Chapter Chai • Board Revision Guide
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जल संसाधन

Subject: सामाजिक विज्ञान | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (भूगोल)

#### अध्याय 3: जल संसाधन - त्वरित संशोधन नोट्स / फॉर्मूला शीट


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परिचय और मुख्य तथ्य (Introduction & Key Facts)

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महत्वपूर्ण परिभाषाएँ (Important Definitions)

1. जल दुर्लभता (Water Scarcity):

क्षेत्र में पानी की मांग की तुलना में जल की उपलब्धता में कमी होना जल दुर्लभता कहलाता है। यह अत्यधिक जनसंख्या, औद्योगिकीकरण और नगरीकरण के कारण होती है।

2. बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ (Multipurpose River Projects):

नदियों पर बड़े-बड़े बाँध बनाकर एक साथ कई उद्देश्यों (जैसे- सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, मत्स्य पालन, आंतरिक जल परिवहन) को पूरा करने वाली परियोजनाएँ।

3. वर्षा जल संग्रहण (Rainwater Harvesting):

वर्षा के जल को एकत्र करके भविष्य में उपयोग करने की प्रक्रिया। इसे भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने के लिए भी उपयोग किया जाता है।

4. टंका (Tanka):

राजस्थान (विशेषकर बीकानेर, बाड़मेर और फलोदी) के शुष्क क्षेत्रों में पीने का पानी जमा करने के लिए घरों में बनाए जाने वाले भूमिगत टैंक।


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मुख्य अवधारणाएँ और भारत में जल संसाधन (Key Concepts)


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पारंपरिक जल संग्रहण प्रणालियाँ (Traditional Rainwater Harvesting Systems)

भारत के विभिन्न राज्यों में जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके:

1. राजस्थान: भूमिगत टैंक (टंका), जोरे, और जोहड़।

2. पर्वतीय क्षेत्र: 'गुल' या 'कुल' (पश्चिमी हिमालय में कृषि के लिए जल वाहिकाएँ)।

3. पश्चिम बंगाल: बाढ़ के मैदानों में सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ।

4. मेघालय: बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली (Bamboo Drip Irrigation System) - इसके द्वारा नदियों और झरनों के पानी को बांस की बनी नलियों द्वारा पौधों तक पहुँचाया जाता है।


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जल संरक्षण के उपाय (Measures for Water Conservation)

