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भूमंडलीकृत विश्व का बनना

Subject: सामाजिक विज्ञान | Class: Class 10 | Syllabus Year: 2026
मुख्य सूत्र (Key Formulas)

MP बोर्ड त्वरित पुनरावृत्ति नोट्स (Quick Revision Notes)

कक्षा: 10वीं | विषय: सामाजिक विज्ञान (इतिहास)

अध्याय: भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World)


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1. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ और शब्दावली (Key Definitions)


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2. मुख्य विषय और घटनाक्रम (Key Topics & Concepts)

#### क. आधुनिक युग से पहले का विश्व (Pre-Modern World)


#### ख. 19वीं शताब्दी (1815-1914): विश्व अर्थव्यवस्था का उदय


#### ग. महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था (Inter-War Economy)


#### घ. विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: युद्धोत्तर काल

1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF): सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे से निपटने के लिए।

2. विश्व बैंक (World Bank / IBRD): युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए धन की व्यवस्था करने के लिए।


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3. महत्वपूर्ण वर्ष और घटनाक्रम (Timeline Table)

| वर्ष / काल | ऐतिहासिक घटना |

| :--- | :--- |

| 1885 | बर्लिन सम्मेलन (यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का बंटवारा) |

| 1890 का दशक | अफ्रीका में 'रिंडरपेस्ट' (मवेशी प्लेग) का प्रकोप |

| 1914 - 1918 | प्रथम विश्व युद्ध |

| 1921 | भारत में गिरमिटिया (Indentured) श्रम प्रणाली का आधिकारिक उन्मूलन |

| 1929 | वैश्विक महामंदी (Great Depression) की शुरुआत |

| 1939 - 1945 | द्वितीय विश्व युद्ध |

| 1944 | ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (IMF और विश्व बैंक की स्थापना) |


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4. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण बिंदु (Exam-Oriented Key Points)

1. सिल्क रूट का महत्व: यह केवल व्यापारिक मार्ग नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम का भी दुनिया भर में प्रसार हुआ।

2. कॉर्न लॉ समाप्त होने के परिणाम: ब्रिटेन में भोजन सस्ता हो गया, जिससे कृषि क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ी और लोग शहरों या अन्य देशों की ओर पलायन करने लगे।

3. गिरमिटिया मजदूरों का सांस्कृतिक योगदान: गिरमिटिया मजदूरों ने नए देशों में अपनी संस्कृति को जीवित रखा। उदाहरण के लिए:

4. बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का उदय: 1970 के दशक के उत्तरार्ध से, बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन और अन्य एशियाई देशों में अपने उत्पादन केंद्र स्थानांतरित करना शुरू कर दिया क्योंकि वहां श्रम (Labour) बहुत सस्ता था। इससे वैश्वीकरण की प्रक्रिया को और गति मिली।

