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पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है, जिसे बनाने के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जो आर्थिक रूप से साध्य और सांस्कृतिक रूप से मान्य है, संसाधन कहलाती है।
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#### (A) उत्पत्ति के आधार पर:
1. जैव संसाधन (Biotic): इनकी प्राप्ति जीवमंडल से होती है और इनमें जीवन व्याप्त होता है।
2. अजैव संसाधन (Abiotic): वे सभी संसाधन जो निर्जीव वस्तुओं से बने हैं।
#### (B) समाप्यता के आधार पर:
1. नवीकरण योग्य संसाधन (Renewable): जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पुन: उत्पन्न किया जा सकता है।
2. अनवीकरण योग्य संसाधन (Non-Renewable): इनके विकास में लाखों वर्ष लग जाते हैं। ये एक बार उपयोग करने पर समाप्त हो जाते हैं।
#### (C) स्वामित्व के आधार पर:
1. व्यक्तिगत संसाधन: निजी व्यक्तियों के स्वामित्व वाले संसाधन (उदा. निजी मकान, खेत, बाग)।
2. सामुदायिक संसाधन: समुदाय के सभी सदस्यों को उपलब्ध (उदा. सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, श्मशान भूमि)।
3. राष्ट्रीय संसाधन: कानूनी रूप से देश की सरकार का अधिकार। देश की राजनीतिक सीमाओं एवं तट रेखा से 12 समुद्री मील (22.2 किमी) तक का समुद्री क्षेत्र।
4. अंतर्राष्ट्रीय संसाधन: अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नियंत्रण में। तट रेखा से 200 समुद्री मील से परे खुला महासागरीय क्षेत्र (विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र)।
#### (D) विकास के स्तर के आधार पर:
1. संभावी संसाधन: जो किसी प्रदेश में विद्यमान हैं परंतु इनका उपयोग नहीं हुआ है (उदा. राजस्थान व गुजरात में पवन और सौर ऊर्जा)।
2. विकसित संसाधन: जिनका सर्वेक्षण किया जा चुका है और उनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है।
3. भंडार: पर्यावरण में उपलब्ध वे पदार्थ जो मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं, परंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में पहुँच से बाहर हैं (उदा. जल से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन पृथक करना)।
4. संचित कोष: यह भंडार का ही हिस्सा है, जिसे उपलब्ध तकनीकी ज्ञान की सहायता से प्रयोग में लाया जा सकता है, परंतु इसका उपयोग अभी शुरू नहीं हुआ है (उदा. बांधों में जल, वन)।
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संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए नियोजन आवश्यक है। इसके 3 मुख्य चरण हैं:
1. देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना (सर्वेक्षण, मानचित्रण)।
2. संसाधन विकास योजनाएं लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत ढांचा तैयार करना।
3. संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समन्वय स्थापित करना।
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#### भू-निम्नीकरण के प्रमुख कारण एवं उपाय:
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| मृदा का प्रकार | मुख्य विशेषताएं | क्षेत्र/विस्तार | मुख्य फसलें |
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| 1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil) | सर्वाधिक उपजाऊ और विस्तृत। सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र द्वारा निर्मित। दो प्रकार: खादर (नया जलोढ़ - अधिक उपजाऊ) और बांगर (पुराना जलोढ़ - कंकड़ युक्त)। | संपूर्ण उत्तरी मैदान, तटीय मैदान | गेहूं, चावल, गन्ना, दलहन |
| 2. काली मृदा (Black / Regur Soil) | इसे 'रेगर' मृदा भी कहते हैं। लावा जनक शैलों से निर्मित। नमी धारण करने की उच्च क्षमता। | महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश | कपास (सर्वोत्तम), मूंगफली |
| 3. लाल और पीली मृदा | लोहे के कणों के कारण लाल रंग; जलदोजन (Hydration) पर पीली दिखाई देती है। | ओडिशा, छत्तीसगढ़, दक्कन पठार | मोटे अनाज, दालें |
| 4. लेटराइट मृदा | ग्रीक शब्द 'Later' (ईंट) से बना। अत्यधिक वर्षा व निक्षालन (Leaching) से निर्मित। | कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश | काजू, चाय, कॉफी |
| 5. मरुस्थलीय मृदा | रेतीली और लवणीय। ह्यूमस और नमी की कमी। | पश्चिमी राजस्थान | बाजरा, सरसों |
| 6. वन मृदा | पर्वतीय क्षेत्रों में। नदी घाटियों में दोमट और सिल्टदार, ऊपरी ढालों पर अम्लीय। | हिमालयी/पर्वतीय क्षेत्र | फल, चाय |
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#### मृदा अपरदन के प्रकार:
1. अवनलिका अपरदन (Gully Erosion): बहता जल मृदा को काटते हुए गहरी वाहिकाएं (नालियां) बनाता है। ऐसी भूमि को उत्खात भूमि (Badland) कहते हैं (उदा. चंबल बेसिन में 'खड्ड' या Ravines)।
2. चादर अपरदन (Sheet Erosion): जल की विस्तृत चादर ढाल के साथ नीचे बहती है और ऊपरी मृदा बह जाती है।
#### मृदा संरक्षण के मुख्य उपाय:
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