Chapter Chai • Board Revision Guide
HI • NCERT

संसाधन एवं विकास

Subject: सामाजिक विज्ञान | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)

MP बोर्ड कक्षा 10 - सामाजिक विज्ञान (भूगोल)

अध्याय 1: संसाधन और विकास (Quick Revision Notes)


---


1. संसाधन की परिभाषा (Definition of Resource)

पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है, जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से साध्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, संसाधन कहलाती है।


---


2. संसाधनों का वर्गीकरण (Classification of Resources)

#### (A) उत्पत्ति के आधार पर:

1. जैव संसाधन (Biotic): इनकी प्राप्ति जीवमंडल से होती है और इनमें जीवन व्याप्त होता है।

2. अजैव संसाधन (Abiotic): वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने हैं।


#### (B) समाप्यता के आधार पर:

1. नवीकरण योग्य संसाधन (Renewable): जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुन: उत्पन्न किया जा सकता है।

2. अनवीकरण योग्य संसाधन (Non-Renewable): इनके विकास में लाखों वर्ष लग जाते हैं। ये एक बार उपयोग करने पर समाप्त हो जाते हैं।


#### (C) स्वामित्व के आधार पर:

1. व्यक्तिगत संसाधन: निजी व्यक्तियों के स्वामित्व वाले संसाधन (उदा. निजी मकान, खेत, बाग)।

2. सामुदायिक संसाधन: समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध (उदा. सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, श्मशान भूमि)।

3. राष्ट्रीय संसाधन: कानूनी रूप से देश की सरकार का अधिकार। देश की राजनीतिक सीमाओं एवं तट रेखा से 12 समुद्री मील (22.2 किमी) तक का समुद्री क्षेत्र।

4. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नियंत्रण में। तट रेखा से 200 समुद्री मील से परे खुला महासागरीय क्षेत्र (विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र)।


#### (D) विकास के स्तर के आधार पर:

1. संभावी संसाधन: जो किसी प्रदेश में विद्यमान हैं परंतु इनका उपयोग नहीं हुआ है (उदा. राजस्थान व गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा)।

2. विकसित संसाधन: जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है।

3. भंडार: पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में पहुँच से बाहर हैं (उदा. जल से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन पृथक करना)।

4. संचित कोष: यह भंडार का ही हिस्सा है, जिसे उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परंतु इसका उपयोग अभी शुरू नहीं हुआ है (उदा. बांधों में जल, वन)।


---


3. सतत पोषणीय विकास और महत्वपूर्ण सम्मेलन


---


4. भारत में संसाधन नियोजन (Resource Planning)

संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन आवश्यक है। इसके 3 मुख्य चरण हैं:

1. देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना (सर्वेक्षण, मानचित्रण)।

2. संसाधन विकास योजनाएं लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढांचा तैयार करना।

3. संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।


---


5. भू-संसाधन एवं भू-उपयोग (Land Resources)


#### भू-निम्नीकरण के प्रमुख कारण एवं उपाय:


---


6. मृदा के प्रकार (Types of Soil in India)

| मृदा का प्रकार | मुख्य विशेषताएं | क्षेत्र/विस्तार | मुख्य फसलें |

| :--- | :--- | :--- | :--- |

| 1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) | सर्वाधिक उपजाऊ और विस्तृत। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र द्वारा निर्मित। दो प्रकार: खादर (नया जलोढ़ - अधिक उपजाऊ) और बांगर (पुराना जलोढ़ - कंकड़ युक्त)। | संपूर्ण उत्तरी मैदान, तटीय मैदान | गेहूं, चावल, गन्ना, दलहन |

| 2. काली मृदा (Black / Regur Soil) | इसे 'रेगर' मृदा भी कहते हैं। लावा जनक शैलों से निर्मित। नमी धारण करने की उच्च क्षमता। | महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश | कपास (सर्वोत्तम), मूंगफली |

| 3. लाल और पीली मृदा | लोहे के कणों के कारण लाल रंग; जलदोजन (Hydration) पर पीली दिखाई देती है। | ओडिशा, छत्तीसगढ़, दक्कन पठार | मोटे अनाज, दालें |

| 4. लेटराइट मृदा | ग्रीक शब्द 'Later' (ईंट) से बना। अत्यधिक वर्षा व निक्षालन (Leaching) से निर्मित। | कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश | काजू, चाय, कॉफी |

| 5. मरुस्थलीय मृदा | रेतीली और लवणीय। ह्यूमस और नमी की कमी। | पश्चिमी राजस्थान | बाजरा, सरसों |

| 6. वन मृदा | पर्वतीय क्षेत्रों में। नदी घाटियों में दोमट और सिल्टदार, ऊपरी ढालों पर अम्लीय। | हिमालयी/पर्वतीय क्षेत्र | फल, चाय |


---


7. मृदा अपरदन और संरक्षण (Soil Erosion & Conservation)

#### मृदा अपरदन के प्रकार:

1. अवनलिका अपरदन (Gully Erosion): बहता जल मृदा को काटते हुए गहरी वाहिकाएं (नालियां) बनाता है। ऐसी भूमि को उत्खात भूमि (Badland) कहते हैं (उदा. चंबल बेसिन में 'खड्ड' या Ravines)।