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 जल संसाधन
Overview
जल की दुर्लभता और जल प्रबंधन की आवश्यकता जल दुर्लभता के कारण बढ़ती जनसंख्या अधिक जल की माँग बढ़ती कृषि और सिंचाई औद्योगीकरण और शहरीकरण जल का असमान वितरण जल की गुणवत्ता में गिरावट (प्रदूषण) जल संरक्षण और प्रबंधन बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ जल की बर्बादी रोकना वर्षा जल संग्रहण बहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ और समन्वय बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लाभ सिंचाई की सुविधा विद्युत उत्पादन बाढ़ नियंत्रण नौकायन और पर्यटन मत्स्य पालन बहुउद्देशीय परियोजनाओं की हानियाँ और विरोध प्राकृतिक जल प्रवाह का बाधित होना तलछट का जमाव और जलीय जीवों पर प्रभाव बड़े पैमाने पर विस्थापन बाढ़ के मैदान में तलछट की कमी जल बंटवारे को लेकर अंतर-राज्यीय विवाद नर्मदा बचाओ आंदोलन सरदार सरोवर बांध के विरोध में जन आंदोलन विस्थापितों के अधिकारों की लड़ाई वर्षा जल संग्रहण (वर्षा जल संचयन) वर्षा जल संग्रहण का अर्थ बारिश के पानी को एकत्रित करके संरक्षित करना पारंपरिक पद्धतियाँ (भारत के विभिन्न राज्य) टैंक और टाँका (राजस्थान) कुल या कूल (पर्वतीय क्षेत्र / हिमाचल प्रदेश) खादीन और जोहड़ (कृषि हेतु जल संचयन) छत वर्षा जल संग्रहण (Rooftop Rainwater Harvesting) - तमिलनाडु में अनिवार्य आधुनिक पद्धतियाँ चेक डैम (Check Dams) बनाना भूजल स्तर को पुनः भरना (Recharge Wells)
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं और उनके लाभों तथा हानियों की व्याख्या कीजिए। इन्हें 'आधुनिक भारत के मंदिर' क्यों कहा जाता है? विस्तार से चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं का परिचय\nबहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ ऐसी बड़ी परियोजनाएँ हैं जिनके तहत नदियों पर बाँध और जलाशय बनाए जाते हैं ताकि एक साथ कई उद्देश्यों को पूरा किया जा सके, जैसे सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए जलापूर्ति, आंतरिक नौकायन और मनोरंजन। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गर्व के साथ बाँधों को 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था क्योंकि इनसे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास के साथ-साथ तीव्र औद्योगीकरण और शहरी अर्थव्यवस्था को एकीकृत बल मिलता था। ### बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लाभ * **सिंचाई:** ये परियोजनाएँ कृषि भूमि के बड़े क्षेत्रों को बारहमासी जल आपूर्ति प्रदान करती हैं, जिससे खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलती है। * **जलविद्युत उत्पादन:** बाँध स्वच्छ और नवीकरणीय जलविद्युत उत्पन्न करते हैं, जो घरेलू उपयोग, कृषि पंप सेटों और उद्योगों के विस्तार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। * **बाढ़ नियंत्रण:** जलाशय भारी मानसून के दौरान अतिरिक्त वर्षा जल को संग्रहित करते हैं, जिससे नदी के बहाव को नियंत्रित किया जाता है और जान-माल को नुकसान पहुँचाने वाली विनाशकारी बाढ़ में भारी कमी आती है। * **जलापूर्ति:** ये तेजी से बढ़ते शहरी केंद्रों को पीने के पानी की विश्वसनीय आपूर्ति और विभिन्न उद्योगों को कच्चे पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। * **आंतरिक नौकायन और पर्यटन:** बड़े जलाशय अक्सर नौकायन योग्य जलमार्गों और लोकप्रिय मनोरंजन स्थलों के रूप में विकसित होते हैं, जिससे स्थानीय पर्यटन, मत्स्य पालन और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। ### बहुउद्देशीय परियोजनाओं की हानियाँ और आलोचनाएँ * **स्थानीय समुदायों का विस्थापन:** विशाल बाँधों के निर्माण से हजारों आदिवासियों, किसानों और स्थानीय ग्रामीणों को कई मामलों में बिना उचित पुनर्वास के उनकी पैतृक भूमि और आवासों से विस्थापित होना पड़ता है। * **पर्यावरणीय क्षरण:** नदियों के पानी को रोकने से उनका प्राकृतिक प्रवाह पैटर्न बदल जाता है, जिससे जलीय आवासों का गंभीर विखंडन होता है, मछलियों के प्रवास मार्ग अवरुद्ध होते हैं और वनों तथा उपजाऊ मिट्टी के विशाल क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं। * **भूकंपीय सक्रियता:** बड़े जलाशयों का पानी पृथ्वी की पपड़ी पर अत्यधिक दबाव डालता है, जिसके कारण स्थानीय स्तर पर भूकंप और भूकंपीय गतिविधियों के बढ़ने का खतरा रहता है। * **जलजनित रोग और लवणता:** खराब जल प्रबंधन के कारण अक्सर जलभराव, मृदा लवणता और सिंचाई नहरों के आसपास मलेरिया जैसे वेक्टर जनित रोगों का प्रसार होता है। * **अंतरराज्यीय जल विवाद:** पड़ोसी राज्यों के बीच नदी के पानी का बँटवारा अक्सर राजनीतिक तनाव, कानूनी लड़ाइयों और न्यायसंगत वितरण को लेकर अंतरराज्यीय विवादों को जन्म देता है।
Q2. भारत में जल की कमी के कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन और संरक्षण की तत्काल आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### जल की कमी का परिचय\nजल की कमी तब होती है जब पानी की मांग उपलब्ध नवीकरणीय आपूर्ति से अधिक हो जाती है या जब खराब गुणवत्ता इसके सुरक्षित उपयोग को प्रतिबंधित करती है। यद्यपि जल एक नवीकरणीय संसाधन है, फिर भी भौतिक कारकों, जनसंख्या विस्फोट, अति-दोहन और असमान वितरण के संयोजन के कारण भारत कई क्षेत्रों में गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। ### भारत में जल की कमी के कारण - **बढ़ती जनसंख्या:** तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने पीने और स्वच्छता की घरेलू मांग को बढ़ा दिया है, साथ ही लाखों लोगों को खिलाने के लिए कृषि उत्पादन