मुख्य सूत्र (Key Formulas)
कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान - अर्थशास्त्र
#### अध्याय: मुद्रा और साख (Money and Credit) - त्वरित रिवीजन नोट्स
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1. मुद्रा का परिचय (Introduction to Money)
- मुद्रा (Money): मुद्रा वह वस्तु है जो विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है। यह लेनदेन को आसान बनाती है।
- वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System): वह प्रणाली जहाँ वस्तुओं का आदान-प्रदान बिना मुद्रा के सीधे वस्तुओं से किया जाता है।
- आवश्यकताओं का दोहरा संयोग (Double Coincidence of Wants): वस्तु-विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी समस्या। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति बेचने की इच्छा रखता है, उसे वही चीज़ खरीदने वाले व्यक्ति की तलाश होनी चाहिए जो उसकी चीज़ में रुचि रखता हो।
- मुद्रा का आधुनिक रूप (Modern Forms of Money): इसमें करेंसी (कागज के नोट और सिक्के) शामिल हैं। इसे देश की सरकार (भारत में भारतीय रिजर्व बैंक - RBI) द्वारा अधिकृत किया जाता है।
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2. बैंकों में निक्षेप (Deposits with Banks)
- डिमांड डिपॉजिट (Demand Deposits / माँग जमा): लोग अपनी अतिरिक्त नकदी को बैंकों में जमा करते हैं। बैंक इस जमा पर ब्याज देते हैं। चूँकि इन जमाओं को माँग के अनुसार (चेक या नकद द्वारा) निकाला जा सकता है, इन्हें 'डिमांड डिपॉजिट' कहते हैं।
- चेक (Cheque): यह बैंक के नाम एक ऐसा कागज़ है जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का निर्देश देता है।
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3. बैंकों की ऋण गतिविधियाँ (Loan Activities of Banks)
- बैंकों की कार्यप्रणाली: बैंक अपनी जमा राशि का एक छोटा हिस्सा (भारत में लगभग 15%) अपने पास नकद के रूप में रखते हैं ताकि ग्राहकों की माँग को पूरा किया जा सके। शेष राशि से वे लोगों को ऋण (Loans) देते हैं।
- ब्याज दर (Interest Rate): बैंक ऋण पर जो ब्याज लेते हैं, वह ब्याज दर उस ब्याज से अधिक होती है जो वे जमाकर्ताओं को देते हैं। यही बैंक की आय का मुख्य स्रोत है।
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4. साख की शर्तें (Terms of Credit)
हर ऋण समझौते में निम्नलिखित शर्तें तय होती हैं:
1. संपार्श्विक (Collateral): यह एक ऐसी संपत्ति है जो उधारकर्ता के पास होती है (जैसे- भूमि, भवन, वाहन, पशु, बैंक जमा) और जिसे वह ऋण की गारंटी के रूप में lender (ऋणदाता) के पास गिरवी रखता है।
2. ब्याज दर (Interest Rate): ऋण चुकाते समय मूलधन के साथ अतिरिक्त राशि का भुगतान करना पड़ता है।
3. भुगतान के दस्तावेज़ (Documents Required): पहचान पत्र, आय प्रमाण, आदि।
4. भुगतान का तरीका (Mode of Repayment): ऋण चुकाने की अवधि और किश्तें।
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5. ऋण के स्रोत (Sources of Credit in India)
भारत में ऋण के स्रोतों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:
- औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector):
- स्रोत: बैंक और सहकारी समितियाँ (Cooperatives)।
- नियंत्रक: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा इनकी निगरानी की जाती है।
- विशेषताएँ: ब्याज दरें कम होती हैं, शोषण की संभावना कम होती है।
- अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector):
- स्रोत: साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार और दोस्त।
- नियंत्रक: कोई संगठन इनकी निगरानी नहीं करता।
- विशेषताएँ: ब्याज दरें बहुत अधिक होती हैं, जिससे उधारकर्ता ऋण जाल (Debt Trap) में फँस जाता है।
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6. ऋण जाल (Debt Trap)
- परिभाषा: जब ऋण की उच्च ब्याज दर के कारण चुकाने की क्षमता समाप्त हो जाती है और उधारकर्ता को पिछला कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेना पड़ता है, तब वह ऐसी स्थिति में फँस जाता है जहाँ से बाहर निकलना असंभव होता है। इसे ऋण जाल कहते हैं।
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7. स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups - SHGs)
- परिभाषा: ग्रामीण क्षेत्रों के गरीबों (विशेषकर महिलाओं) का एक छोटा समूह (आमतौर पर 15-20 सदस्य), जो नियमित रूप से बचत करता है।
- लाभ:
- सदस्यों को कम ब्याज पर बिना संपार्श्विक के ऋण मिल जाता है।
- यह ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है।
- बैंक ग्रामीण गरीबों को सीधे ऋण देने के लिए SHGs को प्रोत्साहित करते हैं।
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8. महत्वपूर्ण नियम व संस्थाएँ
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI):
- यह भारत का केंद्रीय बैंक है।
- यह भारत सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है।
