अध्याय: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन (Excretory Products and Their Elimination)
कक्षा: 11वीं जीव विज्ञान (MP Board)
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1. परिचय एवं मुख्य शब्दावली (Introduction & Key Terms)
- उत्सर्जन (Excretion): शरीर से उपापचय क्रियाओं (metabolic activities) के दौरान बनने वाले नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों (nitrogenous wastes) को बाहर निकालने की प्रक्रिया को उत्सर्जन कहते हैं।
- ऑस्मोरगुलेशन (Osmoregulation): शरीर में जल और आयनों (salts) के संतुलन को बनाए रखने की प्रक्रिया।
- अमोनोटेलिज्म (Ammonotelism): अमोनिया का उत्सर्जन करने वाले जंतु अमोनोटेलिक कहलाते हैं। (उदाहरण: अधिकांश जलीय जंतु, अस्थिल मछलियाँ, उभयचर)।
- यूरियोटेलिज्म (Ureotelism): यूरिया का उत्सर्जन करने वाले जंतु यूरियोटेलिक कहलाते हैं। (उदाहरण: स्तनधारी, स्थलीय उभयचर, समुद्री मछलियाँ)।
- यूरिकोटेलिज्म (Uricotelism): यूरिक अम्ल का उत्सर्जन करने वाले जंतु यूरिकोटेलिक कहलाते हैं। (उदाहरण: सरीसृप, पक्षी, कीट, लैंड स्नेल)।
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2. मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System)
मानव उत्सर्जन तंत्र में निम्नलिखित अंग शामिल होते हैं:
1. एक जोड़ा वृक्क (A pair of Kidneys): गहरे लाल रंग के, सेम के बीज (bean-shaped) के आकार के होते हैं। ये अंतिम वक्षीय और तीसरी कटि कशेरुका (T12 - L3) के बीच स्थित होते हैं।
2. एक जोड़ा मूत्रवाहिनी (A pair of Ureters): वृक्क के हिलाम से निकलकर मूत्राशय में खुलती हैं।
3. मूत्राशय (Urinary Bladder): थैलीनुमा संरचना जहाँ मूत्र संग्रहित होता है।
4. मूत्रमार्ग (Urethra): जिसके माध्यम से मूत्र शरीर से बाहर निकलता है।
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3. वृक्क की आंतरिक संरचना (Internal Structure of Kidney)
- वृक्क के बाहर का क्षेत्र वल्कल (Cortex) और अंदर का क्षेत्र मध्यांश (Medulla) कहलाता है।
- मध्यांश पिरामिड (Medullary pyramids) के रूप में व्यवस्थित रहता है।
- वल्कल का भाग पिरामिड के बीच में धंस जाता है जिसे बर्टिनी के कॉलम (Columns of Bertini) कहते हैं।
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4. नेफ्रॉन: वृक्क की संरचनात्मक एवं कार्यात्मक इकाई (Nephron)
प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख (1 million) नेफ्रॉन होते हैं। नेफ्रॉन के दो प्रमुख भाग होते हैं:
1. केशिकागुच्छ या ग्लोमेरुलस (Glomerulus): रक्त केशिकाओं का गुच्छा।
2. वृक्क नलिका (Renal Tubule):
- बोमन संपुट (Bowman's Capsule): कप के आकार की संरचना जो ग्लोमेरुलस को घेरे रहती है। (ग्लोमेरुलस + बोमन संपुट = मैलपीजियन काय / Renal Corpuscle)।
- समीपस्थ संवलित नलिका (Proximal Convoluted Tubule - PCT)।
- हेनले का लूप (Henle's Loop): इसके दो भाग होते हैं - अवरोही भुजा (Descending limb) और आरोही भुजा (Ascending limb)।
- दूरस्थ संवलित नलिका (Distal Convoluted Tubule - DCT)।
- संग्राहक नलिका (Collecting Duct)।
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5. मूत्र निर्माण की प्रक्रिया (Urine Formation)
मूत्र निर्माण में तीन मुख्य चरण होते हैं:
1. ग्लोमेरुलर निसंदन (Glomerular Filtration):
- रक्त का उच्च दाब पर छनना।
- स्वस्थ व्यक्ति में प्रति मिनट लगभग 125 मिलीलीटर निसंद (filtrate) बनता है, जिसे GFR (Glomerular Filtration Rate) कहते हैं (अर्थात लगभग 180 लीटर प्रतिदिन)।