आवश्यकताओं का भी विस्तार किया है, जिससे मीठे पानी के संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा है। - **कृषि का व्यवसायीकरण:** ट्यूबवेल और भूजल पंपिंग के माध्यम से जल-कमी वाले क्षेत्रों में पानी की अत्यधिक खपत वाली नकदी फसलों (जैसे धान और गन्ना) के विस्तार ने जल स्तर को भारी रूप से कम कर दिया है। - **औद्योगिकीकरण और शहरीकरण:** स्वतंत्रता के बाद के औद्योगिक विकास और बढ़ते शहरी फैलाव ने पानी की मांग को कई गुना बढ़ा दिया है। उद्योग भारी मात्रा में ताजा पानी की खपत करते हैं और जल निकायों में अनुपचारित अपशिष्ट छोड़ते हैं। - **जल प्रदूषण:** घरेलू सीवेज, औद्योगिक रसायन, उर्वरक और कीटनाशक नदियों, झीलों और भूजल जलाशयों को भारी रूप से दूषित करते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में पानी जहरीला हो जाता है और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है। - **असमान कालिक और स्थानिक वितरण:** भारत को वैश्विक वर्षा का 4% प्राप्त होता है, लेकिन वर्षा अत्यधिक विषम है। मानसून कुछ महीनों तक सीमित है, जिससे सूखे क्षेत्रों में तीव्र मौसूमी सूखे की स्थिति पैदा होती है। ### एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM) और संरक्षण की आवश्यकता - **पारिस्थितिक पतन को रोकना:** अनियंत्रित जल निकासी से आर्द्रभूमि, नदियाँ और जैव विविधता खतरे में पड़ जाती है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए रणनीतिक संरक्षण आवश्यक हो जाता है। - **खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना:** सुरक्षित पानी टिकाऊ फसल की पैदावार और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। जल जनित रोगों को रोकने के लिए सभी के लिए स्वच्छ पेयजल की पहुंच की आवश्यकता है। - **जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना:** जलवायु परिवर्तन के कारण अनिश्चित मानसून के लिए लचीले भंडारण, वाटरशेड विकास और कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाओं की आवश्यकता होती है। - **सामाजिक-आर्थिक संघर्षों को रोकना:** पानी की कमी अक्सर नदी जल साझा करने और ग्रामीण-शहरी जल संघर्षों को लेकर अंतर-राज्यीय विवादों को जन्म देती है, जिससे व्यवस्थित प्रबंधन अनिवार्य हो जाता है। ### निष्कर्ष\nजल ही जीवन है, और इसका विवेकपूर्ण प्रबंधन संधारणीय राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण है। सख्त प्रदूषण नियंत्रण कानूनों को लागू करना, ड्रिप सिंचाई जैसी जल-बचाव तकनीकों को बढ़ावा देना, और वर्षा जल संचयन के संबंध में जन जागरूकता को बढ़ावा देना भारत के हाइड्रोलॉजिकल भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में अनिवार्य कदम हैं।
Q3. विभिन्न क्षेत्रों के उपयुक्त उदाहरणों के साथ भारत में वर्षा जल संचयन की पारंपरिक विधियों की चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वर्षा जल संचयन का परिचय\nवर्षा जल संचयन विभिन्न घरेलू, कृषि और भूजल पुनर्भरण उद्देश्यों के लिए वर्षा जल को एकत्र करने, छानने, संग्रहित करने और उपयोग करने की एक लचीली और टिकाऊ तकनीक है। प्राचीन भारत में, लोगों को वर्षा regimes और मिट्टी की स्थिति की गहरी समझ थी, और उन्होंने अपने स्थानीय पारिस्थितिक संदर्भों और हाइड्रोलॉजिकल जरूरतों के अनुकूल वर्षा जल संचयन तकनीकों की एक विस्तृत श्रृंखला विकसित की थी। ### विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक विधियां - **राजस्थान में छत वर्षा जल संचयन:** बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, पारंपरिक रूप से लगभग सभी घरों में मुख्य घर या आंगन के अंदर भूमिगत टैंक या *टांका* बने होते थे। घरों की ढलान वाली छतों से जुड़े, वर्षा के पानी को नीचे की ओर चैनल किया जाता था, रेत या छलनी के माध्यम से फ़िल्टर किया जाता था, और सूखे गर्मियों के महीनों में पीने के लिए संग्रहित किया जाता था। - **पश्चिमी हिमालय के कुल और गुल:** जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, लोगों ने सीढ़ीदार ढलानों में स्थित कृषि क्षेत्रों में धाराओं से पानी ले जाने के लिए *गुल* या *कुल* के रूप में जानी जाने वाली मोड़ चैनल बनाए। इन सामाजिक-पारिस्थितिक प्रणालियों ने पहाड़ी सिंचाई का प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया। - **बंगाल की बाढ़ वाहिकाएं:** पश्चिम बंगाल के बाढ़-प्रवण मैदानों में, लोगों ने प्रमुख नदियों से बाढ़ के पानी को खींचकर अपने कृषि क्षेत्रों की सिंचाई के लिए बाढ़ वाहिकाएं विकसित कीं, और खेती के लिए अतिरिक्त नदी के डिस्चार्ज का सफलतापूर्वक उपयोग किया। - **शुष्क क्षेत्रों में जोहड़ और खादीन:** राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्रों को वर्षा-पोषित भंडारण संरचनाओं में परिवर्तित किया गया था। वर्षा जल का संचयन करने और भूजल जलभृतों को पुनर्भरित करने के लिए *जोहड़* (छोटे मिट्टी के चेक बांध) जैसी संरचनाएं बनाई गईं, जबकि जैसलमेर में *खादीन* को खेती से पहले पानी को खड़े होने और मिट्टी को संतृप्त करने की अनुमति देने के लिए डिज़ाइन किया गया था। - **बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली:** मेघालय में, एक उल्लेखनीय 200 साल पुरानी प्रणाली पौधे के स्थल पर बूंद-बूंद गुरुत्वाकर्षण प्रवाह का उपयोग करके सुपारी की फसलों की सिंचाई के लिए सैकड़ों मीटर तक पानी ले जाने के लिए बांस के पाइप का उपयोग करके धारा और झरने के पानी का दोहन करती है। ### निष्कर्ष\nपारंपरिक वर्षा जल संचयन प्रणालियाँ संधारणीय स्वदेशी ज्ञान का प्रतिनिधित्व करती हैं। घटते भूजल स्तर का मुकाबला करने, पीने के पानी की कमी को कम करने और भारत में विविध भौगोलिक क्षेत्रों में दीर्घकालिक जल सुरक्षा प्राप्त करने के लिए आज इन पर्यावरण-अनुकूल तरीकों को पुनर्जीवित करना आवश्यक है।