माइंड मैप चार्ट (Mind Map Chart)
📍 भूमंडलीकृत विश्व का बनना
Overview
आधुनिक युग से पहले का काल रेशम मार्ग (Silk Routes) एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ना व्यापार (सिल्क, मसाले, चीनी मिट्टी) और संस्कृति का आदान-प्रदान भोजन की यात्रा नए खाद्य पदार्थों का प्रसार (आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर) नूडल्स का चीन से यूरोप यात्रा कर 'स्पैगेटी' बनना आयरलैंड का आलू अकाल (1840 के दशक में भुखमरी) विजय, बीमारी और व्यापार 16वीं सदी में अमेरिका की खोज (क्रिस्टोफर कोलंबस द्वारा) स्पैनिश सेना द्वारा चेचक (Smallpox) के कीटाणुओं का जैविक हथियार के रूप में उपयोग सोने और चांदी की खोज (एल डोराडो - सोने का शहर) 19वीं शताब्दी (1815-1914) वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदय ब्रिटेन में 'कॉर्न लॉ' (Corn Laws) का खात्मा और सस्ता खाद्य आयात कृषि क्षेत्र में बदलाव और शहरों का विकास अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रवाह के तीन प्रकार व्यापार का प्रवाह (मुख्यतः कपड़ा और गेहूं) श्रम का प्रवाह (रोजगार की तलाश में लोगों का पलायन) पूंजी का प्रवाह (अल्पकालिक और दीर्घकालिक निवेश) तकनीक की भूमिका रेलवे, भाप के जहाज और टेलीग्राफ का विकास रेफ्रिजरेटेड जहाजों द्वारा मांस का सुरक्षित परिवहन उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का बंटवारा (1885 का बर्लिन समझौता) रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग) 1890 के दशक में अफ्रीका में फैली मवेशियों की बीमारी 90% मवेशियों की मौत, स्थानीय आजीविका नष्ट, लोगों को श्रम बाजार में धकेला गया अनुबंधित श्रम (गिरमिटिया मजदूर) भारत (बिहार, यूपी) और चीन से मजदूरों को कैरिबियाई द्वीपों, मॉरीशस और फिजी भेजना नई दास प्रथा के रूप में शोषण विदेशों में भारतीय उद्यमी शिकारीपुरी श्रॉफ और चेट्टियार (मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापारिक निवेश) महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) औद्योगिक युद्ध: मशीन गन, टैंक, हवाई जहाजों और रासायनिक हथियारों का प्रयोग ब्रिटेन की आर्थिक कमजोरी और अमेरिका का कर्जदाता देश बनना बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग अमेरिका में असेंबली लाइन पद्धति (हेनरी फोर्ड द्वारा टी-मॉडल कार का उत्पादन) रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन और रेडियो की मांग में वृद्धि महामंदी (1929) कारण: कृषि में अति-उत्पादन और अमेरिकी बैंकों का कर्ज बंद करना प्रभाव: बैंकों का दिवालिया होना, बेरोजगारी, वैश्विक व्यापार ठप भारत और महामंदी आयात-निर्यात आधा रह गया कृषि उत्पादों (जैसे जूट, गेहूं) की कीमतों में भारी गिरावट किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ा, सोने का निर्यात बढ़ा विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: युद्धोत्तर काल द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) मित्र राष्ट्रों और धुरी राष्ट्रों के बीच विनाशकारी युद्ध ब्रेटन वुड्स संस्थान (जुड़वां संतानें) 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में समझौता अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF): बाहरी अधिशेष और घाटे से निपटने के लिए विश्व बैंक (World Bank): युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए वित्तपोषण वि-औपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता एशिया और अफ्रीका के देशों की आजादी विकासशील देशों द्वारा 'G-77' समूह का गठन नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) की मांग बहुराष्ट्रीय कंपनियां (MNCs) और वैश्वीकरण 1970 के दशक से उत्पादन का कम वेतन वाले देशों (जैसे चीन) में स्थानांतरण वैश्विक आर्थिक भूगोल में बदलाव और वैश्वीकरण की तीव्र शुरुआत
महत्वपूर्ण बोर्ड प्रश्न (Important Board Questions)
Q1. उन्नीसवीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने में प्रौद्योगिकी (तकनीक) की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। उपयुक्त उदाहरण दीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nउन्नीसवीं सदी में वैश्वीकरण की प्रक्रिया बहुत तेज हुई, और इस प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी (तकनीक) ने एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई। परिवहन और संचार के क्षेत्र में हुए आविष्कारों, जैसे रेलवे, भाप के जहाजों और टेलीग्राफ ने दूर-दराज के बाजारों को जोड़कर, परिवहन लागत को कम करके और वस्तुओं, पूंजी तथा श्रम के प्रवाह को सुगम बनाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण किया। ### प्रौद्योगिकी की भूमिका और प्रमुख उदाहरण * **रेलवे और भाप के जहाज:** रेलवे के विस्तार ने कृषि क्षेत्रों को समुद्री बंदरगाहों से जोड़ा। बड़े, तेज और हल्के भाप के जहाजों ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका से यूरोपीय बाजारों तक गेहूं और कपास जैसी भारी वस्तुओं को बहुत कम लागत पर समुद्र पार ले जाना संभव बना दिया। * **रेफ्रिजरेटेड जहाज और मांस का व्यापार:** प्रौद्योगिकी के प्रभाव का सबसे बेहतरीन उदाहरण मांस का व्यापार है। 1870 के दशक तक, अमेरिका से यूरोप तक जिंदा जानवर भेजे जाते थे। यह प्रक्रिया बहुत महंगी और नुकसानदेह थी क्योंकि जानवर जहाजों में बहुत जगह घेरते थे, बीमार पड़ जाते थे, उनका वजन कम हो जाता था या वे रास्ते में ही मर जाते थे। इस कारण यूरोप में मांस एक महंगी वस्तु थी। रेफ्रिजरेटेड जहाजों के आविष्कार के बाद, जानवरों को उनके मूल स्थान (जैसे अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया) पर ही काटा जाने लगा और उनके मांस को ठंडे जहाजों में भरकर यूरोप भेजा जाने लगा। इससे परिवहन लागत कम हुई, यूरोप में मांस की कीमतें गिरीं और गरीबों के भोजन में मांस शामिल हो सका। * **टेलीग्राफ:** समुद्र के नीचे बिछाए गए टेलीग्राफ केबलों के विकास ने महाद्वीपों के बीच त्वरित संचार को संभव बनाया। अब व्यापारी बाजार की कीमतों, मांग और जहाजों के आवागमन के बारे में तुरंत जानकारी प्राप्त कर सकते थे, जिससे व्यापारिक जोखिम कम हुआ और आर्थिक दक्षता में वृद्धि हुई। * **उपनिवेशीकरण और बुनियादी ढांचा:** प्रौद्योगिकी ने साम्राज्यवाद के एक साधन के रूप में भी काम किया। यूरोपीय शक्तियों ने संसाधनों का दोहन करने और अपने उपनिवेशों पर नियंत्रण रखने के लिए एशिया और अफ्रीका में बड़े पैमाने पर रेलवे नेटवर्क और टेलीग्राफ लाइनें बिछाईं, जिससे ये क्षेत्र वैश्विक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गए। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, प्रौद्योगिकी ने अकेले काम नहीं किया, बल्कि यह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों के साथ गहराई से जुड़ी हुई थी। तकनीकी प्रगति ने वैश्वीकरण की गति को तेज किया और उन्नीसवीं सदी के विश्व को पहले से कहीं अधिक परस्पर संबद्ध बना दिया।
Q2. 1929 की महामंदी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा? समझाइए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना 1929 की महामंदी, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में शुरू हुई थी, जल्द ही एक वैश्विक संकट बन गई। चूंकि भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश था और वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा हुआ था, इसलिए इस मंदी का भारत के कृषि और वित्तीय क्षेत्रों पर गंभीर और दूरगामी प्रभाव पड़ा। ### भारतीय अर्थव्यवस्था पर मुख्य प्रभाव * **व्यापार और कीमतों में गिरावट:** 1928 और 1934 के बीच, भारत का आयात और निर्यात व्यापार घटकर लगभग आधा रह गया। जैसे ही अंतर्राष्ट्रीय कीमतें गिरीं, भारत में भी कृषि उत्पादों की कीमतें तेजी से गिर गईं। इस अवधि के दौरान भारत में गेहूं की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट आई, जिससे देश में हाहाकार मच गया। * **किसानों की बदहाली:** यद्यपि कृषि उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट आई थी, लेकिन ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने लगान (राजस्व) की दरों में कोई कमी करने से साफ मना कर दिया। विश्व बाजार के लिए उत्पादन करने वाले किसान इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। उदाहरण के लिए, बंगाल के पटसन (जूट) उत्पादकों को, जो निर्यात के लिए कच्चा जूट उगाते थे, कीमतों में 60 प्रतिशत से अधिक की गिरावट का सामना करना पड़ा। इससे वे कर्ज के जाल में फंस गए और उन्हें अपनी जमीनें गिरवी रखनी पड़ीं तथा जेवर बेचने पड़े। * **सोने का निर्यात (संकट का सोना):** इस संकट से बचने के लिए भारतीय किसानों ने अपने पास संचित सोना और चांदी बेचना शुरू कर दिया। मंदी के वर्षों में, भारत सोने का एक बड़ा निर्यातक बन गया। इस सोने के निर्यात ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और उसकी मंदी से उबरने में मदद की, लेकिन इससे भारतीय किसानों को कोई राहत नहीं मिली। * **शहरी क्षेत्रों पर प्रभाव:** ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी भारत पर इसका प्रभाव कम रहा। निश्चित आय वाले शहरी लोग, जैसे वेतनभोगी कर्मचारी और जमींदार जिन्हें नियमित किराया मिलता था, खुद को बेहतर स्थिति में पा रहे थे क्योंकि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें काफी गिर चुकी थीं। * **घरेलू उद्योगों का विकास:** राष्ट्रवादी नेताओं के दबाव में, ब्रिटिश सरकार को भारतीय उद्योगों को सीमा शुल्क संरक्षण (टैरिफ प्रोटेक्शन) देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप 1930 के दशक में चीनी, सीमेंट और कागज जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक निवेश और विकास हुआ। ### निष्कर्ष\nमहामंदी ने ग्रामीण भारत में अत्यधिक पीड़ा और असंतोष को जन्म दिया। इस आर्थिक संकट ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ माहौल तैयार किया, जिसने महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन को एक मजबूत आधार प्रदान किया और इसमें ग्रामीण किसानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
Q3. 'अनुबंधित श्रमिक' (गिरमिटिया मजदूर) से क्या तात्पर्य है? 19वीं शताब्दी में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों के प्रवास के कारणों की व्याख्या कीजिए और वर्णन कीजिए कि उन्होंने अपने नए वातावरण में सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के नए रूपों का निर्माण कैसे किया। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### अनुबंधित श्रमिक (गिरमिटिया मजदूर) का अर्थ \nअनुबंधित श्रम से तात्पर्य अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के तहत बंधुआ मजदूरी की एक प्रणाली से है। इसमें एक श्रमिक एक नए देश या बागान में जाने की यात्रा के खर्च के बदले एक नियोक्ता के लिए एक निश्चित अवधि (आमतौर पर पांच वर्ष) तक काम करने के अनुबंध पर हस्ताक्षर करता था। उन्नीसवीं शताब्दी में, श्रमिकों के लिए कठोर परिस्थितियों और अधिकारों की कमी के कारण इस प्रणाली को अक्सर 'गुलामी की नई प्रणाली' के रूप में वर्णित किया गया था। ### भारतीय अनुबंधित श्रमिकों के प्रवास के कारण \nउन्नीसवीं शताब्दी में, भारत के लाखों श्रमिक दुनिया भर के बागानों, खदानों और सड़क व रेलवे निर्माण परियोजनाओं (जैसे कैरेबियाई द्वीप समूह, मॉरीशस, फिजी और सीलोन) में काम करने के लिए गए। इस प्रवास के मुख्य कारण निम्नलिखित थे: * **कुटीर उद्योगों का पतन:** ब्रिटिश मशीनों से बने सस्ते सामानों के आगमन के कारण भारत में पारंपरिक कुटीर उद्योग नष्ट हो गए, जिससे लाखों कारीगर बेरोजगार हो गए। * **भूमि लगान में वृद्धि:** औपनिवेशिक सरकार और जमींदारों ने भूमि लगान में अत्यधिक वृद्धि कर दी। किसान अपना लगान चुकाने में असमर्थ रहे और कर्ज के जाल में फंस गए। * **जमीनों का अधिग्रहण:** खदानों और बागानों के लिए जंगलों और सामुदायिक जमीनों के बड़े हिस्से को साफ कर दिया गया, जिससे स्थानीय लोग अपनी पारंपरिक आजीविका से वंचित हो गए। * **धोखाधड़ी से भर्ती:** एजेंटों ने