Chapter Chai • Board Revision Guide
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बालगोबिन भगत

Subject: हिंदी | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)
अध्याय: बालगोबिन भगत
लेखक: रामवृक्ष बेनीपुरी
कक्षा: 10 (क्षितिज - गद्य खंड) - त्वरित पुनरावृत्ति नोट्स (Quick Revision Notes)

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### पाठ का परिचय और सारांश

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### मुख्य पात्र: बालगोबिन भगत की विशेषताएँ

1. बाह्य वेशभूषा:


2. गृहस्थ साधु:


3. चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ:


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### पाठ के प्रमुख प्रसंग और संदेश

#### 1. आषाढ़ की रिमझिम और धान की रोपाई


#### 2. भादो की रात और जादू भरा संगीत


#### 3. जाड़े की रितु और भोर (प्रभातियाँ)


#### 4. गर्मियों की उमस और संध्या का संगीत


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### मानवीय संवेदनाएँ और अनूठी विचारधाराएँ

#### 1. पुत्र की मृत्यु पर दृष्टिकोण:


#### 2. सामाजिक परंपराओं का खंडन:


#### 3. बालगोबिन भगत की मृत्यु:


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### महत्वपूर्ण शब्दार्थ (Key Vocabulary)
माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 बालगोबिन भगत
Overview
परिचय और व्यक्तित्व मझोले कद के गोरे-चिकटे व्यक्ति उम्र साठ से ऊपर, बाल सफेद कपड़े बहुत कम (लंगोटी और कबीरपंथी कनफटी टोपी) सर्दियों में काली कमली (कंबल) मस्तक पर हमेशा चमकता हुआ रामानंद श्री संप्रदाय का चंदन गले में तुलसी की जड़ों की बेडौल माला गृहस्थ जीवन और आचरण कबीर के पक्के अनुयायी (साहब को मानने वाले) खेती-बारी भरा-पूरा परिवार (बेटे, पतोहू) कबीर के आदर्शों का पालन: खेत में जो पैदा होता, सिर पर लादकर पहले 'साहब' के दरबार (मठ) ले जाते प्रसाद रूप में जो मिलता, उसी से गुजारा करते संगीत साधना और कला कबीर के गीत गाना और मस्त रहना आषाढ़ की रिमझिम में धान की रोपाई करते समय संगीत गूंजना गर्मियों की उमस भरी शाम में मित्रों के साथ संगीत और नृत्य संगीत का जादू: औरतें गीत गाने लगतीं हलवाइयों के पैर ताल से उठने लगते खेतों में काम करने वालों के हाथ एक साथ उठने लगते मानवीय संवेदनाएँ और अनोखे विचार बेटे की मृत्यु पर अजब रवैया: मृत शरीर को आंगन में चटाई पर लिटाया सफेद चादर ओढ़ाई, फूल और तुलसी दल बिखेरे सिर के पास सिराए दीपक जलाया गीत गाकर आत्मा और परमात्मा के मिलन का आनंद मनाया (मृत्यु को उत्सव माना) पतोहू का पुनर्विवाह: इकलौते बेटे की मौत के बाद पतोहू को रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा भाई को बुलाकर पतोहू का दूसरा विवाह (पुनर्विवाह) करवा दिया व्यक्तित्व की विशेषताएँ और अंत समाज की रूढ़ियों और पाखंडों का विरोध किसी की चीज़ बिना पूछे न छूना, न व्यवहार में लाना खराब मौसम और बढ़ती उम्र का संगीत प्रेम पर कोई असर नहीं अंतिम समय तक नियमित दिनचर्या (भोर में गाना, गंगा स्नान) गंगा स्नान से लौटते समय खेत में ही प्राण त्यागना