Q4. भारत में जल की कमी के प्राथमिक कारणों का परीक्षण कीजिए तथा जल संरक्षण और प्रबंधन की तात्कालिक आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### जल की कमी का परिचय\nजल की कमी को मानक जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जल संसाधनों की कमी के रूप में परिभाषित किया जाता है। हालांकि पानी पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा कवर करने वाला एक प्रचुर मात्रा में नवीकरणीय संसाधन है, लेकिन इसका केवल एक छोटा सा हिस्सा मीठे पानी के रूप में उपलब्ध है। भारत जैसे देश में, पर्याप्त मानसूनी वर्षा प्राप्त होने के बावजूद, कई क्षेत्रों में पानी की कमी एक खतरनाक वास्तविकता बनती जा रही है। ### भारत में जल की कमी के कारण - **बढ़ती जनसंख्या:** तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने घरेलू पानी की खपत की मांग को बढ़ा दिया है, जिससे सतह और भूजल दोनों संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। - **विस्तारित कृषि:** कृषि पानी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए, पानी की अधिक खपत वाली फसलों की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है, जिसके लिए नलकूपों के माध्यम से निरंतर सिंचाई और अत्यधिक भूजल पंपिंग की आवश्यकता होती है। - **औद्योगीकरण:** स्वतंत्रता के बाद के औद्योगिक विकास ने पानी की मांगों को कई गुना बढ़ा दिया है। उद्योग भारी मात्रा में ताजे पानी की खपत करते हैं और अक्सर बिना उपचारित किए अपशिष्ट पदार्थों को छोड़ देते हैं, जिससे मौजूदा जल निकाय दूषित हो जाते हैं। - **शहरीकरण:** तेजी से शहरीकरण ने उच्च जनसंख्या घनत्व वाले शहरी केंद्रों को जन्म दिया है। अत्यधिक शोषित नगर निगम जल प्रणालियों और पक्की शहरी सतहों ने वर्षा जल घुसपैठ को रोका है, जिससे भूजल स्तर नीचे चला गया है। - **असमान पहुँच और अति-दोहन:** खेतों और शहरी आवासीय क्षेत्रों में निजी नलकूपों ने भूजल की अत्यधिक पंपिंग को जन्म दिया है, जिससे कई राज्यों में जल स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर गया है। - **जल प्रदूषण:** घरेलू सीवेज, उर्वरकों और कीटनाशकों युक्त कृषि अपवाह, और औद्योगिक अपशिष्ट ने प्रमुख नदियों और झीलों को दूषित कर दिया है, जिससे बड़ी मात्रा में पानी उपयोग के अयोग्य हो गया है। ### जल संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता - **खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना:** विश्वसनीय कृषि सिंचाई और खाद्य उत्पादन को बनाए रखने के लिए सतत जल प्रबंधन महत्वपूर्ण है। - **स्वास्थ्य खतरों को रोकना:** स्वच्छ पानी की उपलब्धता से हैजा, टाइफाइड और पेचिश जैसे जल जनित रोग रुकते हैं, जिससे जन स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है। - **पारितंत्र की रक्षा करना:** पर्याप्त नदी के प्रवाह और आर्द्रभूमि स्वास्थ्य को बनाए रखना जलीय वनस्पतियों और जीवों को संरक्षित करता है और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखता है। - **जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करना:** अनिश्चित मानसून सूखे और शुष्क दौर से निपटने के लिए कुशल जल भंडारण और संरक्षण रणनीतियों की मांग करता है।
Q5. बड़े बांधों के एक टिकाऊ विकल्प के रूप में भारत के विभिन्न हिस्सों में अपनाई जाने वाली वर्षा जल संचयन की पारंपरिक पद्धतियों की चर्चा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वर्षा जल संचयन का परिचय\nवर्षा जल संचयन बड़े पैमाने पर बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं का एक व्यावहारिक, किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है। प्राचीन भारत में, लोगों को स्थानीय जल विज्ञान regimes और वर्षा पैटर्न का गहरा ज्ञान था। उन्होंने वर्षा जल संचयन तकनीकों की एक विस्तृत श्रृंखला विकसित की जो उनके विशिष्ट क्षेत्रों की पारिस्थितिक स्थितियों और जल आवश्यकताओं के अनुकूल थीं। ### पूरे भारत में पारंपरिक पद्धतियाँ - **रूफटॉप वर्षा जल संचयन:** शिलोंग और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में आमतौर पर अभ्यास किया जाता है, ढलान वाली छतों से वर्षा जल को पाइपों के माध्यम से एकत्र किया जाता है, फ़िल्टर किया जाता है, और पीने के उद्देश्यों के लिए भूमिगत टैंकों (टांकों या कुंडों) में संग्रहीत किया जाता है। - **राजस्थान में टांके:** बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों में, पारंपरिक रूप से लगभग सभी घरों में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टांके बनाए जाते थे। ये अच्छी तरह से विकसित रूफटॉप वर्षा जल संचयन प्रणाली का हिस्सा थे। - **कुल और गुल (पश्चिमी हिमालय):** पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, लोग कृषि के लिए पश्चिमी हिमालय में कुल या गुल नामक मोड़ चैनल बनाते हैं। ये चैनल धाराओं से पानी को खेतों तक ले जाते हैं। - **खादीन और जोहड़:** पश्चिमी राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में, कृषि क्षेत्रों को वर्षा-पोषित भंडारण संरचनाओं में बदल दिया गया था। जोहड़ जैसी संरचनाएं मिट्टी के चेक डैम हैं जो वर्षा जल को पकड़ने और भूजल ताल को पुनर्जीवित करने के लिए जमीन में रिसने के लिए बनाए जाते हैं। - **बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली:** मेघालय में प्रचलित, यह धारा और झरने के पानी को बांस के पाइपों का उपयोग करके सैकड़ों मीटर तक पहुँचाने की एक उल्लेखनीय 200 साल पुरानी प्रणाली है ताकि पौधे के स्थल पर पान की फसलों की सिंचाई बूंद-बूंद दक्षता के साथ की जा सके। - **बाढ़ चैनल:** बंगाल के बाढ़ के मैदानों में, लोगों ने मौसमी बाढ़ के दौरान अपने खेतों की सिंचाई के लिए बाढ़ चैनल विकसित किए। ### आधुनिक प्रासंगिकता और निष्कर्ष\nआज, पारंपरिक वर्षा जल संचयन विधियों को नए सिरे से महत्व मिला है। घटते भूजल स्तर और अनिश्चित मानसून के साथ, इन कम लागत वाली स्वदेशी तकनीकों को अपनाना भूजल को रिचार्ज करने, घरेलू जल सुरक्षा सुनिश्चित करने और पारिस्थितिक तबाही के बिना शहरी बाढ़ को रोकने में मदद करता है।