गरीब ग्रामीणों को काम की प्रकृति, रहने की स्थिति और यहाँ तक कि गंतव्य के बारे में झूठी जानकारी देकर भर्ती किया, और उन्हें बेहतर भविष्य का लालच दिया। ### सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के नए रूपों का निर्माण \nकठोर जीवन और कार्य परिस्थितियों का सामना करते हुए, भारत के विभिन्न क्षेत्रों और दुनिया के अन्य हिस्सों के अनुबंधित श्रमिकों ने अपनी संस्कृतियों को मिलाकर अद्वितीय, मिश्रित रूपों का निर्माण किया: * **होसे (Hosay):** त्रिनिदाद में, वार्षिक मुहर्रम जुलूस को 'होसे' नामक एक विशाल कार्निवल में बदल दिया गया, जिसमें सभी नस्लों और धर्मों के श्रमिक शामिल होते थे। * **रास्ताफ़ेरियनवाद (Rastafarianism):** रास्ताफ़ेरियनवाद नामक विरोध धर्म (जिसे बॉब मार्ले ने प्रसिद्ध किया) कैरेबियन में भारतीय प्रवासियों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है। * **चटनी संगीत (Chutney Music):** त्रिनिदाद और गुयाना में लोकप्रिय 'चटनी संगीत' एक रचनात्मक समकालीन संगीत रूप है जो भारतीय लोक संगीत और स्थानीय कैरेबियाई धुनों के मिश्रण से उत्पन्न हुआ। * **त्योहारों का समामेलन:** दिवाली और होली जैसे पारंपरिक भारतीय त्योहारों को नए तरीकों से मनाया जाने लगा, जिससे प्रवासियों को अपनी पहचान बनाए रखने और नए परिवेश में ढलने में मदद मिली।
Q4. उन्नीसवीं शताब्दी में वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास में प्रौद्योगिकी (जैसे रेलवे, भाप के जहाज और रेफ्रिजरेटेड जहाजों) द्वारा निभाई गई भूमिका का विश्लेषण कीजिए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### 19वीं शताब्दी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रौद्योगिकी की भूमिका \nउन्नीसवीं शताब्दी के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था के विस्तार में प्रौद्योगिकी ने एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई। परिवहन और संचार के क्षेत्र में हुए प्रमुख आविष्कारों ने दुनिया भर में व्यापार, प्रवासन और खाद्य वितरण के स्वरूप को बदल दिया। * **रेलवे और भाप के जहाज:** रेलवे के विकास और विस्तार ने भीतरी कृषि क्षेत्रों को सीधे बंदरगाहों से जोड़ दिया। इससे गेहूं और कपास जैसी भारी वस्तुओं को लंबी दूरी तक तेजी से और सस्ते में ले जाना संभव हो सका। बड़े और तेज चलने वाले भाप के जहाजों ने महासागरों के पार इन सामानों को ले जाने की लागत और समय को कम कर दिया, जिससे दूरदराज के उत्पादक यूरोपीय बाजारों से जुड़ गए। * **टेलीग्राफ:** टेलीग्राफ के विकास ने महाद्वीपों के बीच त्वरित संचार को सक्षम बनाया। व्यापारी और सरकारें बाजार की कीमतों, मांग और आपूर्ति के बारे में वास्तविक समय की जानकारी प्राप्त कर सकते थे, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को पहले की तुलना में कहीं अधिक कुशलता से संचालित करने में सक्षम हुए। * **रेफ्रिजरेटेड जहाज और मांस का व्यापार:** सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी नवाचारों में से एक रेफ्रिजरेटेड जहाजों का विकास था। * *समस्या:* पहले, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड से जीवित जानवरों को यूरोप भेजा जाता था। यह प्रक्रिया बेहद अप्रभावी थी क्योंकि जीवित जानवर जहाजों पर बहुत अधिक जगह घेरते थे, लंबी यात्रा के दौरान कई बीमार पड़ जाते थे या मर जाते थे, और कइयों का वजन कम हो जाता था जिससे वे खाने योग्य नहीं रहते थे। परिणामस्वरूप, यूरोप में मांस एक महंगा विलासिता का साधन था, जो गरीबों की पहुंच से बाहर था। * *समाधान:* रेफ्रिजरेटेड जहाजों के आने से जानवरों को उनके प्रस्थान बिंदु (जैसे अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया) पर ही काटा जा सकता था और उन्हें जमे हुए मांस (frozen meat) के रूप में यूरोप ले जाया जा सकता था। * *प्रभाव:* इसने शिपिंग लागत को काफी कम कर दिया और यूरोपीय बाजारों में मांस की आपूर्ति बढ़ा दी। मांस की कीमतें गिर गईं, और यूरोप के गरीब अब अपने आहार में मांस और मक्खन शामिल कर सकते थे, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ और सामाजिक शांति को बढ़ावा मिला। \nनिष्कर्षतः, प्रौद्योगिकी केवल एक साधन नहीं थी बल्कि एक प्रमुख उत्प्रेरक थी जिसने वैश्विक बाजारों को एकीकृत किया, व्यापारिक लागतों को कम किया और लाखों लोगों के दैनिक जीवन को बदल दिया।
Q5. उन्नीसवीं शताब्दी में वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने में प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से रेलवे, भाप के जहाजों और प्रशीतन (रेफ्रिजरेशन) की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nउन्नीसवीं शताब्दी की वैश्विक अर्थव्यवस्था के रूपांतरण में प्रौद्योगिकी ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रेलवे, भाप के जहाजों और टेलीग्राफ जैसे प्रमुख आविष्कार केवल तकनीकी प्रगति नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों से गहराई से जुड़े हुए थे। उन्होंने विशाल दूरियों के पार वस्तुओं, पूंजी और श्रम के प्रवाह को सुगम बनाया। ### प्रमुख तकनीकी कारक * **रेलवे:** रेलवे ने कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ा। इससे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के आंतरिक भागों से यूरोपीय बाजारों तक खाद्यान्न और कच्चे माल का तेजी से और सस्ता परिवहन संभव हो सका। * **भाप के जहाज:** बड़े और तेज भाप के जहाजों ने माल ढुलाई की लागत और समय को कम कर दिया, जिससे महासागरों के पार भारी सामानों का परिवहन आसान हो गया। * **रेफ्रिजरेटेड (प्रशीतित) जहाज:** यह मांस के व्यापार के लिए एक क्रांतिकारी विकास था। पहले, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया से यूरोप तक जीवित जानवर भेजे जाते थे, जिनमें से कई लंबी यात्रा के दौरान मर जाते थे या उनका वजन कम हो जाता था, जिससे मांस एक महंगा विलास बन जाता था। रेफ्रिजरेटेड जहाजों ने जानवरों को प्रस्थान बिंदु पर ही काटने और जमे हुए मांस के रूप में परिवहन करने की अनुमति दी। ### वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव * **कम कीमतें और बढ़ा हुआ उपभोग:** परिवहन की लागत में भारी गिरावट आई। यूरोप में मांस की कीमतें गिर गईं, जिससे यह गरीब कामकाजी वर्ग के लिए भी सुलभ हो गया, जिससे उनके आहार और जीवन स्तर में सुधार हुआ। * **वैश्विक बाजार का एकीकरण:** प्रौद्योगिकी ने स्थानीय बाजारों को एक एकल वैश्विक बाजार में एकीकृत कर दिया, जहां भोजन अब स्थानीय किसान द्वारा नहीं उगाया जाता था बल्कि हजारों मील दूर से आता था। * **औपनिवेशिक विस्तार:** बेहतर परिवहन और संचार ने सैन्य गतिविधियों को भी तेज कर दिया, जिससे यूरोपीय शक्तियों को एशिया और अफ्रीका में विशाल क्षेत्रों को उपनिवेश बनाने और नियंत्रित करने में मदद मिली।
