मुख्य सूत्र (Key Formulas)
अध्याय: भारत में राष्ट्रवाद - त्वरित पुनरावृत्ति नोट्स (Revision Notes)
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महत्वपूर्ण तिथियाँ और घटनाएँ (Important Dates and Events)
- १९१४ - १९१८: प्रथम विश्व युद्ध (First World War)।
- जनवरी १९१५: महात्मा गांधी का दक्षिण भारत से भारत आगमन।
- १९१६: चंपारण सत्याग्रह (बिहार) - नील बगान के किसानों के खिलाफ।
- १९१७: खेड़ा सत्याग्रह (गुजरात) - फसल खराब होने पर मालगुजारी छूट के लिए।
- १९१८: अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन।
- मार्च १९१९: रौलट एक्ट पारित (Rowlatt Act)।
- १३ अप्रैल १९१९: जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre)।
- १९१९: खिलाफत समिति का गठन (शौकत अली और मोहम्मद अली द्वारा)।
- सितंबर १९२०: कलकत्ता अधिवेशन - असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव।
- दिसंबर १९२०: नागपुर अधिवेशन - असहयोग आंदोलन पर मुहर।
- फरवरी १९२२: चौरी-चौरा कांड (गोरखपुर) - असहयोग आंदोलन की समाप्ति।
- जनवरी १९३०: पूर्ण स्वराज की मांग (लाहौर अधिवेशन, दिसंबर १९२९ के बाद)।
- ३१ जनवरी १९३०: गांधीजी द्वारा वायसराय इरविन को ११ सूत्री मांग पत्र सौंपना।
- १२ मार्च - ६ अप्रैल १९३०: दांडी यात्रा (Dandi March) और सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत (नमक कानून तोड़ना)।
- मार्च १९३१: गांधी-इरविन समझौता और दूसरा गोलमेज सम्मेलन।
- दिसंबर १९३१: दूसरा गोलमेज सम्मेलन (विफल)।
- सितंबर १९३२: पूना पैक्ट (Poona Pact) - महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के बीच।
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महत्वपूर्ण अवधारणाएँ एवं परिभाषाएँ (Key Concepts & Definitions)
#### १. प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव (Impact of First World War):
- युद्ध के कारण रक्षा खर्च में भारी वृद्धि हुई, जिसे करों (Taxes) में वृद्धि और सीमा शुल्क बढ़ाकर पूरा किया गया।
- कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई जिससे आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गईं।
- गाँवों से सिपाहियों को जबरन भर्ती किया गया, जिससे ग्रामीण इलाकों में भारी गुस्सा था।
- १९१८-१९ और १९२१-२२ में फसल खराब होने और इन्फ्लूएंजा महामारी के कारण लाखों लोग मारे गए।
#### २. सत्याग्रह का विचार (Idea of Satyagraha):
- यह जन-संघर्ष की एक नवीन पद्धति थी जो सत्य और अहिंसा पर आधारित थी।
- इसके अनुसार, यदि आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि अन्याय के खिलाफ आपकी लड़ाई है, तो उत्पीड़क से मुकाबला करने के लिए किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।
#### ३. रौलट एक्ट (Rowlatt Act - १९१९):
- इसे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा जल्दबाजी में पारित किया गया था।
- इसके तहत भारतीयों पर बिना किसी मुकदमे के दो साल तक जेल में बंद रखने का अधिकार सरकार को मिल गया था।
- गांधीजी ने इसके खिलाफ 'रौलट सत्याग्रह' शुरू किया।
#### ४. जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre):
- १३ अप्रैल १९१९ को अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोग बैसाखी मेले और रौलट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए थे।
- जनरल डायर ने बाहर निकलने के रास्ते बंद कर दिए और निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलवा दीं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए।
#### ५. खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement):
- प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हुई थी। ऐसी अफवाह थी कि इस्लामिक दुनिया के आध्यात्मिक नेता (खलीफ) पर बहुत सख्त शांति संधि थोपी जाएगी।
- खलीफा की शक्ति की रक्षा के लिए भारत में शौकत अली और मोहम्मद अली बंधुओं ने खिलाफत समिति का गठन किया। गांधीजी ने इसे असहयोग आंदोलन से जोड़ने का अवसर देखा।
#### ६. असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement):
- कारण: रौलट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और खिलाफत मुद्दा।
- कार्यक्रम: सरकारी नौकरियों, उपाधियों, विदेशी वस्तुओं, स्कूलों, अदालतों का बहिष्कार करना और स्वदेशी को अपनाना।
- चौरी-चौरा कांड (फरवरी १९२२): गोरखपुर के चौरी-चौरा में एक शांतिपूर्ण जुलूस हिंसक झड़प में बदल गया और थाने में आग लगा दी गई जिसमें २२ पुलिसकर्मी मारे गए। इससे आहत होकर गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
#### ७. साइमन कमीशन (Simon Commission - १९२७):
- जॉन साइमन के नेतृत्व में गठित इस आयोग को भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली की जाँच करनी थी और बदलाव सुझाने थे।
- विरोध क्यों: इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था (सभी गोरे थे)। भारत पहुंचते ही इसका स्वागत "साइमन वापस जाओ" (Simon Go Back) के नारों और काले झंडों से किया गया।
#### ८. पूर्ण स्वराज (Purna Swaraj):
- दिसंबर १९२९ में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया।
- २६ जनवरी १९३० को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया गया।
#### ९. सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement):
- दांडी यात्रा: गांधीजी ने अपने ७८ भरोसेमंद स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक ३४० किलोमीटर की यात्रा की।
- ६ अप्रैल १९३० को उन्होंने दांडी में नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा और सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की।
- यह असहयोग से अलग था क्योंकि इसमें अंग्रेजों के कानूनों का उल्लंघन करना शामिल था।
#### १०. पूना पैक्ट (Poona Pact - सितंबर १९३२):
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुआ समझौता।
- इसके तहत दलित वर्गों (Depressed Classes) को प्रांतीय और केंद्रीय विधान परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गईं, लेकिन उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों से ही होना तय हुआ।
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राष्ट्रवाद की भावना जगाने वाले प्रतीक (Symbols of Nationalism)
- भारत माता की छवि: पहली बार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 'वंदे मातरम' गीत के साथ इसकी कल्पना की गई। बाद में अभिनेंद्रनाथ टैगोर ने भारत माता को एक शांत, देवी-स्वरूप और आध्यात्मिक छवि में चित्रित किया।
