कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान - वन और वन्यजीव संसाधन (Quick Revision Notes)
---
परिचय (Introduction)
पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवाणुओं और बैक्टीरिया से लेकर बरगद, हाथियों और नीली व्हेल तक करोड़ों जीव-जातियाँ निवास करती हैं। हम इन सभी जीवों के साथ एक जटिल पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं, जिसे जैव विविधता (Biodiversity) कहते हैं।
---
1. वन और वन्यजीवों का ह्रास (Decline of Forests and Wildlife)
- कारण:
- औपनिवेशिक काल से रेलवे, कृषि, वाणिज्यिक और वैज्ञानिक वानिकी का विस्तार।
- स्थानांतरित खेती (झूम खेती) - पूर्वोत्तर और मध्य भारत में।
- बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएँ (जैसे- नर्मदा घाटी परियोजना के कारण सरदार सरोवर बांध से जलमग्न होने वाला जंगल)।
- खनन गतिविधियाँ (जैसे- पश्चिम बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व डोलोमाइट खनन के कारण खतरे में)।
- पशुओं की चराई और ईंधन के लिए लकड़ी की कटाई।
---
2. अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार जातियों का वर्गीकरण
- सामान्य जातियाँ (Normal Species): जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य है (जैसे- साल, चीड़, कृंतक)।
- संकटग्रस्त जातियाँ (Endangered Species): जिनके विलुप्त होने का खतरा है (जैसे- काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय गेंडा, शेर की पूंछ वाला बंदर)।
- सुभेद्य जातियाँ (Vulnerable Species): जिनकी संख्या घट रही है और संकटग्रस्त श्रेणी में पहुँच सकती है (जैसे- नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन)।
- दुर्लभ जातियाँ (Rare Species): जिनकी संख्या बहुत कम है (जैसे- हिमालयन भालू, जंगली भैंसा)।
- स्थानिक जातियाँ (Endemic Species): जो विशेष क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं (जैसे- अंडमान टील, अंडमान जंगली सूअर, अरुणचल का मिथुन)।
- विलुप्त जातियाँ (Extinct Species): जो उपलभ्ध क्षेत्रों में नहीं पाई जातीं (जैसे- एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख)।
---
3. भारत में वन और वन्यजीव संरक्षण (Conservation of Forests and Wildlife in India)
- भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (Wildlife Protection Act): यह अधिनियम वर्ष 1972 में लागू किया गया, जिसका उद्देश्य जंगली जीवों और पौधों की प्रजातियों की रक्षा करना था।
- संरक्षण के चरण:
- बाघों की आबादी को बचाने के लिए 'प्रोजेक्ट टाइगर' (Project Tiger) वर्ष 1973 में शुरू किया गया था।
- इसके अंतर्गत संरक्षित प्रजातियाँ: एक सींग वाला गेंडा, कश्मीरी हिरण (हांगुल), तीन प्रकार के मगरमच्छ (ताजे पानी के, खारे पानी के और घड़ियाल), एशियाई शेर आदि।
---
4. वन और वन्यजीव संसाधनों के प्रकार और वितरण
भारत में वन और बंजर भूमि सरकार के नियंत्रण में हैं, जिन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
1. आरक्षित वन (Reserved Forests): देश के आधे से अधिक वन क्षेत्र इस श्रेणी में आते हैं। इन्हें सबसे मूल्यवान माना जाता है।
2. रक्षित वन (Protected Forests): कुल वन क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा। इनकी और अधिक बर्बादी से सुरक्षा की जाती है।
3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests): अन्य सभी प्रकार के वन और बंजर भूमि जो सरकार और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं।
(नोट: आरक्षित और रक्षित वनों को 'स्थायी वन क्षेत्र' कहा जाता है, जिनका रखरखाव वनों और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए किया जाता है। मध्य प्रदेश में सबसे अधिक स्थायी वन क्षेत्र है।)
---
5. सामुदायिक और नागरिक प्रयास (Community and Conservation)
- सरिस्का बाघ रिजर्व (राजस्थान): यहाँ के ग्रामीणों ने माइनिंग (खनन) कार्यों का विरोध किया क्योंकि वे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत इसे बचाना चाहते थे।
- चीपको आंदोलन: हिमालय क्षेत्र में वनों की कटाई को रोकने और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रसिद्ध आंदोलन।
- बीज बचाओ आंदोलन: टिहरी के किसानों और नवदर्शन द्वारा रासायनिक उर्वरकों के बिना पारंपरिक बीज उत्पादन को बढ़ावा देना।
- संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM): भारत में वनों के संरक्षण और प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी का कार्यक्रम। इसकी शुरुआत औपचारिक रूप से 1988 में ओडिशा राज्य से हुई थी।
- बिश्नोई समाज: राजस्थान के विश्नोई गाँवों के पास काले हिरण, चिंकारा और पेड़ों के प्रति अटूट प्रेम और संरक्षण का अनूठा उदाहरण आज भी देखा जा सकता है।
---
याद रखें: पर्यावरण और वन्यजीवों का संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।