- यह देश के सभी बैंकों की गतिविधियों पर नजर रखता है और सुनिश्चित करता है कि बैंक केवल बड़े व्यापारियों को ही नहीं, बल्कि छोटे किसानों और लघु उद्योगों को भी ऋण दें।
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 मुद्रा और साख
मुद्रा का अर्थ और भूमिका
विनिमय का माध्यम
वस्तु-विनिময় प्रणाली (कठिनाइयाँ)
मुद्रा के आने से आसानी
मुद्रा के आधुनिक रूप
करेंसी (नोट और सिक्के)
बैंक में निक्षेप (डिपाजिट)
बैंकों की गतिविधियाँ
जमा स्वीकार करना
ऋण देना (ब्याज पर)
आय का स्रोत (ऋण ब्याज और जमा ब्याज का अंतर)
ऋण की शर्तें
साख या ऋण का अर्थ
उधारकर्ता और ऋणदाता के बीच समझौता
ऋण की मुख्य शर्तें
ब्याज दर
संपार्श्विक (कोलेटरल) / गिरवी वस्तुएँ
आवश्यक कागजात
भुगतान के तरीके
भारत में ऋण के स्रोत (औपचारिक और अनौपचारिक)
औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector)
बैंक
सहकारी समितियाँ
रिजर्व बैंक की देखरेख
अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector)
साहूकार / व्यापारी
रिश्तेदार / दोस्त
उच्च ब्याज दर, शोषण की संभावना
औपचारिक और अनौपचारिक ऋण में अंतर
सस्ता बनाम महंगा ऋण
गरीबों पर प्रभाव
स्वयं सहायता समूह (SHGs - गरीबों के लिए)
संगठन का स्वरूप
15-20 ग्रामीण महिलाएं
नियमित बचत करना
लाभ
बैंक से ऋण प्राप्त करने में आसानी
स्वरोजगार के अवसर
सामाजिक सशक्तिकरण
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
उत्तर (Answer): ### साख के स्रोतों का परिचय\nसाख (ऋण) एक ऐसा समझौता है जिसके तहत ऋणदाता उधारकर्ता को भविष्य में भुगतान करने के वादे के बदले में धन, वस्तुएं या सेवाएं प्रदान करता है। भारत में साख के स्रोतों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: **औपचारिक स्रोत** और **अनौपचारिक स्रोत**।
### 1. साख के औपचारिक स्रोत
- **परिभाषा:** औपचारिक स्रोतों में बैंक और सहकारी समितियाँ शामिल हैं।
- **विनियमन:** भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) औपचारिक स्रोतों के कामकाज की देखरेख करता है। RBI यह निगरानी करता है कि बैंक न्यूनतम नकद शेष बनाए रखें और केवल लाभ कमाने वाले व्यवसायों को ही नहीं, बल्कि छोटे किसानों, लघु उद्योगों आदि को भी ऋण दें।
- **ब्याज दरें:** ये आमतौर पर अनौपचारिक ऋणदाताओं की तुलना में बहुत कम ब्याज दर वसूलते हैं।
### 2. साख के अनौपचारिक स्रोत
- **परिभाषा:** अनौपचारिक स्रोतों में साहूकार, व्यापारी, नियोक्ता, रिश्तेदार और मित्र शामिल हैं।
- **विनियमन:** अनौपचारिक क्षेत्र में ऋणदाताओं की साख गतिविधियों की निगरानी करने वाली कोई सरकारी संस्था नहीं होती है। वे अपनी इच्छा से किसी भी दर पर ऋण दे सकते हैं।
- **ब्याज दरें:** वे बहुत अधिक ब्याज दर वसूलते हैं, जिससे उधारकर्ता कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
### औपचारिक ऋण प्राप्त करने में गरीब परिवारों को आने वाली कठिनाइयाँ
- **संपार्श्विक (कोलैट्रल) की कमी:** संपार्श्विक वह संपत्ति है जो उधारकर्ता के पास होती है (जैसे जमीन, मकान, वाहन, मवेशी, बैंक जमा) और जिसे वह ऋण के भुगतान तक ऋणदाता के पास गारंटी के रूप में रखता है। गरीब परिवारों के पास अक्सर गिरवी रखने के लिए मूल्यवान संपत्तियां नहीं होती हैं।
- **दस्तावेजीकरण का अभाव:** औपचारिक संस्थानों को उचित दस्तावेजों, पहचान प्रमाण, पते के प्रमाण और आय प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है, जिन्हें निरक्षर या कम जानकारी वाले ग्रामीण गरीबों के लिए व्यवस्थित करना बेहद कठिन होता है।
- **ऋण की कठोर शर्तें:** ब्याज दर, संपार्श्विक, दस्तावेज की आवश्यकता और भुगतान का तरीका मिलकर ऋण की शर्तें बनाते हैं। गरीब लोग इन कठिन शर्तों को पूरा नहीं कर पाते हैं।
- **भौतिक पहुँच:** ग्रामीण इलाकों में स्थानीय साहूकारों की तुलना में बैंक अक्सर आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं, जिससे यात्रा और ऋण प्रक्रिया महंगी और समय लेने वाली हो जाती है।
### समस्याओं को दूर करने में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की भूमिका
- **संपार्श्विक की कमी को दूर करना:** SHG में 15-20 सदस्य होते हैं, आमतौर पर महिलाएं, जो अपनी बचत को एक साथ मिलाती हैं। एक विशिष्ट SHG नियमित रूप से मिलता है और अपनी क्षमता के अनुसार प्रति सदस्य 25 रुपये से 100 रुपये या उससे अधिक की छोटी बचत करता है। सदस्य बिना किसी संपार्श्विक के अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए समूह से ही छोटे ऋण ले सकते हैं।
- **कम ब्याज दरें:** समूह इन ऋणों पर ब्याज लेता है, लेकिन यह साहूकारों द्वारा वसूले जाने वाले ब्याज से बहुत कम होता है।
- **समय पर ऋण और आसान शर्तें:** चूंकि समूह ऋण वसूली के लिए जिम्मेदार होता है, इसलिए किसी भी सदस्य द्वारा ऋण न चुकाने को गंभीरता से लिया जाता है, जिससे उच्च पुनर्भुगतान दर सुनिश्चित होती है। इससे विश्वास पैदा होता है, और एक-दो साल के बाद, यदि बचत नियमित होती है, तो SHG बैंक से ऋण लेने के योग्य हो जाता है, जो समूह के नाम पर स्वीकृत किया जाता है।