- तिरंगा झंडा: स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल में एक तिरंगा झंडा (हरा, पीला, लाल) डिजाइन किया गया जिस पर कमल के आठ फूल (ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों के प्रतीक) और अर्धचंद्र (हिंदू-मुस्लिम का प्रतीक) थे। बाद में गांधीजी ने १९२१ तक स्वराज का तिरंगा झंडा (सफेद, हरा और लाल, बीच में चरखा) तैयार कर लिया।
- लोक कथाओं का पुनरुद्धार: राष्ट्रवाद की भावना जगाने के लिए लोक कथाओं, गीतों और गाथाओं को सहेजा गया। रवींद्रनाथ टैगोर और नटशास्त्री इन्द्रा ने दक्षिण भारत में लोक कथाओं का संकलन (द Folklore of Southern India) किया।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 भारत में राष्ट्रवाद
परिचय और पृष्ठभूमि
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव
रक्षा खर्च में वृद्धि और करों में बढ़ोतरी
जबरन सिपाही भर्ती
अकाल और इन्फ्लूएंजा महामारी
सत्याग्रह का विचार (महात्मा गांधी)
सत्य और अहिंसा पर जोर
शुरुआती प्रयोग: चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद
असहयोग आंदोलन
खिलाफत आंदोलन का मुद्दा
शौकत अली और मोहम्मद अली बंधु
असहयोग का प्रस्ताव (नागपुर अधिवेशन - 1920)
उपाधियों का त्याग
सरकारी नौकरियों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
विभिन्न स्तरों पर भागीदारी
शहरों में मध्यम वर्ग का संघर्ष
ग्रामीण इलाकों में किसान आंदोलन (अवध - बाबा रामचंद्र)
बागानों में आंदोलन (असम - स्वराज का मतलब)
सविनय अवज्ञा आंदोलन
असहयोग का चौरा-चौरी कांड के कारण स्थगन (1922)
साइमन कमीशन का बहिष्कार (1928)
लाला लाजपत राय की मृत्यु
पूर्ण स्वराज की मांग (लाहौर अधिवेशन - 1929)
नमक सत्याग्रह और दांडी मार्च (1930)
गांधीजी की 240 मील की यात्रा
नमक कानून तोड़ना
आंदोलन की विशेषताएं
महिलाओं की भारी भागीदारी
गोलमेज सम्मेलन और गांधी-इरविन समझौता
राष्ट्र की साझी पहचान और सामूहिक अपनेपन की भावना
भारत माता की छवि का निर्माण
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 'वंदे मातरम' की रचना
Abanindranath Tagore द्वारा भारत माता की पेंटिंग
लोक कथाओं और प्रतीकों का पुनरुत्थान
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लोकगीतों का संकलन
तिरंगा झंडा (स्वराज का झंडा) का डिजाइन
इतिहास की पुनर्व्याख्या
गौरवशाली अतीत को याद दिलाना और अंग्रेजों के खिलाफ गर्व जगाना
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### भारत में राष्ट्रवाद का परिचय\nउन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में भारत में राष्ट्रवाद एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरा, जिसने औपनिवेशिक उत्पीड़न के खिलाफ लोगों को एकजुट किया। सामूहिक अपनेपन की यह भावना साझे संघर्षों, ऐतिहासिक पुनर्खोज और ब्रिटिश नीतियों के विरोध के माध्यम से निर्मित हुई थी। राष्ट्रवाद का विकास कोई अचानक हुई घटना नहीं थी; बल्कि यह विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कारकों का परिणाम था।
### राष्ट्रवाद में योगदान देने वाले प्रमुख कारक
* **आर्थिक शोषण:** ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने व्यवस्थित रूप से पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प को नष्ट कर दिया, भारत के धन को बाहर खींचा और भारी कर तथा शुल्क लगाए। भू-राजस्व की मांगें अत्यधिक थीं, जिससे किसान कर्ज, गरीबी और लगातार पड़ने वाले अकालों में धंस गए, जिससे व्यापक आर्थिक असंतोष पैदा हुआ।
* **पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव:** पश्चिमी शिक्षा की शुरुआत ने शिक्षित भारतीयों को स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और लोकतंत्र जैसे आधुनिक उदारवादी विचारों से परिचित कराया। बुद्धिजीवियों ने ब्रिटिश शासन पर सवाल उठाना शुरू किया और जनता के बीच इन लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रचार किया।
* **भारत के अतीत की पुनर्खोज:** विद्वानों द्वारा पुरातात्विक उत्खनन और ऐतिहासिक अनुसंधान ने कला, वास्तुकला, विज्ञान और दर्शन में भारत की गौरवशाली प्राचीन विरासत को उजागर किया। इससे उन भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव और आत्मविश्वास बहाल हुआ जिन्हें अंग्रेजों द्वारा हीन दृष्टि से देखा जाता था।
* **प्रेस और साहित्य की भूमिका:** समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और क्षेत्रीय साहित्य ने जनमत को गोलबंद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रवादी नेताओं ने अनुचित ब्रिटिश नीतियों की आलोचना करने और राजनीतिक जागरूकता फैलाने के लिए प्रेस का उपयोग किया।
### प्रथम विश्व युद्ध की भूमिका\nप्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा की जिसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया:
* **रक्षा व्यय और कराधान:** युद्ध के कारण रक्षा व्यय में भारी वृद्धि हुई, जिसकी भरपाई युद्ध ऋण और करों में वृद्धि करके की गई। सीमा शुल्क बढ़ाए गए और आयकर शुरू किया गया, जिससे आम नागरिकों को भारी वित्तीय कठिनाई का सामना करना पड़ा।
* **मूल्य वृद्धि:** 1913 और 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम जनता को अत्यधिक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा।
* **बलपूर्वक भर्ती:** ब्रिटिश सेना के लिए सैनिकों की आपूर्ति के लिए गांवों पर दबाव डाला गया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक गुस्सा और रोष फैल गया।
* **फसल की विफलता और अकाल:** 1918-19 और 1920-21 के दौरान भारत के कई हिस्सों में फसलें नष्ट हो गईं, जिसके परिणामस्वरूप तीव्र खाद्यान्न संकट उत्पन्न हुआ। इसके साथ ही इन्फ्लूएंजा महामारी भी फैली, जिससे लाखों लोगों की मौत हो गई।
### निष्कर्ष\nइस प्रकार, प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय जनता के लिए भारी कठिनाइयां पैदा कीं, साथ ही ब्रिटिश विरोधी भावना को भी गहरा किया। इसने महात्मा गांधी के नेतृत्व और उसके बाद के जन आंदोलनों का मार्ग प्रशस्त किया जिन्होंने अंततः ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव को चुनौती दी।
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nमहात्मा गांधी द्वारा 1920 में शुरू किया गया असहयोग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह इस आधार पर था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से स्थापित हुआ था, और यदि भारतीय सहयोग करने से मना कर दें, तो एक वर्ष के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा।
