉस्फेट को विलयन में मिलाया जाता है।
* **किण्वन प्रक्रिया:** मिश्रण में खमीर (जिसमें इन्वर्टेज और जाइमेस एंजाइम होते हैं) मिलाया जाता है, और अवायुजीवी वातावरण में तापमान लगभग $303\text{K}$ बनाए रखा जाता है।
* **एंजाइमी अभिक्रियाएं:**
1. इन्वर्टेज सुक्रोज को ग्लूकोज और फ्रुक्टोज में परिवर्तित करता है:
$$\text{C}_{12}\text{H}_{22}\text{O}_{11} + \text{H}_2\text{O} \xrightarrow{\text{इन्वर्टेज}} \text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 + \text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6$$
2. जाइमेस ग्लूकोज को एथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित करता है:
$$\text{C}_6\text{H}_{12}\text{O}_6 \xrightarrow{\text{जाइमेस}} 2\text{C}_2\text{H}_5\text{OH} + 2\text{CO}_2$$
* **आसवन:** 10-15% एथेनॉल युक्त परिणामी किण्वित तरल (जिसे वॉश कहा जाता है) को शुद्ध स्पिरिट (आयतन द्वारा 95% एथेनॉल) प्राप्त करने के लिए आंशिक रूप से आसवित किया जाता है। अनबुझे चूने पर शुद्ध स्पिरिट के निर्जलीकरण से निरपेक्ष अल्कोहल (100% शुद्ध एथेनॉल) प्राप्त होता है।
उत्तर (Answer): ### क्यूमीन (आइसोप्रोपिलबेंजीन) से फीनॉल का निर्माण
\nक्यूमीन फीनॉल और एसीटोन के संश्लेषण के लिए एक महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रारंभिक सामग्री है। इस प्रक्रिया में क्यूमीन का उत्प्रेरणीय ऑक्सीकरण और उसके बाद अम्ल-उत्प्रेरित विदलन शामिल है।
#### चरण 1: क्यूमीन का ऑक्सीकरण\nउच्च तापमान पर कोबाल्ट उत्प्रेरक की उपस्थिति में हवा या ऑक्सीजन गुजार कर क्यूमीन का ऑक्सीकरण किया जाता है। इस अभिक्रिया में मुक्त मूलक ऑक्सीकरण शामिल है, जिससे आइसोप्रोपिल समूह के तृतीयक कार्बन-हाइड्रोजन बंध में ऑक्सीजन अणु का प्रवेश होता है, जिससे क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड बनता है।
$$\text{C}_6\text{H}_5\text{-CH(CH}_3)_2 + \text{O}_2 \xrightarrow{\text{उत्प्रेरक}} \text{C}_6\text{H}_5\text{-C(CH}_3)_2\text{-O-OH} (\text{क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड})$$
#### चरण 2: क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड का अम्लीय विदलन\nक्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड को पुनर्विन्यास और विदलन से गुजरने के लिए तनु अम्ल (जैसे तनु सल्फ्यूरिक अम्ल) के साथ उपचारित किया जाता है। परॉक्सी ऑक्सीजन प्रोटॉनिमित होता है, जिसके बाद फेनिल समूह तृतीयक कार्बन से आसन्न ऑक्सीजन परमाणु पर स्थानांतरित हो जाता है, जिससे कार्बोकेटाइन मध्यवर्ती बनता है। पानी द्वारा बाद में न्यूक्लियोफिलिक आक्रमण और विदलन से सह-उत्पाद के रूप में फीनॉल और एसीटोन प्राप्त होते हैं।
$$\text{C}_6\text{H}_5\text{-C(CH}_3)_2\text{-O-OH} \xrightarrow{\text{H}^+} \text{C}_6\text{H}_5\text{OH} (\text{फीनॉल}) + \text{CH}_3\text{COCH}_3 (\text{एसीटोन})$$
### फीनॉल अल्कोहल की तुलना में अधिक अम्लीय क्यों होते हैं
\nएलिफैटिक अल्कोहल की तुलना में फीनॉल की उच्च अम्लता को उनके संबंधित संयुग्मी क्षार (ऐल्कोक्साइड आयन बनाम फीनक्साइड आयन) के स्थायित्व की जांच करके समझाया जा सकता है।