Q6. रिंडरपेस्ट (पशु प्लेग) क्या था? उन्नीसवीं सदी के अंत में अफ्रीका के लोगों और अर्थव्यवस्था पर इसके विनाशकारी प्रभावों का वर्णन कीजिए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nरिंडरपेस्ट, जिसे 'पशु प्लेग' भी कहा जाता है, पशुओं में फैलने वाली एक अत्यंत संक्रामक और विनाशकारी बीमारी थी। यह बीमारी 1880 के दशक के अंत में अफ्रीका पहुंची। यह उन संक्रमित जानवरों के जरिए फैली जो ब्रिटिश एशिया से पूर्वी अफ्रीका में इरिट्रिया पर हमला कर रहे इतालवी सैनिकों के भोजन के लिए लाए गए थे। ### अफ्रीका की अर्थव्यवस्था और समाज पर प्रभाव * **आजीविका का विनाश:** रिंडरपेस्ट अफ्रीका में जंगल की आग की तरह फैला और 1892 तक अटलांटिक तट तक पहुंच गया। इसके पांच साल बाद यह महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से (केप) तक पहुंच गया। इस यात्रा में इसने अफ्रीका के लगभग 90 प्रतिशत मवेशियों को मार डाला। * **स्वतंत्रता की हानि:** ऐतिहासिक रूप से, अफ्रीका में प्रचुर भूमि और पशुधन था, और लोग शायद ही कभी वेतन के लिए काम करते थे। मवेशियों की मौत ने अफ्रीकी लोगों की पारंपरिक आजीविका को पूरी तरह नष्ट कर दिया। वे अब अपने संसाधनों पर जीवित नहीं रह सकते थे और उन्हें श्रम बाजार में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा। * **औपनिवेशिक शक्तियों का वर्चस्व:** बागान मालिकों, खदान मालिकों और औपनिवेशिक सरकारों ने अपनी शक्ति को मजबूत करने और अफ्रीकियों को वेतन पर काम करने के लिए मजबूर करने के लिए बचे हुए दुर्लभ मवेशी संसाधनों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया। इसने यूरोपीय उपनिवेशवादियों को अफ्रीका पर आसानी से विजय प्राप्त करने और उसे गुलाम बनाने में मदद की। * **सामाजिक विघटन:** मवेशियों के नुकसान ने अफ्रीकी चरवाहा समुदायों के पूरे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया, जिससे व्यापक गरीबी फैली और लोगों को खदानों और बागानों में बंधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ा। इसने अफ्रीकी महाद्वीप पर यूरोपीय साम्राज्यवादी नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त किया।
Q7. 1929 की महामंदी के कारणों की व्याख्या कीजिए और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nमहामंदी की शुरुआत लगभग 1929 में हुई और यह 1930 के दशक के मध्य तक बनी रही। इस अवधि के दौरान, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भयानक गिरावट दर्ज की गई। ### महामंदी के प्रमुख कारण * **कृषि में अति-उत्पादन:** कृषि उत्पादों का अति-उत्पादन एक बड़ी समस्या बनी हुई थी। जैसे-जैसे कृषि उत्पादों की कीमतें गिरीं, किसानों ने अपनी समग्र आय को बनाए रखने के लिए उत्पादन बढ़ाने और बाजार में अधिक मात्रा में फसल लाने का प्रयास किया। इससे बाजार में माल की भरमार हो गई और कीमतें और गिर गईं। खरीदारों के अभाव में कृषि उत्पाद सड़ने लगे। * **अमेरिकी ऋणों की वापसी:** 1920 के दशक के मध्य में, कई देशों ने अमेरिका से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारा था। जब तक स्थिति अच्छी थी, अमेरिका से कर्ज लेना बेहद आसान था, लेकिन संकट के पहले संकेत पर अमेरिकी ऋणदाता घबरा गए। 1928 की पहली छमाही में, अमेरिकी विदेशी ऋण $1 बिलियन से अधिक था। एक वर्ष बाद यह घटकर केवल एक-चौथाई रह गया। जो देश अमेरिकी ऋणों पर निर्भर थे, उन्हें गंभीर संकट का सामना करना पड़ा। ### भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव * **व्यापार में गिरावट:** 1928 से 1934 के बीच भारत का आयात-निर्यात घटकर लगभग आधा रह गया। जैसे ही अंतर्राष्ट्रीय कीमतें गिरीं, भारत में भी कीमतें तेजी से गिर गईं। इस अवधि के दौरान भारत में गेहूं की कीमतों में 50 प्रतिशत की गिरावट आई। * **किसानों की दुर्दशा:** यद्यपि कृषि कीमतों में भारी गिरावट आई, ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने लगान (राजस्व) की मांगों को कम करने से इनकार कर दिया। विश्व बाजार के लिए उत्पादन करने वाले किसान सबसे अधिक प्रभावित हुए। उदाहरण के लिए, बंगाल के जूट उत्पादकों की आय में 60 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई, जिससे वे कर्ज के जाल में फंस गए। * **सोने का निर्यात:** संकट से बचने के लिए, भारतीय किसानों ने अपनी जमा-पूंजी और सोने के गहने बेचे। भारत कीमती धातुओं, विशेष रूप से सोने का एक बड़ा निर्यातक बन गया। इस सोने के निर्यात ने ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को मंदी से उबरने में मदद की, लेकिन भारतीय किसानों को अत्यधिक कंगाल बना दिया। * **शहरी क्षेत्र पर प्रभाव:** यह मंदी शहरी भारत के लिए उतनी कष्टदायक नहीं थी। निश्चित किराया प्राप्त करने वाले जमींदारों और वेतनभोगी कर्मचारियों की स्थिति बेहतर रही क्योंकि वस्तुएं सस्ती हो गई थीं।