- **महिलाओं का सशक्तिकरण:** यह महिलाओं को स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा आदि जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने और कार्रवाई करने के लिए एक मंच प्रदान करता है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनती हैं।
उत्तर (Answer): ### मुद्रा का परिचय\nमुद्रा वह है जिसे विनिमय के माध्यम, खाते की इकाई और स्थगित भुगतानों के मानक के रूप में सामान्य रूप से स्वीकार किया जाता है। दिन-प्रतिदिन के लेन-देन में, वस्तुओं को मुद्रा की सहायता से खरीदा और बेचा जाता है। मुद्रा के आने से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की बोझिल आवश्यकता को समाप्त करके आर्थिक लेन-देन को सरल बना दिया गया है।
### 1. वस्तु-विनिमय प्रणाली और इसकी सीमाएं
- **परिभाषा:** मुद्रा के आविष्कार से पहले, लोग वस्तु-विनिमय प्रणाली का अभ्यास करते थे, जहाँ बिना मुद्रा के उपयोग के वस्तुओं का सीधे वस्तुओं से आदान-प्रदान किया जाता था।
- **प्रमुख सीमा:** वस्तु-विनिमय प्रणाली की सबसे बड़ी कमी **'आवश्यकताओं का दोहरा संयोग'** थी - दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तुओं को बेचने और खरीदने के लिए सहमत होना पड़ता था। उदाहरण के लिए, यदि किसी जूता निर्माता को गेहूं चाहिए था, तो उसे एक ऐसे किसान को खोजना पड़ता था जिसे जूते चाहिए थे और जिसके पास अतिरिक्त गेहूं भी था। यह अत्यंत कठिन और समय लेने वाला था।
### 2. मुद्रा के शुरुआती रूपों का विकास
- वस्तु-विनिमय प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए, समाजों ने विनिमय के माध्यम के रूप में सामान्य मूल्य की वस्तुओं का उपयोग करना शुरू किया।
- **वस्तु मुद्रा:** प्रारंभिक सभ्यताओं में अनाज और मवेशियों का व्यापक उपयोग किया जाता था।
- **धात्विक मुद्रा:** धातुओं की खोज के साथ, सोने, चांदी और तांबे से बने सिक्के उनकी स्थायित्व और मानकीकृत मूल्य के कारण उपयोग में आए। इन्होंने सदियों से मुद्रा प्रणालियों का आधार बनाया।
### 3. मुद्रा के आधुनिक रूप
- **कागज के नोट और सिक्के:** आधुनिक मुद्रा में करेंसी नोट और सिक्के शामिल हैं। सोने या चांदी के सिक्कों के विपरीत, आधुनिक मुद्रा न तो कीमती धातु से बनी है और न ही इसका अपना कोई आंतरिक उपयोग है।
- **इसे क्यों स्वीकार किया जाता है:** आधुनिक मुद्रा को विनिमय के माध्यम के रूप में इसलिए स्वीकार किया जाता है क्योंकि यह मुद्रा **देश की सरकार द्वारा अधिकृत** होती है। भारत में, भारतीय रिजर्व बैंक केंद्र सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है।
- **कानूनी टेंडर (Legal Tender):** भारत में कोई भी व्यक्ति रुपये में किए गए भुगतान को कानूनी रूप से अस्वीकार नहीं कर सकता है। कानून रुपये के उपयोग को विनिमय के माध्यम के रूप में वैध बनाता है जिसे लेन-देन को निपटाने में अस्वीकार नहीं किया जा सकता है।
### 4. बैंकों में जमा राशि के रूप में मुद्रा
- मुद्रा का एक अन्य रूप जिसे लोग रखते हैं, वह बैंकों के पास जमा राशि है। लोग बैंक खातों में अतिरिक्त नकदी जमा करते हैं, जिसे मांग पर निकाला जा सकता है (मांग जमा)।
- **चेक और डिजिटल मुद्रा:** मांग जमा चेक और इलेक्ट्रॉनिक हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करती हैं। चूँकि नकदी को शारीरिक रूप से संभाले बिना भुगतानों के लिए चेक व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं, वे आधुनिक मुद्रा का एक अनिवार्य हिस्सा बनाते हैं।
उत्तर (Answer): ### स्वयं सहायता समूहों (SHG) का परिचय\nहाल के वर्षों में, विशेषकर महिलाओं के बीच, ग्रामीण साख और गरीबी की समस्या से निपटने के लिए स्वयं सहायता समूह (SHG) एक क्रांतिकारी साधन के रूप में उभरे हैं। SHG आमतौर पर गरीब लोगों, मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाओं का एक छोटा स्वैच्छिक संघ है, जो एक ही पड़ोस के हैं और समान आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हैं। वे नियमित रूप से थोड़ी मात्रा में पैसे बचाने और वित्तीय आवश्यकता के समय एक-दूसरे की मदद करने के लिए एक साथ आते हैं।
### SHG का कामकाज
- **गठन और बचत:** एक विशिष्ट SHG में 15 से 20 सदस्य होते हैं, आमतौर पर महिलाएं, जो नियमित रूप से मिलती हैं। प्रत्येक सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार 25 रुपये से 100 रुपये या उससे अधिक की छोटी राशि बचाता है।
- **आंतरिक ऋण देना:** समूह इन बचतों को एक साथ मिलाता है। सदस्य अपनी तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए इस समूहीकृत कोष से छोटे ऋण ले सकते हैं, जैसे कि बीज खरीदना, पुराने ऋण चुकाना, चिकित्सा आपात स्थिति, या सिलाई मशीन खरीदना।
- **ब्याज दरें:** समूह इन ऋणों पर मामूली ब्याज दर वसूलता है, जो साहूकारों द्वारा वसूले जाने वाले ब्याज से बहुत कम है। बचत और ऋण से संबंधित सभी निर्णय सदस्यों द्वारा सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