2. चादर अपरदन (Sheet Erosion): जल की विस्तृत चादर ढाल के साथ नीचे बहती है और ऊपरी मृदा बह जाती है।


#### मृदा संरक्षण के मुख्य उपाय:


---


MP बोर्ड परीक्षा हेतु अति-महत्वपूर्ण प्रश्न संकेत:
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 अध्याय: संसाधन और विकास
Overview
संसाधन का परिचय परिभाषा: पर्यावरण में उपलब्ध वस्तुएँ जो आवश्यकताओं को पूरा करती हैं आधार: प्रौद्योगिकी, आर्थिक सम्भाव्यता और सांस्कृतिक स्वीकार्यता संसाधनों का वर्गीकरण उत्पत्ति के आधार पर जैव संसाधन (सजीव - मनुष्य, वनस्पति, प्राणीजात) अजैव संसाधन (निर्जीव - चट्टानें, धातुएँ) समाप्यता के आधार पर नवीकरण योग्य (पुनः उत्पन्न होने वाले - सौर/पवन ऊर्जा, जल) अनवीकरण योग्य (सीमित मात्रा - खनिज, जीवाश्म ईंधन) स्वामित्व के आधार पर व्यक्तिगत (खुद की जायदाद - घर, भूमि) सामुदायिक (समाज का अधिकार - पार्क, श्मशान घाट) राष्ट्रीय (देश की सीमा में - नदियाँ, वन, खनिज) अंतरराष्ट्रीय (खुला महासागरीय क्षेत्र) विकास के स्तर के आधार पर संभावी (उपलब्ध हैं, पर उपयोग नहीं हुआ) विकसित (सर्वेक्षित और उपयोग हेतु निर्धारित) भंडार (प्रौद्योगिकी के अभाव में अप्रयुक्त) संचित कोष (तकनीक उपलब्ध, भविष्य के लिए सुरक्षित) संसाधनों का विकास और नियोजन अंधाधुंध दोहन की समस्याएँ संसाधनों का ह्रास समाज का दो वर्गों में विभाजन (अमीर-गरीब) वैश्विक पारिस्थितिकी संकट (ग्लोबल वार्मिंग) सतत पोषणीय विकास पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना विकास भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की अनदेखी न करना वैश्विक सम्मेलन रिया डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन (1992) एजेंडा 21 (सतत विकास के लिए वैश्विक सहमति) भारत में संसाधन नियोजन संसाधनों की पहचान और तालिका बनाना संसाधन विकास योजनाएँ लागू करना राष्ट्रीय विकास योजनाओं से तालमेल संसाधन संरक्षण गांधीजी के विचार: "हमारे पास हर व्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति के लिए बहुत कुछ है, लेकिन लालच के लिए नहीं।" भू-संसाधन भारत की भू-आकृति मैदान (43%): कृषि और उद्योग हेतु पर्वत (30%): बारहमासी नदियाँ और पर्यटन पठार (27%): खनिज और जीवाश्म ईंधन भू-निम्नीकरण के कारण वनोन्मूलन (वनों की कटाई) अति पशुचारण खनन और अति सिंचाई संरक्षण के उपाय वृक्षारोपण पशुचारण पर नियंत्रण रक्षक मेखला (Shelterbelts) बनाना खनन गतिविधियों पर नियंत्रण मृदा संसाधन एवं प्रकार जलोढ़ मृदा सबसे उपजाऊ, नदियों द्वारा जमा की गई दो प्रकार: बांगर (पुरानी) और खादर (नयी) गन्ने, चावल और गेहूं के लिए उपयुक्त काली मृदा (रेगर मृदा) लावा जनक शैलों से निर्मित कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम दक्कन ट्रैप क्षेत्र में स्थित लाल और पीली मृदा लोहे के प्रसार से लाल रंग, जलभराव से पीला कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लेटराइट मृदा अत्यधिक वर्षा और निक्षालन से निर्मित चाय, कॉफी और काजू के लिए उपयुक्त मरुस्थली मृदा रेतीली और लवणीय शुष्क जलवायु (राजस्थान) वन मृदा पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में नदी घाटियों में दोमट, ऊपरी ढालों पर मोटे कण मृदा अपरदन और संरक्षण अपरदन के प्रकार अवनलिका अपरदन (गहरी नालियाँ बनना) चादर अपरदन (ऊपरी परत का बहना) संरक्षण की विधियाँ समुच्च रेखा जुताई (ढाल पर जुताई) सोपानी / सीढ़ीदार कृषि पट्टी कृषि (घास की पट्टियां छोड़ना) रक्षक मेखला (पेड़ों की कतारें लगाना)
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. संसाधन नियोजन क्या है? भारत में संसाधन नियोजन की जटिल तीन-स्तरीय प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए, और चर्चा कीजिए कि भारत जैसे देश के लिए संसाधन नियोजन क्यों आवश्यक है। 5 Marks
उत्तर (Answer): संसाधन नियोजन संसाधनों के विवेकपूर्ण, संतुलित और सतत उपयोग की एक सर्वस्वीकृत रणनीति है। यह सुनिश्चित करता है कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना तथा भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए संसाधनों का कुशल उपयोग हो। ### भारत में संसाधन नियोजन की तीन-स्तरीय प्रक्रिया:\nभारत में संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें निम्नलिखित तीन प्रमुख चरण शामिल हैं: 1. **संसाधनों की पहचान और तालिका बनाना:** इस चरण में देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों का सर्वेक्षण करना, मानचित्र बनाना और उनका गुणात्मक एवं मात्रात्मक मापन व अनुमान लगाना शामिल है। 2. **नियोजन ढांचा तैयार करना:** संसाधन विकास योजनाओं को लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढांचा तैयार करना। 