कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान: ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना (Ruling the Countryside) - त्वरित संशोधन नोट्स
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मुख्य अवधारणाएँ और परिभाषाएँ (Key Concepts & Definitions)
1. दीवानी (Diwani): 12 अगस्त 1765 को मुगल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की 'दीवानी' सौंप दी। इसके तहत कंपनी को बंगाल प्रान्त के आर्थिक मामलों का मुख्य नियंत्रक बना दिया गया और उसे अपने भू-क्षेत्र के कर (लगभग राजस्व) वसूलने का अधिकार मिल गया।
2. खुशखुश (Khushkhush) / नील की खेती की प्रणालियाँ:
- निज् (Nij): इस पद्धति में planters (बागान मालिक) अपनी खुद की जमीन पर नील का उत्पादन करते थे या जमीन भाड़े पर लेते थे।
- रयती (Ryoti): इस व्यवस्था के तहत बागान मालिक रयतों (किसानों) के साथ अनुबंध (सट्टा) करते थे। कई बार गाँव के मुखियाओं से भी किसानों की तरफ़ से समझौते पर हस्ताक्षर करा लिए जाते थे।
3. महाल् (Mahal): ब्रिटिश राजस्व दस्तावेजों में 'महाल्' एक राजस्व इकाई थी। यह एक गाँव या गाँवों का समूह हो सकता था।
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प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्थाएँ (Major Land Revenue Systems)
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारत में कृषि से अधिक आय प्राप्त करने के लिए तीन मुख्य राजस्व प्रणालियाँ लागू की गईं:
#### 1. स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) - 1793
- लागूकर्ता: लॉर्ड कॉर्नवालिस (Lord Cornwallis)।
- क्षेत्र: बंगाल, बिहार और उड़ीसा।
- मुख्य बातें:
- राजाओं और तालुकदारों को जमींदार के रूप में मान्यता दी गई।
- जमींदारों का काम किसानों से लगन वसूलना और कंपनी को एक निश्चित राशि चुकाना था।
- यह राशि स्थायी कर दी गई थी, यानी भविष्य में कभी बढ़ाई नहीं जाएगी।
- समस्या: जमींदारों द्वारा कंपनी को तय राशि न दे पाने के कारण कई जमींदारियाँ नीलाम कर दी गईं। किसानों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ा क्योंकि उन्हें जमींदारों के अत्याचार सहने पड़ते थे।
#### 2. रयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System) - रैयतवार व्यवस्था
- लागूकर्ता: थॉमस मुनरो (Thomas Munro) और कैप्टन रीड (Captain Read)।
- क्षेत्र: मुख्य रूप से दक्षिण भारत (मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी)।
- मुख्य बातें:
- स्थायी भूमि के अभाव वाले क्षेत्रों में इसे अपनाया गया।
- इसमें बिचौलियों (जमींदारों) को हटाकर सीधे किसानों (रयतों) के साथ बंदोबस्त किया गया।
- खेत का सर्वेक्षण करने के बाद राजस्व सीधे किसान से वसूला जाता था।
#### 3. महालवाड़ी व्यवस्था (Mahalwari System) - 1822
- लागूकर्ता: होल्ट मैकेंजी (Holt Mackenzie)।
- क्षेत्र: उत्तर-पश्चिम प्रांत (आज के उत्तर प्रदेश, मध्य भारत और पंजाब के कुछ हिस्से)।
- मुख्य बातें:
- ब्रिटिश को लगता था कि उत्तर भारत में गाँव एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है।
- इसलिए, राजस्व वसूली के लिए पूरे गाँव यानी 'महाल' को इकाई माना गया।
- गाँव के हर खेत के अनुमानित राजस्व को जोड़कर कुल राजस्व तय किया जाता था।
- राजस्व चुकाने का उत्तरदायित्व पूरे गाँव के मुखिया या समूह को सौंपा गया।
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नील की खेती और समस्याएँ (Indigo Cultivation and Problems)
1. मांग: यूरोप में कपड़ा उद्योग के विस्तार के कारण नील (Indigo) की भारी मांग थी, जिससे कपड़े को चमकीला नीला रंग मिलता था। भारतीय नील की ब्रिटेन में बहुत अधिक मांग थी।
2. खेती की समस्या (निज् खेती की सीमाएँ):
- उपजाऊ जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी थी, जिससे बड़े पैमाने पर निज् खेती करना मुश्किल था।
- हल और बैलों की भारी जरूरत होती थी जो उस समय धान की कटाई के मौसम में किसानों के पास उपलब्ध नहीं होते थे।
3. रयतों की असंतुष्टि:
- बागान मालिक बहुत कम कीमत पर किसानों से नील की खेती करवाते थे और किसान कर्ज के जाल में फंस जाते थे।
- नील की जड़ें मिट्टी की सारी उपजाऊ शक्ति को चूस लेती थीं, जिसके बाद उस जमीन पर धान की खेती नहीं की जा सकती थी।
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महत्वपूर्ण विद्रोह (Important Rebellion)
- नीل विद्रोह (Blue Rebellion) - मार्च 1859:
- बंगाल के हज़ारों रयतों ने नील की खेती करने से इनकार कर दिया।
- किसानों ने लगन चुकाने से मना कर दिया और तलवार, भाले, तीर-कमान लेकर नील की फैक्ट्रियों पर हमला कर दिया।
- परिणाम: ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा। 'नील आयोग' (Indigo Commission) का गठन किया गया जिसने बागान मालिकों को दोषी पाया और किसानों को भविष्य में अपनी मर्जी से फसल उगाने की छूट दे दी। इसके बाद बंगाल में नील का उत्पादन धीरे-धीरे समाप्त हो गया।