### महात्मा गांधी ने इसे क्यों शुरू किया
- **प्रथम विश्व युद्ध के बाद टूटे हुए वादे:** भारतीयों को उम्मीद थी कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश युद्ध प्रयास में उनके योगदान के बदले उन्हें स्वशासन मिलेगा, लेकिन इसके बजाय उन्हें रौलट एक्ट जैसे दमनकारी उपायों का सामना करना पड़ा।
- **रौलट एक्ट (1919):** इस अधिनियम ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने के लिए अत्यधिक अधिकार दिए और बिना मुकदमे के दो साल तक राजनीतिक कैदियों को हिरासत में रखने की अनुमति दी।
- **जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919):** अमृतसर में एक शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर की क्रूर गोलीबारी में सैकड़ों मासूम पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे गए, जिससे पूरे देश में भारी आक्रोश फैल गया।
- **खिलाफत का मुद्दा:** प्रथम विश्व युद्ध में ओटोमन तुर्की की हार के कारण खलीफा (इस्लामी दुनिया के आध्यात्मिक प्रमुख) पर कठोर शर्तें थोपी गईं। अली बंधुओं के नेतृत्व में भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। गांधी ने इसे हिंदुओं और मुसलमानों को एक ही जन आंदोलन में एक साथ लाने के अवसर के रूप में देखा।
- **स्वराज को अपनाना:** दिसंबर 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में असहयोग कार्यक्रम को औपचारिक रूप से अपनाया गया।
### विभिन्न क्षेत्रों में आंदोलन किस प्रकार आगे बढ़ा
- **कस्बे और शहरों में:**
- छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया, प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया, और वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
- मद्रास को छोड़कर अधिकांश प्रांतों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों पर धरना दिया गया, और आयातित कपड़ों को भारी अलाव में जला दिया गया। 1921 और 1922 के बीच विदेशी कपड़े का आयात आधा हो गया।
- **ग्रामीण क्षेत्रों में (किसान आंदोलन):**
- अवध में बाबा रामचंद के नेतृत्व में किसानों ने तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जो अत्यधिक उच्च किराए और उपकरों की मांग करते थे। आंदोलन ने राजस्व में कमी, बेगार (forced labor) की समाप्ति और दमनकारी जमींदारों के सामाजिक बहिष्कार की मांग की।
- आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में एक उग्रवादी गोरिल्ला आंदोलन फैल गया। अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आदिवासियों ने उन वन कानूनों के खिलाफ विद्रोह किया जिन्होंने आरक्षित वनों में उनके प्रवेश को प्रतिबंधित किया, उनकी आजीविका में बाधा डाली और उन्हें बेगार करने के लिए मजबूर किया।
- **बागानों में:**
- असम के बागान श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता का मतलब उन सीमित स्थानों से स्वतंत्र रूप से आने-जाने का अधिकार था जिनमें वे बंद थे।
- 1859 के इनलैंड इमीग्रेशन एक्ट के तहत, बागान श्रमिकों को बिना अनुमति के चाय बागानों को छोड़ने की अनुमति नहीं थी। जब उन्होंने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना, तो हजारों लोगों ने अधिकारियों की अवहेलना की, बागानों को छोड़ दिया और घर के लिए निकल पड़े, यह मानते हुए कि गांधी राज आ रहा है।
### निष्कर्ष\nअसहयोग आंदोलन में भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की अभूतपूर्व भागीदारी देखी गई। हालांकि, हिंसा की छिटपुट घटनाओं, विशेष रूप से 1922 की चौरी चौरा घटना के कारण, जहां एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी गई थी, महात्मा गांधी ने अचानक आंदोलन को बंद कर दिया।
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nमहात्मा गांधी द्वारा 1930 में शुरू किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक प्रमुख मील का पत्थर था। यह असहयोग आंदोलन से एक कदम आगे था क्योंकि इसका उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन के साथ असहयोग करना नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को सक्रिय रूप से तोड़ना था।
### आंदोलन के कारण बनने वाली परिस्थितियाँ
- **साइमन कमीशन की असफलता:** सभी श्वेत सदस्यों वाले साइमन कमीशन का पूरे भारत में बहिष्कार किया गया क्योंकि इसमें कोई भारतीय सदस्य शामिल नहीं था, जिससे व्यापक आक्रोश और आंदोलन फैल गया।
- **पूर्ण स्वराज की मांग:** दिसंबर 1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का प्रस्ताव पारित किया गया और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।
- **आर्थिक मंदी:** 1929 की विश्वव्यापी महामंदी ने भारतीय कृषि और व्यापार को बुरी तरह प्रभावित किया। कीमतें गिर गईं, किसानों के लिए राजस्व चुकाना असंभव हो गया, फिर भी औपनिवेशिक सरकार ने करों को कम करने से इनकार कर दिया।
- **नमक कानून का मुद्दा:** नमक का सेवन अमीर और गरीब दोनों द्वारा किया जाता था और यह सबसे आवश्यक खाद्य पदार्थों में से एक था। ब्रिटिश सरकार का नमक के उत्पादन पर एकाधिकार था और उसने इस पर भारी कर लगाया था, जिसे महात्मा गांधी ने दमनकारी और अन्यायपूर्ण माना।
### विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी
- **अमीर किसान समुदाय:** गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे समुदाय आंदोलन में सक्रिय थे। व्यावसायिक फसलों के उत्पादक होने के कारण, वे व्यापार मंदी और गिरती कीमतों से बुरी तरह प्रभावित थे। उनके लिए स्वराज की लड़ाई भारी राजस्व के खिलाफ एक संघर्ष थी।
- **गरीब किसान:** छोटे काश्तकारों को मंदी के दौरान अपना किराया चुकाना मुश्किल लग रहा था। वे नो-रेंट अभियानों में शामिल हुए, जो अक्सर कट्टरपंथियों और समाजवादियों द्वारा नेतृत्व किए जाते थे, इस उम्मीद में कि उनका अवैतनिक किराया माफ कर दिया जाएगा।
- **व्यापारी वर्ग:** पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे दिग्गजों के नेतृत्व में भारतीय उद्योगपतियों और व्यापारियों ने आंदोलन का वित्तीय रूप से समर्थन किया और आयातित वस्तुओं का बहिष्कार किया। वे आयात और विदेशी मुद्रा की औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ सुरक्षा चाहते थे।
- **औद्योगिक श्रमिक वर्ग:** नागपुर क्षेत्र को छोड़कर श्रमिकों ने बड़ी संख्या में भाग नहीं लिया। हालांकि, कुछ श्रमिकों ने कम मजदूरी और खराब कामकाजी परिस्थितियों का विरोध करने के लिए विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे गांधीवादी विचारों को अपनाया।
- **महिलाएं:** महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी आंदोलन की एक उल्लेखनीय विशेषता थी। गांधी की नमक यात्रा के दौरान, हजारों महिलाएं उनकी बात सुनने के लिए घरों से बाहर आईं, विरोध मार्च में भाग लिया, नमक बनाया और विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर धरना दिया।