Q6. भारत में जल संकट के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा जल संरक्षण और प्रबंधन की तत्काल आवश्यकता की परीक्षा कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### जल संकट का परिचय\nजल संकट को क्षेत्रीय मांगों को पूरा करने के लिए पानी की कमी या पर्याप्त उपलब्ध जल संसाधनों की कमी के रूप में परिभाषित किया जाता है। हालांकि पानी एक प्रचुर मात्रा में नवीकरणीय संसाधन है जो पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा कवर करता है, लेकिन इसका केवल एक अंश ही मीठे पानी के रूप में उपलब्ध है। भारत को मानसून के माध्यम से भारी मात्रा में वर्षा प्राप्त होती है, फिर भी कई क्षेत्रों में गंभीर जल संकट देखा जाता है। ### भारत में जल संकट के प्रमुख कारण - **बढ़ती जनसंख्या:** तेजी से बढ़ती जनसंख्या पीने, स्वच्छता और स्वास्थ्य के लिए घरेलू मांग को बढ़ाती है, जिससे मौजूदा मीठे पानी की आपूर्ति पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। - **विस्तारित कृषि:** कृषि पानी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। बढ़ती आबादी को भोजन खिलाने के लिए, पानी की अधिक खपत वाली फसलों (जैसे चावल और गन्ना) की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है, जो अक्सर बाढ़ सिंचाई जैसी अकुशल सिंचाई तकनीकों का उपयोग करती हैं, जिससे गंभीर भूजल की कमी होती है। - **औद्योगीकरण और शहरीकरण:** स्वतंत्रता के बाद के औद्योगीकरण और शहरीकरण ने उद्योगों और शहरी केंद्रों की संख्या में घातीय वृद्धि की है। उद्योगों को शीतलन और प्रसंस्करण के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जबकि शहरी जीवन शैली प्रति व्यक्ति की खपत को बढ़ाती है। - **भूजल का अति-शोषण:** भूजल निकालने के लिए ट्यूबवेल और बोरवेल अंधाधुंध खोदे गए हैं, जिससे कई कृषि और शहरी जेबों में जल स्तर में भारी गिरावट आई है। - **जल प्रदूषण:** घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि रसायन (उर्वरक और कीटनाशक) बिना उपचारित किए नदियों और जल निकायों में छोड़े जाते हैं, जिससे मीठे पानी के बड़े हिस्से जहरीले और अनुपयोगी हो जाते हैं। ### जल संरक्षण और प्रबंधन की तत्काल आवश्यकता - **खाद्य सुरक्षा की सुरक्षा:** सतत कृषि उत्पादन और लाखों लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुशल जल प्रबंधन महत्वपूर्ण है। - **स्वास्थ्य खतरों को रोकना:** दूषित पानी से हैजा, टाइफाइड और पेचिश जैसी पानी से होने वाली बीमारियां होती हैं; साफ पानी का संरक्षण सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है। - **पारितंत्र का रखरखाव:** जलीय वनस्पतियों और जीवों को संरक्षित करने और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए नदियों और आर्द्रभूमि में पर्याप्त जल प्रवाह आवश्यक है। - **सामाजिक संकटों को रोकना:** कमी अक्सर सामाजिक संघर्षों, राजनीतिक तनाव और आर्थिक कठिनाइयों को जन्म देती है, जिन्हें उचित प्रबंधन द्वारा कम किया जा सकता है। ### निष्कर्ष\nजल संरक्षण और प्रबंधन केवल पर्यावरणीय चिंताएं नहीं बल्कि जीवन का प्रश्न हैं। एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (IWRM), कुशल सिंचाई, प्रदूषण नियंत्रण और सामुदायिक भागीदारी भारत के हाइड्रोलॉजिकल भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अनिवार्य हैं।
Q7. मेगा-बांधों के एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनाई जाने वाली वर्षा जल संचयन की विभिन्न पारंपरिक पद्धतियों की विवेचना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### वर्षा जल संचयन का परिचय\nवर्षा जल संचयन मेगा-बांधों का एक व्यावहारिक, किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प है। प्राचीन भारत में, लोगों को वर्षा के तरीकों और मिट्टी के प्रकारों का गहन ज्ञान था, जिन्होंने स्थानीय पारिस्थितिक परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाकर भूजल, वर्षा जल और नदी के पानी को पकड़ने के लिए व्यापक वर्षा जल संचयन तकनीकें विकसित की थीं। ### विभिन्न क्षेत्रों में पारंपरिक पद्धतियां - **रूफटॉप वर्षा जल संचयन (राजस्थान):** बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, पारंपरिक रूप से लगभग सभी घरों में पीने का पानी संग्रहीत करने के लिए 'टांका' नामक भूमिगत टैंक होते थे। छतों से वर्षा जल को पाइप के माध्यम से इन भूमिगत टैंकों में निर्देशित किया जाता था, जो चिलचिलाती गर्मियों के दौरान पीने के पानी का एक विश्वसनीय स्रोत प्रदान करते थे। - **कुल और गुल (पश्चिमी हिमालय):** पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, लोगों ने सिंचाई के लिए कृषि खेतों तक पश्चिमी हिमालय में 'गुल' या 'कुल' नामक डायवर्जन चैनल बनाए। इन स्वदेशी चैनलों ने कुशलतापूर्वक पहाड़ी धारा के पानी को सीढ़ीदार खेतों तक मोड़ा। - **बाढ़ के मैदानों में जल चैनल (बंगाल):** बंगाल के बाढ़ के मैदानों में, लोगों ने वर्षा ऋतु के दौरान प्रमुख नदियों के अतिप्रवाह