- **बैंक लिंकेज:** नियमित बचत और समय पर ऋण चुकाने के एक या दो साल बाद, SHG समूह के नाम पर व्यावसायिक बैंकों से ऋण लेने के योग्य हो जाता है। इस बैंक ऋण का उपयोग स्वरोजगार उद्यम शुरू करने या मौजूदा आजीविका का विस्तार करने के लिए किया जाता है।
### SHG का महत्व
- **संपार्श्विक समस्या से पार पाना:** बैंक ऋण प्राप्त करने में गरीबों के लिए सबसे बड़ी बाधा संपार्श्विक (गिरवी रखने की संपत्ति) की कमी है। बैंक समूह की सामूहिक गारंटी के आधार पर SHG को ऋण प्रदान करते हैं, जिससे व्यक्तिगत संपार्श्विक आवश्यकताओं को दरकिनार कर दिया जाता है।
- **ऋण जाल का उन्मूलन:** सस्ते आंतरिक और बैंक ऋण तक आसान पहुंच प्रदान करके, SHG ग्रामीण गरीबों को निर्मम साहूकारों के चंगुल से मुक्त कराते हैं और उन्हें अंतहीन ऋण जाल से बचाते हैं।
- **वित्तीय अनुशासन और समय पर चुकौती:** नियमित बैठकें, सामूहिक निर्णय लेना और सहकर्मी दबाव ऋण की उच्च चुकौती दर सुनिश्चित करते हैं, जिससे वित्तीय संस्थानों के बीच विश्वास बनता है।
- **महिला सशक्तिकरण:** SHG महिलाओं के लिए घरेलू हिंसा, स्वास्थ्य और पोषण जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने के मंच के रूप में कार्य करते हैं। यह उनका आत्मविश्वास बढ़ाता है, उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाता है और परिवार तथा समुदाय के निर्णय लेने में उन्हें आवाज देता है।
उत्तर (Answer): ### मुद्रा का परिचय\nमुद्रा वह वस्तु है जिसे विनिमय के माध्यम, हिसाब की इकाई, मूल्य के संचय और स्थगित भुगतान के मानक के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। मुद्रा के आने से पहले, लोग वस्तु-विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम) का उपयोग करते थे, जहाँ मुद्रा के उपयोग के बिना वस्तुओं का सीधे आदान-प्रदान किया जाता था।
### 1. आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समाप्ति
- **वस्तु-विनिमय प्रणाली की समस्या:** वस्तु-विनिमय प्रणाली में व्यापार के लिए 'आवश्यकताओं के दोहरे संयोग' की आवश्यकता होती थी—जो व्यक्ति बेचना चाहता है, वह ठीक वही होना चाहिए जो दूसरा व्यक्ति खरीदना चाहता है। यदि एक जूता निर्माता को गेहूं चाहिए, तो उसे एक ऐसे किसान को खोजना होगा जिसे जूते चाहिए और जिसके पास अतिरिक्त गेहूं भी हो।
- **मुद्रा की भूमिका:** मुद्रा विनिमय के एक मध्यवर्ती माध्यम के रूप में कार्य करती है, जो इस जटिल आवश्यकता को समाप्त करती है। जूता निर्माता केवल मुद्रा के लिए जूते बेच सकता है और फिर उस मुद्रा का उपयोग गेहूं खरीदने के लिए कर सकता है। इस प्रकार मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कार्य करती है जो आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की आवश्यकता को हटा देती है।
### 2. मुद्रा के आधुनिक रूप\nमुद्रा के आधुनिक रूपों में मुद्रा (कागजी नोट और सिक्के) और बैंकों के पास जमा राशि शामिल है।
- **करेंसी:** पहले मुद्रा के रूप में उपयोग की जाने वाली चीजों (जैसे अनाज और मवेशी) के विपरीत, आधुनिक मुद्रा सोने, चांदी या तांबे जैसी कीमती धातुओं से नहीं बनी है। कागजी नोटों और सिक्कों को विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि उन्हें देश की सरकार द्वारा अधिकृत किया जाता है।
- **बैंकों में जमा:** लोग बैंकों के पास जमा के रूप में भी पैसा रखते हैं। चूंकि लोगों को अपने दैनिक उपयोग के लिए केवल कुछ नकदी की आवश्यकता होती है, इसलिए वे अतिरिक्त नकदी अपने बैंक खातों में जमा करते हैं, जिसे मांग पर निकाला जा सकता है (मांग जमा)।
- **चेक:** मांग जमा चेक की सुविधा प्रदान करती है। चेक एक ऐसा कागज है जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से उस व्यक्ति को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का निर्देश देता है जिसके नाम पर चेक जारी किया गया है।
- **डिजिटल और प्लास्टिक मनी:** आज के युग में डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल माध्यम भी आधुनिक मुद्रा के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
### 3. अर्थव्यवस्था में मुद्रा की भूमिका
- **लेन-देन को सुगम बनाना:** यह बाजारों में खरीद और बिक्री को सुचारू और कुशल बनाता है।
- **मूल्य का मानक:** यह विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को समान रूप से मापने में मदद करता है।
- **मूल्य का संचय:** यह लोगों को भविष्य के उपयोग के लिए क्रय शक्ति को सुरक्षित रूप से बचाने की अनुमति देता है।
- **आर्थिक विकास:** बैंकों के माध्यम से ऋण सृजन और निवेश को आसान बनाकर, आधुनिक मुद्रा व्यापार विस्तार और समग्र आर्थिक विकास का समर्थन करती है।
उत्तर (Answer): ### स्व-सहायता समूह (SHGs) का परिचय\nस्व-सहायता समूह गरीब लोगों, मुख्य रूप से महिलाओं का एक छोटा नेटवर्क है, जो एक ही पड़ोस या गांव में रहते हैं और अपनी बचत को एक साथ जमा करते हैं। हाल के वर्षों में, SHGs ग्रामीण गरीबों को सूक्ष्म-वित्त प्रदान करने के एक अभिनव और प्रभावी तरीके के रूप में उभरे हैं, जिससे उन्हें संपार्श्विक (कोलेटरल) की कमी की समस्या को दूर करने में मदद मिलती है जो उन्हें बैंक ऋण प्राप्त करने से रोकती है।