3. **राष्ट्रीय विकास योजनाओं से मिलान:** क्षेत्रीय संसाधन विकास योजनाओं का राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों के साथ समन्वय स्थापित करना। ### भारत में संसाधन नियोजन की आवश्यकता: 1. **क्षेत्रीय विषमताएं:** भारत में संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता है। कुछ क्षेत्र किसी विशिष्ट संसाधन में समृद्ध हैं तो कुछ में भारी कमी है: - *झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश* खनिजों और कोयले के भंडारों से समृद्ध हैं। - *अरुणाचल प्रदेश* में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी है। - *राजस्थान* में सौर और पवन ऊर्जा की प्रचुरता है लेकिन जल संसाधनों की कमी है। - *लद्दाख* का शीत मरुस्थल सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है, परंतु जल, बुनियादी ढांचे और आवश्यक खनिजों की कमी का सामना कर रहा है। 2. **संसाधनों के ह्रास की रोकथाम:** अनियोजित दोहन से भू-मंडलीय तापन (ग्लोबल वार्मिंग) और प्रदूषण जैसी गंभीर पारिस्थितिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं। 3. **सतत पोषणीय विकास:** संसाधन नियोजन संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करता है, जिससे देश का संतुलित और सतत विकास संभव होता है।
Q2. भारत में भू-निम्नीकरण (भूमि अवनयन) के प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए और भू-निम्नीकरण को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी संरक्षण उपायों का सुझाव दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): भू-निम्नीकरण से तात्पर्य मृदा की प्राकृतिक उर्वरता और गुणवत्ता में गिरावट आने से है, जिससे भूमि कृषि और पारिस्थितिक संतुलन के लिए अनुपयुक्त हो जाती है। भारत में लगभग 130 लाख हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत है। ### भारत में भू-निम्नीकरण के प्रमुख कारण: 1. **वनोन्मूलन और खनन:** वनों की कटाई और खनन जैसी मानवीय गतिविधियों से भूमि को भारी क्षति पहुँचती है। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में खनन गतिविधियों के कारण भूमि का भारी निम्नीकरण हुआ है, क्योंकि खनन के बाद खदानों को मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। 2. **अतिपशुचारण:** मवेशियों द्वारा लगातार चराई से भूमि का वनस्पति आवरण नष्ट हो जाता है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अतिपशुचारण भू-निम्नीकरण का एक मुख्य कारण है। 3. **अत्यधिक सिंचाई:** पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में अत्यधिक सिंचाई से जलभराव (जलाक्रांतता) की समस्या उत्पन्न होती है। इससे मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है। 4. **औद्योगिक अपशिष्ट:** कारखानों से बिना उपचारित किए निकला जहरीला जल और रासायनिक अपशिष्ट आसपास की मिट्टी और जल निकायों को प्रदूषित करते हैं। 5. **खनिज प्रक्रियाएं:** सीमेंट उद्योग के लिए चूना पत्थर को पीसने जैसी प्रक्रियाओं से वायुमंडल में भारी मात्रा में धूल जमा हो जाती है, जो मृदा द्वारा जल के अवशोषण को रोकती है। ### भू-निम्नीकरण को नियंत्रित करने के उपाय: 1. **वनीकरण:** बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने से मृदा अपरदन रुकता है और मिट्टी की पकड़ मजबूत होती है। 2. **चरागाह प्रबंधन:** पशुचारण को नियंत्रित करने से प्राकृतिक घास आवरण की रक्षा होती है। 3. **रक्षक मेखला और कांटेदार झाड़ियां:** शुष्क क्षेत्रों (जैसे राजस्थान) में रक्षक मेखलाएं बनाकर और कांटेदार झाड़ियां लगाकर रेतीले टीलों को स्थिर किया जा सकता है। 4. **औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार:** औद्योगिक अपशिष्टों का विसर्जन करने से पूर्व उचित उपचार करना अनिवार्य होना चाहिए। 5. **सोपानी एवं समोच्च जुताई:** पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीदार खेती और समोच्च जुताई अपनाने से मृदा अपरदन कम होता है।
Q3. स्वामित्व तथा विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण कीजिए और प्रत्येक श्रेणी के लिए उपयुक्त उदाहरण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): संसाधनों का वर्गीकरण स्वामित्व और विकास के स्तर के आधार पर निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है: ### **1. स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण:** * **व्यक्तिगत संसाधन:** ये संसाधन निजी व्यक्तियों के स्वामित्व में होते हैं। उदाहरण: किसानों की निजी भूमि, मकान, बाग, चरागाह, कुएँ आदि। * **सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन:** ये संसाधन समुदाय के सभी सदस्यों को सुलभ होते हैं। उदाहरण: गाँव की शामिलात भूमि (चरागाह, श्मशान भूमि), सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल और खेल के मैदान। * **राष्ट्रीय संसाधन:** तकनीकी रूप से देश में मौजूद सभी संसाधन राष्ट्रीय हैं। सरकार को व्यक्तिगत संपत्ति को भी जनहित में अधिग्रहित करने का कानूनी अधिकार है। उदाहरण: सड़कें, रेलवे, खनिज पदार्थ, और तट रेखा से 12 समुद्री मील (22.2 किमी) तक का समुद्री क्षेत्र। * **अंतरराष्ट्रीय संसाधन:** इन संसाधनों का नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ करती हैं। तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र) से