पानी को चैनल करके अपने खेतों की सिंचाई के लिए बाढ़ चैनल विकसित किए। - **खादिन और जोहड़ (शुष्क राजस्थान):** शुष्क क्षेत्रों में, कृषि खेतों को वर्षा आधारित भंडारण संरचनाओं में परिवर्तित किया गया था। फसल बोने से पहले मिट्टी को नम करते हुए, खेतों में वर्षा जल एकत्र होने दिया जाता था। इन संरचनाओं को जैसलमेर में स्थानीय रूप से 'खादिन' और राजस्थान के अन्य हिस्सों में 'जोहड़' के रूप में जाना जाता है। - **बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली (मेघालय):** मेघालय में, बांस के पाइपों का उपयोग करके धारा और झरने के पानी का दोहन करने के लिए 200 साल पुरानी प्रणाली का उपयोग किया जाता है। बांस के चैनलों के माध्यम से गुरुत्वाकर्षण का उपयोग करके उच्च पहुंच से पौधे के स्थल तक पानी पहुंचाया जाता है, जहां प्रवाह को एक टपकाव तक नियंत्रित किया जाता है। ### पारंपरिक पद्धतियों का महत्व\nपारंपरिक वर्षा जल संचयन प्रणालियां विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन को बढ़ावा देती हैं। वे स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाती हैं, अत्यधिक भूजल की कमी को रोकती हैं, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखती हैं, और बड़े बांधों से जुड़े बड़े पैमाने पर विस्थापन या पर्यावरणीय विनाश के बिना स्थायी पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करती हैं। ### निष्कर्ष\nआधुनिक भारत में जल सुरक्षा प्राप्त करने, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मुकाबला करने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए इन प्राचीन, समय-परीक्षणित वर्षा जल संचयन विधियों को पुनर्जीवित करना महत्वपूर्ण है।
Q8. भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अपनाई जाने वाली वर्षा जल संचयन की पारंपरिक पद्धतियों का उपयुक्त उदाहरणों के साथ परीक्षण कीजिए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### पारंपरिक जल संचयन का परिचय\nप्राचीन भारत में, लोगों को स्थानीय जलविज्ञान संबंधी स्थितियों और मौसमी वर्षा के पैटर्न की गहरी समझ थी। उन्होंने परिष्कृत और सरल पारंपरिक वर्षा जल संचयन प्रणालियाँ विकसित कीं जो उनके विशिष्ट पारिस्थितिक क्षेत्रों और पानी की जरूरतों के अनुकूल थीं। इन पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों ने न केवल घरेलू और कृषि आवश्यकताओं को पूरा किया बल्कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना भूजल स्तर को पुनर्जीवित करने में भी मदद की। ### भारत में प्रमुख पारंपरिक वर्षा जल संचयन पद्धतियाँ - **राजस्थान में टांका:** बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों में, लगभग सभी घरों में पारंपरिक रूप से पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक या *टांका* होते थे। इन्हें मुख्य घर या आंगन के अंदर बनाया जाता था, जो पाइप के माध्यम से ढलान वाली छतों से जुड़े होते थे, जहाँ वर्षा का पानी एकत्र और संग्रहित किया जाता था। - **खादीन और जोहड़:** पश्चिमी राजस्थान के शुष्क भागों में, कृषि क्षेत्रों को वर्षा-पोषित भंडारण संरचनाओं में परिवर्तित किया जाता था जिन्हें *खादीन* कहा जाता था। हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में, वर्षा के पानी को पकड़ने और संरक्षित करने के लिए छोटे मिट्टी के चेक बांध बनाए जाते थे जिन्हें *जोहड़* कहा जाता था, जिससे मिट्टी की नमी बढ़ती थी और भूजल का पुनर्भरण होता था। - **बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली:** मेघालय में, एक उल्लेखनीय 200 साल पुरानी प्रणाली प्रचलित है, जिसमें सैकड़ों मीटर दूर स्थित पौधों की जड़ों तक झरने के पानी को पहुँचाने के लिए बांस के पाइपों का उपयोग किया जाता है। पानी गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से बहता है, और यह प्रणाली फसलों को बूंद-बूंद करके सही मात्रा में पानी पहुँचाती है। - **पश्चिम बंगाल में बाढ़ चैनल:** पश्चिम बंगाल के बाढ़-प्रवण मैदानों में, लोगों ने फसलों की सिंचाई करने और उपजाऊ गाद जमा करने के लिए नदियों के बाढ़ के पानी को अपने कृषि खेतों में मोड़ने के लिए बाढ़ चैनल विकसित किए। - **पश्चिमी हिमालय में गुल और कुल:** जम्मू और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में, लोगों ने सिंचाई के उद्देश्यों के लिए धाराओं से कृषि खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए *गुल* या *कुल* नामक डायवर्जन चैनल बनाए। ### आधुनिक समय में महत्व\nआज, गंभीर जल की कमी से पार पाने के लिए इन पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों में से कई को पुनर्जीवित किया जा रहा है और आधुनिक तकनीकों के साथ एकीकृत किया जा रहा है, जो यह साबित करता है कि स्वदेशी ज्ञान सतत जल प्रबंधन के लिए अत्यधिक प्रासंगिक बना हुआ है।