### 1. SHGs के उद्देश्य
- **बचत का आधुनिकीकरण:** ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं को छोटे समूहों में संगठित करना और नियमित बचत को प्रोत्साहित करना।
- **वित्तीय समावेशन:** पारंपरिक भारी संपार्श्विक के बिना समय पर वित्तीय सहायता प्रदान करके स्वरोजगार के अवसर प्रदान करना।
- **सशक्तिकरण:** महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र और घरों व समाज में निर्णय लेने वाला बनाकर सामाजिक पूंजी का निर्माण करना और उनका सशक्तिकरण करना।
- **शोषक तत्वों से मुक्ति:** स्थानीय साहूकारों के चंगुल से गरीबों को बचाना।
### 2. SHGs की कार्यप्रणाली
- **संरचना:** एक विशिष्ट SHG में 15 से 20 सदस्य होते हैं, जो आमतौर पर एक ही पड़ोस के होते हैं, जो नियमित रूप से मिलते हैं और बचत करते हैं। लोगों की क्षमता के आधार पर प्रति सदस्य बचत 25 रुपये से 100 रुपये या उससे अधिक होती है।
- **आंतरिक ऋण देना:** समूह अपने सदस्यों को गिरवी रखी जमीन को छुड़ाने, बीज, उर्वरक खरीदने या चिकित्सा खर्चों को पूरा करने जैसी जरूरी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने स्वयं के बचत कोष से छोटे ऋण प्रदान करता है।
- **बैंक लिंकेज:** एक बार जब समूह एक या दो साल के लिए अपनी बचत में नियमित हो जाता है, तो वह बैंकों से ऋण लेने के योग्य हो जाता है। ऋण समूह के नाम पर स्वीकृत किया जाता है और स्वरोजगार के अवसर पैदा करता है।
### 3. SHGs का महत्व और लाभ
- **संपार्श्विक समस्या से मुक्ति:** सदस्य उचित ब्याज दरों पर बिना संपार्श्विक के ऋण प्राप्त कर सकते हैं।
- **समय पर ऋण:** स्थानीय साहूकारों की तुलना में विभिन्न उद्देश्यों के लिए और बहुत कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध होता है।
- **सामाजिक मंच:** SHGs महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, घरेलू हिंसा, दहेज और बाल विवाह जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने और कार्रवाई करने के लिए एक नियमित मंच के रूप में कार्य करते हैं।
- **नियमित पुनर्भुगतान:** साथियों के दबाव और समूह की जिम्मेदारी के कारण, SHGs में ऋण चुकौती की दर उल्लेखनीय रूप से उच्च है, जो बैंकों में आगे ऋण देने के लिए विश्वास पैदा करती है।
उत्तर (Answer): ### साख के स्रोतों का परिचय\nसाख (ऋण) से तात्पर्य उस समझौते से है जिसमें ऋणदाता उधारकर्ता को भविष्य में भुगतान के वादे के बदले धन, वस्तुएं या सेवाएं प्रदान करता है। भारत में साख के स्रोतों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: औपचारिक स्रोत और अनौपचारिक स्रोत।
### 1. साख के औपचारिक स्रोत
- **परिभाषा:** साख के औपचारिक स्रोतों में बैंक और सहकारी समितियां शामिल हैं।
- **निगरानी:** भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) औपचारिक स्रोतों के कामकाज की देखरेख करता है। RBI बैंकों पर नजर रखता है ताकि वे न्यूनतम नकद शेष बनाए रखें और यह सुनिश्चित करें कि वे केवल लाभ कमाने वाले व्यवसायों को ही नहीं बल्कि छोटे किसानों, लघु उद्योगों और उधारकर्ताओं को भी ऋण दें।
- **ब्याज दरें:** वे आम तौर पर अनौपचारिक स्रोतों की तुलना में कम ब्याज दर लेते हैं।
- **संपार्श्विक (कोलेटरल):** इसके लिए संपार्श्विक (ऋण के विरुद्ध सुरक्षा) और उचित दस्तावेजों की आवश्यकता होती है।
### 2. साख के अनौपचारिक स्रोत
- **परिभाषा:** अनौपचारिक स्रोतों में साहूकार, व्यापारी, नियोक्ता, रिश्तेदार और मित्र शामिल हैं।
- **निगरानी:** अनौपचारिक क्षेत्र में ऋणदाताओं की साख गतिविधियों की निगरानी करने वाली कोई संस्था नहीं है। वे अपनी पसंद की किसी भी दर पर ऋण दे सकते हैं।
- **ब्याज दरें:** वे बहुत अधिक ब्याज दरें वसूलते हैं, जिससे उधारकर्ता को कोई लाभ नहीं होता।
- **संपार्श्विक:** ऋण की शर्तें अक्सर लचीली होती हैं, और कभी-कभी औपचारिक संपार्श्विक के बिना भी ऋण दिए जाते हैं, लेकिन शोषण अधिक होता है।
### गरीबों को औपचारिक ऋण की अधिक आवश्यकता क्यों है
- **ऋण जाल:** अनौपचारिक ऋणदाता बहुत अधिक ब्याज दर वसूलते हैं, जिससे ऋण जाल (डेब्ट ट्रैप) की स्थिति पैदा हो जाती है। उधार लेने की उच्च लागत का मतलब है कि कमाई का एक बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में खर्च हो जाता है, जिससे आजीविका के लिए बहुत कम बचता है।
- **आय में वृद्धि:** औपचारिक स्रोतों से सस्ता और किफायती ऋण देश के विकास के लिए और गरीब परिवारों के लिए शोषण के डर के बिना छोटे व्यवसाय या खेती शुरू करके अपनी आय बढ़ाने में सक्षम बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
- **निर्भरता में कमी:** औपचारिक ऋण का विस्तार पारंपरिक साहूकार पर निर्भरता को कम करता है जो अक्सर समाज के कमजोर वर्गों का शोषण करते हैं।