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. बालगोबिन भगत की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई और वह उनके जीवन के सिद्धांतों के अनुरूप कैसे थी? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत की मृत्यु ठीक उसी प्रकार हुई जैसी उन्होंने कामना की थी—शांत, गरिमामयी और उनके जीवन के सिद्धांतों के अनुकूल। वृद्धावस्था और अस्वस्थता के बावजूद उन्होंने अपनी दैनिक साधना और नियमों में कोई ढील नहीं दी। वे गंगा स्नान के लिए तीस कोस पैदल गए और वहाँ से लौटने के बाद उन्हें बुखार आ गया। लोगों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने हंसकर टाल दिया और अपनी सुबह-शाम की प्रार्थना, स्नान और गायन जारी रखा। अपनी अंतिम शाम को भी उन्होंने बहुत मधुर गीत गाए, लेकिन उनके स्वर में एक शिथिलता थी, जैसे कोई धागा टूट रहा हो। अगली सुबह जब लोगों को उनका प्रभाती गीत सुनाई नहीं दिया, तो उन्होंने जाकर देखा कि बालगोबिन भगत का केवल पार्थिव शरीर पड़ा था। इस प्रकार उनका अंत भी उनकी साधना की तरह ही पवित्र था।
Q2. बालगोबिन भगत का कबीर के प्रति क्या दृष्टिकोण था और उनके दैनिक जीवन पर कबीर के विचारों का क्या प्रभाव था? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत संत कबीर के परम भक्त थे और उन्हें अपना 'साहब' मानते थे। उनके पूरे जीवन पर कबीर के विचारों और दर्शन की गहरी छाप थी। वे कबीर के ही पदों को गाते थे और उन्हीं के बताए आदर्शों पर चलते थे। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सभी के साथ खरा व्यवहार रखते थे। कबीर की तरह ही वे अपरिग्रह और अनासक्ति के सिद्धांत का पालन करते थे। उनके खेत में जो भी अनाज पैदा होता था, उसे वे सबसे पहले चार कोस दूर स्थित कबीरपंथी मठ में ले जाते थे और वहाँ सब कुछ भेंट स्वरूप अर्पित कर देते थे। इसके बाद प्रसाद रूप में जो कुछ मिलता था, उसी से अपना घर चलाते थे। उन्होंने कबीर की तरह ही सामाजिक कुरीतियों और पाखंडों का कड़ा विरोध किया।
Q3. लेखक ने बालगोबिन भगत के बाह्य व्यक्तित्व (शारीरिक बनावट और पहनावे) तथा उनकी जीवनशैली का किस प्रकार वर्णन किया है? 3 Marks
उत्तर (Answer): लेखक ने बालगोबिन भगत के बाह्य व्यक्तित्व और सादगीपूर्ण जीवन का बहुत सुंदर चित्रण किया है। भगत जी साठ वर्ष से अधिक उम्र के गोरे-चिट्टे व्यक्ति थे, जिनके बाल पक चुके थे। वे बहुत कम कपड़े पहनते थे; कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी धारण करते थे। सर्दियों में वे एक काली कमली (कंबल) ओढ़ लेते थे। उनके माथे पर हमेशा रामानंदी चंदन का तिलक चमकता था और गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला बंधी रहती थी। उनकी जीवनशैली अत्यंत अनुशासित और सात्विक थी। वे सुबह जल्दी उठकर नदी स्नान के लिए जाते थे, खेतों में कड़ी मेहनत करते थे और कबीर के पदों को गाते थे। उनका जीवन सादा जीवन और उच्च विचार का आदर्श उदाहरण था।
Q4. बालगोबिन भगत ने अपनी पतोहू (पुत्रवधू) के संबंध में कौन-से क्रांतिकारी कदम उठाए और क्यों? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत ने अपनी पतोहू (पुत्रवधू) के संबंध में दो अत्यंत क्रांतिकारी और प्रगतिशील कदम उठाए, जो तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को चुनौती देते थे। पहला कदम उन्होंने तब उठाया जब अपने बेटे की मृत्यु पर उन्होंने सामाजिक परंपराओं को तोड़ते हुए अपनी पतोहू से ही बेटे की चिता को मुखाग्नि दिलवाई, जो कार्य सामान्यतः पुरुषों द्वारा किया जाता है। दूसरा बड़ा कदम उन्होंने तब उठाया जब श्राद्ध की अवधि पूरी होने पर उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाकर उसे दूसरी शादी करने का आदेश दिया। जब पतोहू ने उनकी सेवा करने के लिए घर छोड़ने से मना किया, तो भगत जी ने दृढ़ता दिखाते हुए कहा कि यदि वह नहीं जाएगी, तो वे स्वयं घर छोड़कर चले जाएंगे। इस प्रकार उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन कर समाज सुधारक की भूमिका निभाई।