Q9. बढ़ती जल की कमी के मद्देनजर भारत में जल संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता तथा पद्धतियों की विवेचना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### जल संकट का परिचय\nजल संकट अत्यधिक दोहन, अत्यधिक उपयोग और विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पानी तक असमान पहुंच के कारण एक खतरनाक वैश्विक और राष्ट्रीय संकट है, जिसके साथ तेजी से जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण जुड़ा हुआ है। भारत में, प्रचुर मानसूनी वर्षा से संपन्न होने के बावजूद, खराब प्रबंधन के कारण गंभीर जल तनाव पैदा हो गया है, जिससे सतत विकास के लिए जल संरक्षण और प्रबंधन एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। ### जल संरक्षण की आवश्यकता - **बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करना:** पानी का संरक्षण सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, स्वास्थ्य और स्वच्छता की चुनौतियों का समाधान करता है। - **कृषि स्थिरता:** कृषि में मीठे पानी का सबसे बड़ा हिस्सा खपत होता है। बढ़ती आबादी के लिए फसल उत्पादन बनाए रखने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुशल जल प्रबंधन महत्वपूर्ण है। - **पर्यावरण क्षरण को रोकना:** भूजल का अत्यधिक निष्कर्षण जल स्तर की कमी, नदियों के सूखने और जलीय पारिस्थितिक तंत्र के ह्रास की ओर ले जाता है। - **जलवायु परिवर्तन से निपटना:** अनिश्चित मानसूनी पैटर्न और लंबे समय तक सूखे से जलवायु अनिश्चितताओं के खिलाफ लचीलापन बनाने के लिए मजबूत संरक्षण रणनीतियों की आवश्यकता होती है। ### जल संरक्षण और प्रबंधन की पद्धतियाँ - **वर्षा जल संचयन:** यह भविष्य के उपयोग के लिए छतों या सतही अपवाह से वर्षा जल एकत्र करने और संग्रहीत करने की एक टिकाऊ तकनीक है। यह भूजल जलभृतों को पुनर्भरण करने में मदद करता है और शहरी जल की कमी को कम करता है। - **जलविभाजन प्रबंधन:** इसमें भूजल भंडारण को बढ़ाने और मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए छोटे चेक बांध, समोच्च बंड और रिसने वाले टैंकों का निर्माण करके भूमि और जल दोनों संसाधनों का प्रबंधन और संरक्षण शामिल है। - **आधुनिक सिंचाई तकनीक:** टपक सिंचाई और फव्वारा प्रणालियों को अपनाना पौधों की जड़ों तक लक्षित वितरण के माध्यम से कृषि में पानी की बर्बादी को कम करता है। - **पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग:** उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग औद्योगिक उद्देश्यों, शहरी भूदृश्य और बागवानी के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सकता है, जिससे ताजे पानी का निष्कर्षण कम हो जाता है। - **सामुदायिक सहभागिता:** जलविभाजन प्रबंधन और पारंपरिक जल संचयन प्रणालियों (जैसे जोहड़, खादीन और टांका) में स्थानीय समुदायों को शामिल करना दीर्घकालिक रखरखाव और न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करता है।
Q10. बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं को समझाइए तथा जल संसाधन भूगोल के अंतर्गत चर्चा किए गए उनके लाभों और हानियों की विवेचना कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं का परिचय\nबहुउद्देशीय नदी परियोजनाएँ नदियों पर बनाई जाने वाली बड़ी इंजीनियरिंग संरचनाएँ हैं जो एक साथ कई उद्देश्यों को पूरा करती हैं, जैसे कि सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, घरेलू और औद्योगिक उपयोग के लिए जल आपूर्ति, अंतर्देशीय नौवहन और मनोरंजन। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गर्व से बांधों को 'आधुनिक भारत के मंदिर' घोषित किया था क्योंकि वे कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास को तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरी अर्थव्यवस्था के विकास के साथ एकीकृत करते हैं। ### बहुउद्देशीय परियोजनाओं के लाभ - **सिंचाई:** ये सिंचाई के लिए पानी का बारहमासी स्रोत प्रदान करते हैं, विशेष रूप से शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, जिससे कृषि उत्पादता में काफी वृद्धि होती है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है। - **जलविद्युत उत्पादन:** बांध स्वच्छ, नवीकरणीय और सस्ती जलविद्युत उत्पन्न करने के लिए बहते पानी की गतिज ऊर्जा का उपयोग करते हैं, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है। - **बाढ़ नियंत्रण:** नदियों के प्रवाह को विनियमित करके, ये परियोजनाएं बाढ़ के विनाशकारी प्रभाव को कम करती हैं, मानव जीवन, पशुधन और बुनियादी ढांचे की रक्षा करती हैं। - **जल आपूर्ति:** वे तेजी से बढ़ते शहरी केंद्रों को पीने के पानी की एक विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं और विभिन्न उद्योगों की भारी मांगों को पूरा करते हैं। - **अंतर्देशीय नौवहन और पर्यटन:** बांधों द्वारा बनाए गए जलाशय अंतर्देशीय जल परिवहन को सुगम बनाते हैं और पर्यटन को बढ़ावा देते हैं, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। ### हानियाँ और नकारात्मक प्रभाव - **लोगों का विस्थापन:** बड़े बांधों के निर्माण से अक्सर स्थानीय समुदायों और स्वदेशी जनजातियों का उनके पारंपरिक आवासों और आजीविका से बड़े पैमाने पर विस्थापन होता है, अक्सर पर्याप्त पुनर्वास के बिना। - **पारिस्थितिक क्षति:** नदियों को बांधने से प्राकृतिक प्रवाह बदल जाता है, जिससे जलीय आवासों का गंभीर विखंडन होता है, प्रवासी मछलियों को ऊपर की ओर जाने से रोका जाता है, और वनों और उपजाऊ मिट्टी के विशाल क्षेत्रों का जलमग्न होना होता है। - **अवसादन:** जलाशयों में समय के साथ गाਦ जमा हो जाती है, जिससे बांध का जीवनकाल कम हो जाता है और नीचे की ओर के बाढ़ के मैदानों को पोषक तत्वों से भरपूर जलोढ़ मिट्टी से वंचित होना पड़ता है। - **जल जनित बीमारियाँ और संघर्ष:** रुके हुए जल निकाय वेक्टर जनित रोगों के प्रजनन स्थल बन सकते हैं। इसके अलावा, नदी के पानी और परियोजना के लाभों को साझा करने को लेकर अक्सर अंतर-राज्यीय जल विवाद उत्पन्न होते हैं।
Q11. 'पलाणी' या बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली की अवधारणा और जल प्रबंधन में इसके व्यावहारिक महत्व को समझाइए। 3 Marks