### निष्कर्ष\nब्रिटिश दमन और नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद, सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीय जनता की बढ़ती राजनीतिक चेतना को प्रदर्शित किया और ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ विभिन्न समूहों को एकजुट किया।
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nराष्ट्रवाद तब फैलता है जब लोग यह विश्वास करने लगते हैं कि वे सभी एक ही राष्ट्र का हिस्सा हैं, जब वे कुछ ऐसी एकता की खोज करते हैं जो उन्हें एक साथ बांधती है। भारत में, इतिहास, लोककथाओं, प्रतीकों और संकेतों का सहारा लेते हुए विभिन्न सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सामूहिक अपनेपन की भावना को गढ़ा गया था।
### सांस्कृतिक प्रक्रियाओं और प्रतीकों की भूमिका
1. **भारत माता की छवि:** राष्ट्र की पहचान को सबसे अधिक एक आकृति या छवि में प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया गया था। भारत माता की पहचान उस प्रतिष्ठित छवि से जुड़ गई जिसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में अपने उपन्यास *आनंदमठ* के लिए 'वंदे मातरम' लिखते समय बनाया था। बाद में, अवनिंद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की अपनी प्रसिद्ध पेंटिंग बनाई जिसमें उन्हें एक तपस्वी के रूप में चित्रित किया गया—शांत, दिव्य और आध्यात्मिक।
2. **भारतीय लोककथाओं का पुनरुत्थान:** उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में भारत में, राष्ट्रवादियों ने भाटों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों को रिकॉर्ड करना शुरू किया और लोक गीतों व किंवदंतियों को इकट्ठा करने के लिए गांवों का दौरा किया। बंगाल में, रवींद्रनाथ टैगोर ने लोकगीतों, नर्सरी कविताओं और मिथकों को एकत्र करना शुरू किया, और लोक पुनरुत्थान के आंदोलन का नेतृत्व किया। मद्रास में, नतेशा शास्त्री ने तमिल लोक कथाओं का एक विशाल चार-खंडों का संग्रह प्रकाशित किया, जिसका नाम *द फ़ोklore ऑफ़ सदर्न इंडिया* था।
3. **इतिहास का पुनर्लेखन और अतीत की पुनर्व्याख्या:** राष्ट्रवाद की भावना पैदा करने का एक अन्य साधन इतिहास की पुनर्व्याख्या था। अंग्रेजों ने भारतीयों को पिछड़ा और खुद पर शासन करने में असमर्थ माना। इसके जवाब में, भारतीयों ने भारत की महान उपलब्धियों की खोज के लिए अतीत में झांकना शुरू किया। उन्होंने प्राचीन काल में कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित और धर्म में गौरवशाली विकास के बारे में लिखा, और भारतीयों से अपने अतीत पर गर्व करने का आग्रह किया।
4. **राष्ट्रवाद के प्रतीकों के रूप में झंडे:** बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान, एक तिरंगा झंडा (लाल, हरा और पीला) डिजाइन किया गया था। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करने वाले आठ कमल और हिंदुओं और मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक अर्धचंद्र था। 1921 तक, गांधीजी ने स्वराज ध्वज डिजाइन कर लिया था—एक तिरंगा (लाल, हरा और सफेद) जिसके केंद्र में चरखा था, जो आत्म-सहायता के गांधीवादी आदर्श का प्रतिनिधित्व करता था।
### निष्कर्ष\nइन सभी विविध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रतीकों, गीतों, आइकनों और पुनर्व्याख्या किए गए इतिहास के माध्यम से, राष्ट्रवादी नेताओं ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत भर के विभिन्न समुदायों को सफलतापूर्वक एकजुट किया, जिससे उनमें साझा पहचान और सामूहिक अपनेपन की गहरी भावना पैदा हुई।
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nमहात्मा गांधी द्वारा 1930 में शुरू किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण चरण था। असहयोग आंदोलन के विपरीत, इसमें ब्रिटिश शासन के साथ केवल असहयोग करना शामिल नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को सक्रिय रूप से तोड़ना भी शामिल था।
### नमक मार्च और आंदोलन की शुरुआत
1. **नमक को एक प्रतीक के रूप में चुनना:** महात्मा गांधी को नमक में एक ऐसा शक्तिशाली बंधन मिला जो राष्ट्र को एकजुट कर सकता था। नमक अमीर और गरीब दोनों द्वारा समान रूप से खाया जाने वाला और भोजन की सबसे आवश्यक वस्तुओं में से एक था। नमक पर कर और इसके उत्पादन पर सरकारी एकाधिकार ने ब्रिटिश शासन के सबसे दमनकारी चेहरे को उजागर किया।
2. **दांडी मार्च:** 12 मार्च 1930 को, गांधीजी ने अपने 78 विश्वसनीय स्वयंसेवकों के साथ अपनी प्रसिद्ध नमक यात्रा शुरू की। उन्होंने साबरमती में गांधीजी के आश्रम से गुजरात के तटीय शहर दांडी तक 240 मील की पैदल यात्रा की। 6 अप्रैल को, वे दांडी पहुंचे, और समुद्री पानी को उबालकर नमक बनाकर औपचारिक रूप से कानून तोड़ा।
3. **आंदोलन का प्रसार:** इसने सविनय अवज्ञा आंदोलन की औपचारिक शुरुआत को चिह्नित किया। हजारों लोगों ने नमक कानून तोड़ा, नमक बनाया, और सरकारी नमक डिपो के सामने प्रदर्शन किया। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया गया, किसानों ने राजस्व और चौकीदारी कर देने से इनकार कर दिया, और ग्राम अधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया।
### सामाजिक समूहों की भागीदारी
* **अमीर किसान समुदाय:** गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे समुदाय आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। व्यावसायिक फसलों के उत्पादक होने के कारण, वे व्यापार मंदी और गिरती कीमतों से बुरी तरह प्रभावित हुए थे। उनके लिए स्वराज की लड़ाई अत्यधिक राजस्व के खिलाफ एक संघर्ष था।
* **गरीब किसान:** मंदी के कारण छोटे किसानों को अपना किराया चुकाना मुश्किल हो रहा था। वे चाहते थे कि जमींदारों को दिया जाने वाला बकाया किराया माफ कर दिया जाए। वे समाजवादियों और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले कट्टरपंथी आंदोलनों में शामिल हो गए।
* **व्यापारिक वर्ग:** भारतीय व्यापारी और उद्योगपति व्यवसाय के विस्तार के इच्छुक थे और जब व्यवसाय पर औपनिवेशिक प्रतिबंध लगाए गए तो उन्होंने आंदोलन का समर्थन किया। उन्होंने वित्तीय सहायता दी और आयातित सामान खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया।
* **औद्योगिक श्रमिक वर्ग:** नागपुर को छोड़कर श्रमिक बड़ी संख्या में शामिल नहीं हुए, क्योंकि उद्योगपति कांग्रेस के करीब थे। हालांकि, कुछ श्रमिकों ने कम मजदूरी और खराब कामकाजी परिस्थितियों के खिलाफ अपने स्वयं के आंदोलनों के हिस्से के रूप में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार जैसे गांधीवादी विचारों को अपनाया।