परे खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। ### **2. विकास के स्तर के आधार पर वर्गीकरण:** * **संभावी संसाधन:** वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते हैं, परंतु इनका उपयोग नहीं किया गया है। उदाहरण: राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ। * **विकसित संसाधन:** वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है। उदाहरण: उपयोग में लाए जा रहे कोयला और पेट्रोलियम संसाधन। * **भंडार:** पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में पहुँच से बाहर हैं। उदाहरण: जल (H₂O) दो ज्वलनशील गैसों—हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का यौगिक है, लेकिन इसे ऊर्जा स्रोत के रूप में अलग करने की तकनीक उपलब्ध नहीं है। * **संचित कोष:** यह भंडार का ही वह हिस्सा है जिसे उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परंतु इसका उपयोग अभी शुरू नहीं हुआ है। इसका उपयोग भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बचाकर रखा गया है (जैसे नदियों का जल)।
Q4. मृदा अपरदन किसे कहते हैं? मृदा अपरदन के प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए तथा भारत में मृदा संरक्षण के उपयुक्त उपायों का सुझाव दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### **मृदा अपरदन की परिभाषा:**\nप्राकृतिक कारकों (जैसे जल, पवन) तथा मानवीय गतिविधियों द्वारा मृदा के ऊपरी आवरण का कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। ### **मृदा अपरदन के प्रमुख प्रकार:** 1. **अवनालिका अपरदन (Gully Erosion):** बहता हुआ जल मृतिका युक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएँ (गलियाँ) बनाता है, जिन्हें अवनालिकाएँ कहते हैं। ऐसी भूमि कृषि योग्य नहीं रहती और इसे खड्ड भूमि (Badland) कहते हैं, जैसे चंबल बेसिन में खड्ड। 2. **चादर अपरदन (Sheet Erosion):** कई बार जल विस्तृत क्षेत्र पर ढाल के साथ नीचे की ओर बहता है और ऊपरी मृदा की परत बह जाती है। इसे चादर अपरदन कहा जाता है। 3. **पवन अपरदन (Wind Erosion):** पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र से मृदा को उड़ा ले जाने की प्रक्रिया को पवन अपरदन कहते हैं। ### **मृदा संरक्षण के प्रमुख उपाय:** * **समुच्य जुताई (Contour Ploughing):** ढाल वाली भूमि पर समुच्य रेखाओं के समानांतर हल चलाने से जल बहाव की गति घटती है। * **सोपान या सीढ़ीदार कृषि (Terrace Farming):** पश्चिमी और मध्य हिमालय में ढालों पर सीढ़ियाँ बनाकर कृषि करने से मृदा अपरदन नियंत्रित होता है। * **पट्टी कृषि (Strip Cropping):** बड़े खेतों को पट्टियों में बाँधकर फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं, जो पवन के बल को कमजोर करती हैं। * **रक्षक मेखला (Shelterbelts):** वृक्षों को कतारों में लगाकर रक्षक आवरण बनाना, जिससे शुष्क क्षेत्रों में रेत के टीलों का स्थिरीकरण होता है। * **वृक्षारोपण एवं अतिपशुचारण पर रोक:** अधिक से अधिक पेड़ लगाकर और पशुचारण को नियंत्रित करके मृदा आवरण को सुरक्षित रखा जा सकता है।
Q5. भारत में संसाधन नियोजन की प्रक्रिया को समझाइए। भारत जैसे देश के लिए संसाधन नियोजन क्यों आवश्यक है? 4 Marks
उत्तर (Answer): संसाधन नियोजन विवेकपूर्ण और न्यायसंगत तरीके से उपलब्ध प्राकृतिक और मानव संसाधनों का उपयोग करने की एक जटिल प्रक्रिया है। ### **भारत में संसाधन नियोजन की प्रक्रिया:** 1. **संसाधनों की पहचान और तालिका बनाना:** देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना। इसमें सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और संसाधनों का गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना तथा मापन शामिल है। 2. **नियोजन ढाँचा तैयार करना:** संसाधन विकास योजनाओं को लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना। 3. **राष्ट्रीय विकास योजनाओं से मिलान:** संसाधन विकास योजनाओं का राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ समन्वय और मिलान स्थापित करना। ### **भारत में संसाधन नियोजन की आवश्यकता:** * **संसाधनों का असमान वितरण:** भारत में संसाधनों की उपलब्धता में अत्यधिक विविधता है। उदाहरण के लिए, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार हैं, लेकिन बुनियादी ढाँचे की कमी है। अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं लेकिन विकास की कमी है। राजस्थान में सौर और पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं लेकिन जल संसाधनों की कमी है। * **अत्यधिक दोहन पर रोक:** संसाधनों के अविवेकपूर्ण उपयोग और अति-उपभोग के कारण गंभीर सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। * **सतत पोषणीय विकास:** संसाधन नियोजन यह सुनिश्चित करता है कि वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के लिए भी संसाधन सुरक्षित रहें। \nइसलिए, भारत के संतुलित और सतत विकास के लिए राष्ट्रीय, राज्य, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों पर संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक है।