Q8. अनुबंधित श्रम (गिरमिटिया मजदूर) से क्या अभिप्राय है? उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों के प्रवास की परिस्थितियों, बागानों में उनके जीवन और उन्होंने किस प्रकार एक नई संस्कृति का निर्माण किया, इसका वर्णन कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### अनुबंधित श्रम (गिरमिटिया मजदूर) का अर्थ\nअनुबंधित श्रम से तात्पर्य एक ऐसे बंधुआ मजदूर से है जो किसी नियोक्ता के लिए एक निश्चित समय (आमतौर पर पांच वर्ष) तक काम करने के अनुबंध के तहत बंधा होता है, ताकि वह किसी नए देश या बागान की अपनी यात्रा के खर्च का भुगतान कर सके। उन्नीसवीं शताब्दी में, इस प्रणाली को अक्सर 'गुलामी की नई प्रणाली' के रूप में वर्णित किया गया था। ### भारत से प्रवास की परिस्थितियाँ * **आर्थिक संकट:** उन्नीसवीं शताब्दी में, भारत के लाखों मजदूर दुनिया भर के बागानों, खदानों और सड़क व रेलवे निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए गए। अधिकांश मजदूर वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे जिलों से आए थे। इन क्षेत्रों में, कुटीर उद्योग नष्ट हो गए थे, भूमि का लगान बढ़ गया था, और खदानों व बागानों के लिए जमीनें साफ की जा रही थीं। इन सबने गरीबों के जीवन को गहराई से प्रभावित किया; वे अपना लगान चुकाने में असमर्थ रहे, कर्ज के जाल में फंस गए और काम की तलाश में पलायन करने के लिए मजबूर हो गए। * **धोखाधड़ी से भर्ती:** भर्ती नियोक्ताओं द्वारा नियुक्त एजेंटों द्वारा की जाती थी, जिन्हें एक छोटा कमीशन मिलता था। कई एजेंटों ने अंतिम गंतव्य, यात्रा के साधनों, काम की प्रकृति और रहने व काम करने की परिस्थितियों के बारे में झूठी जानकारी देकर संभावित प्रवासियों को लालच दिया। अक्सर, मजदूरों को यह भी नहीं बताया जाता था कि उन्हें एक लंबी समुद्री यात्रा पर जाना होगा। ### बागानों में जीवन * **कठोर वास्तविकता:** बागानों में पहुँचने पर, मजदूरों ने पाया कि परिस्थितियाँ वैसी नहीं थीं जैसी उन्होंने कल्पना की थी। रहने और काम करने की परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन थीं, और उनके पास बहुत कम कानूनी अधिकार थे। * **सजा और पलायन:** यदि कोई मजदूर भागने का प्रयास करता या काम पूरा करने में विफल रहता, तो उसे गंभीर सजा का सामना करना पड़ता था, जिसमें कारावास और शारीरिक प्रताड़ना शामिल थी। इसके बावजूद, कई मजदूर जंगलों में भाग गए, हालांकि पकड़े जाने पर उन्हें गंभीर सजा मिलती थी। ### नई संस्कृति का निर्माण (सांस्कृतिक संलयन)\nकठिन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए, अनुबंधित श्रमिकों ने अपनी पारंपरिक संस्कृतियों को स्थानीय संस्कृतियों के साथ मिलाते हुए व्यक्तिगत और सामूहिक आत्म-अभिव्यक्ति के नए रूप विकसित किए: * **होसे (Hosay) उत्सव:** त्रिनिदाद में, वार्षिक मुहर्रम के जुलूस को 'होसे' (इमाम हुसैन के नाम पर) नामक एक विशाल कार्निवल में बदल दिया गया, जिसमें सभी नस्लों और धर्मों के श्रमिक शामिल होते थे। * **चटनी संगीत:** त्रिनिदाद और गुयाना में लोकप्रिय 'चटनी संगीत' अनुबंधित श्रम के बाद के अनुभव की एक और रचनात्मक समकालीन अभिव्यक्ति है, जो भारतीय लोक संगीत को कैरेबियाई धुनों के साथ जोड़ती है। * **रास्ताफ़ेरियनिज़्म (Rastafarianism):** 'रास्ताफ़ेरियनिज़्म' (बॉब मार्ले द्वारा प्रसिद्ध) नामक विरोध धर्म भी कैरेबियन में भारतीय प्रवासियों के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाता है। * **धार्मिक पाठ:** भजन गाना और तुलसीदास की रामायण का पाठ करना भारतीय श्रमिकों के लिए अपनी पहचान बनाए रखने और दूर देशों में सांत्वना पाने के महत्वपूर्ण साधन बन गए। ### निष्कर्ष\nइस प्रकार, यद्यपि अनुबंधित श्रम अत्यधिक शोषण की एक प्रणाली थी, लेकिन इसके कारण सांस्कृतिक संलयन की एक समृद्ध प्रक्रिया भी शुरू हुई, जहाँ प्रवासियों ने अपनी विरासत को सुरक्षित रखते हुए अपने नए घरों की संस्कृतियों को अपनाया और उन्हें समृद्ध किया।
Q9. उन्नीसवीं शताब्दी में वैश्विक अर्थव्यवस्था को आकार देने में प्रौद्योगिकी, विशेष रूप से रेलवे, भाप के जहाजों और रेफ्रिजरेटेड जहाजों की भूमिका की चर्चा कीजिए। 4 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nउन्नीसवीं शताब्दी तीव्र औद्योगिकीकरण और वैश्वीकरण का काल थी। इस प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी ने एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाई। रेलवे, भाप के जहाज और टेलीग्राफ जैसे प्रमुख आविष्कारों ने दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों को जोड़ने, व्यापार को बदलने और सामाजिक व आर्थिक जीवन को नया आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ### रेलवे की भूमिका * **भीतरी इलाकों को बंदरगाहों से जोड़ना:** कृषि और औद्योगिक भीतरी इलाकों को तटीय बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे आवश्यक थी। इसने निर्यात के लिए देशों के आंतरिक हिस्सों से बंदरगाहों तक कच्चे माल (जैसे कपास, गेहूं और खनिज) की तीव्र आवाजाही को सक्षम बनाया। * **बड़े पैमाने पर प्रवास को सुगम बनाना:** रेलवे ने यूरोप और एशिया से लाखों प्रवासियों को कृषि सीमाओं (जैसे अमेरिकी मिडवेस्ट या रूसी स्टेपीज़) तक ले जाने में भी मदद की, जहाँ उन्होंने खेती के लिए भूमि साफ की। ### भाप के जहाजों (स्टीमशिप) की भूमिका * **तेज और सस्ता समुद्री परिवहन:** भाप के जहाजों से पहले, लकड़ी के पाल वाले जहाज धीमे थे और उनकी माल वहन क्षमता सीमित थी। कोयले से चलने वाले भाप के जहाजों ने महासागरों को पार करने के समय को काफी कम कर दिया और माल वहन क्षमता को बढ़ा दिया। इसने लंबी दूरी पर गेहूं, कोयला और लोहे जैसी कम कीमत वाली वस्तुओं के थोक परिवहन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बना दिया। ### रेफ्रिजरेटेड जहाजों की भूमिका * **खाद्य व्यापार में क्रांति:** 1870 के दशक तक, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड से मांस को जीवित जानवरों के रूप में यूरोप भेजा जाता था। जीवित जानवर जहाज में बहुत अधिक जगह घेरते थे, यात्रा के दौरान कई मर जाते थे, बीमार पड़ जाते थे, उनका वजन कम हो जाता था या वे खाने के योग्य नहीं रह जाते थे। परिणामस्वरूप, मांस यूरोपीय गरीबों की पहुंच से बाहर एक विलासिता की वस्तु थी। * **कीमतों में कमी और आहार में सुधार:** रेफ्रिजरेटेड जहाजों के आविष्कार ने जानवरों को उनके प्रारंभिक बिंदु (जैसे, अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया में) पर ही काटने और फिर उन्हें जमे हुए मांस के रूप में यूरोप ले जाने में सक्षम बनाया। इससे शिपिंग लागत कम हुई, यूरोप में मांस की कीमतें गिरीं और यूरोपीय कामकाजी वर्ग को मांस और मक्खन सहित अधिक विविध आहार का उपभोग करने का अवसर मिला, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ। ### सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव * **औपनिवेशिक विस्तार:** तकनीकी प्रगति ने औपनिवेशिक हितों की भी सेवा की। तेज संचार और परिवहन ने यूरोपीय शक्तियों को अफ्रीका और एशिया में विशाल उपनिवेशों को अधिक कुशलता से नियंत्रित करने की अनुमति दी। * **वैश्विक बाजार एकीकरण:** प्रौद्योगिकी ने स्थानीय बाजारों को एक एकल वैश्विक बाजार में एकीकृत कर दिया, जहां दुनिया के एक हिस्से में वस्तुओं की कीमतें दूसरे हिस्से के उत्पादकों को सीधे प्रभावित करती थीं। ### निष्कर्ष\nसंक्षेप में, प्रौद्योगिकी केवल तेज परिवहन का साधन नहीं थी; यह उन्नीसवीं शताब्दी में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन का एक सक्रिय कारक थी। इसने वैश्विक व्यापार के पैटर्न को पुनर्गठित किया, औद्योगिक देशों में जीवन स्तर में सुधार किया और वैश्विक अर्थव्यवस्था के एकीकरण को सुगम बनाया।
Q10. 1929 की महामंदी के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कारणों और परिणामों की व्याख्या कीजिए, तथा भारत पर इसके विशिष्ट प्रभाव का विश्लेषण कीजिए। 5 Marks
उत्तर (Answer): ### प्रस्तावना\nमहामंदी की शुरुआत लगभग 1929 में हुई और यह 1930 के दशक के मध्य तक जारी रही। इस अवधि के दौरान, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भारी गिरावट दर्ज की गई। ### महामंदी के कारण * **कृषि अति-उत्पादन:** कृषि में अति-उत्पादन एक बड़ी समस्या बनी हुई थी। जैसे ही कृषि उत्पादों की कीमतें गिरीं और किसानों की आय कम हुई, उन्होंने अपनी कुल आय को बनाए रखने के लिए उत्पादन बढ़ाने और बाजार में अधिक मात्रा में फसल लाने का प्रयास किया। इससे बाजार में माल की भरमार हो गई और कीमतें और भी नीचे गिर गईं। खरीदारों की कमी के कारण कृषि उत्पाद सड़ने लगे। * **अमेरिकी ऋणों की वापसी:** 1920 के दशक के मध्य में, कई देशों ने अमेरिका से ऋण लेकर अपने निवेश का वित्तपोषण किया था। जब स्थिति अच्छी थी, तब अमेरिका से ऋण प्राप्त करना बेहद आसान था, लेकिन संकट के पहले संकेत पर अमेरिकी ऋणदाताओं में घबराहट फैल गई। 1928 की पहली छमाही में, अमेरिकी विदेशी ऋण $1 बिलियन से अधिक था। एक साल बाद यह घटकर केवल एक-चौथाई रह गया। जो देश अमेरिकी ऋणों पर अत्यधिक निर्भर थे, वे गंभीर संकट में आ गए। ### वैश्विक अर्थव्यवस्था पर परिणाम * **वित्तीय प्रणाली का पतन:** अमेरिकी ऋणों की वापसी के साथ, यूरोप में बड़े बैंक धराशायी हो गए और ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग जैसी मुद्राओं का अवमूल्यन हुआ। अमेरिका में, बैंकों ने घरेलू ऋण देना बंद कर दिया और दिए गए ऋणों की वसूली शुरू कर दी। ऋण चुकाने में असमर्थ होने के कारण, हजारों परिवारों ने अपने घर, कार और अन्य उपभोक्ता वस्तुएं खो दीं। * **बेरोजगारी और गरीबी:** जैसे ही कारखाने बंद हुए और व्यवसाय ठप हो गए, लाखों लोगों ने अपनी नौकरियां खो दीं। अमेरिका में, 1933 तक 4,000 से अधिक बैंक बंद हो चुके थे और 1929 से 1932 के बीच लगभग 110,000 कंपनियां बंद हो गईं। ### भारत पर महामंदी का प्रभाव * **व्यापार में गिरावट:** 1929 और 1934 के बीच भारत का आयात-निर्यात घटकर लगभग आधा रह गया। जैसे ही अंतर्राष्ट्रीय कीमतें गिरीं, भारत में भी कीमतें धड़ाम से गिर गईं। 1929 और 1934 के बीच भारत में गेहूं की कीमतें 50% तक गिर गईं। * **किसानों की दुर्दशा:** शहरी निवासियों की तुलना में किसानों और काश्तकारों को अधिक नुकसान उठाना पड़ा। यद्यपि कृषि कीमतों में भारी गिरावट आई थी, औपनिवेशिक सरकार ने लगान (राजस्व) की मांगों को कम करने से इनकार कर दिया। विश्व बाजार के लिए उत्पादन करने वाले किसान (जैसे बंगाल के जूट उत्पादक) सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए। वे कर्ज के जाल में फंस गए, उन्होंने अपने सोने-चांदी के गहने बेच दिए और अपनी जमीनें गिरवी रख दीं। * **सोने का निर्यात:** इन मंदी के वर्षों में, भारत कीमती धातुओं, विशेष रूप से सोने का निर्यातक बन गया। इस प्रसिद्ध सोने के निर्यात ने ब्रिटेन की आर्थिक सुधार को गति देने में मदद की, लेकिन भारतीय किसानों को इससे कोई राहत नहीं मिली। * **शहरी क्षेत्रों की स्थिति:** शहरी भारत के लिए मंदी उतनी गंभीर साबित नहीं हुई। जमींदार जिन्हें किराया मिलता था और मध्यम वर्ग के वेतनभोगी कर्मचारी खुद को बेहतर स्थिति में पा रहे थे क्योंकि सब कुछ सस्ता हो गया था। राष्ट्रवादी नेताओं के दबाव में सरकार द्वारा उद्योगों को सीमा शुल्क संरक्षण दिए जाने के कारण औद्योगिक निवेश में भी वृद्धि हुई। ### निष्कर्ष\nमहामंदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी आपस में जुड़ चुकी थी। इसने भारत सहित दुनिया भर की ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को तबाह कर दिया, और अंतर्राष्ट्रीय वित्त तथा व्यापार पर अत्यधिक निर्भरता की कमजोरियों को उजागर किया।
Q11. 'ब्रेटन वुड्स की जुड़वां संतानें' (Bretton Woods Twins) से क्या अभिप्राय है? द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के युग में इनकी स्थापना क्यों की गई थी? 3 Marks
उत्तर (Answer): युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक दुनिया में आर्थिक स्थिरता और पूर्ण रोजगार बनाए रखना था। इसकी रूपरेखा पर जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक और वित्तीय सम्मेलन में सहमति बनी थी। ब्रेटन वुड्स सम्मेलन ने अपने सदस्य देशों के बाहरी अधिशेष और घाटे से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक कोष (IMF) की स्थापना की। युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के वित्तपोषण के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (जिसे आमतौर पर विश्व बैंक के रूप में जाना जाता है) की स्थापना की गई थी। IMF और विश्व बैंक को ब्रेटन वुड्स संस्थान या कभी-कभी 'ब्रेटन वुड्स की जुड़वां संतानें' कहा जाता है। युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली को अक्सर ब्रेटन वुड्स प्रणाली भी कहा जाता है। इन संस्थानों की स्थापना एक स्थिर वैश्विक आर्थिक वातावरण सुनिश्चित करने, 1929 जैसी विनाशकारी आर्थिक मंदी की पुनरावृत्ति को रोकने और यूरोप व एशिया की युद्ध से तबाह हुई अर्थव्यवस्थाओं का पुनर्निर्माण करने के लिए की गई थी।