* **महिलाएं:** सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक विशिष्ट विशेषता महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी थी। गांधीजी की नमक यात्रा के दौरान, हजारों महिलाएं उनकी बात सुनने के लिए अपने घरों से बाहर आईं। उन्होंने विरोध मार्च में भाग लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर धरना दिया।
### आंदोलन की सीमाएं
* **अछूत (दलित):** लंबे समय तक कांग्रेस ने रूढ़िवादी उच्च जाति के हिंदुओं (सनातनियों) के डर से दलितों की उपेक्षा की थी। गांधीजी ने उन्हें 'जन' कहा और मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए सत्याग्रह आयोजित किया, लेकिन कई दलित नेता अपने समुदाय की समस्याओं के लिए एक अलग राजनीतिक समाधान के इच्छुक थे, और अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग कर रहे थे।
* **मुस्लिम भागीदारी:** असहयोग-खिलाफत आंदोलन के पतन के बाद, मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा। सांप्रदायिक झड़पों और हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संदेह के माहौल के बीच, एक संयुक्त संघर्ष की संभावना मुश्किल हो गई थी।
### निष्कर्ष\nअपनी सीमाओं और अंग्रेजों द्वारा अंततः दमन किए जाने के बावजूद, सविनय अवज्ञा आंदोलन ने अपूर्व राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन किया और भारत की स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाले भविष्य के संघर्षों की नींव रखी।
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nमहात्मा गांधी के नेतृत्व में 1920 में शुरू किया गया असहयोग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस आंदोलन ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर जन प्रतिरोध को संगठित किया।
### असहयोग आंदोलन की ओर ले जाने वाली परिस्थितियां
1. **रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड:** 1919 में रॉलेट एक्ट पारित होने से सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखने की अपार शक्तियां मिल गईं। इसके खिलाफ लोगों में भारी आक्रोश था, जो अमृतसर के क्रूर जलियांवाला बाग हत्याकांड में बदल गया, जिससे भारतीय गहरे आहत हुए।
2. **खिलाफत का मुद्दा:** प्रथम विश्व युद्ध में ओटोमन तुर्की की हार ने खलीफा की सुरक्षा को लेकर भारतीय मुसलमानों के मन में गहरी आशंका पैदा कर दी थी। सेव्रे की संधि की कठोर शर्तों ने मुसलमानों को नाराज कर दिया। महात्मा गांधी ने इसे हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाने का एक अवसर माना और खिलाफत के मुद्दे को असहयोग आंदोलन के साथ मिला दिया।
3. **युद्ध के बाद की आर्थिक कठिनाइयां:** प्रथम विश्व युद्ध ने भारत में गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर दिया था। युद्ध ऋणों और करों द्वारा वित्तपोषित रक्षा व्यय में वृद्धि से कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हुई, आम लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फसलें नष्ट हो गईं और विनाशकारी इन्फ्लूएंजा महामारियों ने व्यापक असंतोष पैदा किया।
### विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी
* **शहरों में:** आंदोलन की शुरुआत मध्यम वर्ग की भागीदारी से हुई। छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया, प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया और वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। अधिकांश प्रांतों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों पर धरना दिया गया और विदेशी कपड़ों की भारी होली जलाई गई।
* **ग्रामीण इलाकों में विद्रोह:** अवध में किसानों का नेतृत्व बाबा रामचंद्र ने उन तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ किया जो अत्यधिक उच्च लगन और कर मांगते थे। आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में औपनिवेशिक वन कानूनों के खिलाफ एक उग्रवादी गोरिल्ला आंदोलन फैल गया, जिसने लोगों को मवेशी चराने या जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने के लिए जंगलों में प्रवेश करने से रोक दिया था।
* **बागानों में स्वराज:** असम में बागान श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ उन सीमित स्थानों से स्वतंत्र रूप से आने-जाने का अधिकार था जिनमें वे बंद थे, और उस गांव से संबंध बनाए रखना जहां से वे आए थे। 1859 के इनलैंड इमीग्रेशन एक्ट के तहत बागान श्रमिकों को बिना अनुमति के चाय बागानों को छोड़ने की अनुमति नहीं थी।
### निष्कर्ष\nइस प्रकार, हालांकि असहयोग आंदोलन ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को एक ही बैनर के तहत एकजुट किया, लेकिन प्रत्येक समूह ने अपने विशिष्ट ग्रीवांसों और आकांक्षाओं को दर्शाते हुए 'स्वराज' शब्द की अपनी-अपनी व्याख्या की।
उत्तर (Answer): ### सविनय अवज्ञा आंदोलन का परिचय\nमहात्मा गांधी द्वारा 1930 में ऐतिहासिक नमक यात्रा (दांडी मार्च) के साथ शुरू किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख मील का पत्थर था। इसने ब्रिटिश कानूनों को सीधे तौर पर चुनौती दी और पहले के आंदोलनों की तुलना में जन प्रतिरोध के अधिक व्यापक रूप का प्रतिनिधित्व किया।
### असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के बीच अंतर
* **कार्रवाई की प्रकृति:** असहयोग आंदोलन (1920-22) के दौरान, लोगों से ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग न करने के लिए कहा गया था, जिसमें स्कूलों, कॉलेजों, विदेशी वस्तुओं और अदालतों का बहिष्कार शामिल था। इसके विपरीत, सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) एक कदम आगे था; लोगों से न केवल अंग्रेजों के साथ सहयोग से इनकार करने के लिए कहा गया, बल्कि नमक कानूनों, वन कानूनों और भू-राजस्व कानूनों जैसे औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ने के लिए भी कहा गया।
* **उद्देश्य:** असहयोग आंदोलन खिलाफत और जलियांवाला बाग के मुद्दों जैसी विशिष्ट ज्यादतियों को दूर करने के लिए शुरू किया गया था, और बाद में स्वराज की मांग की। सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्पष्ट लक्ष्य दिसंबर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में घोषित पूर्ण स्वतंत्रता या 'पूर्ण स्वराज' को प्राप्त करना था।