* **फीनक्साइड आयन का अनुनाद स्थायित्व:** जब एक फीनॉल एक प्रोटॉन खो देता है, तो यह फीनक्साइड आयन ($\text{C}_6\text{H}_5\text{O}^-$) बनाता है। ऑक्सीजन परमाणु पर ऋणावेश अनुनाद के माध्यम से सुगंधित बेंजीन वलय में विस्थानीयकृत हो जाता है। फीनक्साइड आयन के लिए कई योगदानकारी विहित संरचनाएं हैं जो वलय की ऑर्थो और पैरा स्थितियों पर ऋणावेश को फैलाती हैं। यह व्यापक विस्थानीयकरण फीनक्साइड आयन को काफी स्थिर करता है।
* **ऐल्कोक्साइड आयन में अनुनाद की कमी:** इसके विपरीत, जब एक अल्कोहल एक प्रोटॉन खो देता है, तो यह ऐल्कोक्साइड आयन ($\text{RO}^-$) बनाता है। ऋणावेश पूरी तरह से ऑक्सीजन परमाणु पर स्थानीयकृत होता है, जिसमें कोई अनुनाद स्थायित्व उपलब्ध नहीं होता है।
* **$sp^2$ संकरित कार्बन का प्रेरण प्रभाव:** फीनॉल में हाइड्रॉक्सिल समूह से जुड़ा कार्बन परमाणु $sp^2$ संकरित होता है, जो अल्कोहल में $sp^3$ संकरित कार्बन की तुलना में अधिक विद्युत ऋणात्मक होता है। यह $\text{O-H}$ बंध को ध्रुवीकृत करने और परिणामी ऋणावेश को स्थिर करने में मदद करता है।
\nचूंकि फीनक्साइड आयन ऐल्कोक्साइड आयन की तुलना में बहुत अधिक स्थिर है, इसलिए फीनॉल के लिए प्रोटॉन हानि का संतुलन दाईं ओर अधिक होता है, जिससे यह एक मजबूत अम्ल बन जाता है।
उत्तर (Answer): ### अल्कोहल के अम्लीय निर्जलीकरण की क्रियाविधि
\nअल्कोहल के अम्लीय निर्जलीकरण द्वारा एल्कीन का निर्माण कार्बनिक रसायन विज्ञान में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है। यह अभिक्रिया आमतौर पर द्वितीयक और तृतीयक अल्कोहल में होती है और E1 विलोपन क्रियाविधि के माध्यम से आगे बढ़ती है। इस संपूर्ण अभिक्रिया में उच्च तापमान पर सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) या फॉस्फोरस अम्ल ($H_3PO_4$) जैसे अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में अल्कोहल अणु से पानी के एक अणु का निष्कासन होता है।
#### चरण 1: अल्कोहल का प्रोटॉनीकरण\nपहले चरण में, अल्कोहल अणु का ऑक्सीजन परमाणु अम्ल उत्प्रेरक से एक प्रोटॉन ($H^+$) स्वीकार करने के लिए अपने एकांकी इलेक्ट्रॉन युग्म (lone pair) का उपयोग करता है। इसके परिणामस्वरूप प्रोटॉनिमित अल्कोहल का निर्माण होता है, जिसे एल्काइलोक्सोनियम आयन भी कहा जाता है। यह चरण तेज और उत्क्रमणीय होता है। प्रोटॉनीकरण खराब प्रस्थान समूह ($-OH$) को एक बहुत बेहतर प्रस्थान समूह, जो कि पानी का अणु ($$-OH_2^+$) है, में परिवर्तित कर देता है।
#### चरण 2: कार्बोकेटाइन का निर्माण (दर-निर्धारक चरण)\nदूसरे चरण में, प्रोटॉनिमित अल्कोहल का कार्बन-ऑक्सीजन बंध टूट जाता है, जिससे एक उदासीन पानी का अणु निकलता है और पीछे एक धनावेशित कार्बन प्रजाति बच जाती है जिसे कार्बोकेटाइन कहा जाता है। यह चरण धीमा होता है और पूरी अभिक्रिया क्रियाविधि का दर-निर्धारक चरण होता है। बनने वाले कार्बोकेटाइन का स्थायित्व निर्जलीकरण की सुगमता को निर्धारित करता है; इसलिए, तृतीयक कार्बोकेटाइन सबसे आसानी से बनते हैं, उसके बाद द्वितीयक और प्राथमिक कार्बोकेटाइन आते हैं।
#### चरण 3: एल्कीन बनाने के लिए प्रोटॉन का विलोपन\nअंतिम चरण में, एक क्षार (जैसे पानी का अणु या बाइसल्फेट आयन) धनावेशित कार्बोकेटाइन से जुड़े आसन्न कार्बन परमाणु ($\beta$-कार्बन) से एक प्रोटॉन ($H^+$) को हटा देता है। $\text{C-H}$ बंध के इलेक्ट्रॉन $\alpha$ और $\beta$ कार्बन के बीच एक द्विआबंध बनाने के लिए स्थानांतरित हो जाते हैं, जिससे अंतिम उदासीन एल्कीन उत्पन्न होता है और अम्ल उत्प्रेरक पुनः उत्पन्न हो जाता है।