Q6. भू-निम्नीकरण (भूमि का निम्नीकरण) क्या है? भारत में भू-निम्नीकरण के मुख्य मानव निर्मित और प्राकृतिक कारणों की व्याख्या कीजिए, तथा भू-निम्नीकरण की समस्या को हल करने के लिए पाँच प्रभावी उपाय सुझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भू-निम्नीकरण का अर्थ\nभू-निम्नीकरण से तात्पर्य समय के साथ मिट्टी या भूमि संसाधन की गुणवत्ता और उर्वरता में आने वाली गिरावट से है, जिससे भूमि कृषि और अन्य उत्पादक कार्यों के लिए अनुपयुक्त हो जाती है। यह प्राकृतिक कारकों और मानवीय गतिविधियों दोनों के कारण होता है। ### भारत में भू-निम्नीकरण के प्रमुख कारण * **वनोन्मूलन (वनों की कटाई):** कृषि, शहरीकरण और औद्योगीकरण के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से भूमि का वनस्पति आवरण हट जाता है, जिससे ऊपरी मिट्टी हवा और पानी द्वारा आसानी से बह जाती है। * **अतिपशुचारण:** गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से घास का आवरण समाप्त हो जाता है, जिससे मृदा अपरदन होता है। * **खनन कार्य:** खनन के बाद खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में खनन के कारण हुए वनोन्मूलन ने भूमि को भारी नुकसान पहुँचाया है। * **अत्यधिक सिंचाई:** पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अत्यधिक सिंचाई से जलक्रांतता (Waterlogging) की समस्या पैदा होती है, जिससे मृदा में लवणता और क्षारियता बढ़ जाती है। * **औद्योगिक अपशिष्ट:** बिना उपचारित किए उद्योगों द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट और रसायन मिट्टी को प्रदूषित करते हैं और उसे अनुपजाऊ बना देते हैं। ### भू-निम्नीकरण के समाधान के उपाय 1. **वनारोपण और चरागाहों का प्रबंधन:** बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने और चरागाहों के उचित प्रबंधन से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। 2. **रक्षक मेखला (Shelterbelts):** खेतों के किनारों पर कतारों में पेड़ लगाने से हवा की गति कम होती है, जिससे शुष्क क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव रुकता है। 3. **कांटेदार झाड़ियां लगाकर बालू के टीलों का स्थिरीकरण:** थार मरुस्थल जैसे क्षेत्रों में कांटेदार झाड़ियां लगाकर बालू के टीलों को बहने से रोका जा सकता है। 4. **औद्योगिक अपशिष्ट का सही उपचार:** औद्योगिक जल और कचरे को भूमि पर या नदियों में छोड़ने से पहले उनका उचित परिष्करण (उपचार) किया जाना चाहिए। 5. **खनन नियंत्रण:** खनन गतिविधियों को नियंत्रित करके और खनन के बाद भूमि का पुनर्निर्माण करके भू-निम्नीकरण को रोका जा सकता है।
Q7. स्वामित्व और विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों के वर्गीकरण की उपयुक्त उदाहरणों सहित व्याख्या कीजिए। 4 Marks
उत्तर (Answer): स्वामित्व और विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिसका विवरण नीचे दिया गया है: ### 1. स्वामित्व के आधार पर * **व्यक्तिगत संसाधन:** ये संसाधन निजी व्यक्तियों के स्वामित्व में होते हैं। किसानों के पास सरकार द्वारा आवंटित भूमि होती है जिसके बदले वे राजस्व चुकाते हैं। शहरों में लोगों के पास भूखंड, मकान और अन्य संपत्ति होती है। बाग, चरागाह, तालाब और कुओं का पानी व्यक्तिगत संसाधनों के उदाहरण हैं। * **सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन:** ये संसाधन समुदाय के सभी सदस्यों को सुलभ होते हैं। गांव की आम भूमि (चरागाह, श्मशान भूमि, तालाब) तथा नगरीय क्षेत्रों के सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल और खेल के मैदान वहां रहने वाले सभी लोगों के लिए उपलब्ध होते हैं। * **राष्ट्रीय संसाधन:** तकनीकी रूप से देश में पाए जाने वाले सभी संसाधन राष्ट्रीय हैं। सरकार को व्यक्तिगत संपत्ति को भी जनहित में अधिग्रहित करने का कानूनी अधिकार है। सड़कें, नहरें और रेलवे लाइनें अधिग्रहित भूमि पर बनाई जाती हैं। सभी खनिज, जल संसाधन, वन, वन्य जीवन और राजनीतिक सीमाओं के भीतर की भूमि तथा तट से 12 समुद्री मील (22.2 किमी) तक का समुद्री क्षेत्र राष्ट्रीय संपत्ति है। * **अंतर्राष्ट्रीय संसाधन:** इन संसाधनों का नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं करती हैं। तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी से परे खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का अधिकार नहीं है; इनका उपयोग अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति के बिना नहीं किया जा सकता। ### 2. विकास के स्तर के आधार पर * **संभावी संसाधन:** वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते हैं, परंतु इनका उपयोग नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए, भारत के पश्चिमी भागों (राजस्थान और गुजरात) में पवन और सौर ऊर्जा संसाधनों की अपार संभावना है, परंतु इनका सही ढंग से विकास नहीं हुआ है। * **विकसित