### नमक यात्रा का महत्व\nमहात्मा गांधी ने आंदोलन के लिए 'नमक' को केंद्र बिंदु के रूप में चुना क्योंकि नमक का सेवन अमीर और गरीब दोनों द्वारा समान रूप से किया जाता था, और यह भोजन की सबसे आवश्यक वस्तुओं में से एक था। ब्रिटिश सरकार का नमक के उत्पादन और बिक्री पर एकाधिकार था और उसने इस पर कर लगाया था। दांडी में नमक कानून को तोड़कर, गांधी जी ने सार्वभौमिक रूप से नापसंद कर के खिलाफ पूरे देश को सफलतापूर्वक एकजुट किया।
### आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
* **सक्रिय भागीदारी:** सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक उल्लेखनीय विशेषता महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी थी। अपनी यात्राओं के दौरान गांधी जी को सुनने के लिए हजारों महिलाएं अपने घरों से बाहर आईं।
* **प्रदर्शन और धरना:** महिलाओं ने विरोध मार्च में भाग लिया, अवैध रूप से नमक बनाया, और विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर धरना दिया। अपनी सक्रिय भागीदारी के लिए कई महिलाएं जेल भी गईं।
* **राष्ट्रीय जागरण:** भारतीय महिलाओं के लिए, यह भागीदारी राष्ट्रीय जागरण का प्रतीक थी, जिसने उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में लाया और समाज में उनकी पारंपरिक भूमिकाओं को बदल दिया।
### निष्कर्ष\nयद्यपि इस आंदोलन को अंग्रेजों द्वारा गंभीर दमन का सामना करना पड़ा और अंततः इसे स्थगित कर दिया गया, इसने भारतीय समाज के सभी वर्गों में अभूतपूर्व साहस, एकता और पूर्ण स्वतंत्रता की व्यापक इच्छा का प्रदर्शन किया।
उत्तर (Answer): ### सविनय अवज्ञा आंदोलन: महत्व और भागीदारी
\nमहात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 में शुरू किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक और बड़ा मील का पत्थर साबित हुआ। इसकी शुरुआत ऐतिहासिक दांडी मार्च के साथ हुई, जहां गांधी और उनके अनुयायियों ने नमक कानून तोड़ने के लिए 240 मील की पदयात्रा की।
#### असहयोग आंदोलन से अंतर
* **कार्रवाई की प्रकृति:** जहां असहयोग आंदोलन ने लोगों से ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग करने से इनकार करने का आग्रह किया, वहीं सविनय अवज्ञा आंदोलन में न केवल असहयोग शामिल था, बल्कि स्पष्ट रूप से औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ना (जैसे नमक कर, वन कानून और भू-राजस्व कानून) भी शामिल था।
* **लक्ष्य:** असहयोग आंदोलन का अंतिम लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन (स्वराज) था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन ने स्पष्ट रूप से 1929 के लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में घोषित *पूर्ण स्वराज* (पूर्ण स्वतंत्रता) की मांग की।
#### विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी
* **अमीर किसान समुदाय:** गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे समुदाय सक्रिय भागीदार थे। व्यावसायिक फसलों के उत्पादक होने के नाते, वे व्यापार मंदी और गिरती कीमतों से बुरी तरह प्रभावित हुए थे। उनके लिए स्वराज की लड़ाई ऊंचे राजस्व के खिलाफ एक संघर्ष थी।
* **गरीब किसान:** छोटे काश्तकार जिन्होंने मकान मालिकों से जमीन किराए पर ली थी, मंदी के दौरान किराया चुकाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे कट्टरपंथी नो-रेंट अभियानों में शामिल हुए, जिनका नेतृत्व अक्सर समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने किया।
* **व्यापारिक वर्ग:** पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे दिग्गजों के नेतृत्व में भारतीय उद्योगपतियों और व्यापारियों ने इस आंदोलन को वित्तीय रूप से समर्थन दिया और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया। उन्होंने उन औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिन्होंने व्यावसायिक गतिविधियों को प्रतिबंधित किया और विदेशी आयातों के खिलाफ सुरक्षा चाही।
* **औद्योगिक श्रमिक वर्ग:** नागपुर क्षेत्र को छोड़कर औद्योगिक श्रमिकों ने बड़ी संख्या में भाग नहीं लिया, हालांकि कुछ श्रमिकों ने अपनी खुद की साम्राज्यवादी विरोधी रुख के हिस्से के रूप में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को अपनाया।
* **महिलाओं की भागीदारी:** महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी इस आंदोलन की एक अनूठी विशेषता थी। हजारों महिलाओं ने विरोध मार्च में भाग लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़े और शराब की दुकानों पर पिकेटिंग की, जो सार्वजनिक क्षेत्र में उनके उभरने का प्रतीक था।
उत्तर (Answer): ### असहयोग आंदोलन: परिस्थितियां और भागीदारी
\nमहात्मा गांधी द्वारा 1920-1922 में शुरू किया गया असहयोग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह संवैधानिक आंदोलन से जन प्रतिरोध में बदल गया था।
#### आंदोलन की ओर ले जाने वाली परिस्थितियां
1. **युद्ध के बाद की आर्थिक कठिनाई:** प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने गंभीर आर्थिक संकट पैदा किया। बढ़े हुए रक्षा खर्च को युद्ध के ऋणों और करों के माध्यम से वित्तपोषित किया गया, जिससे अत्यधिक मूल्य वृद्धि, आम लोगों के लिए कठिनाई, और इन्फ्लूएंजा महामारी के साथ फसल खराब होने की स्थिति पैदा हुई।
2. **रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड:** दमनकारी रॉलेट एक्ट (1919) ने सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने की भारी शक्तियां दीं। इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के कारण अमृतसर में क्रूर जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, जहां जनरल डायर ने एक शांतिपूर्ण सभा पर गोली चलाई, जिससे पूरा देश आक्रोशित हो गया।
3. **खिलाफत मुद्दा:** प्रथम विश्व युद्ध में ओटोमन तुर्की की हार और सेव्रेस की संधि की कठोर शर्तों ने खलीफा (इस्लामी दुनिया के आध्यात्मिक प्रमुख) की लौकिक शक्तियों को खतरे में डाल दिया। अली बंधुओं (मोहम्मद अली और शौकत अली) के नेतृत्व में भारतीय मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया। गांधी ने इसे एक एकीकृत राष्ट्रीय संघर्ष में हिंदुओं और मुसलमानों को एकजुट करने के अवसर के रूप में देखा।
#### विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी
* **शहरों में:** मध्यम वर्ग की भागीदारी प्रमुख थी। छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया, प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों ने इस्तीफा दे दिया, और वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग की गई, और विदेशी कपड़ों की होलियों जलाई गईं।
* **ग्रामीण इलाकों में (किसान और आदिवासी):** बाबा रामचन्द्र के नेतृत्व में अवध के किसानों ने तालुकदारों द्वारा मांगे जाने वाले ऊंचे किराए और बेगार (जबरन श्रम) के खिलाफ लड़ाई लड़ी। आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में, अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आदिवासियों ने वन कानूनों के खिलाफ एक उग्रवादी गोरिल्ला आंदोलन शुरू किया, जिसने आरक्षित वनों में उनके प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया था।