उत्तर (Answer): ### 1. स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का परिचय\nस्वयं सहायता समूह गरीब लोगों, विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के छोटे, स्वैच्छिक संगठन होते हैं, जो अपनी बचत को एक साथ मिलाते हैं। इनका गठन औपचारिक ऋण संपार्श्विक की कमी की समस्या को दूर करने के लिए किया जाता है, जो आमतौर पर गरीब लोगों को बैंक ऋण प्राप्त करने से रोकता है।
### 2. संरचना और बचत तंत्र
* **आकार:** एक एसएचजी में आमतौर पर 15 से 20 सदस्य होते हैं, जो आमतौर पर एक ही पड़ोस या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित होते हैं।
* **नियमित बचत:** सदस्य नियमित रूप से मिलते हैं और अपनी बचत क्षमता के आधार पर प्रति व्यक्ति 25 रुपये से 100 रुपये या उससे अधिक की छोटी राशि बचाते हैं।
### 3. कामकाज और आंतरिक ऋण देना
* **सूक्ष्म ऋण:** सदस्य आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने, पुराने ऋण चुकाने, बीज खरीदने या छोटे व्यवसाय स्थापित करने के लिए सीधे समूह के संयुक्त बचत कोष से छोटे ऋण ले सकते हैं।
* **कम ब्याज दरें:** समूह इन ऋणों पर न्यूनतम ब्याज दर लेता है, जो अनौपचारिक साहूकारों द्वारा मांगे जाने वाले ब्याज से बहुत कम है।
* **संपार्श्विक के रूप में साथियों का दबाव:** चूंकि सदस्य एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए औपचारिक संपार्श्विक की आवश्यकता नहीं होती है। साथियों का दबाव और सामूहिक जिम्मेदारी ऋणों का समय पर पुनर्भुगतान सुनिश्चित करती है।
### 4. बैंक लिंकेज कार्यक्रम
* **सामूहिक शक्ति:** नियमित बचत और समय पर पुनर्भुगतान के एक या दो साल बाद, एसएचजी वाणिज्यिक बैंकों से ऋण लेने के योग्य हो जाता है।
* **ऋण स्वीकृति:** बैंक समूह के नाम पर एक ही ऋण स्वीकृत करता है, जिसे बाद में सिलाई मशीनें, मवेशी खरीदने या छोटी दुकानें खोलने जैसी विभिन्न आय-सृजन गतिविधियों के लिए सदस्यों के बीच वितरित किया जाता है।
### 5. महत्व और सामाजिक प्रभाव
* **सशक्तिकरण:** एसएचजी महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनने में मदद करते हैं।
* **सामाजिक मंच:** नियमित बैठकें महिलाओं को घरेलू हिंसा, दहेज, स्वास्थ्य और बाल शिक्षा जैसे विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर चर्चा करने और कार्रवाई करने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं।
* **गरीबी उन्मूलन:** वे स्वरोजगार के अवसर पैदा करके ग्रामीण गरीबी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उत्तर (Answer): ### 1. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का परिचय\nभारत में, भारतीय रिजर्व बैंक केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य करता है और मौद्रिक एवं बैंकिंग प्रणाली को विनियमित करने के लिए सर्वोच्च अधिकार रखता है। इसकी प्राथमिक जिम्मेदारियों में से एक ऋण के औपचारिक क्षेत्र की देखरेख करना है, जिसमें वाणिज्यिक बैंक और सहकारी समितियां शामिल हैं।
### 2. नकद शेष का रखरखाव
* **वैधानिक आवश्यकता:** आरबीआई यह सुनिश्चित करने के लिए बैंकों की निगरानी करता है कि वे वास्तव में अपने द्वारा प्राप्त जमा राशि में से न्यूनतम नकद शेष बनाए रखें।
* **उद्देश्य:** इससे यह सुनिश्चित होता है कि बैंकों के पास जमाकर्ताओं की दैनिक निकासी मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त तरलता है, जिससे बैंक भगदड़ और अचानक वित्तीय पतन को रोका जा सके।
### 3. ब्याज दरों और ऋण का विनियमन
* **सभी क्षेत्रों को ऋण:** आरबीआई यह सुनिश्चित करता है कि बैंक केवल लाभ कमाने वाले निगमों और अमीर व्यापारियों को ही ऋण न दें। यह अनिवार्य करता है कि ऋणों का एक निश्चित प्रतिशत (प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को ऋण) छोटे किसानों, लघु उद्योगों और गरीब उधारकर्ताओं को दिया जाना चाहिए।
* **निष्पक्ष ब्याज दरें:** बैंकों को आरबीआई को इस बारे में रिपोर्ट करना आवश्यक है कि वे कितना ऋण दे रहे हैं, किसे दे रहे हैं, और किस ब्याज दर पर दे रहे हैं। यह औपचारिक क्षेत्र के भीतर शोषणकारी ऋण प्रथाओं को रोकता है।
### 4. आवधिक रिपोर्टिंग और लेखा परीक्षा
* **विवरण प्रस्तुत करना:** वाणिज्यिक बैंकों को आरबीआई को आवधिक वित्तीय रिटर्न और बयान जमा करने होते हैं।
* **निरीक्षण:** केंद्रीय बैंक अनुपालन की जांच करने, भ्रष्टाचार को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए बैंक की किताबों का नियमित निरीक्षण और ऑडिट करता है कि बैंक जनता के पैसे के साथ अनुचित वित्तीय जोखिम नहीं उठा रहे हैं।
### 5. निष्कर्ष\nइन कड़े पर्यवेक्षी उपायों के माध्यम से, आरबीआई यह सुनिश्चित करता है कि औपचारिक ऋण प्रणाली पारदर्शी रूप से काम करे, आम जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करे, संतुलित आर्थिक विकास को बढ़ावा दे, और मनमाने वित्तीय प्रथाओं के कारण अर्थव्यवस्था को ढहने से रोके।
उत्तर (Answer): ### 1. ऋण की स्थितियों का परिचय\nऋण वह समझौता है जिसमें ऋणदाता उधारकर्ता को भविष्य में भुगतान के वादे के बदले धन, वस्तुएं या सेवाएं प्रदान करता है। जोखिम और आय सृजन के आधार पर, ऋण आर्थिक प्रगति ला सकता है या उधारकर्ता को गंभीर ऋण जाल में धकेल सकता है।