संसाधन:** वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है। संसाधनों का विकास प्रौद्योगिकी और उनकी सम्भाव्यता के स्तर पर निर्भर करता है। * **भंडार:** पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में उसकी पहुंच से बाहर हैं, भंडार कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, जल दो गैसों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) का यौगिक है तथा यह ऊर्जा का मुख्य स्रोत बन सकता है, परंतु इसका उपयोग करने के लिए हमारे पास तकनीकी ज्ञान नहीं है। * **संचित कोष:** यह भंडार का ही एक हिस्सा है, जिन्हें उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परंतु इनका उपयोग अभी शुरू नहीं हुआ है। इनका उपयोग भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सकता है, जैसे नदियों के जल का उपयोग जल-विद्युत पैदा करने में किया जा सकता है।
Q8. भारत में **जलोढ़ मृदा** और **काली मृदा** की मुख्य विशेषताओं तथा उनके भौगोलिक वितरण का विस्तृत वर्णन कीजिए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### 1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) \nजलोढ़ मृदा भारत में सबसे विस्तृत रूप से फैली हुई और सर्वाधिक महत्वपूर्ण मृदा है। यह देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 40% भाग पर पाई जाती है। * **मुख्य विशेषताएँ:** * **निर्माण:** यह मृदा सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी तीन प्रमुख नदी प्रणालियों द्वारा लाए गए गाद/तलछट के निक्षेपण से बनी है। * **पोषक तत्व:** इसमें पोटाश, फास्फोरस और चूना प्रचुर मात्रा में होता है, जो गन्ना, धान, गेहूं और दलहनी फसलों की वृद्धि के लिए बहुत उपयुक्त है। इसमें नाइट्रोजन की कमी होती है। * **आयु के आधार पर वर्गीकरण:** * *बांगार:* पुरानी जलोढ़ मृदा, जिसमें 'कंकर' की मात्रा अधिक होती है और यह कम उर्वर होती है। * *खादर:* नई जलोढ़ मृदा, जिसके कण बारीक होते हैं और यह अधिक उपजाऊ होती है। * **उपजाऊपन:** अत्यधिक उपजाऊ होने के कारण इस मृदा वाले क्षेत्रों में गहन कृषि की जाती है और यहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक है। * **भौगोलिक वितरण:** * यह मुख्य रूप से उत्तरी भारत के मैदानों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम) में फैली है। * यह पूर्वी तटीय मैदानों विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा क्षेत्रों में भी पाई जाती है। --- ### 2. काली मृदा / रेगुर मृदा (Black Soil) \nकाली मृदा को **रेगुर मृदा** या **काली कपास मृदा** भी कहा जाता है, क्योंकि यह कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। * **मुख्य विशेषताएँ:** * **निर्माण:** इसका निर्माण लावा जनक शैलों (बेसाल्ट चट्टानों) के अपक्षय और जलवायु संबंधी परिस्थितियों के प्रभाव से हुआ है। * **नमी धारण क्षमता:** यह मृदा बहुत महीन अर्थात मृतिका (चिकनी मिट्टी) के कणों से बनी है, जिसके कारण इसमें नमी धारण करने की असाधारण क्षमता होती है। * **पोषक तत्व:** यह कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने जैसे तत्वों से समृद्ध होती है, परंतु इसमें फास्फोरस की मात्रा कम पाई जाती है। * **स्वतः जुताई की प्रकृति:** गर्म शुष्क मौसम में इस मिट्टी में गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे इसमें हवा का समिश्रण (वातित होना) आसानी से हो जाता है। गीली होने पर यह चिपचिपी हो जाती है, इसलिए पहली बारिश के तुरंत बाद इसकी जुताई आवश्यक होती है। * **भौगोलिक वितरण:** * यह दक्कन ट्रैप (बेसाल्ट) क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी भागों में पाई जाती है। * यह महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठारी क्षेत्रों तथा गोदावरी व कृष्णा नदियों की घाटियों तक फैली हुई है।
Q9. भू-निम्नीकरण (भूमि अवनयन) से आप क्या समझते हैं? भारत में भू-निम्नीकरण के प्रमुख मानवीय कारणों की व्याख्या कीजिए तथा भूमि संसाधनों के संरक्षण हेतु उपयुक्त उपाय सुझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### भू-निम्नीकरण (भूमि अवनयन) का अर्थ **भू-निम्नीकरण** से तात्पर्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं अथवा मानवीय गतिविधियों के कारण भूमि की गुणवत्ता, उर्वरता और उत्पादकता में कमी आने से है। इसके कारण भूमि कृषि एवं अन्य उत्पादक कार्यों के लिए अनुपयुक्त हो जाती है। --- ### भारत में भू-निम्नीकरण के प्रमुख मानवीय कारण 1. **वनोन्मूलन (वनों की कटाई):** कृषि, शहरीकरण और उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से मिट्टी का प्राकृतिक आवरण समाप्त हो जाता है, जिससे जल और वायु द्वारा तीव्र मृदा अपरदन होता है। 2. **अति पशुचारण:** गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से वनस्पति का आवरण नष्ट हो जाता है, जिससे भूमि निम्नीकृत हो जाती है। 3. **खनन कार्य:** खनन के बाद खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में खनन के कारण भूमि का भारी नुकसान हुआ है। 