* **बगान श्रमिक:** असम में बगान श्रमिकों के लिए, स्वतंत्रता का अर्थ चाय के बागानों की सीमित जगहों के भीतर और बाहर स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार था। 1859 के इनलैंड इमीग्रेशन एक्ट के तहत, उन्हें अनुमति के बिना चाय बागानों को छोड़ने की अनुमति नहीं थी। गांधी से प्रेरित होकर, हजारों लोगों ने अधिकारियों की अवहेलना की और घर की ओर चल पड़े।
उत्तर (Answer): ### भारत में राष्ट्रवाद का विकास
\nभारत में राष्ट्रवाद 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में एक शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरा और विकसित हुआ। यह जागृति कोई अलग-थलग घटना नहीं थी, बल्कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक कारकों का परिणाम थी, जिसने औपनिवेशिक उत्पीड़न के खिलाफ विविध आबादी को एकजुट किया।
* **ब्रिटिशों द्वारा आर्थिक शोषण:**
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत के पारंपरिक आर्थिक ताने-बाने को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया। भारी कराधान, मैनचेस्टर से सस्ते मशीन निर्मित सामानों के आगमन के कारण स्वदेशी हस्तशिल्प उद्योगों का पतन, और बार-बार पड़ने वाले अकालों ने किसानों, कारीगरों और श्रमिक वर्ग को अलग-थलग कर दिया। भारत से ब्रिटेन की ओर धन की निकासी ने व्यापक आर्थिक संकट पैदा किया, जिससे भारतीयों को यह अहसास हुआ कि उनकी गरीबी ब्रिटिश शासन का सीधा परिणाम है।
* **पश्चिमी शिक्षा की भूमिका:**
ब्रिटिशों द्वारा पश्चिमी शिक्षा की शुरुआत का उद्देश्य अधीनस्थ लिपिकों का एक वर्ग तैयार करना था, लेकिन अनजाने में इसने शिक्षित भारतीयों को स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और लोकतंत्र के आधुनिक उदारवादी विचारों से परिचित कराया। रूसो, लॉक और मिल जैसे विचारकों ने बुद्धिजीवियों की एक नई पीढ़ी को प्रेरित किया जिन्होंने विदेशी शासन की वैधता पर सवाल उठाना और अपनी शिकायतों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करना शुरू किया।
* **बुनियादी ढांचे के माध्यम से देश का एकीकरण:**
आधुनिक बुनियादी ढांचे, विशेष रूप से टेलीग्राफ, डाक प्रणाली और एक व्यापक रेलवे नेटवर्क के विकास ने अनजाने में राष्ट्रवादी आंदोलन में सहायता की। हालांकि इनका निर्माण मुख्य रूप से प्रशासनिक और सैन्य सुविधा और आर्थिक शोषण के लिए किया गया था, लेकिन इन्होंने देश के विभिन्न कोनों के लोगों को करीब लाया, जिससे नेताओं को यात्रा करने, संवाद करने और अखिल भारतीय राजनीतिक आंदोलनों को संगठित करने में मदद मिली।
* **भारत के अतीत की खोज (सांस्कृतिक पुनरुत्थान):**
भारतीय और यूरोपीय विद्वानों (जैसे सर विलियम जोन्स, मैक्स मूलर, स्वामी विवेकानंद और बंकिम चंद्र चट्टोपध्याय) द्वारा भारत की प्राचीन विरासत, समृद्ध साहित्य, कला और दर्शन पर शोध ने भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव की भावना पैदा की। इसने भारतीय पिछड़ेपन और सांस्कृतिक हीनता के ब्रिटिश आख्यान का मुकाबला किया।
* **प्रेस और साहित्य की भूमिका:**
क्षेत्रीय और अंग्रेजी समाचार पत्रों (जैसे *द केसरी*, *द हिंदू*, *अमृत बाजार पत्रिका*) और देशभक्ति साहित्य ने राजनीतिक जागृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अन्यायपूर्ण ब्रिटिश नीतियों की आलोचना की, राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया और सार्वजनिक बहस और महत्वपूर्ण जागरूकता के लिए एक मंच तैयार किया।
* **वायसरायों की आक्रामक नीतियां:**
लॉर्ड लिटन (वर्नाकुलर प्रेस एक्ट, आर्म्स एक्ट) जैसे ब्रिटिश वायसरायों द्वारा अपनाए गए दमनकारी उपायों और भारतीयों द्वारा सामना किए जाने वाले स्पष्ट नस्लीय भेदभाव (जैसे इल्बर्ट बिल विवाद) ने राज के दमनकारी स्वभाव को और उजागर किया, जिससे भारतीय क्रोध और संकल्प में एकजुट हो गए।
उत्तर (Answer): महात्मा गांधी ने फरवरी 1922 में चौरी-चौरा (जो कि संयुक्त प्रांत, वर्तमान उत्तर प्रदेश, के गोरखपुर जिले में स्थित है) में हुई हिंसक घटना के कारण असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लिया। एक शांतिपूर्ण बाजार जुलूस पुलिस के साथ हिंसक संघर्ष में बदल गया, और भीड़ द्वारा पुलिस थाने में आग लगा दिए जाने के कारण कई पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई। महात्मा गांधी 'सत्याग्रह' और अहिंसा के दृढ़ विश्वासी थे। उनका मानना था कि आंदोलन कई स्थानों पर हिंसक रूप ले रहा है और सत्याग्रही पूर्ण अहिंसा से जुड़े जन-संघर्षों के लिए अभी तक ठीक से प्रशिक्षित नहीं हुए हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि संघर्ष के तरीकों की पवित्रता तात्कालिक राजनीतिक लक्ष्य से अधिक महत्वपूर्ण है। परिणामस्वरूप, इस दुखद घटना से उन्हें भारी आघात पहुंचा और उन्होंने राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन को वापस लेने की औपचारिक घोषणा कर दी, क्योंकि उनका मानना था कि हिंसा के प्रसार को रोकना और नैतिक सिद्धांतों को बनाए रखना अत्यंत आवश्यक था।
उत्तर (Answer): असहयोग आंदोलन, जो शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक उत्साह के साथ शुरू हुआ था, धीरे-धीरे गति खो बैठा और प्रतिभागियों के सामने आने वाली कई व्यावहारिक, आर्थिक और संस्थागत बाधाओं के कारण धीमा पड़ गया।
\nसबसे पहले, ब्रिटिश शैक्षणिक संस्थानों के बहिष्कार ने छात्रों और शिक्षकों के लिए एक गंभीर दुविधा पैदा कर दी। वैकल्पिक भारतीय शैक्षणिक संस्थान, जैसे राष्ट्रीय स्कूल और विश्वविद्यालय, आने में बहुत धीमी गति से थे। परिणामस्वरूप, छात्रों और शिक्षकों के पास अपनी पढ़ाई और आजीविका जारी रखने के लिए सरकार द्वारा नियंत्रित स्कूलों और कॉलेजों में लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, जिससे दीर्घकालिक बहिष्कार असहनीय हो गया।
\nदूसरा, खादी का कपड़ा मैनचेस्टर से आयातित या भारतीय मिलों में उत्पादित बड़े पैमाने पर उत्पादित मिल के कपड़े की तुलना में काफी महंगा था। शहरी गरीब, दैनिक वेतन भोगी और आर्थिक रूप से हाशिए के वर्ग महंगी खादी खरीदने में असमर्थ थे, जिससे उन्हें सस्ते ब्रिटिश या मिल के कपड़े पर वापस लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा।