Q5. अपने बेटे की मृत्यु पर बालगोबिन भगत की क्या प्रतिक्रिया थी और इससे उनके किन विचारों का पता चलता है? 3 Marks
उत्तर (Answer): अपने इकलौते बेटे की मृत्यु पर बालगोबिन भगत का व्यवहार आम लोगों से बिल्कुल अलग और आश्चर्यजनक था। वे रोने-धोने के बजाय अपने मृत बेटे के शरीर को चटाई पर लिटाकर, उस पर फूल और तुलसी दल बिखेरकर, सिरहाने एक दीपक जलाकर कबीर के भक्ति पद गाने लगे। वे पूरी तल्लीनता और खंजड़ी की थाप पर गा रहे थे। उन्होंने अपनी रोती हुई पतोहू को ढाढस बंधाया और कहा कि यह शोक मनाने का नहीं, बल्कि उत्सव मनाने का समय है। उनका मानना था कि आत्मा (विरहिणी) अपने प्रियतम परमात्मा से जाकर मिल गई है, जो कि सबसे बड़ा आनंद है। भगत जी का यह व्यवहार उनके गहरे आध्यात्मिक ज्ञान, आत्मा की अमरता में अटूट विश्वास और सांसारिक मोह-माया से उनकी मुक्ति को दर्शाता है।
Q6. आषाढ़ के महीने में बालगोबिन भगत के संगीत का खेतों में काम करने वाले लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता था? 3 Marks
उत्तर (Answer): आषाढ़ के महीने में जब रिमझिम बारिश शुरू होती है और पूरा गाँव खेतों में धान की रोपनी के लिए उमड़ पड़ता है, तब बालगोबिन भगत का मधुर संगीत पूरे वातावरण को जादुई बना देता था। कीचड़ में लथपथ होकर खेतों में काम करते हुए भगत जी जब अपने सुरीले कंठ से कबीर के पदों को गाते थे, तो उनका संगीत सीधे लोगों के दिलों को छूता था। उनके संगीत के प्रभाव से खेतों में खेलते हुए बच्चे झूमने लगते थे, मेढ़ पर बैठी औरतें गुनगुनाने लगती थीं और हलवाहों के पैर ताल पर उठने लगते थे। धान की रोपनी करने वाली उँगलियाँ एक निश्चित संगीत की लय में काम करने लगती थीं। उनका संगीत थकावट भरे कृषि कार्य को एक आनंदमय उत्सव में बदल देता था, जिससे सभी लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
Q7. बालगोबिन भगत गृहस्थ थे, फिर भी उन्हें 'साधु' क्यों कहा जाता था? स्पष्ट कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत एक गृहस्थ थे, उनका एक बेटा और पतोहू थे, उनके पास खेती-बाड़ी और एक साफ-सुथरा मकान भी था। इसके बावजूद उन्हें 'साधु' कहा जाता था क्योंकि साधु कहलाने का आधार केवल बाहरी वेशभूषा या घर-बार छोड़ना नहीं होता, बल्कि व्यक्ति का पवित्र आचरण और उच्च विचार होते हैं। भगत जी का जीवन कबीर के आदर्शों पर चलता था। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे, सभी से खरा व्यवहार रखते थे और किसी की चीज़ को बिना पूछे हाथ नहीं लगाते थे। वे अपनी फसल को कबीरमठ में भेंट स्वरूप चढ़ा देते थे और वहाँ से प्रसाद रूप में जो मिलता था, उसी से अपना गुजारा करते थे। उनके मन में किसी के प्रति लोभ, मोह या क्रोध नहीं था। उनका यही निस्वार्थ, पवित्र और संयमित आचरण उन्हें एक सच्चा साधु बनाता था।
Q8. बालगोबिन भगत के जीवन का अंत कैसे हुआ और यह उनके किस रूप को दर्शाता है? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत के जीवन का अंत बहुत ही शांत और उनकी पूरे जीवन की साधना के अनुकूल हुआ। वे बुढ़ापे में भी अपनी दिनचर्या से बिल्कुल नहीं डिगे। अपनी अंतिम दिनों में भी वे उतने ही नियमबद्ध थे जितने जवानी में थे। जिस दिन उनकी मृत्यु हुई, उस दिन भी उन्होंने रोज की तरह स्नान किया और गीत गाए। हालांकि उस दिन उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी और शरीर कमजोर हो चुका था, फिर भी उन्होंने अपनी भक्ति और नियमों में कोई ढील नहीं दी। लोगों ने उन्हें आराम करने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं मानी। अगली सुबह जब उनके घर से खंजरी की आवाज नहीं आई, तो लोगों ने जाकर देखा कि बालगोबिन भगत का प्राणपक्षी उड़ चुका था। उनका शरीर शांत पड़ा था और उनके चेहरे पर वही संत जैसी शांति और संतोष का भाव था।