4. **अत्यधिक सिंचाई:** पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अत्यधिक सिंचाई से जलक्रांतता (Waterlogging) की समस्या पैदा होती है, जिससे मृदा में लवणीयता और क्षारीयता बढ़ जाती है। 5. **औद्योगिक अपशिष्ट:** बिना उपचारित किए गए औद्योगिक अपशिष्ट और रसायनों को भूमि पर छोड़ देने से मिट्टी प्रदूषित हो जाती है और जल के रिसाव की क्षमता घट जाती है। --- ### भूमि संरक्षण के प्रमुख उपाय * **वनरोपण:** बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करने से मिट्टी का कटाव रुकता है और भूमि की नमी बनी रहती है। * **चारागाहों का उचित प्रबंधन:** पशुचारण पर नियंत्रण लगाकर और समर्पित चारागाह विकसित करके वनस्पति आवरण को बचाया जा सकता है। * **रक्षक मेखला (Shelter Belts) बनाना:** खेतों के किनारों पर कतारबद्ध तरीके से पेड़ लगाने से हवा की गति कम होती है, जिससे शुष्क क्षेत्रों में मिट्टी का अपरदन रुकता है। * **कांटेदार झाड़ियाँ लगाकर रेत के टीलों का स्थिरीकरण:** मरुस्थलीय क्षेत्रों में कांटेदार झाड़ियाँ लगाकर रेत के टीलों को बहने से रोका जाता है। * **खनन गतिविधियों पर नियंत्रण:** खनन कार्यों पर उचित नियम लागू करना और खनन के बाद गड्ढों को भरकर भूमि का पुनरुद्धार करना। * **औद्योगिक अपशिष्टों का उपचार:** उद्योगों से निकलने वाले जल और कचरे को विसर्जित करने से पहले उनका उचित उपचार करना।
Q10. संसाधन किसे कहते हैं? **स्वामित्व** तथा **विकास के स्तर** के आधार पर संसाधनों के वर्गीकरण की उपयुक्त उदाहरणों सहित विस्तृत व्याख्या कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### संसाधन की परिभाषा\nहमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है, और जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, एक **संसाधन** कहलाती है। --- ### 1. स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण * **व्यक्तिगत संसाधन:** ये संसाधन निजी व्यक्तियों के स्वामित्व में होते हैं। * *उदाहरण:* किसानों की निजी भूमि, शहरों में मकान, बाग, चारागाह और निजी कुएँ। * **सामुदायिक स्वामित्व वाले संसाधन:** ये संसाधन समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध होते हैं। * *उदाहरण:* गाँव की चराई भूमि, श्मशान भूमि, सार्वजनिक तालाब, और शहरों के सार्वजनिक पार्क तथा खेल के मैदान। * **राष्ट्रीय संसाधन:** तकनीकी रूप से देश में मौजूद सभी संसाधन राष्ट्रीय संसाधन हैं। सरकार को व्यक्तिगत संपत्ति को भी जनहित में अधिग्रहित करने का कानूनी अधिकार है। * *उदाहरण:* देश की राजनीतिक सीमाओं के भीतर की सड़कें, रेलगाड़ियाँ, खनिज, वन, वन्य जीवन और समुद्री सीमा (तट से 12 समुद्री मील तक)। * **अंतर्राष्ट्रीय संसाधन:** इन संसाधनों का नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय सहमति के बिना कोई भी देश इनका उपयोग नहीं कर सकता। * *उदाहरण:* तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी (अनन्य आर्थिक क्षेत्र) से परे खुले महासागरीय संसाधन। --- ### 2. विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण * **संभावी संसाधन:** वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान होते हैं, परंतु इनका उपयोग सही ढंग से नहीं किया गया है। * *उदाहरण:* राजस्थान और गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ। * **विकसित संसाधन:** वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है। * *उदाहरण:* वर्तमान में उपयोग किए जा रहे कोयला और पेट्रोलियम के भंडार। * **भंडार:** पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में वे उसकी पहुँच से बाहर हैं। * *उदाहरण:* जल ($H_2O$) दो ज्वलनशील गैसों (हाइड्रोजन और ऑक्सीजन) का यौगिक है, जो ऊर्जा का मुख्य स्रोत बन सकता है, पर इसका उपयोग करने की तकनीक अभी विकसित नहीं है। * **संचित कोष:** यह 'भंडार' का ही एक हिस्सा है, जिन्हें उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परंतु इनका उपयोग अभी प्रारंभ नहीं हुआ है। इसका उपयोग भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सकता है। * *उदाहरण:* नदियों का जल, जिसका उपयोग जलविद्युत पैदा करने में सीमित रूप से हो रहा है।
Q11. भारत में संसाधन नियोजन की प्रक्रिया के तीन प्रमुख चरणों की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): संसाधन नियोजन संसाधनों के विवेकपूर्ण और सतत उपयोग के लिए बनाई गई एक महत्वपूर्ण तथा जटिल प्रक्रिया है। भारत में संसाधन नियोजन तीन मुख्य चरणों में संपन्न होता है: 1. **संसाधनों की पहचान और सूची बनाना:** इस प्रथम चरण के अंतर्गत देश के विभिन्न क्षेत्रों में संसाधनों का सर्वेक्षण, मानचित्रण करना, तथा उनका गुणात्मक और मात्रात्मक अनुमान लगाकर माप करना शामिल है। 2. **नियोजन ढाँचा तैयार करना:** संसाधन विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढाँचे से युक्त एक नियोजन संरचना तैयार की जाती है। 3. **राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ मिलान:** अंतिम चरण के अंतर्गत क्षेत्रीय संसाधन विकास योजनाओं का देश की संपूर्ण राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ समन्वय और मिलान किया जाता है। \nभारत में संसाधनों की उपलब्धता में अत्यधिक विविधता पाई जाती है, इसलिए संतुलित और न्यायसंगत विकास के लिए संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक है।