\nतीसरा, ब्रिटिश कानूनी संस्थानों और अदालतों के बहिष्कार को भी इसी तरह के भाग्य का सामना करना पड़ा। जिन वकीलों और अधिवक्ताओं ने आंदोलन के शुरुआती चरण के दौरान अपने आकर्षक अभ्यास छोड़ दिए थे, उन्होंने जल्द ही खुद को गंभीर वित्तीय बाधाओं का सामना करना पाया। अपने परिवारों का भरण-पोषण करने और अपनी आजीविका बनाए रखने के लिए, कई वकीलों को अंततः सरकारी अदालतों में अपना अभ्यास फिर से शुरू करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
\nइस प्रकार, आर्थिक आवश्यकता, वैकल्पिक राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे की कमी और किफायती स्वदेशी विकल्पों की अनुपस्थिति के कारण अपने शुरुआती विस्फोटक चरण के बाद असहयोग आंदोलन की शहरी गति कम हो गई।
उत्तर (Answer): रॉलट एक्ट मार्च 1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा जल्दबाजी में पारित किया गया था, इसके बावजूद कि भारतीय सदस्यों ने इसका एक स्वर में विरोध किया था। इसका आधिकारिक नाम अराजक और क्रांतिकारी अपराध अधिनियम था, जिसे सर सिडनी रॉलट की अध्यक्षता वाली राजद्रोह समिति की सिफारिशों पर तैयार किया गया था।
\nइस अधिनियम ने ब्रिटिश सरकार और पुलिस को राजनीतिक गतिविधियों को दबाने और भारत में किसी भी रूप में राष्ट्रवादी असंतोष को कुचलने के लिए अपार और अनियंत्रित शक्तियां प्रदान कीं। इसके सबसे कुख्यात प्रावधान ने दो साल तक की अवधि के लिए बिना मुकदमे के राजनीतिक कैदियों को हिरासत में लेने की अनुमति दी, जिससे बंदी प्रत्यक्षीकरण और बुनियादी नागरिक स्वतंत्रताएं प्रभावी रूप से निलंबित हो गईं।
\nभारतीयों ने कई महत्वपूर्ण कारणों से रॉलट एक्ट का पुरजोर विरोध किया। सबसे पहले, इसे मौलिक मानव अधिकारों, भाषण की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना गया। लोगों को सही महसूस हुआ कि यदि सरकार केवल संदेह के आधार पर किसी को भी बिना कानूनी प्रतिनिधित्व या अदालत में निष्पक्ष सुनवाई की अनुमति दिए बिना गिरफ्तार और कैद कर सकती है, तो कोई भी नागरिक सुरक्षित नहीं था।
\nदूसरा, अधिनियम के समय ने जनता के गुस्से को गहराई से बढ़ा दिया था। राजनीतिक सुधारों और स्वशासन की प्रत्याशा में भारतीयों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों को भारी सहयोग और समर्थन दिया था। इस निष्ठा को पुरस्कृत करने के बजाय, अंग्रेजों ने उन्हें एक कठोर दमनकारी कानून से पुरस्कृत किया, जिससे उनकी insincerity साबित हुई।
\nमहात्मा गांधी ने 'रॉलट सत्याग्रह' का आयोजन किया, जिसमें 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल (हड़ताल) का आह्वान किया गया। दुकानें बंद हो गईं, रैलियां आयोजित की गईं, और रेलवे कार्यशालाएं हड़ताल पर चली गईं, जिससे पूरे देश में अभूतपूर्व औपनिऔषिक एकता का प्रदर्शन हुआ।
उत्तर (Answer): सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं को जगाने और विविध भाषाई, धार्मिक और क्षेत्रीय सीमाओं के पार लोगों को एकजुट करने में एक महत्वपूर्ण, भावनात्मक भूमिका निभाई। राष्ट्रवाद ने विभिन्न कलात्मक, साहित्यिक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों के माध्यम से लोगों की कल्पना को मोहित किया और सामूहिक अपनेपन की गहरी भावना को प्रेरित किया।
\nसबसे पहले, राष्ट्र की पहचान सबसे अधिक दृश्य रूप से 'भारत माता' की छवि से जुड़ी थी। इस मातृ रूप का निर्माण 1870 के दशक में शुरू हुआ जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि के भजन के रूप में 'वंदे मातरम' लिखा। बाद में, अवनिंद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की अपनी प्रसिद्ध पेंटिंग बनाई जिसमें उन्हें एक तपस्वी के रूप में चित्रित किया गया - शांत, दिव्य, आध्यात्मिक, और भोजन, शिक्षा और वस्त्र प्रदान करने वाली। इस देशभक्ति की छवि को व्यापक रूप से प्राप्त किया गया और पूजा गया, जिससे गहरी भक्ति को बढ़ावा मिला।
\nदूसरा, राष्ट्रवादी नेताओं ने राष्ट्रीय पहचान को पुनर्जीवित करने और भारत के गौरवशाली अतीत में गर्व की भावना को बहाल करने के लिए भारतीय लोक कथाओं का सहारा लिया। बंगाल में, रवींद्रनाथ टैगोर ने लोकगीतों, नर्सरी राइम्स और मिथकों को एकत्र करना शुरू किया, जबकि मद्रास में, नतेशा शास्त्री ने तमिल लोक कथाओं का एक विशाल चार-खंड का संग्रह 'द फ़ोकलोर ऑफ़ सदर्न इंडिया' प्रकाशित किया, जिसमें तर्क दिया गया कि लोक कथाएँ राष्ट्रीय साहित्य थीं और लोगों के वास्तविक विचारों की सबसे भरोसेमंद अभिव्यक्ति थीं।
\nतीसरा, स्वदेशी आंदोलन के दौरान डिज़ाइन किया गया तिरंगा झंडा (लाल, हरा और पीला), जिसे बाद में केंद्र में चरखे के साथ गांधीजी के स्वराज ध्वज द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, आत्म-सहायता का प्रतिनिधित्व करते हुए अवज्ञा और राष्ट्रीय एकता का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया।
\nअंत में, इतिहास की पुनर्व्याख्या ने गर्व पैदा किया। ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीयों को पिछड़े और खुद पर शासन करने में असमर्थ के रूप में पेश किया। इसके जवाब में, भारतीयों ने कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित और धर्म में भारत की महान उपलब्धियों की खोज के लिए अतीत में देखना शुरू किया, यह साबित करते हुए कि भारत की गौरवशाली विरासत को औपनिऔषिक शोषण द्वारा दबा दिया गया था।
उत्तर (Answer): असम के बागान श्रमिकों के लिए, स्वतंत्रता का अर्थ उन सीमित स्थानों के अंदर और बाहर स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार था जिसमें वे बंद थे, और इसका मतलब उन गांवों के साथ संपर्क बनाए रखना था जहाँ से वे आए थे। औपनिवेशिक अंतर्देशीय उत्प्रवास अधिनियम, 1859 के तहत, बागान श्रमिकों को अनुमति के बिना चाय के बागानों को छोड़ने की अनुमति नहीं थी, और वास्तव में, उन्हें शायद ही कभी ऐसी अनुमति दी जाती थी।
\nजब असहयोग आंदोलन की खबर चाय बागानों तक पहुँची, तो हजारों श्रमिकों ने अधिकारियों की अवहेलना की, अपने बागानों को छोड़ दिया, और अपने घरों की ओर चल पड़े। उनका मानना था कि 'गांधी राज' आ रहा है और हर व्यक्ति को उसके अपने गांवों में जमीन दी जाएगी।
\nहालाँकि, उनकी घर की यात्रा योजना के अनुसार नहीं हुई। रेलवे और स्टीमर हड़ताल के कारण रास्ते में फंसे होने के कारण, उन्हें पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया, बेरहमी से पीटा गया, और वापस लाया गया। हालाँकि वे अपनी मंजिलों तक पहुँचने में असफल रहे, लेकिन उनकी भागीदारी ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया कि कैसे 'स्वराज' के विचार को विभिन्न सामाजिक समूहों द्वारा अलग-अलग तरीकों से समझा गया, जो अक्सर कांग्रेस नेतृत्व की तात्कालिक कल्पना से परे था और जबरन बंधन से मुक्ति का एक कट्टरपंथी, स्थानीय अर्थ ले रहा था।