### 2. स्थिति 1: ऋण के साथ सफलता (सलीम का मामला)
* **परिदृश्य:** सलीम, एक जूता निर्माता, एक महीने के भीतर जूतों के 3,000 जोड़े का बड़ा ऑर्डर पूरा करने के लिए चमड़ा आपूर्तिकर्ता और बैंक से कार्यशील पूंजी ऋण प्राप्त करता है।
* **परिणाम:** सलीम समय पर जूते सफलतापूर्वक डिलीवर करता है, अच्छा मुनाफा कमाता है और उधार ली गई राशि को पूरी तरह चुका देता है।
* **Result:** यहाँ ऋण एक सकारात्मक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे उसकी आय बढ़ाने और व्यवसाय का विस्तार करने में मदद मिलती है।
### 3. स्थिति 2: ऋण जाल (स्वप्ना का मामला)
* **परिदृश्य:** स्वप्ना, एक छोटी किसान, अच्छी फसल की उम्मीद में अपनी जमीन पर मूंगफली उगाने के लिए एक साहूकार से ऋण लेती है। दुर्भाग्य से, कीट के हमले से उसकी फसल बर्बाद हो जाती है।
* **परिणाम:** वह साहूकार को चुका नहीं पाती है और उच्च ब्याज के कारण ऋण की राशि बढ़ जाती है (ऋण जाल)। अगले साल वह पुराना ऋण चुकाने के लिए नया ऋण लेती है, लेकिन फसल की फिर से विफलता उसकी स्थिति को और खराब कर देती है, जिससे उसे ऋण चुकाने के लिए अपनी जमीन का एक हिस्सा बेचना पड़ता है।
* **परिणाम:** ऋण उधारकर्ता को ऐसी स्थिति में धकेल देता है जिससे उबरना बहुत दर्दनाक और कठिन होता है।
### 4. औपचारिक और अनौपचारिक ऋण स्रोतों के बीच अंतर
* **औपचारिक स्रोत:** इनमें बैंक और सहकारी समितियां शामिल हैं। इन्हें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा विनियमित किया जाता है। वे कम ब्याज दरें लेते हैं, संपार्श्विक (कोललेटरल) की मांग करते हैं, और कमजोर उधारकर्ताओं का शोषण नहीं करते हैं।
* **अनौपचारिक स्रोत:** इनमें साहूकार, व्यापारी, नियोक्ता, रिश्तेदार और मित्र शामिल हैं। वे किसी भी प्राधिकरण द्वारा विनियमित नहीं होते हैं, बहुत अधिक ब्याज दरें लेते हैं, अक्सर ऋण जाल की ओर ले जाते हैं, और औपचारिक संपार्श्विक की आवश्यकता नहीं रखते हैं लेकिन व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग करते हैं।
उत्तर (Answer): स्वयं सहायता समूह (SHG) मुख्य रूप से गरीब ग्रामीण महिलाओं द्वारा अपने अल्प वित्तीय संसाधनों को एकत्रित करने और गरीबी तथा अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भरता को दूर करने के लिए बनाए गए छोटे, समुदाय-आधारित स्वैच्छिक संगठन हैं। विशिष्ट SHG में 15 से 20 सदस्य होते हैं, जो आमतौर पर एक ही पड़ोस के होते हैं, जो नियमित रूप से मिलते हैं और बचत करते हैं। SHG का मुख्य उद्देश्य वित्तीय बचत का एक आत्मनिर्भर समूह बनाना, सामूहिक शक्ति प्रदान करना और बिना किसी संपार्श्विक की आवश्यकता के आपातकालीन जरूरतों को पूरा करने, पुराने ऋणों को चुकाने, या सिलाई मशीनों, बीजों या मवेशियों जैसी उत्पादक संपत्ति खरीदने के लिए सदस्यों को छोटे ऋण सुलभ कराना है। समूह स्वयं बचत और ऋण नीतियों पर निर्णय लेता है, जिसमें ली जाने वाली ब्याज दरें भी शामिल हैं। इसके अलावा, नियमित समय पर बचत और सफल ऋण पुनर्भुगतान समूह को संपार्श्विक-मुक्त बैंक ऋण प्राप्त करने के योग्य बनाते हैं, जिनका उपयोग समूह-आधारित सूक्ष्म उद्यमों के लिए किया जाता है। इस प्रकार SHG महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाते हैं, नेतृत्व को बढ़ावा देते हैं, सामाजिक स्थिति में सुधार करते हैं, और आपसी वित्तीय सहायता का एक विश्वसनीय नेटवर्क बनाते हैं।
उत्तर (Answer): भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने और जमाकर्ताओं और उधारकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए देश में औपचारिक क्षेत्र के ऋण के कामकाज की देखरेख करने में सर्वोपरि भूमिका निभाता है। सबसे पहले, आरबीआई इस बात की निगरानी करता है कि वाणिज्यिक बैंक वास्तव में मिलने वाली जमा राशि में से न्यूनतम नकद शेष बनाए रखें, न कि सारा पैसा उधार दे दें। दूसरा, आरबीआई यह सुनिश्चित करता है कि बैंक केवल लाभ कमाने वाले कॉर्पोरेट व्यापारिक घरानों और अमीर व्यापारियों को ही ऋण न दें, बल्कि प्राथमिकता क्षेत्र ऋण दिशानिर्देशों के माध्यम से छोटे किसानों, लघु उद्योगों और सीमांत उधारकर्ताओं को भी ऋण दें। तीसरा, समय-समय पर, वाणिज्यिक बैंकों को आरबीआई को विस्तृत सांख्यिकीय रिटर्न जमा करने होते हैं, जिसमें यह रिपोर्ट करना होता है कि वे कितना उधार दे रहे हैं, किसे दे रहे हैं, और किस ब्याज दर पर दे रहे हैं। यह निरंतर नियामक निरीक्षण बैंकों को लापरवाह ऋण प्रथाओं में शामिल होने से रोकता है, मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद करता है, बैंकिंग प्रणाली में जनता का विश्वास बनाए रखता है, और यह सुनिश्चित करता है कि विकासशील अर्थव्यवस्था के सभी आवश्यक क्षेत्रों में ऋण निष्पक्ष और समान रूप से वितरित किया जाए।