Q9. बालगोबिन भगत अपनी खेत की उपज के प्रति अपनी ईमानदारी और अलोभिता का परिचय कैसे देते थे? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत के जीवन में लोभ और मोह का कोई स्थान नहीं था। उनके खेत में जो भी फसल पैदा होती थी, वे उसे सबसे पहले अपने घर लाने के बजाय सिर पर लादकर कबीरपंथी मठ ले जाते थे, जो उनके गाँव से कुछ दूर था। वहाँ वे उस अनाज को मठ के महंत को अर्पित कर देते थे। महंत उस ढेर में से थोड़ा सा अनाज प्रसाद के रूप में वापस भगत जी को दे देते थे, और बाकी अनाज मठ के उपयोग के लिए रख लिया जाता था। भगत जी उसी प्रसाद रूपी थोड़े से अनाज से अपना और अपने परिवार का पूरा साल गुज़ारा करते थे। वे कभी भी अपने खेत की फसल को अपनी निजी संपत्ति नहीं मानते थे और न ही कभी मुनाफा कमाने का लालच रखते थे। उनकी यह अलोभिता और त्याग लोगों के लिए एक मिसाल थी।
Q10. बेटे की मृत्यु के बाद बालगोबिन भगत ने अपनी पतोहू को उसके मायके क्यों भेज दिया और पतोहू की क्या प्रतिक्रिया थी? 3 Marks
उत्तर (Answer): बेटे की मृत्यु के पश्चात बालगोबिन भगत ने अपनी पतोहू को उसके भाई के साथ मायके भेज दिया। इसका मुख्य कारण यह था कि उनकी पतोहू अभी बहुत युवा थी और भगत जी चाहते थे कि उसका दूसरा विवाह हो जाए ताकि वह अपना शेष जीवन सुखमय तरीके से बिता सके। वे समाज के उस वर्ग के विरोधी थे जो विधवाओं के पुनर्विवाह का विरोध करता था। किंतु पतोहू इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसने रोते हुए भगत जी से कहा कि यदि वह चली जाएगी तो उनके बुढ़ापे में उनकी देखभाल कौन करेगा, उनके लिए भोजन कौन बनाएगा और बीमारी के समय पानी कौन देगा। वह जीवनभर उनकी सेवा करना चाहती थी। परंतु भगत जी अपने निर्णय पर अटल रहे और साफ कह दिया कि यदि वह मायके जाकर दूसरा विवाह नहीं करती है, तो वे स्वयं घर छोड़कर चले जाएंगे।
Q11. कार्तिक से शुरू होकर फागुन तक बालगोबिन भगत की दिनचर्या कैसी रहती थी? 3 Marks
उत्तर (Answer): कार्तिक मास आते ही बालगोबिन भगत की दिनचर्या में बदलाव आ जाता था और यह फागुन तक जारी रहता था। वे सुबह-सुबह बहुत भोर में ही उठ जाते थे, जब गाँव के लोग गहरी नींद में सो रहे होते थे। वे गाजे-बाजे के साथ कबीर के पद गाते हुए गाँव से दूर पोखर पर स्नान करने जाते थे। वहाँ से लौटकर वे गाँव के एक छोर पर स्थित अपने घर के बाहर पोखर के किनारे या अपनी मड़ैया में ही आसन जमाकर बैठ जाते थे और अपनी खंजरी लेकर गाने लगते थे। कड़ाके की ठंड और माघ महीने की कुहासे भरी सुबह में भी उनकी आवाज गाँव के कोने-कोने तक गूंजती थी। उनकी यह नियमित दिनचर्या उनके असाधारण अनुशासन और संगीत के प्रति अटूट समर्पण को दर्शाती थी, जिससे पूरा गाँव मंत्रमुग्ध हो जाता था।