Q12. एजेंडा 21 क्या है? इसके मुख्य उद्देश्यों और स्थानीय सरकारों के लिए इसके महत्व का उल्लेख कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): एजेंडा 21 एक कार्यसूची है जिसे 1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन (UNCED) के तत्वावधान में राष्ट्राध्यक्षों द्वारा स्वीकृत किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य 21वीं सदी में वैश्विक सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development) प्राप्त करना है। \nएजेंडा 21 का मुख्य उद्देश्य समान हितों, पारस्परिक आवश्यकताओं एवं सम्मलित जिम्मेदारियों के अनुसार वैश्विक सहयोग के द्वारा पर्यावरणीय क्षति, गरीबी और रोगों से निपटना है। इसका सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि प्रत्येक स्थानीय सरकार को अपना स्वयं का स्थानीय एजेंडा 21 तैयार करना चाहिए ताकि स्थानीय स्तर की पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याओं का समुदाय की भागीदारी से समाधान निकाला जा सके।
Q13. पहाड़ी क्षेत्रों और शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्रों में अपनाई जाने वाली मृदा संरक्षण की विधियों की व्याख्या कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): मृदा अपरदन को रोकने और उसकी उर्वरता बनाए रखने के लिए मृदा संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग संरक्षण विधियों का उपयोग किया जाता है: 1. **पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में**: - **समुच्च रेखीय जुताई**: ढाल वाली भूमि पर समुच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाने से जल के बहाव की गति कम हो जाती है। - **सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि**: ढालों पर सीढ़ियां बनाकर खेती करने से मृदा अपरदन नियंत्रित होता है। पश्चिमी और मध्य हिमालय में यह विधि अत्यधिक प्रचलित है। 2. **शुष्क और मरुस्थलीय क्षेत्रों में**: - **रक्षक मेखला (शेल्टर बेल्ट)**: पेड़ों को कतारों में लगाकर पवन की गति को कम किया जाता है, जिससे रेत के टीलों के प्रसार को रोका जा सकता है। - **पट्टी कृषि**: फसलों के बीच में घास की पट्टियां उगाई जाती हैं जो हवा के वेग को तोड़ती हैं।
Q14. मृदा अपरदन किसे कहते हैं? भारत में मृदा अपरदन और भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी किन्हीं तीन मानवीय गतिविधियों का वर्णन कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): मृदा के कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। मृदा अपरदन प्राकृतिक कारकों के साथ-साथ मानवीय गतिविधियों के कारण भी होता है। भारत में भूमि निम्नीकरण और मृदा अपरदन के लिए निम्नलिखित मानवीय गतिविधियां मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं: 1. **वनोन्मूलन (वनों की कटाई)**: कृषि, शहरीकरण और उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से मृदा का प्राकृतिक आवरण हट जाता है, जिससे वह पवन और जल के प्रति असुरक्षित हो जाती है। 2. **अतिपशुचारण**: गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से वनस्पतियों का विनाश होता है और मिट्टी ढीली हो जाती है। 3. **खनन और उत्खनन**: खनन के बाद खदानों वाले स्थलों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। चूना पत्थर को पीसने जैसे सीमेंट उद्योग के कार्यों से धूल उड़ती है, जो भूमि में जल के अवशोषण को रोकती है।
Q15. निर्माण, विशेषताओं और फसल उपयुक्तता के आधार पर जलोढ़ मृदा और काली मृदा के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): जलोढ़ मृदा और काली मृदा के निर्माण, विशेषताओं और फसल उपयुक्तता में निम्नलिखित मुख्य अंतर हैं: 1. **जलोढ़ मृदा**: इस मृदा का निर्माण सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों द्वारा लाए गए गाद और निक्षेपों से होता है। यह अत्यंत उपजाऊ मृदा है, जिसमें पोटाश, फास्फोरस और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह गन्ना, चावल, गेहूं और दालों की खेती के लिए बहुत उपयुक्त है। यह उत्तरी मैदानों और तटीय डेल्टा क्षेत्रों में फैली है। 2. **काली मृदा**: इसे 'रेगुर मृदा' भी कहा जाता है। इसका निर्माण दक्कन ट्रैप क्षेत्र में बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय से हुआ है। यह मृदा महीन कणों (मृत्तिका) से बनी है और इसमें नमी धारण करने की अपार क्षमता होती है। शुष्क मौसम में इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे वायु मिश्रण होता है। यह कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।