#### अभिक्रिया सैत्ज़ेफ नियम का पालन क्यों करती है\nसैत्ज़ेफ नियम बताता है कि विलोपन अभिक्रियाओं में, मुख्य उत्पाद वह एल्कीन होता है जिसमें द्विआबंधयुक्त कार्बन परमाणुओं से जुड़े एल्किल समूहों की संख्या अधिक होती है (यानी, अधिक प्रतिस्थापित एल्कीन)। निर्जलीकरण के दौरान, जब एक से अधिक एल्कीन बनने की संभावना होती है, तो हाइपरकंजगेशन और प्रेरण प्रभावों के कारण अधिक प्रतिस्थापित एल्कीन अधिक स्थिर होता है। परिणामस्वरूप, अधिक स्थिर एल्कीन की ओर ले जाने वाली संक्रमण अवस्था की सक्रियण ऊर्जा कम होती है, जिससे यह मुख्य उत्पाद बन जाता है।
उत्तर (Answer): सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) का उपयोग करके एथेनॉल का निर्जलीकरण इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे अभिक्रिया तापमान अंतिम उत्पाद के वितरण को निर्धारित करता है।
1. $443 \text{ K}$ पर एथीन का निर्माण:\nजब एथेनॉल को $443 \text{ K}$ के उच्च तापमान पर सांद्र $H_2SO_4$ के साथ गर्म किया जाता है, तो अंतःअणु निर्जलीकरण होता है। एथीन बनाने के लिए एथेनॉल एक पानी का अणु खो देता है।\nसमीकरण: $CH_3CH_2OH \xrightarrow{conc. H_2SO_4, 443 K} CH_2=CH_2 + H_2O$
2. $413 \text{ K}$ पर डाइएथिल ईथर (एथॉक्सीएथेन) का निर्माण:\nजब एथेनॉल को $413 \text{ K}$ के कम तापमान पर सांद्र $H_2SO_4$ के साथ उपचारित किया जाता है, तो अंतर-आणविक निर्जलीकरण होता है। एथेनॉल के दो अणु अभिक्रिया करते हैं जहाँ एक अणु न्यूक्लियोफाइल के रूप में कार्य करता है और डाइएथिल ईथर का उत्पादन करते हुए दूसरे प्रोटोनेटेड एथेनॉल अणु पर आक्रमण करता है।\nसमीकरण: $2CH_3CH_2OH \xrightarrow{conc. H_2SO_4, 413 K} CH_3CH_2OCH_2CH_3 + H_2O$
उत्तर (Answer): हाइड्रोआयोडिक अम्ल ($HI$) द्वारा ईथर का विदलन अभिक्रिया की स्थिति (तापमान और सांद्रता) और एल्किल समूहों की प्रकृति पर निर्भर करता है।
1. ठंडे सांद्र $HI$ के साथ अभिक्रिया:\nजब डाइएथिल ईथर को ठंडे सांद्र $HI$ के साथ उपचारित किया जाता है, तो एल्किल हैलाइड का एक अणु और एल्कोहॉल का एक अणु बनाने के लिए ईथर बंध का विदलन होता है।\nसमीकरण: $CH_3CH_2OCH_2CH_3 + HI (cold) \xrightarrow{273 K} CH_3CH_2OH + CH_3CH_2I$
2. गर्म सांद्र $HI$ के साथ अभिक्रिया:\nजब अभिक्रिया को अतिरिक्त गर्म सांद्र $HI$ के साथ किया जाता है, तो शुरू में बना मध्यवर्ती एल्कोहॉल भी एल्किल हैलाइड का दूसरा अणु और पानी देने के लिए $HI$ के दूसरे अणु के साथ अभिक्रिया करता है।\nसमीकरण:\nचरण 1: $CH_3CH_2OCH_2CH_3 + HI \rightarrow CH_3CH_2OH + CH_3CH_2I$\nचरण 2: $CH_3CH_2OH + HI (hot) \rightarrow CH_3CH_2I + H_2O$\nकुल अभिक्रिया: $CH_3CH_2OCH_2CH_3 + 2HI \xrightarrow{heat} 2CH_3CH_2I + H_2O$
उत्तर (Answer): विलियमसन ईथर संश्लेषण सममित और असममित ईथर की तैयारी के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि है। इस विधि में, एक एल्किल हैलाइड को सोडियम एल्कोक्साइड या सोडियम फिनॉक्साइड के साथ अभिक्रिया कराई जाती है। यह अभिक्रिया $S_N2$ (द्विअणु न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन) क्रियाविधि के माध्यम से आगे बढ़ती है।