उत्तर (Answer): औपचारिक वित्तीय संस्थानों तक पहुँचने में आने वाली कई महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के कारण गरीब परिवार ऋण के अनौपचारिक स्रोतों पर अत्यधिक निर्भर होते हैं। सबसे पहले, बैंकों जैसे औपचारिक क्षेत्रों को उचित संपार्श्विक की आवश्यकता होती है—जैसे कि भूमि के कागजात, भवन के दस्तावेज, वाहन या मवेशी—जो गरीबों के पास शायद ही कभी होते हैं। पर्याप्त संपार्श्विक के बिना, बैंक आम तौर पर उन्हें ऋण स्वीकृत करने के इच्छुक नहीं होते हैं। दूसरा, औपचारिक ऋण के लिए व्यापक दस्तावेज, कानूनी कागजी कार्रवाई और एक स्थायी पते की आवश्यकता होती है, जिसे कई अनपढ़ या हाशिए पर रहने वाले ग्रामीण और शहरी गरीब बेहद जटिल और डराने वाला पाते हैं। तीसरा, स्थानीय साहूकार, व्यापारी और नियोक्ता जैसे अनौपचारिक ऋणदाता पड़ोस में ही आसानी से सुलभ होते हैं, अक्सर किसी भी औपचारिक कागजी कार्रवाई या संपार्श्विक की आवश्यकता के बिना, और वे व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर लचीली पुनर्भੁगतान शर्तें बनाए रखते हैं। नतीजतन, भले ही अनौपचारिक ऋणों में अत्यधिक उच्च ब्याज दरें होती हैं जो गंभीर ऋण जाल का कारण बन सकती हैं, गरीब लोगों के पास अपनी तत्काल आपातकालीन और उपभोग आवश्यकताओं के लिए उन पर भरोसा करने के अलावा बहुत कम विकल्प होते हैं।
उत्तर (Answer): भारत में ऋण के दो प्रमुख स्रोत औपचारिक क्षेत्र का ऋण और अनौपचारिक क्षेत्र का ऋण हैं। औपचारिक क्षेत्र के ऋणों में बैंक और सहकारी समितियां शामिल हैं। भारतीय रिजर्व बैंक औपचारिक स्रोतों के कामकाज की देखरेख करता है, यह सुनिश्चित करता है कि वे उचित नकद भंडार बनाए रखें और उधारकर्ताओं के विविध समूह को उचित ब्याज दरों पर ऋण प्रदान करें। इसके विपरीत, अनौपचारिक क्षेत्र के ऋणों में साहूकारों, व्यापारियों, नियोक्ताओं, रिश्तेदारों और दोस्तों के ऋण शामिल हैं। अनौपचारिक क्षेत्र में ऋणदाताओं की ऋण गतिविधियों की देखरेख करने वाला कोई संगठन नहीं है, और वे अपनी पसंद की किसी भी ब्याज दर पर ऋण दे सकते हैं। औपचारिक ऋण के लिए सख्त संपार्श्विक और प्रलेखन की आवश्यकता होती है, जबकि अनौपचारिक ऋण अक्सर संपार्श्विक के बिना आसानी से सुलभ होते हैं, विशेष रूप से उन गरीब परिवारों के लिए जिनका साहूकारों के साथ व्यक्तिगत संबंध होता है। हालांकि, अनौपचारिक ऋणों में अत्यधिक उच्च ब्याज दरें होती हैं जो उधारकर्ताओं को आसानी से ऋण और ऋण-जाल के दुष्चक्र में फंसा सकती हैं, जबकि औपचारिक ऋण सुरक्षित होते हैं और न्यायसंगत विकास को बढ़ावा देते हैं।
उत्तर (Answer): बैंक जिनके पास अधिशेष धन है (जमाकर्ताओं) और जिन्हें धन की आवश्यकता है ( उधारकर्ताओं) के बीच एक पुल के रूप में कार्य करके अर्थव्यवस्था के भीतर ऋण के विस्तार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बैंक अपनी जमा राशि का केवल एक छोटा सा हिस्सा अपने पास नकद के रूप में रखते हैं (जैसे भारत में 15 प्रतिशत) उन जमाकर्ताओं को भुगतान करने के लिए जो किसी भी दिन पैसे निकालने आ सकते हैं। वे विभिन्न आर्थिक गतिविधियों जैसे कृषि, व्यापार और आवास के लिए ऋण चाहने वाले लोगों को ऋण देने के लिए जमा राशि के अधिकांश हिस्से का उपयोग करते हैं। ऐसा करके, बैंक ऋण पर जमा की तुलना में अधिक ब्याज दर वसूलते हैं। उधारकर्ताओं से जो वसूला जाता है और जमाकर्ताओं को जो भुगतान किया जाता है, उसके बीच का अंतर उनकी आय का मुख्य स्रोत है। इस ऋण सृजन प्रक्रिया के माध्यम से, बैंक व्यक्तियों और व्यवसायों की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने, आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करने, निवेश को बढ़ावा देने, रोजगार के अवसर पैदा करने और पूरे देश में बचत के कुशल गतिशीलता को सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।
उत्तर (Answer): मुद्रा के आधुनिक रूपों में मुद्रा (कागज के नोट और सिक्के) और बैंकों के साथ जमा शामिल हैं। पहले के समय में मुद्रा के रूप में उपयोग की जाने वाली चीजों—जैसे अनाज और मवेशी—के विपरीत, आधुनिक मुद्रा सोने, चांदी या तांबे जैसी कीमती धातुओं से नहीं बनी होती है, और यह दैनिक उपयोग की वस्तु नहीं है। इसे विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि मुद्रा देश की सरकार द्वारा अधिकृत होती है। भारत में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) केंद्र सरकार की ओर से मुद्रा नोट जारी करता है। कानूनन किसी अन्य व्यक्ति या संगठन को मुद्रा जारी करने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा, कानून रुपये के उपयोग को भुगतान के माध्यम के रूप में वैध बनाता है जिसे भारत में लेनदेन के निपटान में अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। मुद्रा का दूसरा रूप बैंकों के पास जमा है। लोग बचत के रूप में बैंक जमा में पैसा रखते हैं। चूंकि बैंक खातों में जमा राशि की मांग पर निकाली जा सकती है, इसलिए इन जमाओं को मांग जमा कहा जाता है। मांग जमा एक दिलचस्प और आवश्यक सुविधा प्रदान करते हैं; वे मुद्रा की आवश्यक विशेषताओं को साझा करते हैं और नकदी के बजाय चेक के माध्यम से विनिमय के माध्यम के रूप रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।