Q12. 1929 की महामंदी के मुख्य कारण क्या थे? इसके प्रभाव को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): महामंदी की शुरुआत लगभग 1929 में हुई और यह 1930 के दशक के मध्य तक जारी रही। इस अवधि के दौरान, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भारी गिरावट दर्ज की गई। इस मंदी के दो मुख्य कारण थे। पहला, कृषि क्षेत्र में अति-उत्पादन (overproduction) एक बड़ी समस्या बनी हुई थी। जैसे-जैसे कृषि उत्पादों की कीमतें गिरीं और किसानों की आय कम हुई, किसानों ने अपनी कुल आय को बनाए रखने के लिए उत्पादन बढ़ाने और बाजार में अधिक मात्रा में उपज लाने का प्रयास किया। इससे बाजार में खाद्यान्न की अधिकता हो गई और कीमतें और भी गिर गईं। दूसरा, 1920 के दशक के मध्य में, कई देशों ने अमेरिका से ऋण लेकर अपने निवेश का वित्तपोषण किया था। जब स्थिति अच्छी थी तब अमेरिका से ऋण लेना आसान था, लेकिन संकट के पहले संकेत पर अमेरिकी ऋणदाताओं में घबराहट फैल गई। 1928 की पहली छमाही में अमेरिकी विदेशी ऋण 1 बिलियन डॉलर से अधिक था, जो एक वर्ष बाद घटकर उसका एक चौथाई रह गया। अमेरिकी ऋणों पर निर्भर देशों को तीव्र संकट का सामना करना पड़ा।
Q13. 'अनुबंधित श्रम' (गिरमिटिया मजदूर) से क्या अभिप्राय है? उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों की स्थिति का वर्णन कीजिए। 3 Marks
उत्तर (Answer): अनुबंधित श्रम (गिरमिटिया मजदूर) से तात्पर्य एक ऐसे बंधुआ मजदूर से है जो किसी नए देश या स्थान पर जाने के खर्च के बदले एक निश्चित समय तक किसी नियोक्ता के लिए काम करने के अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के तहत बंधा होता था। उन्नीसवीं शताब्दी में, भारत और चीन के लाखों मजदूर दुनिया भर में बागानों, खदानों और सड़क व रेलवे निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए गए। भारत में, अनुबंधित श्रमिकों को ऐसे अनुबंधों के तहत काम पर रखा जाता था जिसमें उनके नियोक्ता के बागान पर पांच साल काम करने के बाद भारत लौटने की यात्रा का वादा किया जाता था। अधिकांश भारतीय गिरमिटिया मजदूर वर्तमान पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत और तमिलनाडु के सूखे जिलों से आते थे। इन श्रमिकों के रहने और काम करने की स्थिति अत्यंत कठिन थी और उनके पास बहुत कम कानूनी अधिकार थे। इसे अक्सर 'गुलामी की नई प्रणाली' के रूप में वर्णित किया गया था। यदि श्रमिक जंगलों में भागने की कोशिश करते थे, तो पकड़े जाने पर उन्हें गंभीर सजा दी जाती थी। हालांकि, उन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक रूपों को मिलाकर आत्म-अभिव्यक्ति के नए तरीके भी विकसित किए।
Q14. कॉर्न लॉ (मक्का कानून) क्या थे? इन्हें क्यों समाप्त किया गया और इनके समाप्त होने का ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा? 3 Marks
उत्तर (Answer): अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से, ब्रिटेन में जनसंख्या वृद्धि ने खाद्यान्न की मांग बढ़ा दी थी। जैसे-जैसे शहरी केंद्रों का विस्तार हुआ और उद्योगों का विकास हुआ, कृषि उत्पादों की मांग बढ़ती गई, जिससे खाद्यान्न की कीमतें बढ़ गईं। बड़े भूस्वामियों के दबाव में, ब्रिटिश सरकार ने मक्के के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। जिन कानूनों के तहत सरकार को ऐसा करने की अनुमति मिली थी, उन्हें आमतौर पर 'कॉर्न लॉ' (मक्का कानून) कहा जाता था। खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतों से नाखुश उद्योगपतियों और शहरी निवासियों ने सरकार को कॉर्न लॉ समाप्त करने के लिए मजबूर किया। कॉर्न लॉ के निरस्त होने के बाद, ब्रिटेन में भोजन का आयात देश के भीतर उत्पादित होने वाले भोजन की तुलना में अधिक सस्ते में किया जा सकता था। ब्रिटिश कृषि आयात का मुकाबला करने में असमर्थ थी। भूमि के विशाल क्षेत्रों को बिना खेती के छोड़ दिया गया, और हजारों पुरुष और महिलाएं बेरोजगार हो गए। वे काम की तलाश में शहरों की ओर भागे या विदेशों में चले गए, जिससे वैश्विक खाद्य अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आया।
Q15. स्पष्ट कीजिए कि अमेरिका पर स्पेनिश विजय केवल बेहतर सैन्य मारक क्षमता का परिणाम नहीं थी, बल्कि जैविक युद्ध के कारण भी थी। 3 Marks
उत्तर (Answer): सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक अमेरिका पर पुर्तगाली और स्पेनिश विजय और उपनिवेशीकरण निर्णायक रूप से शुरू हो चुका था। हालाँकि, यूरोपीय विजय केवल बेहतर सैन्य मारक क्षमता का परिणाम नहीं थी। वास्तव में, स्पेनिश विजेताओं का सबसे शक्तिशाली हथियार कोई पारंपरिक सैन्य हथियार नहीं था, बल्कि चेचक जैसे कीटाणु थे जो वे अपने साथ लाए थे। लंबे समय तक दुनिया से अलग-थलग रहने के कारण, अमेरिका के मूल निवासियों में यूरोप से आने वाली इन बीमारियों के खिलाफ कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) नहीं थी। चेचक विशेष रूप से एक घातक हत्यारा साबित हुआ। एक बार फैलने के बाद, यह किसी भी यूरोपीय हमलावर के पहुँचने से पहले ही महाद्वीप के भीतर तक फैल गया। इसने पूरे के पूरे समुदायों को नष्ट कर दिया, जिससे विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ। बंदूकों के विपरीत, जिन्हें खरीदा जा सकता था या छीनकर हमलावरों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता था, चेचक जैसी बीमारियों का मुकाबला मूल अमेरिकी नहीं कर सकते थे क्योंकि उनमें प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता की कमी थी।