\nउदाहरण: एथॉक्सीएथेन (डाइएथिल ईथर) का निर्माण।
$CH_3CH_2ONa + CH_3CH_2Cl \rightarrow CH_3CH_2OCH_2CH_3 + NaCl$
\nसीमाएँ:
1. यह विधि प्राथमिक एल्किल हैलाइड के साथ सबसे अच्छा काम करती है। यदि द्वितीयक या तृतीयक एल्किल हैलाइड का उपयोग किया जाता है, तो विलोपन अभिक्रियाएँ (एल्कीन बनाना) प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं क्योंकि तृतीयक एल्किल हैलाइड स्टेरिक रूप से बाधित होते हैं।
2. तृतीयक एल्किल समूह वाले मिश्रित ईथर के संश्लेषण के लिए, विलोपन उप-उत्पादों के बिना सुचारू न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन सुनिश्चित करने के लिए तृतीयक एल्कोक्साइड को प्राथमिक एल्किल हैलाइड के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
उत्तर (Answer): फिनॉल का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन क्यूमीन ऑक्सीकरण प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है। क्यूमीन (आइसोप्रोपिलबेंजीन) को अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में प्रोपीन के साथ बेंजीन के फ्रिडल-क्राफ्ट्स एल्काइलेशन द्वारा संश्लेषित किया जाता है।
\nचरण 1: क्यूमीन का ऑक्सीकरण। कोबाल्ट उत्प्रेरक की उपस्थिति में क्यूमीन के माध्यम से वायु या ऑक्सीजन प्रवाहित करके क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड बनाया जाता है।\nसमीकरण: $C_6H_5CH(CH_3)_2 + O_2 \rightarrow C_6H_5C(CH_3)_2OOH$
\nचरण 2: अम्लीय विदलन। क्यूमीन हाइड्रोपरॉक्साइड को तनु सल्फ्यूरिक अम्ल ($H_2SO_4$) के साथ उपचारित किया जाता है, जिससे फिनॉल और एक मूल्यवान सह-उत्पाद के रूप में एसीटोन प्राप्त होता है।\nसमीकरण: $C_6H_5C(CH_3)_2OOH \xrightarrow{H^+} C_6H_5OH + CH_3COCH_3$
\nसह-उत्पाद: इस औद्योगिक प्रक्रिया में एसीटोन ($CH_3COCH_3$) एक महत्वपूर्ण और मूल्यवान सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
उत्तर (Answer): राइमर-टीमैन अभिक्रिया फिनॉल के फॉर्माइलेशन के लिए उपयोग की जाने वाली एक क्लासिक नाम वाली अभिक्रिया है। जब फिनॉल को लगभग $340 \text{ K}$ पर जलीय सोडियम हाइड्रोक्साइड ($\text{NaOH}$) विलयन की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म ($CHCl_3$) के साथ उपचारित किया जाता है, तो बेंजीन रिंग की ऑर्थो-स्थिति पर एक एल्डिहाइड समूह ($-CHO$) प्रवेश कर जाता है, जिससे मुख्य उत्पाद के रूप में सेलिसील्डिहाइड (2-हाइड्रॉक्सीबेंजाल्डिहाइड) बनता है।
\nयह अभिक्रिया एक इलेक्ट्रोफिलिक प्रजाति, डाइक्लोरोकार्बेन (: $CCl_2$) के निर्माण के माध्यम से आगे बढ़ती है, जो क्षार ($\text{NaOH}$) के साथ क्लोरोफॉर्म की अभिक्रिया से बनती है। उत्पन्न डाइक्लोरोकार्बेन एक मध्यवर्ती बनाने के लिए फिनॉक्साइड आयन पर आक्रमण करती है, जो बाद में क्षारीय जल अपघटन और अम्लीकरण पर सेलिसील्डिहाइड देता है।
\nसंतुलित रासायनिक समीकरण:
$C_6H_5OH + CHCl_3 + 3NaOH \rightarrow C_6H_4(OH)(CHO) + 3NaCl + 2H_2O$
\nयह अभिक्रिया एरोमैटिक हाइड्रॉक्सी एल्डिहाइड तैयार करने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।