2. पुनः अवशोषण (Reabsorption):
- कुल निसंद का लगभग 99% भाग वृक्क नलिकाओं द्वारा पुनः अवशोषित कर लिया जाता है।
- PCT (समीपस्थ संवलित नलिका) में अधिकतम पुनः अवशोषण होता है (जैसे- ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, Na+ आदि)।
3. स्रवण (Secretion):
- नलिकाओं की कोशिकाएँ निसंद में $H^+$, $K^+$, और अमोनिया जैसे पदार्थों का स्रवण करती हैं, जिससे शरीर के तरल पदार्थों का pH और आयनिक संतुलन बना रहता है।
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6. हेनले लूप और वासारेक्टा की भूमिका (Counter-Current Mechanism)
- प्रतिक्रिधारा तंत्र (Counter-Current Mechanism): हेनले के लूप और वासारेक्टा (Vasa recta) के बीच रक्त और filtrate के विपरीत दिशा में बहने के कारण मध्यांश (medulla) में सांद्रता प्रवणता (concentration gradient) बनी रहती है।
- यह तंत्र सांद्र (concentrated) मूत्र के निर्माण में सहायक होता है, जिससे शरीर में जल का संरक्षण होता है।
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7. मत्रातिसर्ग का नियमन (Regulation of Kidney Function)
वृक्क की कार्यप्रणाली का नियमन हॉर्मोन्स द्वारा होता है:
- ADH (एंटीडायूरेटिक हॉर्मोन्स / वासopressin): शरीर में जल की कमी होने पर हाइपोथैलेमस से स्रावित होता है। यह जल के पुनः अवशोषण को बढ़ाता है (जल का ह्रास रोकता है)।
- JGA (जक्स्टाग्लोमेरुलर उपकरण): रक्त दाब कम होने पर रेनिन (Renin) का स्रावण करता है जो RAAS तंत्र (Renin-Angiotensin-Aldosterone System) को सक्रिय कर रक्त दाब और GFR को सामान्य करता है।
- ANF (एट्रियल नेट्रियूरेटिक फैक्टर): रक्त दाब बढ़ने पर हृदय की अलिंद दीवारों द्वारा स्रावित होता है जो वाहिकाओं को चौड़ा (vasodilation) कर रक्त दाब घटाता है (ADH के प्रभाव को उलटता है)।
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8. मत्राविसर्जन (Micturition)
- मूत्राशय के भरने पर तंत्रिका तंत्र संकेत भेजता है जिससे मूत्राशय की पेशियाँ संकुचित होती हैं और मूत्रमार्ग की अवरोधनी (urethral sphincter) शिथिल हो जाती है, जिससे मूत्र शरीर से बाहर निकल जाता है। इस प्रक्रिया को मत्राविसर्जन (Micturition) कहते हैं। एक वयस्क व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 1.5 लीटर मूत्र उत्सर्जित करता है।
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9. सहायक उत्सर्जी अंग (Accessory Excretory Organs)
- त्वचा (Skin): स्वेद (Sweat) और सीबम (Sebum) के द्वारा NaCl, यूरिया, लैक्टिक अम्ल आदि का निष्कासन।
- फेफड़े (Lungs): प्रतिदिन लगभग $18 \text{ L} CO_2$ और कुछ मात्रा में जल वाष्प का निष्कासन।
- यकृत (Liver): कोलेस्ट्रॉल, डिग्रेड्ड स्टेरॉयड हॉर्मोन्स, विटामिन्स और औषधियाँ पित्त (Bile) के माध्यम से उत्सर्जित करता है।
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10. प्रमुख विकार (Disorders of Excretory System)
- यूरिमिया (Uremia): रक्त में यूरिया की मात्रा का अत्यधिक बढ़ जाना, जो वृक्क की विफलता (Kidney failure) का संकेत है।
- ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस (Glomerulonephritis): वृक्क के ग्लोमेरुलस में सूजन।
- वृक्क पथरी (Renal Calculi / Kidney Stones): वृक्क में ऑक्सालेट या अन्य लवणों के क्रिस्टल का जमा होना।
- पॉलीयूरिया (Polyurea): अत्यधिक मात्रा में मूत्र का त्याग (डायबिटीज इनसिपिडस में)।
- ग्लाइकोसुरिया (Glycosuria): मूत्र में ग्लूकोज की उपस्थिति (डायबिटीज मेलिटस का लक्षण)।