Q12. बालगोबिन भगत ने अपने बेटे के अंतिम संस्कार में किन सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओं का विरोध किया? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत ने अपने बेटे की मृत्यु के समय समाज की रूढ़िवादी परंपराओं को कड़ा मुकाबला दिया और उन्हें तोड़ डाला। आमतौर पर हमारे समाज में यह नियम है कि किसी की मृत्यु होने पर मुखाग्नि पुरुष (बेटा या कोई पुरुष संबंधी) ही देता है। किंतु भगत जी ने इस परंपरा के विपरीत अपने बेटे की चिता को अपनी पतोहू के हाथों से आग दिलाई। उन्होंने न केवल पतोहू से मुखाग्नि दिलवाई बल्कि समाज के उस ढकोसले को भी खारिज कर दिया जो महिलाओं को श्मशान जाने या अंतिम संस्कार में भाग लेने से रोकता है। भगत जी की यह सोच तत्कालीन समाज में अत्यंत प्रगतिशील और क्रांतिकारी थी। उन्होंने समाज की स्थापित पुरुषवादी मान्यताओं को चुनौती दी और महिलाओं को समान अधिकार देने का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत किया।
Q13. बालगोबिन भगत का मृत्यु के प्रति दृष्टिकोण कैसा था, विशेषकर अपने बेटे की मृत्यु के समय? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत मृत्यु को बहुत ही दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देखते थे। उनके अनुसार मृत्यु दुख का नहीं बल्कि आत्मा के परमात्मा से मिलने का आनंदोत्सव था। जब उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हुई, तो उन्होंने सामान्य लोगों की तरह विलाप करने या रोने के बजाय उसके शव को आंगन में चटाई पर लिटाकर सफेद चादर से ढक दिया और फूलों से सजा दिया। इसके बाद वे उसके पास बैठकर पूरी तल्लीनता से कबीर के पद गाने लगे और खंजरी बजाते रहे। उनका मानना था कि विरहिणी आत्मा अपने परमात्मा के पास चली गई है, इसलिए यह रोने का नहीं बल्कि आनंद मनाने का अवसर है। उन्होंने अपनी पतोहू को भी रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा, क्योंकि उनके लिए यह नश्वर शरीर का त्याग और आत्मा की मुक्ति का स्वाभाविक मार्ग था।
Q14. आषाढ़ की रिमझिम में बालगोबिन भगत का संगीत पूरे गाँव के वातावरण को कैसे प्रभावित करता था? 3 Marks
उत्तर (Answer): आषाढ़ की रिमझिम फुहारों के बीच जब पूरा गाँव खेतों में धान की रोपाई करने में व्यस्त होता था, तब बालगोबिन भगत का संगीत समूचे वातावरण को जादुई बना देता था। उनके कंठ से निकला एक-एक शब्द खेत की मेड़ों पर गूंजने लगता था। धान के खेतों में बच्चे खेलते हुए और औरतें कलेवा लेकर खेतों में पहुँचती थीं। भगत जी घुटनों तक कीचड़ में खड़े होकर धान के पौधे खेतों में लगा रहे होते थे और साथ ही कबीर के पद गा रहे होते थे। उनके संगीत का जादू ऐसा था कि उनकी अंगुलियां एक-एक धान के पौधे को पंक्तिबद्ध खेत में रोप रही होती थीं और उनका कंठ संगीत की स्वर लहरियां बिखेर रहा होता था। उन्हें गाते देख खेतों में काम करती हुई महिलाओं के होंठ भी उनके साथ थिरकने लगते थे। उनकी ताल पर हलवाहे और मेड़ पर खड़े दर्शकों के मन भी झूम उठते थे।
Q15. बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व और वेशभूषा कैसी थी? 3 Marks
उत्तर (Answer): बालगोबिन भगत मंजोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी थे। उनकी उम्र साठ के ऊपर रही होगी। बाल पक गए थे। लंबी दाढ़ी या जटा-जूट तो वे नहीं रखते थे, किंतु उनका चेहरा सफेद बालों से जगमगाता रहता था। कपड़े बिल्कुल कम पहनते थे—कमर में एक लंगोट और सिर पर कबीरपंथियों की सी कनफटी टोपी। जाड़े में एक काली कमली ऊपर से ओढ़े रहते थे। मस्तक पर हमेशा चमकता हुआ रामानंद श्रीखंड का तिलक जो नाक के छोर तक ऊपर से ही शुरू होता था, गले में तुलसी की जड़ों की बेडौल माला बंधे रहते थे। वे खेती-बारी करने वाले सीधे-सादे गृहस्थ थे, लेकिन उनका आचरण और उनके जीवन के सिद्धांत पूरी तरह से एक संत और कबीर के अनुयायी जैसे थे। वे कभी भी किसी से झूठ नहीं बोलते थे और न ही किसी की चीज बिना पूछे इस्तेमाल करते थे। उनकी हर विशेषता उनके साधु स्वभाव को दर्शाती थी।