उत्तर (Answer): बांस ड्रिप सिंचाई प्रणाली पूर्वोत्तर राज्य मेघालय में व्यापक रूप से प्रचलित बांस के पाइपों का उपयोग करके धाराओं और झरनों के पानी को दोहन करने की एक शानदार स्वदेशी पद्धति है। इस प्रणाली में, बांस के पाइप सिस्टम में प्रवेश करने वाले 18 से 20 लीटर पानी को सैकड़ों मीटर तक पहुँचाया जाता है और अंत में पौधे के स्थल पर प्रति मिनट 20-80 बूंदों तक कम कर दिया जाता है। बांस के पाइपों की स्थिति बदलकर पानी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है। चूंकि चैनल पूरी तरह से बांस से बने होते हैं, जो स्थानीय रूप से प्रचुर मात्रा में होता है, इसलिए स्थापना की लागत बेहद कम होती है। यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि पानी पौधे की जड़ों तक बूंद-बूंद करके सीधे पहुंचे, जिससे वाष्पीकरण का नुकसान कम होता है और मृदा अपरदन रोकता है। यह पहाड़ी और असमतल इलाकों में स्थानीय कृषि जल प्रबंधन के लिए एक असाधारण, पर्यावरण के अनुकूल दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है।
Q12. प्राचीन भारत की पारंपरिक हाइड्रोलिक संरचनाओं की तुलना आधुनिक बांधों से कीजिए, उनके मूल अवधारणाओं और प्रासंगिकता को उजागर करते हुए। 3 Marks
उत्तर (Answer): प्राचीन काल से, भारत ने सिंचाई के लिए पत्थर के मलबे से बने बांध, जलाशय या झीलें, तटबंध और नहर प्रणालियों जैसी परिष्कृत हाइड्रोलिक संरचनाओं का निर्माण किया है। पुरातात्विक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड प्राचीन इलाहाबाद में गंगा के बाढ़ के पानी को चैनल करने वाली जल संचयन प्रणाली या 11वीं शताब्दी में निर्मित भोपाल झील जैसी रचनाओं को दर्शाते हैं। आधुनिक बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं के विपरीत, जो विशाल कंक्रीट संरचनाएं हैं जो पारिस्थितिक विखंडन, विस्थापन और अवसादन का कारण बनती हैं, पारंपरिक हाइड्रोलिक संरचनाएं आम तौर पर छोटी, विकेंद्रीकृत और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और मौसमी वर्षा पैटर्न के अनुकूल थीं। जबकि आधुनिक बांधों का उद्देश्य बड़े पैमाने पर व्यावसायिक बिजली उत्पादन और भारी सिंचाई है, पारंपरिक तरीकों ने समुदाय की भागीदारी, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय कृषि आजीविका पर ध्यान केंद्रित किया।
Q13. आधुनिक भारत में औद्योगिकीकरण और शहरीकरण जल संकट में कैसे योगदान करते हैं? स्पष्ट तर्कों के साथ समझाइए। 3 Marks
उत्तर (Answer): स्वतंत्रता के बाद के भारत ने तीव्र औद्योगिकीकरण और शहरीकरण देखा है, इन दोनों ने जल संकट को अत्यधिक बढ़ा दिया है। उद्योगों के विस्तार के साथ, ताजे पानी की मांग कई गुना बढ़ गई है, क्योंकि उद्योग न केवल निर्माण प्रक्रियाओं के लिए भारी मात्रा में पानी की खपत करते हैं बल्कि अपने संचालन को चलाने के लिए जलविद्युत की भी आवश्यकता होती है। इसके अलावा, औद्योगिक अपशिष्टों को अक्सर बिना उपचारित किए नदियों, झीलों और भूजल स्रोतों में छोड़ दिया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप गंभीर जल प्रदूषण होता है। दूसरी ओर, तेजी से शहरीकरण के कारण घनी आबादी और आधुनिक जीवन शैली वाले शहरी केंद्रों का विकास हुआ है, जिससे घरेलू पानी की खपत में भारी वृद्धि हुई है। शहरी मांगों को पूरा करने के लिए भूजल के अत्यधिक निष्कर्षण ने जल स्तर को काफी कम कर दिया है, जबकि शहरी सतहों के कंक्रीटकरण से प्राकृतिक वर्षा का पानी रिसना बंद हो गया है।
Q14. राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों, विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में प्रचलित पारंपरिक छत वर्षा जल संचयन प्रणाली की कार्यप्रणाली को समझाइए। 3 Marks
उत्तर (Answer): राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों, विशेष रूप से बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में, लगभग सभी घरों में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए पारंपरिक रूप से भूमिगत टैंक या 'टांके' होते थे। ये टांके एक बड़े कमरे जितने बड़े हो सकते थे; फलोदी के एक घर में 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लंबा और 2.47 मीटर चौड़ा टांका था। टांके मुख्य घर या आंगन के अंदर बनाए जाते थे और एक पाइप के माध्यम से घरों की ढलान वाली छतों से जुड़े होते थे। छतों पर गिरने वाला बारिश का पानी पाइप से नीचे बहकर इन भूमिगत टांकों में जमा हो जाता था। बारिश की पहली बौछार को आमतौर पर एकत्र नहीं किया जाता था क्योंकि यह छतों और पाइपों को साफ करती थी। इन टांकों में जमा वर्षा का पानी पीने के पानी का एक अत्यंत विश्वसनीय स्रोत के रूप में कार्य करता है, जिसे अक्सर 'पालर पानी' कहा जाता है।
Q15. भारत में बड़े बांधों से जुड़े विभिन्न सामाजिक-पर्यावरणीय आंदोलनों की चर्चा कीजिए, जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन। 3 Marks
उत्तर (Answer): हाल के दशकों में, बड़े बांधों और बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं को तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा है, जिससे पूरे भारत में कई सामाजिक-पर्यावरणीय आंदोलनों को जन्म मिला है। इनमें सबसे प्रमुख नर्मदा बचाओ आंदोलन है, जो नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे सरदार सरोवर बांध परियोजना के विरोध में उभरा था। ये आंदोलन मुख्य रूप से स्थानीय समुदायों, विशेष रूप से आदिवासी आबादी के बड़े पैमाने पर विस्थापन, आजीविका के नुकसान, अपर्याप्त पुनर्वास पैकेजों और उपजाऊ कृषि भूमि तथा समृद्ध वनों के डूबने से संबंधित मुद्दों से प्रेरित हैं। पारिस्थितिक रूप से, आलोचकों का तर्क है कि बांध प्राकृतिक नदी के प्रवाह को बदलते हैं, जलीय पारिस्थितिक तंत्र को खंडित करते हैं, और भूकंपीय गतिविधियों को प्रेरित करते हैं। फलस्वरूप, ये आंदोलन विकास के पारंपरिक प्रतिमान को चुनौती देते हैं।